हिन्दुस्तानी शास्त्रीय गायन में महिला कलाकारों का योगदान

राकेश कलोत्तरा

पी.एच.डी. शोधार्थी,संगीत विभाग,दिल्ली विश्वविद्यालय,दिल्ली . सम्पर्क:  rakeshkalotra21@gmail.comमो. 9717655412

भारतीय शास्त्रीय संगीत का इतिहास वैदिक काल से ही माना जाता है. मानव और संगीत का इतना गहरा संबंध है ,जो उसके जन्म के साथ ही चला आ रहा है. प्राचीन साहित्य के उल्लेखों को देखतें हुए यह अनुमान लगाया जा सकता है कि जहां तक धार्मिक अवसर का संबंध था ब्राह्मण एवं क्षत्रिय दोनों वर्ग अपने जातिगत धर्म के अनुसार यज्ञादि में भाग लेते थे. यज्ञ में धार्मिक संस्कारों पर कन्याओं एवं यजमानों की पत्नियों का संगीत से संबंध प्राप्त होता है. साम-गायन जैसे धार्मिक अवसर तथा अन्य यज्ञ एवं धार्मिक संस्कारों के अवसरों से लेकर सामाजिक अवसरों तक में स्त्रियों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है .महाव्रत यज्ञ इत्यादि के अवसर पर साम गायक पुरुषों के साथ–साथ उनकी स्त्रियाँ गायन-वादन करती थीं. दास कुमारियों द्वारा नृत्य तथा  गाथाओं का गायन किया जाता था. संगीत संबंधी सभी अवसरों पर महिलाओं का विशेष सहयोग रहता था. ऋग्वेद में स्त्रियों के गायन और नृत्य की चर्चा गई है.

‘शतपथब्राह्मण’ तैत्तिरीय संहिता’ आदि में भी साम-गान स्त्रियों का विशेष कार्य माना गया तथा उस समय भी संगीत स्त्रियों का विशिष्ट गुण माना जाता था. महाभारत काल में भी स्त्रियों की संगीत में विशेष भूमिका रही है. जिसमें क्षत्रिय वर्ग की स्त्रियों द्वारा विराट पर्व में नृत्य कला की प्रस्तुतियाँ एवं ब्राह्मण कुल की स्त्रियों के साम गायन आदि के उल्लेख मिलतें हैं. देवगंधर्वो के साथ साथ मेनका, रंभा आदि अप्सराओं के नृत्य कारामायण काल में भी उल्लेख मिलता है| अनेक प्रकार के उत्सवों में स्त्रियों द्वारा गायन-वादन तथा नृत्य के कार्यक्रम प्रस्तुत किए जाते थे. महाभारत युग में भी संगीत स्त्रियों के लिए निषिद्ध नहीं था.

हरिवंश पुराण’ में ऐसा उल्लेख मिलता है कि यादवों का अत्यंत प्रिय गान छालिक्य गान था. विष्णु पर्व में ऐसापाया जाता है कि महाराजा अग्रसेन ने अपना राज्य-भार वसुदेव को सौंप कर श्री कृष्ण और यादवों के साथसमुद्र-यात्रा की थी. जिसमें सत्यभामा,रेवती के आलावा सोला सौ रमणियां भी श्री कृष्ण के साथ थीं औरयादवों ने अपनी पत्नियों को भी साथ लिया था. क्रीड़ा के समय विभिन्न नृत्य गीतों का आयोजन हुआ था. इसके लिये अप्सरा आदि नर्तकियां भी साथ थीं. इन अप्सराओं ने नृत्य, गीत,वाद्य में अपना योगदान दिया और नर्तकी रंभा ने असारित नृत्य के बाद अपने नृत्य से सबको विमुग्ध कर दिया था. यह उल्लेखनीय है कि प्रथम और द्वितीय शताब्दी में कई नट-नटिनियों की मूर्तियाँ मिलती हैं, जिससे यह प्रमाणित होता है कि उस कल में भी गीत, वाद्य, नृत्य आदि में महिलाओं का योगदान था. इस प्रकार की मूर्तियाँ हमें हिन्दू मंदिरों व बुद्ध विहारों में भी मिलती हैं. मुगलकाल के मोहम्मद शाह रंगीले के दरबार में गायिकाएं और नर्तकियां गायन, वादन, नृत्य और शास्त्र की विधिवत शिक्षा ग्रहण करतीं थीं. रामपुर की सदारंग परम्परा के प्रतिनधि आचार्य बृहस्पति के अनुसार मुगलकाल में अकबर के राज्य के समय में संगीत का उत्कर्ष चरम पर था. उनके दरबार में कई संगीतज्ञ थे, जिनमें तानसेन का नाम विशेष उल्लेखनीय है. तानसेन की पुत्री सरस्वती बड़ी कलाकार हुई जिसका विवाह मिश्री सिंह (नौबत खां) के साथ हुआ.


