‘विज्ञापनों में महिलाओं का प्रस्तुतीकरण:आर्थिक और सामाजिक परिप्रेक्ष्य’

उपासना गौतम

पी-एच. डी शोधार्थी,महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय,वर्धा. सम्पर्क: sonpari2003@gmail.com  

प्रस्तावना

लिंगाधारित व्यवस्था में खड़ी विभिन्न संस्थाओं  और उसके घटकों ने स्त्री अधीनस्थता का पूरा लाभ उठाते हुए वैश्वीकरण के दौर में महिलाओं के श्रम और देह को अपने मुनाफे में बदल दिया है । विज्ञापनों और फिल्मों में इसकी बड़ी भूमिका है। विज्ञापनों में महिला का जैसा प्रस्तुतीकरण हो रहा है उस पर गंभीर प्रश्न खड़ा होता है कि आखिर उत्पाद क्या है और किसको बेचा जा रहा है ? महिला के इतने विकृत चित्रण को उत्पाद बिक्री का जरिया बनाने में कौन से कारण और मानसिकता कार्यरत है । यही मुख्य सवाल है जिस पर बाजार के दृष्टिकोण के अनुसार बहुत कुछ लिखा जा चुका है । लेकिन यह विषय नितांत बाजार के दृष्टिकोण के साथ ही अन्य सामाजिक-राजनीतिक पहलुओं को सम्मिलित करने की  अपील करता है जिसे समझना मुख्य बात है ।आज विज्ञापनों में रचनाओं पर अश्लीलता हावी है । विज्ञापन एजेंसियों ने उपभोक्तावाद को एक भ्रामक उच्चवर्गीय जीवन शैली के अंतर्गत प्रचारित  किया है । अयोग्य सामानों को बेचने में महिला की देह का नियोजित ढंग से प्रयोग किया है । पुरुष उत्पादों के विज्ञापनों में महिला माडल को इतने निर्लज्ज तरीके से दिखाते हैं , जो ब्रांडेड परफ्यूम या अंडरवियर के कारण पुरुष का चेहरा चुंबन से भर देती है , संभोग तक कर लेती है। ऐसे  विज्ञापन सिखाते हैं कि सुंदर महिला उसी पुरुष को चाहेगी जिसके पास कीमती ब्रांडेड उपभोक्ता वस्तुएँ हैं । वास्तव में इस उपभोक्तावादी संस्कृति ने औरत को उपभोक्तावाद  के घेरे में जकड़ लिया है ।

 पुरुष उत्पादों के विज्ञापनों में महिला-

 विज्ञापनों में महिलाओं का विज्ञापित होना विचारकों के लिये एक चर्चा का विषय बना हुआ है। फिर चाहे वे टी.वी. के विज्ञापन हों  या फिर अन्य प्रकार के विज्ञापन हर प्रकार के विज्ञापनों में महिलाओं की दैहिक कमनीयता और उसका सजा-संवरा रूप ही प्रत्यक्ष रूप में हमारे सामने है । टी॰वी॰ पर प्रसारित होने वाले ढेरों विज्ञापन इसका उदाहरण हैं । पुरुष के अंडरवियर , बनियान से लेकर ब्लेड तक में स्त्री को इस तरह प्रस्तुत किया गया है जहाँ उसकी प्रस्तुति पर सवाल खड़े होते हैं । यदि इससे इतर विज्ञापनों पर नजर डाले तो भी स्थिति निराशाजनक है। वास्तव में समस्या विज्ञापन में स्त्री की उपस्थिति को लेकर नहीं हैं बल्कि उसकी उपस्थिति  कैसी है यह सोचने-समझने का विषय है । पिछले पाँच सालों से अबतक के विज्ञापनों पर नजर डालें  तो एक बात साफ हैं कि ये अनावश्यक कामुकता से भरे हुए है। इस कड़ी में कुछ उत्पादों जैसे पर्फ्यूम , पुरुषों के अंतर्वस्त्र , कोंडम के एक मिनट के विज्ञापनों ने अश्लीलता को घर-घर तक पहुँचा दिया है । इन विज्ञापनोंमें स्त्रियों की गरिमा तथा उनकी अस्मिता पर जबरदस्त कुठाराघात करने का कार्य किया है। ऐसे में सवाल उठता हैं कि वह कौन सी अनिवार्यता हैं जो स्त्री की देह को उसकी कामुकता को उत्पाद बेचने का जरिया बनाया गया है ? आखिर कौन सी मानसिकता मूल रूप से विद्यामान है ?उत्पाद पुरूषो के हैं जिसका लक्ष्य उपभोक्ता पुरूष है मगर फिर भी स्त्री को एक उत्पाद के रूप में प्रस्तुत किया गया है।टी.वी. पर बाइक का एक विज्ञापन आता था। इसमें एक स्त्री जो बाइक पर लेटी हुई दिखायी जाती है फिर वह बाइक के रूप में बदल जाती है, उसी दौरान उस पर एक पुरुष सवार होता दिखाया जाता है। इस पूरे विज्ञापन के देखने से स्पष्ट हो जाता है कि बाइक की तुलना एक स्त्री (युवती) से की गई है। बल्कि कहना चाहिए कि वह बाइक की खूबियों का एक प्रतीक बनाकर प्रस्तुत की गई है। कंपनी इस विज्ञापन के माध्यम से यह बताना चाहती है कि बाइक कितनी आरामदायक और आनंददायक, संतुष्टि देने वाली है।


