समकालीन ग़ज़ल में मुखर होता महिला रचनाकारों का स्वर

के. पी. अनमोल
हिन्दी ग़ज़ल क्षेत्र के उल्लेखनीय गज़लकार और आलोचक. ‘साहित्य रागिणी’ और ‘हस्ताक्षर’ वेब पत्रिका के संपादक.. संपर्क : मो. 8006623499
kpanmol.rke15@gmail.com

दुष्यन्त कुमार के अवतरण के बाद हिन्दुस्तानी साहित्य में ग़ज़ल विधा ने प्रमुखता से स्थान बनाया है। आज यह विधा कविता से भी अधिक लोकप्रिय होने की स्थिति में है। इसका कारण इसका तयशुदा लयात्मक प्रारूप और सरल-सहज शब्दावली में हर ख़ासो-आम के मन की बात प्रभावी तरीक़े से उकेरना है।

दुष्यन्त के बाद हिन्दुस्तानी ग़ज़ल में अनेक उम्दा ग़ज़लकार आये और उसे समृद्ध किया। आज हिन्दुस्तानी ग़ज़ल के पास ऐसे कई नाम हैं जो इस विधा के जाने-माने चेह्रे हैं। लेकिन अगर बात महिला ग़ज़लकारों की की जाए तो गिनती के लिए शायद हमें उँगलियों का ही इस्तेमाल करना पड़े।

ऐसा नहीं है कि ग़ज़ल में महिला रचनाकारों ने अभिव्यक्ति की ही नहीं, की है और बहुत सलीक़े से की है। अगर हिन्दुस्तानी ग़ज़ल में महिला रचनाकारों के नाम याद करना चाहें तो डॉ. रमा सिंह, सरोज व्यास, देवी नागरानी, ममता किरण, सिया सचदेव सहित कई नाम ज़ेहन में उभर कर आएँगे। जो लगातार कई सालों से ग़ज़लें कह रही हैं और उन्हें साधने में रत हैं।

वर्तमान में सोशल मीडिया के आने के बाद इस सूचि में बढ़ोतरी हुई है। आज ऐसी अनेक महिला ग़ज़लकारों के नाम पढ़ने-सुनने को मिलते हैं जो इस विधा में धारदार प्रस्तुति दे रही हैं। चूल्हे-चौके और घर की चार-दीवारी से बाहर निकल आज कई महिला ग़ज़लकार देश-दुनिया और समाज की समस्याओं पर भी समान अधिकार से अभिव्यक्ति कर रही हैं। कसे हुए शिल्प के साथ घर और बाहर के कई मुद्दों पर अपनी ग़ज़लों के माध्यम से खुल कर बोल रही हैं।

कच्चा मकां तो ऊँची इमारत में ढल गया
आँगन में वो जो रहती थी चिड़िया किधर गयी
('हस्ताक्षर' वेब पत्रिका, दिसम्बर 2016)

वरिष्ठ ग़ज़लकार ममता किरण अपने इस शेर के माध्यम से विकास की भेंट चढ़े एक प्यारे-से एहसास को बहुत मार्मिकता से हमारे सामने रख, हमें यह सोचने पर विवश करती हैं कि क्या विकास के साथ-साथ हम अपने एहसासों को नहीं बचाए रख सकते!

याद कीजिए वह दिन जब हर घर के आँगन में एक वृक्ष हुआ करता था और उस वृक्ष में अनेक पक्षी अपना बसेरा बनाके रहा करते थे। सुबह सुबह जब आँख खुलती तो इन पक्षियों की तरह तरह की कर्ण-प्रिय आवाज़ें सुनने को मिलतीं। उस वृक्ष की डालियों पर पक्षी जब अठखेलियाँ करते तो उन्हें देखकर मन को कितना सुकून मिलता था। लेकिन आज शहरीकरण के इस दौर में यह दृश्य किसी सपने-सा प्रतीत होता है।

महज आकाश छूना प्यास का मिटना नहीं होता
ज़मीं पर पाँव का टिकना सफ़लता की निशानी है
(सत्यचक्र, ग़ाज़ियाबाद)

डॉ. तारा गुप्ता का यह शेर कितना सकारात्मक और प्रेरणास्पद है। सफ़लता प्राप्त कर लेने के बाद अगर किसी ने ज़मीन छोड़ दी तो उसकी सफ़लता का कोई औचित्य नहीं। यह शेर लाखों युवाओं के लिए मार्गदर्शक हो सकता है।


सामाजिक सरोकारों के साथ साथ महिला ग़ज़लकार एक महिला की ज़िंदगी के विभिन्न पहलुओं को भी बड़ी बारीकी से उकेर रही हैं। एक महिला के जीवन से जुड़े कई अनुभव ऐसे होते हैं जो केवल और केवल एक महिला ही समझ सकती है। ऐसे कई अनुभवों/ पहलुओं को इनकी ग़ज़लों में कथ्य के रूप में जगह मिल रही है। इस बहाने 'स्त्री विमर्श' भी आगे बढ़ता हुआ दिखता है।

नशे में धुत्त अपने आदमी से मार खाकर भी
बहुत ज़िन्दादिली से दर्द को वो भूल जाती है
(समकालीन महिला ग़ज़लकार, सं- हरेराम समीप)

