सिंदूर बना विमर्श : पक्ष-विपक्ष में रचनाकार, मैत्रेयी पुष्पा हुईं ट्रॉल


यह सप्ताह स्त्रीवादी विमर्श के खाते में रहा. जहां अमेरिका स्थित भारतीय वकील सारा राय ने विद्यार्थियों के यौन उत्पीड़क प्रोफेसरों की सूची जारी की और उसपर कुछ स्त्रीवादियों ने प्रतिवाद किया वहीं हिन्दी अकादमी,दिल्ली की उपाध्यक्ष और चर्चित साहित्यकार मैत्रेयी पुष्पा ने 'बिहारी महिलाओं' के सिंदूर पोतने पर सवाल खड़ा कर छठ के अवसर को सोशल मीडिया पर विमर्श का अवसर बना दिया. रचनाकारों और अन्य लोगों से ट्रॉल  होकर उन्होंने पोस्ट हटा ली. हालांकि स्क्रीन शॉट घूम रहा है. पढ़ें पक्ष-विपक्ष की कुछ टिप्पणियाँ.



बिहारी औरतों की मांग में सिंदूर देखकर भडकिए मत.यह सिंदूर स्वाभाविक है,नकली नहीं है।इसी तरह जानकर रखें कि दुर्गा पूजा के समय बंगाली औरतें देवी के पंडाल में सिंदूर खेला,खेलती हैं.सिंदूर औरत के आनंद की निशानी है.पति की नहीं।
जगदीश्वर चतुर्वेदी 

मेरा सिंदूर : सांस्कृतिक प्रतीक
तेरा बुर्का : धार्मिक प्रतीक
हे हिन्दू नारी तुम भी क्या कमाल करती हो ...धार्मिक कर्म कांड को तथाकथित संस्कृति से रिप्लेस कर धमाल करती हो ...
#जय_हमारा_नारीवाद
नूतन यादव 

जिन्हें बिहार की महिलाओं के नाक से सिंदूर लगाने से,पूरी मांग सिंदूर लगाने से ऐतराज़ है तो वे ये बताएं कि उन्होंने खुद का विवाह हिन्दू रीति से क्यो किया? क्यो किया सिंदूर दान,क्यो पहना मंगलसूत्र? क्यो सर पर आँचल रखती है? नाक से सिंदूर लगाना छठ पूजा पर हमारे बिहार की संस्कृति है,जिन्हें हम पसंद से करते हैं। जिसमे कोई दास प्रथा नाम की चीज ही नहीं। हम किसी की बंदिनी नही,जीवनसंगिनी बनकर रहते है,ताउम्र।😊
विभा रानी 

आपत्तिजनक टिप्पणी के सन्दर्भ में, उनसे एक बेबाक सम्वाद...........

.पुष्पा दीदी, हैरान हूँ आपके द्वारा किसी की आस्था पे किए गए उपहास जनक प्रहार से ! वैसे आप उम्रदराज़ होने के कारण अनुभव सम्पन्न है, साथ ही, लेखन से जुडी होने के कारण संवेदनशील और विचारशील भी है, सो जानती ही होगी कि किसी की भी आस्था पर चोट करना ‘संस्कारहीनता और संवेदनहीनता’ कहलाती है ! सिन्दूर लगाने की बात हो या व्रत-उपवास रखने की बात; ये सब भारतीय संस्कृति जुडी हुई सदियों से प्रेम और निष्ठा के तहत चली आ रही प्यारी आस्थाएं हैं ! उसमें किसी को किसी की आलोचना करने या मखौल सा उड़ाते हुए सवाल करने का हक नही ! आप व अन्य कोई सुहागन सिन्दूर नही लगाती, तो कोई बात नही क्योंकि ऐसा करने में आपकी और उनकी आस्था नही है ! इसी तरह जिन बहिनों की आस्था है, यदि उन्हें ऐसा करना पसंद है, उन्हे इससे सुख-सुकून मिलता है, तो उस पर आपके द्वारा ‘पोतना’ शब्द का प्रयोग करते हुए सवाल करना उचित नही ! आपने लिखा ‘क्यों पोत रच लेती है’....यदि कोई आपसे पूछने लगे कि आप विवाहित है पर आप माँग सूनी क्यों रखती है, सिन्दूर से क्यों नही भरती, बिछुए क्यों नही पहनती...वगैरा, वगैरा, तो दूसरे का ऐसा सोचना और पूछना भी गलत है ! यदि आपकी सोच, आपकी धारणा, दूसरों की तरह नही है, तो इसका मतलब यह नही कि सदियों से चली आ रही आस्थाओं के साथ जीने वाली स्त्रियों को, आप अपनी सोच, अपनी पसंद का हवाला देते हुए, पाठ पढाने लगे - ‘’ मैंने नहीं किया विवाह सिन्दूर की ख़ातिर , नहीं सहेजी कभी सिंदूर की डिबिया , नही सजाई माँग सिन्दूरी रंग से ।उसको नहीं माना वर , सुहाग और पति परमेश्वर । वह मेरे सुख दुख का साथी है ,सहचर है ।प्रेम मोहब्बत और विश्वास के साथ हम एक संग हैं’’