दरअसल इस बात से इंकार नही किया जा सकता कि बड़ी-बड़ी विज्ञापन एंजेसिया इसी मानसिकताके वशीभूत होकर विज्ञापन बनाने मे लगी हुई है। तमाम  कंपनियाँ सौन्दर्य के नए मानक परोस रही हैं इसी सौन्दर्य जिज्ञासा यानि ‘ब्युटि मिथ’ को जगाकर वे इनकी जेबों से पैसा निकालने में भी सफल हैं । साँवले रंग को गोरा कैसे बनाया जाए इसके लिए दर्जनों ब्रांड के उत्पाद बाजार में मौजूद हैं ऐसे उत्पादों की कंपनियों में विज्ञपनों के द्वारा कड़ी प्रतियोगिता देखने को मिलती है जो बड़े से बड़े दावे के साथ किसी भी साँवली स्त्री को गोरा बनाकर उसके जीवन को ऊंचाई देते नजर आते हैं ।गोरा बनते ही लड़की में आत्मविश्वास आता है,अच्छी जॉब मिलती है , कल तक शादी के लिए लड़का राजी नहीं था गोरा बनते ही अब वह उस लड़के को शादी के लिए इंकार करती है , क्यों कि अब हर रूप में वह पूरी तरह से सक्षम है । इस संदर्भ में नाओमि वुल्फ़ अपनी किताब ‘ब्यूटी मिथ’ में लिखती हैं –“सौन्दर्य मिथ ने महिला की स्वतंत्रता को मोड़कर उसके चेहरे और देह में बदल दिया । जब महिला को अधूरा बताया जाता है तो ब्यूटी मिथ शुरू होता है । कॉस्मेटिक्स आते हैं ,कपड़े-लत्ते , फैशन उसकी पहचान के नाम पर आते हैं । सौन्दर्य मिथ ने महिला को झूठी चयनशीलता दी है ”सौन्दर्य पात्रता को प्रतिष्ठित करने वाले विज्ञापनों की भरमार से स्त्री -स्थिति के समाजशास्त्र को बहुकोणीय रूप में देखने की अनिवार्यता को किसी भी तौर पर अनदेखा नहीं किया जा सकता । इस प्रकार के अनेक विज्ञापनों मेंराजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक इन सभी दृष्टिकोणों के समावेश के बिना किसी भी तरह जड़ तक नहीं पहुंचा जा सकता । आज मुक्त बाजार और पाशविक उपभोक्तावाद ने लोगों की घेराबंदी की है जिससे बच पाना एक चुनौती से कम नहीं है। ठीक यही मानसिकता विज्ञापनों में महिलाओं की भूमिका भी तय करती है । यह  लिंग - भेद पर आधारित इस पितृसत्तात्मक विचारधारा की देन है जो आज की अर्थव्यवस्था को केंद्र में रखते हुए सम्पूर्ण व्यवस्था से बहुत ही नजदीक से जुड़ाव रखती है ।

