क्यों महिला विरोधी है दिल्ली मेट्रो का किराया बढ़ाना?

ज्योति प्रसाद
 शोधरत , जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय. सम्पर्क: jyotijprasad@gmail.com  

हाल ही में दिल्ली मेट्रो का किराया फिर से बढ़ा दिया गया है। इस बीच दिल्ली सरकार और मेट्रो अधिकारियों के बीच खूब कहा सुनी और खींचतान जारी रही। यह अहम विषय है और इसे कतई नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। कल ही भैया दूज के दिन मेट्रो ने लगभग 45 मिनट तक लोगों को रुलाया तो वहीं कुछ दिन पहले राजीव चौक स्टेशन पर चली ‘गंदी वाली’ फिल्म ने सभी को मुंह खोलने के मौका भी दे दिया था। जी हाँ, दिल्ली मेट्रो के संदर्भ में ऐसे किस्से चल रहे हैं। अब बढ़े हुए किराए ने फिर एक बार उसे चर्चा का विषय बना दिया है।

मेट्रो ने सफर के नए अनुभवों में अपनी अच्छी ख़ासी जगह बनाई है और निरंतर बना भी रही है। ‘इश्क़ में मेट्रो होना’ किताब के लिए अच्छी ख़ासी सामाग्री मेट्रो के अंदर और बाहर मिल सकती है। मनुष्य, उसका सफर और संसाधनों के बीच गुंथा हुआ भी है। छोटी कक्षाओं में पढ़े गए यातायात के संसाधनों के उन प्राचीन स्रोतों को दिमाग में घुमा लेना जरूरी है। इतिहास की किताबों में बड़े ही दिलचस्प अंदाज़ में तस्वीरों और छोटे छोटे वर्णनों के प्रयोग से परिवहन को समझाया जाता था और शायद आज भी ऐसा हो रहा होगा। आदि मानव से शुरू हुई कहानी पहिये के चमत्कारिक और क्रांतिकारी आविष्कार के साथ आगे बढ़ती है और बच्चों के नन्हे दिमाग को यह समझ आने लगता है कि सफर किन पड़ावों से गुज़र चुका है। और आज जब हम बड़े हुए हैं तब यह मालूम चलता है कि उस जानवर वाली गाड़ी के पीछे वाला हिस्सा जिसमें पहिया लगा था आज मेट्रो और रेल को कितनी शानदार गति प्रदान कर रहा है। इसमें यह बात भी जोड़ लेनी चाहिए कि विद्युत का असीम योगदान है।

सफर मानव स्वभाव में कई चीज़ों की बदौलत उभरता है। जरूरत,कौतुक, रोमांच, दिलचस्पी, जगहों के भ्रमण की तीव्र इच्छा और न जाने क्या क्या कारक हैं। इतिहास में सफर-संस्मरण, यात्रियों के संस्मरणों के रूप में दस्तक देते रहते हैं। भारत के इतिहास का एक बहुत बड़ा टुकड़ा विदेशी यात्रियों की बदौलत सामने आता है। मेगास्थनीज़, अल बिरूनी(बिरनी भी कहते हैं लोग), फाहियान या फिर ह्वेन सांग आदि आदि यात्रियों ने जो देखा और दर्ज़ किया। इनके द्वारा लिखा वृतांत भारतीय इतिहास के लिए आगे चलकर अहम दस्तावेज़ में तब्दील हो गए।यात्रा ने मानव मस्तिष्क के अनुसार अपने रवैये और साधन को बदलाया मानव मस्तिष्क ने यात्रा की शक्ल बदली। जो बात नहीं बदली वह यात्रा ही थी और है। यात्रा मानव सभ्यता की एक तहज़ीब है।
लेकिन फिर भी किसी औरत का नाम उस चमक से नहीं उभरता जिस चमक के साथ पुरुष यात्रियों का सुनाई पड़ता है। हमारी किताबें अधिकतर महिला यात्रियों के संदर्भ में मौन रहती हैं। जब इब्न बतूता का नाम सुना था तब पहला सवाल मन में यह आया था कि कोई इब्नी बतूती भी हुई है क्या? ह्वेनी  सांगी,फाहियानी,मेगास्थनीज़ी...फेहरिश्त लंबी हो सकती है। सोचिए, अगर महिला यात्रियों के वर्णन हमारे सामने होते तब आज इतिहास की अक्ल-शक्ल बेहद अलग होती। भारत के संदर्भ में तो यह और भी हैरान करने वाली हो सकती थी।


