पितृसत्तात्मक हादसों से मुठभेड़ करती लेखिका की आत्मकथा: 'हादसे'


स्त्री को सदा से पुरुष की अनुगामिनी बनकर जीवन जीने की शिक्षा दी जाती है। स्त्री  का लक्षमण रेखा लाँघना समाज के तथाकथित पहरेदारों की बर्दाश्त से बाहर होता है।औरत अगर खुदसर हो तो उसकी मुख़ालफ़त लाज़िमी होती है और अगर कहीं राजनीति में हो और वह भी लता बनकर नहीं बल्कि पेड़ या खूँटा बनकर तो उसे हिला देने की तरकीबें, झकझोर देने के ढंग, उखाड़ देने के प्रयास इन्तहा पर पहुँच जाते हैं। अगर वह ट्रेड यूनियन में हो, वह भी सफ़ेदपोशों की यूनियन में नहीं बल्कि स्वयं वर्गहीन होकर खाँटी खटनेवाले ब्लू कॉलर कोयला मज़दूरों के बीच रहकर उन्हें संगठित कर आन्दोलित करने का दम रखती हो, तब तो ’युद्ध और प्रेम में हर चीज़ जायज़ है’ का फ़ॉर्मूला लागू करने में सहयोगी, सहभागी- यहाँ तक कि प्रशंसक भी देर नहीं लगाते- दुश्मनों का तो कहना ही क्या ! हाँ, दुश्मनों का ! ऐसी औरत के दुश्मन खड़े हो जाते हैं। दुश्मनी इसलिए नहीं होती कि उससे कुछ नुकसान पहुँचेगा, वह समान कारण तो स्त्री-पुरुष दोनों पर ही लागू होता है- दुश्मनी इसलिए कि एक औरत ने इतने लोगों का विश्वास कैसे प्राप्त कर लिया- बिना उनकी मदद के यह कैसे संभव हुआ ! ज़रूर दाल में कुछ काला है ! यह डाह ही दुश्मन खड़ा कर देती है। तब ऐसी औरत के खिलाफ़ बहुत सी ’कनफुसकियाँ’, अफ़वाहें, चटपटी प्रणय कथाएँ, झूठे-सच्चे किस्से हवा में तैरने लगते हैं।1


पुरुष औरत को उसी हालत में बर्दाश्त करता है, जब उसे यह यकीन हो जाए कि वह पूरी तरह उसी पर आश्रित है और ख़ुद कोई निर्णय नहीं ले सकती या फिर वह स्वयं उस औरत से डरने लगे, तो वह उसे सहता है। पुरुष के मुकाबले में कोई पुरुष हो तो उन्हें अपनी क्षमता का फ़र्क उन्नीस या बीस ही नज़र आता है लेकिन अगर औरत खुदमुख्तार होकर सामने खड़ी हो जाए, वह भी निर्णय ले सकनेवाली औरत, तो चाहे बिन चाहे वह हीन-भावना से दब जाता है और उसे अपनी तुलना में वह औरत बाईस लगने लगती है।ईर्ष्यावश शत्रुता का अंकुर मन में जन्म लेता है। वह समझता है कि औरत के पास उसके समान गुणों के अतिरिक्त आकर्षित और प्रभावित करने की क्षमता अधिक होती है और इसे ही वह अपने पौरुष के लिए चुनौती मान बैठता है। अत्यंत प्रेम और समर्पण के क्षणों में भी पुरुष अपने निर्णय को अन्तिम साबित करने की ज़िद करता है।

रमणिका गुप्ता बचपन से ही राजनीतिक और सामाजिक परिवर्तन की धारणा से जुड़ी रहीं। जब पाँचवी-छठी कक्षा में पढ़ती थीं, तब ’सत्यार्थ प्रकाशन’ के समर्थन में तथा मूर्ति-पूजा के विरोध में घंटों बहस करती थीं। इन्हीं बहसों के कारण उन्होंने विक्टोरिया स्कूल की अपनी प्रधानाचार्या से बहुत डाँट खाई थी। वे अपने निर्णय स्वयं लेती थीं तथा उनका अच्छा-बुरा फल भोगने को सदैव तैयार रहती थीं।