घरेलू उत्पादों के विज्ञापनों में महिला की सांस्कृतिक छवि–

घरेलू रोजमर्रा की चीजें जैसे-डिटरर्जेण्ट पाउडर, मिर्च, हल्दी (मसालों) बर्तन धोने के उत्पादों आदि के विज्ञापनों में पुरूषो की उपस्थिति दर्ज होने पर उनका पुरूषाई वर्चस्व कायम रखा जाता है। ठीक यही प्रक्रिया अन्य घरेलू उत्पादों के विज्ञापनों में भी दिखाई पड़ती है जैसे मसालों के विज्ञापनों को ही लें तो ऐसे विज्ञापनों में मसालों की गुणवत्ता स्वाद के तौर पर बताने के लिये स्त्री को खाना बनाते हुए दिखाया जाता है और पुरुष इन विज्ञापनों में खाते हुए,खाने की तारीफ करते हुए दिखाया जाता हैऔर जहाँ कोई भी बर्तन चमकाने वाले उत्पाद का विज्ञापन हो तो पुरूष ऐसे विज्ञापनों में सेलर की भूमिका में होता है । इसका क्या अर्थ है? कही न कही यह पूरी परिपाटी पुरूषाई वर्चस्व के अधीन है। समाज में स्त्री पुरूष के संदर्भ में पुरूष को नियामक तथा मुखिया या कर्ता का स्थान प्राप्त हैं। पुंसवादी समाज में वही पहले दर्जे का नागरिक है। स्त्री उसके अधीन है न कि वह स्त्री के। यही समाज की संरचना के मूल में है। जिसके तहत घरेलू कामकाज महिलाओं के लिये ही निर्धारित किये गये है। पुरूष का इनसे कोई लेना-देना नहीं क्योंकि वह कमाता है और ठोस कारण यह भी है कि वह मुखिया होता है स्त्री उसकी बंदिनी के रूप में होती है इसलिये घर के काम केवल उसे ही निबटाने हैं। उन्हें इनसे किसी भी मुकाम पर पहुँच मुक्ति नहीं मिलती ।


इन विज्ञापन में महिलाओं का कपड़े, धोना, बर्तन मांजना, पति को आफिस के लिये रवाना करना से लेकर उनका मिजाज सही करने तक को दिखाया जाता है। देखने में तो यह सब बड़ा आसान लगता है लेकिन वास्तव में यह उतना आसान नहीं है।कोई भी स्त्री पुरूष से कम कार्य नहीं करती बल्कि हम देखते हैं कि पुरूष दिन भर काम करने बाद घर में बिलकुल कार्यमुक्त हो जाता है मगर एक ग्रहिणी कभी कार्यमुक्त नहीं होती घर के काम काज लेकर बच्चों की देख रेख की सम्पर्ण जिम्मेदारी जैसे अनेक घरेलू कार्य उसे कभी भी मुक्त नहीं रहने देते जबकि पुरूष धनोपार्जन के कार्य के बाद एकदम निश्चिंत होता है उसे घर के किसी काम-काज या देख-रेख से कोई सरोकार नहीं होता। यह सब उसकी स्वेच्छा पर निर्भर करता है जब कि महिलाओं के लिए घरेलू काम-काज स्वेच्छात्मक नहीं होते। उनके लिए यह अनिवार्य होते है। कुछ महिलाये जो कामकाजी/व्यवसायिक कार्य करती है वे घर के भी सारे काम निबटाती हैं क्यों कि घर के कार्य उन्ही के पल्लू से बांधे गये है तो ऐसे में निष्कर्ष यही निकलता है कि ऐसी कामकाजी महिलाये तो पुरूषो  से अधिक ही नहीं वरन् अत्याधिक कार्य करती हैं तब फिर ऐसे हालातों में  कभी पुरूषो  को विपरीत धारा में क्यों नहीं दिखाया जाता? क्यों स्त्री-पुरूष के सम्बन्धों के पारम्परिक ढर्रे को ज्यों का त्यों बरकरार रखा जाता है? और अगर कभी किसी विज्ञापन में ऐसा दिखाया भी गया हो तो वह अपवाद स्वरूप ही होगा क्योंकि विज्ञापन भी उसी पारम्परिक सामंती-पितृसत्तामक संस्कृति को बरकार रखते हुए बनाये जा रहे हैं जिसमें महिला अपने निर्धारित परिपाटी से बाहर नहीं निकलती। यही प्रक्रिया सभी विज्ञापनों में देखने को मिलती हैं। यह कितना उचित है?  महिलाओं के लिये हमारे समाज में दायरा तय है और उस दायरे के तहत ये घरेलू कामकाज उसी के लिये है या उसी के पल्लू से बंधे है। महिलाओं के लिये यह निर्धारित कार्य हैं जो उसी को निबटाने होते है । फिर चाहे स्थिति जो हो। वह चाहे शिक्षित हो जाये या फिर वह कामकाजी/व्यवसायिक हो तब भी उसके लिये घरेलू कार्य अनिवार्यता से जुड़े होते हैं। ठीक इसी सांस्कृतिक मानस को ध्यान में रखकर विज्ञापन भी बनाये जाते हैं।