.Who cares………कि आपने विवाह क्यों किया ? आपसे कौन पूछ रहा है कि आप को पति वर, सुहाग मानती है या चौकीदार, बौडीगार्ड या पहरेदार ? किसी को रूचि नही है आपके वैवाहिक जीवन से जुडी बातो, या आपके करम-धरम और आपकी सोच को जानने की ! न आपके जीवन में झाँकने की और कमेन्ट पास करने की ! फिर आपका क्या अधिकार बनता है कि आप अन्य स्त्रियों की आस्था और धारणा पर चोट करे और पौराणिक उदाहरण देकर सिन्दूर की छीछालेदर करे ! सिन्दूर आपके लिए महज एक लाल रंग की ‘कुनाई’ हो सकता है, ‘चूरा’ हो सकता है, लेकिन दूसरी स्त्री के लिए वह प्रेम का पवित्र ‘भाव’ हो सकता है, उसे प्राणों से प्यारा हो सकता है ! भारत की हर शिक्षित-अशिक्षित आम स्त्री, निस्वार्थ भाव से वैवाहिक जीवन को लेकर, जो मूल्य-संस्कार मन में संजोये होती है, याद रखिये कि वे पुरुष द्वारा उसकी कद्र या उपेक्षा ‘से परे होते हैं ‘! पुरुष उसे प्यार करे या दुत्कारे - इसकी परवाह किए बिना, स्त्री अपनी आस्था पे कायम रहती है और उसकी यह दृढ़ता और विश्वास, स्त्री स्वभाव की ‘उदात्तता’ का परिचायक है !
.आपकी तरह, अन्य स्त्रियों को भी तो अपनी मान्यताओं,आस्था और विश्वास को संजोने का हक है ? अगर पौराणिक पात्रों की ही आप बात करती है तो, आपको सीता तो यद रही पर आप सावित्री को क्यों भूल गई, जो यम से पति को छुड़ा लाई थी ! आप पार्वती का हवाला भी दीजिए जिसने सिन्दूर और ‘करवाचौथ’ के व्रत के बल पर, शिव जैसे ‘महादेव’ को पाया था। द्रौपदी को मत भूलिए, जिसने कृष्ण के बताये अनुसार, जब सिन्दूर धारण करके करवाचौथ का व्रत रखा तो , उसके प्रताप और बल से पांडवो की महाभारत के युद्ध में विजय हुई थी ! निश्चित ही पांडवो का पुरुषार्थ तो था ही लेकिन स्त्री की प्रार्थना की शक्ति से वह चौगुना हो गया ! इसी तरह आप इस पौराणिक तथ्य को भी जानिये कि श्रीराम बालि को मारने ही वाले थे तो उनकी नजर अचानक बालि की पत्नी तारा की मांग पर पड़ी, जो कि सिंदूर से भरी हुई थी। इसलिए उन्होंने सिंदूर का सम्मान करते हुए बालि को नहीं मारा।


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.तो दीदी किसी की आस्था पर प्रश्नचिन्ह मत लगाईये और उनकी आस्थाओं को निरर्थक सिद्ध मत कीजिए ! याद रखिये कि आस्थाएँ, तर्कों से अधिक ताकतवर होती है और उनसे निकली प्रार्थनाएँ अद्भुतं परिणाम भि देती आई है ! इसलिए ही अनेक डॉक्टर ईश्वर पर अपनी आस्था के तहत, क्लीनिक में सम्मान से इस उक्ति को मुख्य स्थान पर लगाते देखे गए हैं :
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. I treat, 'He' cures
सो आस्थाओं को तोडना किसी के वश में नही ! उनकी नीव बड़ी गहरी होती है और उन पर टिका विश्वास सघन होता है ! इसलिए सबकी भावनाओ का सम्मान करना सीखिए !
दीप्ति गुप्ता 

सिंदूर लगाना या ना लगाना किसी महिला का व्यक्तिगत मामला हो सकता है, लेकिन छठ पूजा के दौरान सिंदूर नाक से लगाने की परंपरा पर सवाल उठाने पर दिग्गज साहित्यकार मैत्रेयी पुष्पा जी का जिस तरह से अपमान हुआ. उसे क्या कहा जाये? एक महिला पर इतनी आपत्तिजनक टिप्पणी? आखिर एक सवाल ही तो किया है उन्होंने, क्या एक सवाल मात्र से छठ पूजा की महत्ता कम हो जायेगी? या जो सवाल मैत्रेयी जी कर रही हैं, उसमें वही बात छुपी है जो एक स्त्री अधिकारों की पैरोकार होने के नाते वो कह रही हैं. सवाल उठाना तो एक लेखक एक्टिविस्ट का धर्म है, समाज जवाब दे, लेकिन सवाल की तो भ्रूण हत्या ना करे? जैसे बेटियों की कोख में करते हैं?

रजनीश आनंद 


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