डॉ. मालिनी गौतम के इस शेर के माध्यम से एक बहुत बड़े वर्ग की पीड़ा का बयान हुआ है। कितना वास्तविक और मर्मस्पर्शी शेर हुआ है यह। नशे की लत में डूबे अपने पति से मिली यातना के इस सच का इस तरह यथार्थ बयान किसी पुरुष ग़ज़लकार के शेर में आ पाना बहुत मुश्किल था।

वो समन्दर की तरह शोर मचाने से रही
जबकि सीने में नदी कितने भँवर रखती है

रश्मि सबा के इस शेर में यदि समन्दर और नदी के प्रतीकों का आशय पुरुष और स्त्री से लिया जाए तो शेर कितना खिलकर आता है! यह हक़ीक़त है एक महिला पुरुष की तुलना में कई गुणा दर्द अपने सीने में पालकर रखती है लेकिन उसे उफ्फ्फ़ तक करने की आज़ादी नहीं है। बहुत ही सलीक़े से कहे गए इस शेर की गूंज दूर तक सुनाई देती है।


महिलाओं के लिए असुरक्षित हमारे समाज में एक महिला हमसे क्या उम्मीद करती है, इसे समझना बहुत ज़रूरी है। हमें अपने बच्चों को यह समझ देनी होगी कि एक औरत का क्या मर्तबा है और उसका अदब करना कितना ज़रूरी है। हर पुरुष को यह समझना होगा कि एक बीवी, एक बेटी और एक बहन की क्या ख़्वाहिशें हैं और उन ख़्वाहिशों को पूरा करने के लिए उन्हें किस तरह के माहौल की ज़रूरत है। असमा सुबहानी का यह मार्मिक शेर देखिए जो एक गुहार है हर पुरुष से, हर बीवी, बेटी और बहन की-

उड़ानों के लिए रख लो ये सारा आसमां तुम ही
ज़मीं रहने दो पैरों में हमें इतना ही काफ़ी है

एक लड़की घर-परिवार की हो जाने के बाद अपने परिवारजनों की मिन्नतों, चाहतों और उम्मीदों में इस तरह खट जाती है कि उसे अपने होने का भी एहसास बहुत कम होता है। एक वक़्त के बाद जब उसे ज़िम्मेदारियों से ज़रा-सी फ़ुर्सत मिलती है तब वह अपने आपको टटोलती है और उस वक़्त उसे भान होता है कि इस बीते समय के साथ क्या-क्या पीछे छूट गया, समय कितनी तेज़ी से निकल गया। कुछ यही ख़याल दीपाली जैन 'ज़िया' ने कितना खूबसूरती से शेर में बाँधा है, देखिए-

उम्र ने दहलीज़ तन की लाँघ ली है और हम
आइने में झुर्रियों को ढांपते ही रह गए

एक माँ अपनी औलाद के प्रति क्या भाव रखती है, उसके मन में ममता का सैलाब किस तरह हिलोरें मारता है, यह एक महिला के अलावा कोई अभिव्यक्त नहीं कर सकता। कोख में पल रहे बच्चे से बातें, उसकी पहली किलकारी, पहली बार माँ शब्द का उच्चारा जाना, स्कूल का पहला दिन, औलाद की क़ामयाबी, बिटिया की विदाई आदि कई एहसास ऐसे हैं जो केवल एक माँ ही समझ सकती है। देखिए डॉ. भावना का एक ममता भरा शेर-

बड़ी होकर न जाने कितने वो क़िस्से सुनाएगी
मेरी नवजात बच्ची तो अभी से बात करती है
(हंस, दिसम्बर 16)

इश्क़-मोहब्बत जैसी पाक शय को निभाने का हुनर समझने में जहाँ दुनिया भर के विद्वान चूक जाते हैं, वहीं एक नौजवान शाइरा उसे कितनी आसानी से समझा देती है। देखिए पूनम यादव का एक नाज़ुक-सा शेर-

बड़ी तहज़ीब से निभती है साहिब
मुहब्बत रस्म मामूली नहीं है



हमारी संस्कृति में एक रूमानी जोड़ी; जो प्रेम का प्रतीक सा समझी जाती है, राधा-कृष्ण। कई कई प्रेम-काव्य इनके जीवन पर रचे गए हैं और उनमें लगभग सभी तरह के भाव उनमें समाहित हैं। लेकिन शरारत भरा एक जो ख़याल डॉ. तुलिका सेठ के एक शेर में आया है, वो अन्यत्र मिल पाना मुश्किल है-

कैसे ऊँगली पे कान्हा नचाये गए
राधिका से ज़रा ये पता कीजिए
(आईना ज़िंदगी का, ग़ज़ल संग्रह)

इस तरह हिंदुस्तानी ग़ज़ल में महिला रचनाकार बहुत प्रभावी तरीक़े अपनी उपस्थिति दर्ज करवाती हुई नज़र आती हैं। ख़याल, कहन और लहजे में ताजगी के साथ ये रचनाकार ग़ज़ल विधा को नई ऊँचाइयों तक लेकर जाएँगी, ऐसी कामना अब हर ग़ज़ल-प्रेमी कर सकता है।

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