विज्ञापनों में महिलाओं का दूसरा रूप उनके तथाकथित ढर्रे में ही दिखाया जाता है।मीडिया भी इसी व्यवस्था के पैराकारों के द्वारा संचालित हो रहा है। जिसके कारण विज्ञापनों में पारंपरिक मूल्यों व संस्कृति को बरकरार रखने का कार्य किया जा रहा है।इन विज्ञापनों की मूल मानसिकता पितृसत्तावादी चलन को बरकरार रखने की है। यह बाजार की मांग प्रचारित कर रहा है। यह एक ऐसी मानसिकता विकसित कर रहा है जिसमें स्त्री की गुलामी प्रत्यक्ष रूप में बड़े सौम्य तरीके से तथा परोक्ष रूप में बड़ी चतुराई से एक जाल की भांति समाज में फैलाई जा रही है। तब फिर यह उम्मीद कैसे कर सकते हैं कि पुरूष के उत्पादों के विज्ञापनों में महिला के शरीर को ने बेचा जाए जब कि बाजार के अर्धसामान्ती और अर्धऔपनिवेशिक चेहरा बिल्कुल साफ दिखाई दे रहा है। बाजार ने इन्हीं सामाजिक संरचना के सरोकरों को बाजारू बनाया है जिसमें फंसकर युवतियां अपनी मुक्ति के नाम पर इनकी घटिया साजिश का शिकार हो रही है।शहर के चर्चित स्थानों पर लगे बड़े बड़े र्होडिंग्स, वाल राइटिंग, अखबारो, पत्रिकाओं आदि के विज्ञापन एक ही प्रक्रिया में जुटे हैं। महिलाओं की देह को उत्पाद बेचने का एक ठोस जरिया बन चुका  है।  ऐसा माहौल बनाया जा रहा है कि जिससे उपभोक्ताओं के बीच अनाव्यश्यक मांग पैदा हो और उपभोक्ता वर्ग की संख्या में बढ़ोत्तरी हो।यहाँ यह ध्यान देने योग्य है कि विज्ञापन केवल व्यावसायिक दृष्टी से ही महत्वपूर्ण नहीं है,बल्कि सामाजिक क्षेत्र में इसका व्यापक प्रभाव पड़ता है ।