यात्रा पर पुरुषों का एकाधिकार महसूस होता है। किसी महिला की व्यक्तिगत प्राचीन यात्रा के संदर्भ में बहुत कम जानकारी मिलती है। ज़्यादातर महिलाओं की यात्रा पुरुषों के साथ दिखाई देती हैं।विकिपीडिया पर‘लिस्ट ऑफ फीमेल एक्सप्लोरर्स एंड ट्रेवलर्स’नाम से एक सूची है। इस सूची में प्राचीन व मध्यकाल के समय की एक भी स्त्री का नाम नहीं है। इसके अलावा आधुनिक होते हुए भी इसमें भारत की एक भी औरत का नाम नहीं है।पर मुझे ऐसा यकीन नहीं होता कि भारत की स्त्रियाँ यात्रा-रहित रही हों कभी भी। क्योंकि हमारे यहाँ तो बादल और कबूतर तक सफर किया करते थे।

इसके पीछे के कई कारण हो सकते हैं। आप सोचिए। महीन से महीन कारण मिलेंगे। उँगलियों पर गिनने से भी खत्म नहीं होंगे। बल्कि ढेर सारी वजहें दिखेंगी। उनका यहाँ विश्लेषण देना आसान नहीं है। किसी भी यात्रा में यात्री, यात्रा का रास्ता,यात्रा और यात्री का साधन, समय, परिवेश, समय आदि घटक यात्रा के खाके को रचते हैं। महिलाओं के संदर्भ में हमेशा से ही इनमें अकाल पड़ा रहा। आज भी लोग आदि मानव को यायावर कहते हैं न कि आदि मानवी को। ऐसे बहुत से अवरोधक रहे हैं जिन्होंने औरत को यात्री में तब्दील नहीं होने दिया।
ग्लोबलाइज़ेशन के ज़माने में आश्चर्यजनक रूप से बदलाव आया है। अब तो ‘आज़ादी मेरा ब्रांड’ जैसी रचनाएँ दिखने लगी हैं। यहाँ तक आना निश्चित ही बिना किसी आधार के नहीं हुआ होगा। ज़रूर कथा-कहानियों और समय के अंदर वे स्त्रियाँ रही होंगी जिन्होंने घूमने में दिलचस्पी ली होगी। वे इतिहास में सक्रिय महिलायें होंगी जिन्होंने औरतों को पूरी तरह से गुमशुदा नहीं होने दिया। बल्कि खुद को घर की चौहद्दी से बाहर निकाला होगा। हाल के वर्षों में हो रहे शोध अब जानबूझकर गुमशुदा कर दी गईं औरतों को प्रकट करने में अपनी अहम भूमिका निभा रहे हैं। यह अच्छी बात है।

सफर नितांत घर से बाहर से जुड़ा हुआ है। जबकि परिवार जैसे संस्था के प्रकट हो जाने के बाद महिला घरेलू हो गई। थोड़े रिश्ते गाढ़े हुए तो वह सम्मानीय हो गई जहां सम्मान तो था पर जान चली गई। कुछ अरसे बाद वह वस्तु में परिवर्तित हो गई। ऐसी जानकारियाँ किताबों में अटीं पड़ी हैं। लोग चाहे तो इसे पढ़ें और समझें। वास्तव में छवियों के बनने से परेशानी नहीं हुई, परेशानी तब हुई जब वह लोहे की तरह जम गईं। यही वजह है के आज जब वे छवियाँ गलाने की कोशिश हो रही हैं तब महिलाओं के प्रति हिंसा उभर कर आ रही है।

हिंसा का कारण यही है- पुरानी छवियों को टूटने न देने की ज़िद्द। इसलिए घर से बाहर किसी भी लड़की और औरत को एक दूसरे तरह के ज़ोन का सामना करना पड़ रहा है। हर तरह के हमले हो रहे हैं फिर चाहे वे सामाजिक, आर्थिक, नैतिक, मनो-वैज्ञानिक, शारीरिक, संस्थानिक, राजनैतिक आदि आदि। हाँ, इन सब के बीच घरेलू हमलों और हिंसा को नहीं भूलना चाहिए।