आपहुदरी : रमणिका गुप्ता की आत्मकथा -पहली किस्त

पटियाला रियासत में उन दिनों वेश्याओं का प्रचलन था। उनके स्कूल में सईदा नाम की की एक वेश्या की लड़की पढ़ती थी। यदि कोई उसे चिढ़ाता था तो रमणिका उससे झगड़ा करती थी और मारपीट तक पर उतर आती थी। उनकी नज़र में सईदा का वेश्या की लड़की होना या उसकी माँ का वेश्या होना समाज का दोष था। वेश्या होने न होने से ही किसी स्त्री को पतित या सती करार देने को भी वे गलत मानती थीं।वे औरत के संबंध में पतित शब्द की परिभाषा से सहमत नहीं हैं कि यह शब्द औरत के चरित्र से जोड़ा जाता है और चरित्र का अर्थ केवल औरत के यौन-संबंधों को लेकर ही समझा जाता है। औरत के संदर्भ में चरित्र के अन्य गुण या लक्षण जैसे नैतिकता, शालीनता, ईमानदारी, परस्पर सद्‍भाव, संवेदनशीलता, बहादुरी और निडरता आदि को नज़रअन्दाज़ कर दिया जाता है।


उनकी मान्यता है कि औरतों को खुद का सहारा या सहयोगी बनना चाहिए, सहारा खोजना नहीं चाहिए। उन्हें ’थेथर’ बनना ज़रूरी है। ’छुई-मुई’ बनने से समाज में काम चलनेवाला नहीं है। आग पर चलने की हिम्मत जुटाना आवश्यक है। हवा के विपरीत चलने का इरादा अपेक्षित है।

रमणिका गुप्ता ने अनेक निर्णायक हठ किए और अप्रिय लगनेवाले कदम उठाए। उन्होंने अपने मानदंड खुद गढ़े। कहते हैं- “समरथ को नहिं दोष गुसाईं।“ वे स्वयं को समर्थ बनाकर अपनी शर्तों पर चलीं। उन्होंने समाज के पीछे चलने की बजाय समाज को अपने पीछे चलाया। उनका पहला हमला प्रचलित नियमों, प्रथाओं, प्रतिबन्धों, यहाँ तक कि यौन-संबंधों पर होता था। उन्हें रूढ़ियाँ तोड़ने में बड़ा मज़ा आता था और प्रतिक्रिया में रूढ़िवादियों का तिलमिलाना या झल्लाना अच्छा लगता था।2

आपहुदरी : रमणिका गुप्ता की आत्मकथा : दूसरी किस्त

परम्परा तोड़ने का हठ- इनका परिवार सामन्ती परिवार था। घर में परदा-प्रथा लागू थी तथा परिवार में लड़कियों का सिर ढकना लाज़िमी माना जाता था। पारिवारिक परम्परा तोड़ने के लिए सबसे पहले रमणिका गुप्ता ने ताँगे में आगे की सीट पर अपने पिता की बगल में बैठने की ज़िद शुरू की। कार या ताँगे में परदा लगाने पर भी वे मुँह बाहर निकालकर बैठती थीं। साइकिल लेकर सड़क पर निकल जाती तो घर में हंगामा मच जाता था। जब वे न मानीं तो उनकी माँ ने अल्टीमेटम दे दिया कि यदि सिर नहीं ढकना तो या तो बीस कदम आगे चलो या पीछे ताकि लोग न जानें कि वे साथ-साथ हैं। उन्होंने बीस कदम आगे चलना शुरू कर दिया। उस दिन से उन्हें घर में विद्रोही का-सा रुतबा मिल गया और हर समय टोका जाने लगा। पर वे ज़िद पर अड़ी रहीं।3

जाति तोड़कर प्रेम विवाह करने के फ़ैसले को परिवार ने एक चुनौती के रूप में देखा और इस निर्णय को बदलने के लिए बहुत दबाव डाला गया। मामा ने उनका घर से निकलना बंद कर दिया, रोज़ पिटाई होती थी और उन्हें पटियाला भेज दिया गया। एक दिन तंग आकर पापा जी ने कहा कि- “ये फ़ैसला तो बदलना ही होगा नहीं तो तुम दोनों में से किसी एक को ज़हर खाना होगा-तुम्हारी माँ को या तुम्हें।“ रमणिका ने तुरंत जवाब दिया- “मेरी माँ और आप ज़िंदगी का सुख देख चुके हैं, भोग चुके हैं। मुझे अभी ज़िन्दगी देखनी बाकी है इसलिए ज़हर मैं नहीं खाऊँगी, बीबी जी खाएँ।“ उनकी ये बातें परम्परावादी, औचित्यवादी, त्यागवादी और आचरणप्रिय लोगों को अखरती थीं परन्तु उनके लिए यह निर्णायक घड़ी थी। तभी वे जो करना चाहती थीं, कर पाईं। परम्पराओं को तोड़ना और रूढ़ियों के विपरीत चलना ही मानों उनका लक्ष्य बन गया था, इसके लिए अपनों के खिलाफ़ विद्रोह आवश्यक था-जिसके लिए उन्होंने स्वयं को तैयार कर रखा था।एक बार पिता ने तंग आकर उन्हें घर से भाग जाने की सलाह दी किन्तु उन्होंने साफ़ इनकार करते हुए कहा- “ शादी तो आप ही को करवानी होगी मेरी। मैं भागूँगी नहीं। इन्तज़ार करूँगी।“ उन्होंने खुद अपने माता-पिता को शादी की चिट्ठी लिखी और वे विवाह में सम्मिलित भी हुए। उनके ब्याह में न मँगनी हुई, न छेका, न दान और न दहेज, भाई सत्यव्रत बेदी से घर से प्रकाश उन्हें विदा करा लाए। उनके परिवार में किसी लड़की द्वारा परम्परा के विरुद्ध किया गया यह पहला विद्रोह था।4