पूंजीवाद और  विज्ञापन का सह:संबंध -

महिलाओं के संदर्भ में विज्ञापनों पर विचार करें तो मूल रूप से बाजार की उन्मुखता का जिक्र पूरी तरह से जरूरी है।1990 के दशक में उदारीकरण के प्रभाव सामने आये वैसे कार्यक्रम तो 1980 के दशक से ही प्रारंभ हो चुके थे। उदारीकरण और वैश्वीकरण के आने पर बाजारवाद को हावी होने का भरपूर मौका मिला जिसके चलते इस देश की अर्द्धसामन्ती व्यवस्था के पारम्परिक सामंती मूल्यों को भुनाकर उन्हें मुनाफे का यंत्र बना दिया गया। इसलिए आज बीस अरब का कॉस्मेटिक्स उद्योग है ,तीन सौ अरब का कॉस्मेटिक्स सर्जरी उद्योग है, और सात अरब का पॉर्न उद्योग है । यह उद्योग उस  भ्रामकता पर टिके हैं जो विज्ञापनों या कहा जाए मास-मीडिया के द्वारा प्रेषित की जा रही है । जिसे ‘अनावश्यक मांग’ पैदा करना कहा जाता है ।पुरूषो के उत्पादों के विज्ञापनों में महिलाओं की कामोत्तेजक प्रस्तुति इसी का भयानक अंग है। बाजारीकरण की विचारधारा ने पुंसवादी समाज की इसी नस को पकड़कर अपने बाजार की मजबूती को बरकरार रखने में अपार सफलता अर्जित की है। पर्दे की दुनिया में महिलाओं को उनके बौद्धिक स्तर पर नही वरन् दैहिक स्तर पर पेश किया जाता हैं क्योंकि महिलाओं को एक वस्तु के रूप में, देह के  रूप में मानने सामन्ती मूल्य आज भी समाज में जड़ कियें हुए है। इस प्रक्रिया में तो सबसे अधिक विज्ञापनों ने स्त्री की देह को विज्ञापन बना डाला है। टी.वी. पर चाहें जो चैनल देखों हर चैनल पर आने वाले उन्ही विज्ञापनों में महिलाओं की स्थिति का खुला आंकलन करने का प्रमाण आपके समक्ष होगा।