इसी काल में ग्वालियर घराना अपनी अष्टांग गायकी के लिये प्रसिद्ध रहा है. इस घराने की शिष्य परम्परा बहुत
बड़ी है. अन्य सभी संगीत घरानों का उद्गम भी इसी घराने से मन जाता है. इस घराने के काशीनाथ बुवा की
शिष्या सुशीला मराठे, बलदेव जी बुवा की शिष्या डॉ. सुमति मुटाटकर, गजानन बुवा जोशी की शिष्या मांजरेकर, पंडित ओंकारनाथ ठाकुर की शिष्या बिजनवाल, विनायक राव पटवर्धन की शिष्या कमल केलकर,कालिंदी केलकर एवं सुनंदा पटनायक, बलवंत राय भट्ट की शिष्या सुभद्रा चौधरी. पंडित गोविन्द राव राजुरकर की शिष्या मालिनी राजुरकर, पंडित कुमार गंधर्व की पत्नी वसुंधरा कोमकाली एवं शिष्या मीरा राव, पंडितशंकर राव बोडस  की पुत्री एवं शिष्या वीणा सहस्त्रबुद्धे, लक्ष्मण पंडित की शिष्या चित्रा चक्रवर्ती तथा आशालता करल्गीकर के नाम उल्लेखनीय हैं. इन गायिकाओं ने हिन्दुस्तानी शास्त्रीय गायन में अच्छी ख्याति आर्जित की. हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के इतिहास के बारे में चर्चा की जाये तो इस क्षेत्र में अनेक महान विदुषी गायिकाएं हुई हैं. जिन्होंने शास्त्रीय संगीत को विकसित किया. इतिहास का कोई कालखंड ऐसा नहीं है जब महिलाओं ने अपनी कलाप्रियता एवं सृजन कौशल का परिचय न दिया हो. स्त्री और कला एक दूसरे की पर्यावाची हैं. स्त्री सृष्टि की वह सुंदर रचना है  जिसका संबंध ललित कलाओं से होना स्वाभाविक है. अर्थात गायन-वादन और नृत्य के गुण उसमें स्वभावतः पाये जाते हैं. गायन के क्षेत्र में महिला कलाकारों ने क्रियात्मक संगीत के साथ-साथ नित्य नवीन रागों का निर्माण एवं गायन शैलियों में नये जोड़ का समावेश कर अपनी सृजनात्मक प्रतिभा को अनन्त विस्तार दिया है.


इन महान गायिकाओं की निरंतर कठोर साधना, रियाज़, शिक्षातथा जिस लगन के साथ इस कला को उन्होंने अपनाया है उसे देखकर हम उनकेसामने नतमस्तक हो जाते हैं.हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की अनमोल गायन परम्परा को आधुनिक काल में भी अनेक संगीत साधिकाओं ने अपनी योग्यता और सृजन क्षमता से भारतीय संगीत को अति उच्च स्थान पर पहुँचाया है. इनमें प्रमुख नाम हैं-सुश्री केसरबाई केरकर, किराना घराने की गान कोकिला हिराबाई बडोदेकर, जयपुर घराने की गायिका मोगुबाई कुर्डीकर, मल्लिका-ए- ग़ज़ल बेग़म अख्तर, गंगूबाई हंगल, डॉ. प्रभा आत्रे, गान सरस्वती किशोरीअमोनकर, शोभा गुर्टू, मालिनी राजुरकर, परवीन सुलताना और सुगम संगीत की अलौकिक आवाज़ की गायिका लता मंगेशकर आदि हिन्दुस्तानी संगीत के जगमगाते सितारे हैं. इन सब गायिकाओं ने अपने जीवन में अनेक कठिनाइयों का सामना करते हुए अपनी लगन तथा मेहनत से गायिकी में अपने आपको निपुण बनाने के लिए कठोर साधना की और शास्त्रीय गायन की समृद्ध परम्परा को आगे बढ़ाने में विशिष्ट भूमिका निभायी.

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