वैवाहिक जीवन की कठिनाइयों की शिकायत उन्होंने कभी किसी ने नहीं की। उन्होंने न अपने घर में परदा किया और न ही छुआछूत चलने दी। छुआछूत का विरोध जताने की नीयत से उन्होंने एक मेहतरानी के ईसाई पुत्र को अपना रसोइया नियुक्त कर लिया। उन दिनों मुसलमानों और ईसाइयों को ’मलेच्छ’ माना जाता था और उनका हिन्दू घरों में आना-जाना, खान-पान वर्जित था।4

1960 में उन्होंने सक्रिय राजनीति में भाग लेने का निर्णय लिया और अपने विश्वास के मुताबिक औरतों के निर्णय लेने की आज़ादी को बरकरार रखने के लिए निर्णय के बाद ही इसकी सूचना प्रकाश को दी।उनकी नज़र मे औरत को किसी निर्णय के लिए पति की इजाज़त माँगना औरतों के अधिकार का हनन है। आपने इस परम्परा अपने जीवन में सदा नकारा। वे किसी समारोह इत्यादि में श्रीमती वी.पी.गुप्ता बनकर जाना पसंद नहीं करती थीं। उनके मन में यह भावना अति तीव्र हो गई थी कि- “मुझे लोग मेरे कारण पहचानें, प्रकाश की पत्नी होने के कारण नहीं।“5

धनबाद में रमणिका ने कई संस्थाएँ शुरू की थीं जिनमें लगभग डेढ़ सौ महिलाएँ जीविका अर्जित करती थीं। स्थानान्तरण के पश्चात उन्होंने पति के साथ कानपुर न जाने का निर्णय लिया ताकि उनका स्वयंसिद्धा होने का संकल्प पूरा हो सके। उन्होंने इसे अपना कर्त्तव्य माना जबकि लोगों ने इस फ़ैसले को निर्ममता, क्रूरता और निर्दयता से युक्त बताया क्योंकि दोनों बच्चियाँ पिता के साथ गई थीं और उन्हें हॉस्टल भेजना पड़ा था।6

राजनीति में वे पहले कांग्रेस में थीं जहाँ नेता स्त्री कार्यकर्ताओं को अपना कलेवा मानते थे जिसे भूख लगने पर खाने का एक स्वर्जित जन्मसिद्ध अधिकार उन्होंने प्राप्त कर रखा था। इन नेताओं का मानना था कि किसी पुरुष नेता-वृक्ष का सहारा लिए महिला नेता-लता पनप और बढ़ नहीं सकती थी परन्तु रमणिका जी लता बनने को तैयार नहीं थीं अत: उन्होंने अपनी सदस्यता से त्यागपत्र दे दिया और कांग्रेस अध्यक्ष को यह लिखा कि- “मैं कांग्रेस से त्यागपत्र दे रही हूँ। मैं अपना रास्ता खुद बनाने में सक्षम हूँ, इसलिए अपना रास्ता खोज लूँगी, नहीं तो रास्ता ही मुझे खोज लेगा।“6