पुरूषो के दाढ़ी बनाने वाले यंत्रों की सौम्यता और सुगमता की तुलना स्त्री की देह से करने का और क्या कारण हो सकता है सिवाय इसके किआज भी वही सामन्ती विचारधारा इस व्यवस्थाकेमूलमें है जिसमें पुरूष हर दूसरी स्त्री को भोगी नजरों से तथा नग्नदेखना चहता है या फिर वह स्त्री को भोग की वस्तु के रूप में ही देखता है। इसी सामंतवाद को बाजारवाद ने नये फ्रेम में मढ़कर पर्दे पर विज्ञापनों में स्त्री की स्वतन्त्रता को उसके नग्न शरीर तथा कामोत्तेजक गतिविधियों अथवा प्रदर्शनसे जोड़ा है, जिसका जीता-जागता उदाहरण पर्दे पर दिखाई जाने वाली हिन्दी फिल्में हैं जिसमें अश्लील दृश्यों की भरमार रहती है इन  दृश्यों को ‘बोल्ड सीन’कहना चलन में है। इसके मायने क्या है? स्पष्ट है कि पर्दे पर महिला का साहस (बोल्डनेस) और स्वतंत्रता इस रूप मे चित्रित की जा रही हैजो यह सामन्ती विचारधारावाला समाज हर पराईस्त्रीकेलिए चाहताहै।जबकि पूंजीवाद की सन्तान बाजारवाद ने महिला वर्ग में पढ़ी - लिखी महिलाओं को इस दिशा में बढ़ाने का कार्य किया है जिसमें वह  अपनी  दैहिकक मनीयता  को हथियार के रूप में मान रही है,जबकि सच्चाई इससे परे है। देखा जाये तो यह एक प्रकार की गुलामी ही है जिसमें महिलाओं की बौद्धिकता को दरकिनार कर महज उसके दैहिक सौन्दर्य को परोसने भर का कार्य करवाया जाता है। यह उसके सम्पूर्ण व्यक्तित्व की उपेक्षा है जहां वह एक बुद्धिमान, प्रतिभावान, गौरवान्वित अस्तित्वान मनुष्य के रूप में नही बल्कि एक उत्पाद (प्रोडक्ट) के रूप में प्रस्तुत की जाती है। यह कहना गलत नही होगा कि बाजारवाद में महिलाओं की अस्तित्वहीनता और लिंग-विभाजन श्रम पर आश्रित अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिला है क्योंकि एड़ी से लेकर चोटी तक ऐेसे अनगिनत उदाहरण प्रत्यक्ष रूप में हमारे सामने है। इस बात को नजरअंदाज नही किया जा सकता कि लिंगाधारित श्रम विभाजन वहाँ (पर्दे की दुनिया विज्ञापनों में) भी पूरी तरह से मौजूद है। इसलिये स्त्री -पुरूषो के बीच काम की समरूपता कोसों दूर है।इसके साथ ही यह भी ध्यान देने योग्य है कि इन सभी विज्ञापनों का लक्ष्य मुख्य रूप से मध्यम वर्ग ही है। विज्ञापनों में दिखायी जाने वाली ब्रांडेड वस्तुएं निम्न वर्ग की पहुच से बाहर है। उदाहरण के तौर पर एक रिक्शा चालक या मजदूर किसी भी ब्रांडेड बनियान की जगह किसी छोटी -मोटी दुकान से कोई सस्ती और किफायती बनियान ही खरीदेगा यह भी हो सकता है कि वह बनियान ही न पहने केवल कमीज से ही काम चलाये। कहने का तात्पर्य यही है कि इस देश  में आज के दौर में भी मजदूर वर्ग या निम्न वर्ग के सामने रोजी-रोटी का सवाल बहुत बडा हैं।
देश  की 80 प्रतिशत आबादी के सामने जो चुनौतियां है वे बुनियादी जरूरतों की है। ऐसे में उनके ब्रांडेड अण्डरवियर या अन्य उत्पादों जो अच्छी-खासी ब्रांड के या नामी-गिरामी ब्रांड के है उन्हें इस्तेमाल में लाने का तो सवाल ही पैदा नही होता। इन हालातो में यह साफ है कि देश का उच्चवर्ग और मुख्य रूप से मध्यम वर्ग ही इन विज्ञापनों का लक्ष्य हैं। तमाम विज्ञापन एजेंसियां इन्ही वर्गों को लुभाने की बेजोड़ कवायद में लगी हैं। यह समझना जरूरी है कि  महिला वर्ग इससे पूरा जुड़ाव रखता है ।सवाल खड़ा होता है कि भूमंडलीकरण ने जिन महिलाओं का प्रतिनिधित्व किया है वे करोड़ों महिलाओं में कितनी संख्या में हैं ?मास –मीडिया ने किसान और मजदूर या श्रमिकवर्ग की महिलाओं के जीवन से जुड़ी वास्तविक समस्याओं को प्रचारित करने का काम कभी नहीं किया । विज्ञापन तो ऐसा माध्यम बन चुका है जिसका काम मतिभ्रमों को बढ़ाकर उत्पाद बेचना है । महिलावर्ग को लक्ष्य बनाकर बहुत कुछ बेचा जा रहा है । स्वास्थ्य के लिए हानिकारक नूडल्स को माँ बच्चों के टिफिन में रखते दिखाई जाती है क्योंकि इसके दो फायदे बताए जाते हैं एक तो यह कि यह दो मिनट में झट से तैयार होता है दूसरा इतना स्वादिष्ट है कि बच्चे इसके बिना रह नहीं सकते । दुनिया का सबसे खराब जी मचलाने वाला खाना बर्गर आदि को स्टेंडराइज़ बना दिया गया है कि उसके बिना न तो पढ़ी-लिखी माँ आधुनिक होती है और न ही उनके बच्चे आधुनिक होंगे व्यावहारिक रूप से इस बात को समझने के लिए आंकड़ो कि जरूरत नहीं है क्योंकि हर शहर के रेस्तरां और तमाम शहरों में पहुँचे डोमिनोज के पिज्जा हट जैसी कई प्रतिष्ठित दुकानों में विज्ञापनो के इस प्रभाव को देखा जा सकता है । यहाँ डर यह है कि बच्चे कहीं उस धारा से पिछड़ न जाएँ । खाद्य उत्पादों में यही सोच निश्चित रूप से मिलती है ।इस मानक को खड़ा करने का लाभ यह है कि आज तैंतीस करोड़ अरब डालर से ऊपर का भोजन उद्योग है ।