मेट्रो का किराया बढ़ना एक अदृश्य संस्थानिक हमला है। हो सकता है लोग इस बात पर हँसे और खूब हँसे। परवाह नहीं। लेकिन यह सच है कि मेट्रो का किराया बढ़ना महिलाओं के प्रति न दिखने वाली हिंसा है जो उन पर दूरगामी प्रभाव डालेगी। जो हिंसा दिखाई देती है उस पर तो खुद दिल्ली मेट्रो अपनी वेबसाइट पर उल्लेख करती है। उदाहरण के लिए,यात्री सूचना के टैब में महिला यात्रियों के लिए सुविधा नाम के वर्ग में खूब बढ़ा चढ़ा कर राग आलापा गया है कि महिलाओं के लिए अलग से डिब्बा आरक्षित है। चेकिंग के लिए महिला कर्मचारी है, रखवाली के लिए जवान गश्त लगाते हैं, महिला डिब्बे में पुरुष यात्री अगर आते हैं तो उन पर 250/- रुपये का जुर्माना लगाया जाएगा, शराबियों और उत्पात मचाने वालों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा, आपात कालीन बटन और एक टीम है जो त्वरित कारवाई करेगी अगर कुछ अनहोनी घटना घट जाती है। इसके अलावा सीसीटीवी कैमरा से निगरानी की जाती है।

बेशक उपर्युक्त बातें महिला सुरक्षा के संदर्भ में दिल्ली मेट्रो कहती ज़रूर है पर इसके पीछे उनका व्यवसाय का एक पक्ष छिपा है। इन सब सुविधाओं के बदले महिला यात्री भी पुरुष यात्रियों के समान योगदान देती हैं। इसलिए अगर ये सब सुविधा बार-बार महिला कह कर और जतला कर दी भी जा रही है तो वह अहसान कतई नहीं है बल्कि वह मेट्रो संचालन की आर्थिक क्रिया से जुड़ा है। टोकन का रुपया महिला होने पर बदल नहीं जाता।
महिलाओं के लिए आरक्षित डिब्बों वाली बात को गौर से समझने की जरूरत है। क्या हमारे साथ रहने वाले पुरुष इतने बड़े जानवर हैं कि वे महिलाओं को देखते ही हमला कर देंगे? क्या वे इतने हद तक खतरनाक हैं कि चंद मिनटों की यात्रा वह महिला यात्रियों के संग नहीं कर सकते? अगर यही है तब तो समाज की एनएसएल और नींव का चेक अप होना चाहिए। महिलाओं को पालतू बनाकर एक दड़बे में घुसेड़ देना वास्तव में उन्हें और डिफ़ेंसिव मोड में ला देने जैसा है।

महिलाओं को चूंकि एक लंबे समय से घरेलू बनाकर रखा गया है इसलिए उनमें कुछ विशेषताएं स्वाभाविक हैं। (हो सकता है पुरुषों में भी हों) बचत करने की अद्भुत क्षमता बहुत सी औरतों में होती है। छोटे कीमत के नोट या सिक्के चावल दाल के डिब्बों में मिलना इस बात का सबूत है। पिछले साल की गई नोट बंदी में इस आदत ने बहुत से परिवारों को संभाल लिया। बल्कि इस नोटबंदी ने महिलाओं की बचतों का सत्यानाश भी कर दिया। औरतों को एक बड़ा झटका दिया। कई औरतों को 5-5 रुपये की बचत करते हुए देखा जा सकता है। मेट्रो का अंतिम किराया 60 रुपये बताया जा रह है और शुरुआती किराया 10 रुपये। ऐसे में महिलाएं छोटी बचत की खातिर सीधे उन यातायात के साधनों का रुख कर रही हैं जो सफर के लिहाज से असुरक्षित हैं। आराम के मामले में भयानक। उदाहरण के लिए छोटी छोटी दूरी पर चलने वाली ग्रामीण सेवा जैसे वाहन कम दूरी का अधिकतम किराया सुबह और रात को वसूलते हैं। छः यात्रियों की जगह 8 से 10 यात्री बैठा लेते हैं। इसके अलावा दिल्ली के बहुत से ऑटो वाले मीटर का प्रयोग न के बराबर करते हैं। ओला और उबर सेवा अभी तक विश्वास हासिल नहीं कर पाई हैं। ऐसे में मेट्रो का बढ़ा किराया महिलाओं को एक असुरक्षित स्पेस में धकेल रहा है।