आपहुदरी : रमणिका गुप्ता की आत्मकथा : आख़िरी किस्त

 रमणिका गुप्ता कहती हैं कि- “बहुत पहले मैं अग्नि-दीक्षा ले चुकी थी, इसलिए अग्नि परीक्षाओं को हमेशा नकारा, ग़ैरज़रूरी समझा और उनसे गुज़रने की ज़हमत भी नहीं उठाई। मैंने अपने आचरण का स्पष्टीकरण कभी नहीं दिया। मैं जो हूँ, खुली किताब के रूप में सामने हूँ।" उन्होंने अपने यौन शोषण का आरोप किसी पर नहीं लगाया क्योंकि या तो वे स्वयं इसमें शामिल थीं या विरोध में डटी रही थीं और यदि कुछ हुआ भी तो खुद को कभी हतोत्साहित नहीं होने दिया।राजनीति में रणनीति के तहत उन्होंने कई बार कुछ परिस्थितिजन्य समझौते भी किए किन्तु स्वयं को कभी बेबस या असहाय नहीं माना।अन्याय का विरोध करना उनकी आदत का अभिन्न अंग रहा भले ही इसके चलते उन्हें व्यक्तिगत रूप से बहुत नुकसान भी उठाना पड़ा। उनका मानना है कि राजनीति और समाज-सेवा में आत्मविश्वास, हौसला, निडरता और हठ ज़रूरी चीज़ें हैं। एक औरत को आगे बढ़ने के लिए ’थेथर’ होना आवश्यक है। थेथर का अर्थ संवेदनारहित होना नहीं बल्कि पूर्णतया संवेदनशील होते हुए विपरीत परिस्थितियों में डटे रहना है- आरोपों, कलंकों और घटनाओं-दुर्घटनाओं तथा ज़्यादतियों को झेलते हुए, अपने रास्ते पर चलते रहना और संकल्प-शक्ति तथा इच्छा-शक्ति का बल बनाए रखना ही है। इसका मतलब है खुद को अपनों की बेरुखी सहने को भी तैयार रखना, हँसते-हँसते कुत्सित व्यंग्य, कुटिल मुस्कानें, द्विअर्थी वाक्य पचाने की आदत डालना और कभी-कभी दूसरों के वाक्यों को उन्हीं के खिलाफ़ मुहिम छेड़ने के लिए उछालना।पीठ थपथपाकर बहादुरी का वास्ता देने वाले राजनीति में बहुत मिलते हैं। उनकी नीयत को पहचानकर सोच-समझकर अपने फ़ैसलों पर अडिग रहना ही ’थेथरपन’ है जो राजनीति में स्त्रियों के लिए लाज़िमी है। ’सुनो जग की, करो मन की’ सूक्ति का पालन करना वे आवश्यक मानती हैं।7

 सन् 1968 में उन्होंने मज़दूरों के बच्चों के लिए स्कूल बनाने के मुद्दे को लेकर टाटा कम्पनी से लड़ाई की और इसमें कामयाब भी हुईं। सरकार द्वारा पानी की योजना बनवाकर घर-घर में पानी पहुँचाया तो वे ’पानी की रानी’ के नाम से मशहूर हो गईं। आदिवासियों के साथ मिलकर जंगल के सिपाहियों के खिलाफ़ उन्होंने नारा दिया- “घूस नहीं, अब घूसा देंगे।“ मज़दूरों के अधिकारों को सुरक्षित रखने की खातिर यूनियन बनाने के लिए उन्होंने आमरण अनशन किया और अपनी माँगों को मनवाया। खदानों में खटने वाले अनाम मज़दूरों को परिचयपत्र दिलवाने के लिए जॉर्ज फ़र्नाडिस से बात की जिन्होंने आन्दोलन के लिए नारे दिए- “हम कौन हैं लिख कर दो- हमारा नाम क्या है लिख कर दो- हम क्या काम करते हैं लिखकर दो-हमारा वेतन क्या है लिखकर दो- हम कहाँ खटते हैं लिखकर दो !” इसके परिणामस्वरूप सभी मज़दूरों के परिचय-पत्र मिला जो राष्ट्रीयकरण के बाद खदानों में उनकी नौकरी का प्रमाणपत्र माना गया।8


इन आन्दोलनों के दौरान उन पर कई बार जानलेवा हमले हुए। कई दफ़ा लाठियाँ बरसाई गई जिनसे उनकी हड्डियाँ भी टूटीं परन्तु उन्होंने कभी हिम्मत नहीं हारी और न ही हार मानी। वे जानती थीं और मानती थीं कि ऐसे अवसरों पर जोखिम उठाना ज़रूरी होता है। उनका कहना है कि यदि एक औरत आन पर आ जाए तो वह मरदों से अधिक जोखिम उठा सकने की कुव्वत रखती है। एक बार आन्दोलन के समय उन्हें जेल भी जाना पड़ा था। वहाँ के सभी अधिकारी उन्हें महिला कैदी नहीं बल्कि एक नेता कैदी के रूप में देखते थे। वे अपना सुख-दुख मज़दूरों के सुख-दुख में महसूस करती थीं इसलिए उनकी तकलीफ़ देखकर उनका गुस्सा बढ़ता था। वे गुस्से में रोने लगतीं और पुन: कड़े संघर्ष के लिए तैयार हो जाती थीं। खदानों के राष्ट्रीयकरण के बाद उन्होंने मज़दूरों की बहाली को सुनिश्चित करने को लेकर एक लम्बी लड़ाई लड़ी। उन्होंने कभी सस्ती वाहवाही लूटने के लिए भारी पलड़े का साथ नहीं दिया।