यहाँ इस बात का जिक्र करना लाजिमी है कि मीडिया संदेशों के प्रसारण का ठोस माध्यम है और कई तरीकों से वह अपने संदेश लोगों तक पहुँचाता है, जिनमें मुख्य रूप से मनोरंजक कार्यक्रमों, धारावाहिकों, समाचारों और विज्ञापनों के द्वारा इस प्रकार के संदेश प्रसारित किये जाते है। देश की मुख्यधारा या लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ मीडिया को जनता से आज कोई सरोकार नही रह गया है। मीडिया पूरी तरह से देशी – विदेशी  कंपनियों के लाभ के लिये काम करता हुआ दिखाई पड़ता है। मीडिया एक बहुत बड़े उद्योग के रूप में स्थापित हो चुका है।  उसे केवल अपने मुनाफे की चिंता  है । महिलाओं के प्रति पूरे विश्व का रवैया पितृसत्तात्मक ही है,मीडिया भी इन्ही पितृसत्तात्मक मूल्यों का पोषण करता है फिर चाहे प्रिंट मीडिया हो या इलेक्ट्रानिक मीडिया हो सब जगह पितृसत्तामकता और उसमें लिप्त बाजारू मूल्यों को ही परोसना मीडिया का असली चरित्र है । ऐसे में विज्ञापनों में महिला विरोधी मूल्य ही दिखायी देंगे लगभग हर विज्ञापन मुनाफा कमाने की प्रक्रिया की अटूट कड़ी से ग्रसित है।इस तरह के विज्ञापनों पर (जो पुरूषो उत्पादों के हैं), नजर डालें तो देश और दुनियाभर में महिलाओं के विरूद्ध खड़े पितृसत्ता, शासक वर्ग और बाजार के नजरिये का पता लगाना बहुत ही आसानबात है।  बाइक के विज्ञापन तथा ऐसे तमाम विज्ञापनों को जो इस समय टी.वी. पर प्रसारित किये जा रहे हैं।इनका आशय केवल इतना है कि महिला सिर्फ आनंद, आराम और संतुष्टि देने की वस्तु मात्र है।

 पुरूषवादी सोच महिलाओं को सिर्फ इसी रूप में देखती है। इसलिए बाजार भी महिलाओं को अपने मुनाफे के लिए इसी रूप में दिखाता है और इससे अधिक दिखाकर प्रचारित करने से वह अनाव्यश्यक माँग भी पैदा करता है । ज्यादातर विज्ञापनोंमें  इसी सोच के तहत महिलाओं के शरीर को बेचा जाता है। टी वी पर प्रसारित इन विज्ञापनों के प्रसार में जो मूल प्रवृत्ति है वह पितृसत्ता ही है। जिसका बाजार अपने फायदे के लिए हथियार स्वरूप इस्तेमाल कर रहा है। यह विडम्बना ही है कि बालीबुड की कई अभिनेत्रियों कला से अधिक स्लीमट्रीम बनने तथा अश्लीलप्रदर्शन की होड़ में इस कदर जुटी है मानो उनका ’बोल्ड और सेक्सी’ होने का तमगा उनसे छिन गया तो उन्हे फिल्म जगत में कोई नहीं पूछेगा जो कि सच्चाई भी है फिल्मबिकने के लिए बनायी जा रही है इनका मुख्य उद्देश्य व्यापार करना है और उनमें महिलाओं का ‘बोल्ड-सेक्सी‘ होना बाजार में  फिल्म बेचने का एक मजबूत जरिया बना दिया है। इसका कारण जो समाज में नहीं दिखता वो खूब दिखाओ और जब आदत बन जाए तो जाहिर है वह मांग में बदल जाती है दूसरी तरफ समाज का मानस भी ऐसा बनता जा रहा है।यह सब एक प्रकार की साजिश  के तहत हो रहा है। पहले से ही समाज का पुरूष वर्ग महिलाओं को इसी परिपाटी में देखता आया है लेकिन मीडिया जगत ने खास तौर पर फिल्मों और विज्ञापनों ने इस विचारधारा को और अधिक हवा दी है, और अधिक दृढ़ता प्रदान की है। किसी भी उम्र का व्यक्ति फिर चाहे वे बच्चे ही क्यों न हो इससे अछूते नही है क्योंकि अपने सही समय से पहले ही वे इस पहलू से वाकिफ हो रहे, परिपक्व हो रहे है। इतना ही नहीं किशोरावस्था के नव युवक-युवतियों की दिशा भ्रमित करने का दायित्व भी इन्हीं पर है। इस संदर्भ में विज्ञापनों में दिखाई जाने वाली माडल भी अभिनेत्रियों से पीछे नहीं हैं क्योंकि उनको भी फिल्म जगत में या फिर माडलिंग में स्थापित होना है या कहा जाये कि कीर्तिमान स्थापित करना है तो इस प्रतिस्पर्धा में सर्वश्रेष्ठ बनने का तयशुदा मूलमंत्र अपनाना होगा ।