दिल्ली मेट्रो कोई मामूली परिवहन-जगह नहीं है। वह खुद भारत के विकास और परिवहन के शानदार नमूनों में से एक है। कुछ मेट्रो स्टेशन पर भारत के इतिहास और ऐतिहासिक इमारतों की प्रदर्शनी की झलक तो मिलती ही है साथ ही साथ मेट्रो के बनने की प्रक्रिया भी चित्रों में दिखलाई पड़ती है। मेट्रो के लिए औरत हो या आदमी, बच्चे हों या बूढ़े, सभी के मन में एक प्यार और इज्जत की जगह मौजूद है। वहाँ का रख रखाव और साफ सफाई, कर्मचारी और हर तरह की सहूलियत यात्रियों के दिल को जीत लेती है। जो लोग देख सुन नहीं सकते उन्हें भी बाकी जगहों के मुक़ाबले मेट्रो में सम्मान मिल जाता है।

मेट्रो अधिकरण का कहना है कि किराया कई सालों से बढ़ाया नहीं गया था और लगातार घाटा हो रहा है। उसे मेट्रो बनाने के लिए कर्जे का भुगतान भी करना है। इन सब वजहों को सुनकर हंसी ही आती है। जब इतने सालों से किराया नहीं बढ़ाया गया था तब अचानक अब घाटे की दुहाई देकर क्यों बढ़ाया जा रहा है? क्या घाटा तौलने का अधिकारियों को दीवा स्वप्न आ गया था? क्या जिन विदेशी कंपनियों से कर्जा लिया गया था, वे अचानक मेट्रो का कॉलर पकड़ कर कर्जे की मांग 2017 में करने लग गईं? मेट्रो में कई लाख लोग रोजाना सफर करते हैं। ऐसा नहीं है कि वे लोग एक या दो दिन ही करते हैं, बल्कि वे यात्री रोज़ ही मेट्रो का इस्तेमाल करते हैं। वे नियमित हैं। इसके अलावा हाल के समय में मेट्रो स्टेशनों में बहुत से कर्मचारियों की जगह मशीनों को फिट कर दिया गया है। जिससे व्यक्ति विशेष की नौकरी तो गई साथ में हर महीने का पगार का भी झंझट नहीं। क्या मेट्रो कार्पोरेशन हर महीने मशीनें खरीदती है? ये सवाल तो हैं ही साथ में और भी सवाल हैं जिनसे मेट्रो के अधिकारी टकराना नहीं चाहते। ऐसे समय में जब देश नोटबंदी और जीएसटी की मार तो झेल ही रहा है साथ ही बेरोजगारी में अव्वल इजाफा हुआ है तब मेट्रो का किराया बढ़ाना निहायती अमानवीय कृत्य है।

हालिया आई एक रिपोर्ट कहती है कि सुरक्षा के लिहाज से दिल्ली सबसे खतरनाक शहर है। इसलिए मेट्रो के बढ़े किराए का असर महिलाओं की सुरक्षा को प्रभावित करेगा। यदि किसी के पास किराये के उचित पैसे नहीं तो वह कैसे मेट्रो में जाएगा। मेट्रो के बजाय उपलब्ध साधन जो कि संतोषजनक नहीं है, का इस्तेमाल करेगा। निर्भया हादसे में तो साफ दिखा था कि कैसे ऑटो चालक ने आधे रास्ते तक ही छोड़ा और डीटीसी की बस की कमी के कारण अनधिकृत बस में जाना पड़ा। इसलिए परिवहन के साधनों पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है। उनके किराए में तो कटौती की जानी चाहिए न कि बढ़ौती।


मेट्रो की छोटी यात्राएं बेशक एक बड़ी यात्राएं नहीं हैं, फिर भी वे महिलाओं में यात्रा करने का आत्मविश्वास तो जगाती ही हैं। सफर का अंदाज़ देती हैं। और इस बात की पूरी संभावना है कि छोटी-छोटी यात्राएं करने वालियाँ एक दिन दुनिया की सैर पर निकल जायें।

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