उन्हें ऐसे हंगामे खड़े करने में बहुत मज़ा आता था जिनसे निजी स्वार्थ पर चोट पहुँचे। कई लोगों को लगता था कि वे खामख्वाह ही दुश्मन बना लेती हैं, कुछ मामलों में चुप भी रहा जा सकता है। परन्तु वे चुप रहना सीखी ही नहीं थीं। ज़रा-सा अन्याय देखते ही तीव्र प्रतिक्रिया करने की आदत ने उन्हें कई बार खतरनाक मोड़ों पर खड़ा कर दिया था। उनके साथ ऐसी कई घटनाएँ घटीं जब पार्टी प्रतिबद्धता और मानवीयता के बीच एक को चुनना था, उन्होंने हमेशा मानवीय संवेदना को ही प्राथमिकता दी और मज़दूरों के हित का साथ दिया भले पार्टी या उसका ओहदा उन्हें छोड़ना पड़ा।9

‘आपहुदरी’: ‘अपने शर्तों पर जीने की आत्मकथा’

1970 में एक चुनाव के दौरान उन्हें गाँव वालों से पता चला कि भुईनी औरतों का शोषण किया जाता है और इन घरों की नवब्याहताओं का डोला पहली रात बाबू साहब के यहाँ उतारा जाता था। कुछ दिन पहले एक भुईनी महिला का झोंपड़ा जला दिए जाने की खबर भी उन्हें मिली तो रमणिका जी ने आई.जी. को बुलाकर कहा- “उस भुईनी का घर वहाँ बन जाना चाहिए, नहीं तो मुझे स्वयं जाकर खुद खड़े होकर घर बनवाना होगा और अगर मेरे साथ कुछ दुर्घटना घट गई तो उसकी जिम्मेवारी आपकी होगी।“ आपके प्रयासों से भुईनी का घर भी बन गया और दोषियों की गिरफ़्तारी भी हुई।10

उनकी मान्यता थी कि –“अश्लीलता को सदन में कोई स्थान नहीं दिया जा सकता। उन्होंने कभी किसी लड़ाई को हल्के ढंग से नहीं लिया और न ही कभी अधूरा छोड़ा। उसको तार्किक निष्कर्ष तक पहुँचाया- चाहे जीत हो या हार। बचाव में हताश होकर भागी नहीं क्योंकि वे हार सहने की क्षमता भी रखती थीं। वैसे हर औरत हार सहने और स्वीकारने की आदी होती और हथियार डाल देती है किन्तु उन्होंने ’हथियार डालना’ तो सीखा ही नहीं था और न ही उनका इसमें विश्वास था।11

इस प्रकार उनकी आत्मकथा ’हादसे’ से पूर्णतया स्पष्ट होता है कि उन्होंने अपना जीवन अपनी शर्तों पर जीया और आज भी अपने जीवन के मानदण्ड स्वयं निर्धारित करती हैं। बँधी-बँधाई रूढ़ियों पर वे न विश्वास करती हैं और न ही पारम्परिक लीक पर चलने को उचित मानती हैं। वे ’स्वयंसिद्धा’ हैं और अन्य औरतों के लिए भी प्रेरणा का स्त्रोत हैं।

संदर्भ सूची
1.रमणिका गुप्ता, हादसे, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण-2010, पृ-15-16
2.वही, पृ- 17
3.वही, पृ- 18
4.वही, पृ- 24-25
5.वही, पृ- 26
6.वही, पृ- 27
7.वही, पृ- 52-54
8.वही, पृ- 74-78
9.वही, पृ- 186-190
10.वही, पृ- 192
11.वही, पृ- 250
लेखिका:-डॉ.राजेश्वरी, माल्या अदिति इंटरनेस्कूल, बंगलूरु, कर्नाटक
संपर्क:dr.rajeshwarig gmail.com

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