यहाँ यह कहना गलत नहीं होगा कि ऊपर बैठे तेज-तर्रार लोग तथा व्यवस्था के पैरोकारों ने आधुनिक शब्द को अपने मुताबिक मोड़कर उसको सम्पूर्ण अर्थ को चालाकी से बदल कर समाज में प्रसारित किया जा रहा है जोकि किसी भी सूरत में समाज के लिये घातक है। महिलाओं को बल-बुद्धिसे कम आंकना या फिर एक तरह से देखा जाये तो हर लिहाज से कम आंकना सामन्तवादी पितृसत्ता के मूल में है क्योंकि उन्हें इस व्यवस्था में मनुष्य होने का दर्जा आज भी पूरी तरह से प्राप्त नहीं है। ऐसी स्थिति में ऊपर बैठे इस व्यवस्था के पैरोकारो द्वारा दी जाने वाली महिलाओं की मुक्ति का रास्ता भी वैसा ही होगा जिसमें उनका लाभ हो और उनका बाजार गर्म रहे इस बात को ध्यान में रखते हुए ही उनकी सभी गतिविधियां लागू होती है। इसलिये महिलाओं के लिये आधुनिकता का इसी रूप में प्रचार किया जा रहा है या मानस बनाया जा रहा है जब कि इस शब्द के मायने काफी बड़े स्तर के है न कि विज्ञापन और फिल्मों में दिखायी जाने वाली महिलाओं के जैसा बनने में। अन्य शब्दों में कहा जाये तो आधुनिकता के अर्थ को दैहिक सौन्दर्य  तक ही सीमित किया रहा है।


 निष्कर्ष - 

विज्ञापनों में महिलाओं के दो रूप प्रत्यक्ष दिखाई देते हैं। एक तो पूर्णतः बाजारवाद जिसमें महिला का उत्तेजक व अश्लील रूप में मिलता है और दूसरा पूर्णतः पारम्परिक, सामंती मूल्यों को जारी  रखने के रूप में जिसमें घर और पितृसत्तात्मक संस्कृति को बनाये रखने का भाव पूर्णरूप से दिखाई देता है,जितने भी घरेलू उत्पादों के विज्ञापन हैं उनमें महिलाओं का वही पारंपरिक सांस्कृतिक रूप ही दिखाया जाता है। ऐसे घरेलू उत्पादों के विज्ञापनों की पूरी थीम ही श्रम विभाजन को स्पष्ट समझाती है । उदारीकरण और वैश्वीकरण के चलते बाजार ने इस व्यवस्था के पितृसत्ताई -सामंती मूल्यों को कायम रखने का पूरा प्रयास किया है तो दूसरी तरफ यह भी समझना होगा कि पूंजीवाद ने अपने फायदे के लिए स्त्री को, स्त्री स्वतन्त्रता की एक झूठी चयनशीलता दी है ।वास्तव में  यह एक प्रकार का भयावह मतिभ्रम है जहाँ महिला की वास्तविक मुक्ति नगण्य है क्योंकि स्त्री-मुक्ति के रास्ते को भूमंडलीकरण ने बेहद भ्रामक मोड़ दिया है ।

संदर्भ सूची :-
1.रूबीना, लेख 2010, टूटती साँकलें
2.गौतम रूपचन्द, मीडिया और संस्कृति 2008, श्री नटराजन प्रकाशन
3.त्रिपाठी कुशुम, 2013, पटपड़गंज दिल्ली, भावना प्रकाशन
4.http://www.dw.com/hi/विज्ञापनों-में-महिलाएं/g-18691477
5.विज्ञापन फिल्में

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