बाबा साहेब डा. अम्बेडकर की पत्नी (माई साहेब) को बदनाम किया नेताओं ने:रामदास आठवले


केन्द्रीय सामाजिक  न्याय और अधिकारिता मंत्री  (राज्य) रामदास आठवले ने कहा कि "नेताओं ने जानबूझ कर माई साहब को बदनाम करने की कोशिश की.  बाबा साहब डा. अम्बेडकर के साथ 1948 में उनकी शादी हुई..मैंने यह स्टैंड लिया कि माई साहब अम्बेडकर पर अन्याय हुआ है और ब्रह्मणों में यदि ऐसी कोई साजिश होती तो बाबा साहब के बुद्धिस्ट बनने से पहले ही ऐसा कुछ हो सकता था."

यह बातचीत रामदास आठवले ने अपने ऊपर आ रही किताब 'भारत के राजनेता: रामदास आठवले ( द मार्जिनलाइज्ड प्रकाशन की सीरीज किताब के तहत) के लिए की है. विस्तृत बातचीत किताब में शामिल: 

 भारत के राजनेता: अली अनवर 
  संपादक : राजीव सुमन 
  श्रृंखला संपादक : प्रमोद रंजन




राज्य (महाराष्ट्र )  में कोई ऐसी घटना घटी हो या केंद्र में, जिसके बारे में आपको लगा हो कि कुछ घटित हो रहा है और तब आप भी एकदम सक्रिय रूप से राजनीति में आ गये हों?

वह समय दलित पैंथर का था. मतलब जब मैं मुंबई आया था और सिद्धार्थ हास्टल में था. दलितों पर अत्याचारों की घटना सुनाने को मिलती. मतलब जगह-जगह पर अत्याचार होते रह रहे थे. दलित पैंथर का आंदोलन पहले ही शुरू था. मैं तो बाद में उधर आ गया. मैं जिस हॉस्टल में रहता था, उधर ही राजा ढाले मिलते थे और फिर राजा ढाले से मेरे अच्छे संबंध बनते गये. उनके साथ मेरे विचार अच्छे होते गये और फिर उसी तरह माई साहब अम्बेडकर,जो बाबा साहब अम्बेडकर की पत्नी थीं, उनके साथ भी मेरे बहुत ही अच्छे संबंध हो गये थे. मैंने उनके साथ हुए अन्याय के मुद्दे को उठाया था, राजा ढाले ने भी उठाया था कि माई साहब अम्बेडकर पर अन्याय हुआ है. ये जो बाबा साहब के बाद वाले लीडर्स थे, वे माईसाहब को ही बाबा साहब अम्बेडकर की मौत के लिए जिम्मेदार मानते थे और लगातार ऐसी चर्चायें करते थे कि ब्राह्मण लोगों ने जानबूझ कर बाबा साहब की हत्या माई साहेब से करवाई है. लेकिन यह सही बात नहीं है. सही बात यह है कि माईसाहब अम्बेडकर  बुद्धिस्ट थी. वह कुमकुम नहीं लगाती थी. तिलक नहीं लगाती थी. वे ब्राह्मण होने के बावजूद भी खुद को बुद्धिस्ट समझती थी. बाबा साहब अम्बेडकर के बारे में उन्होंने किताब भी लिखी है. किताब उनकी यादों के बारे में है. मैंने यह भूमिका ली कि माई साहब अम्बेडकर को जान-बूझ कर इन नेताओं ने बदनाम करने का काम किया ताकि माई साहब के पास कोई न जाये. इसलिए माई साहब अम्बेडकर  के बारे में समाज में इन लोगों ने इस तरह की गलतफ़हमी फैलाई थी. माई साहब अम्बेडकर मुंबई या महाराष्ट्र भी नहीं आती थी. वो दिल्ली रहती थीं. दिल्ली के महरौली में एक फॉर्महाउस था, वहां माईसाहब अम्बेडकर कई सालों तक रहीं. लेकिन जब मैंने यह स्टैंड लिया कि माई साहब अम्बेडकर पर अन्याय हुआ है और ब्रह्मणों में यदि ऐसी कोई साजिश होती तो बाबा साहब के बुद्धिस्ट बनने से पहले ही ऐसा कुछ हो सकता था. बाबा साहब अम्बेडकर के बुद्धिस्ट बनने के समारोह में 14 अक्टूबर 1956 को माई साहब अम्बेडकर मौजूद थी. सफ़ेद साड़ी पहन कर बाबा साहब के साथ उन्होंने धम्म की दीक्षा ली और बौद्ध धम्म ग्रहण किया.



तो आपको क्या लगता है नानकचन्द्र रत्तू और सोहनलाल शास्त्री, जो बाबा साहब के साथ थे,- ये दोनों, या कई अन्य नेता क्यों गये होंगे माईसाहब के खिलाफ?

साथ रहे थे. लेकिन इसी तरह का प्रचार उन्होंने समाज में किया और नेताओं ने जानबूझ कर माई साहब को बदनाम करने की कोशिश की. माई साहब बहुत सरल स्वभाव की थीं. सीधी-सादी औरत थी. बाबा साहब अम्बेडकर के साथ 1948 में उनकी शादी हुई. वे एमबीबीएस थीं, पुणे में पढाई की थीं. उनका परिवार कबीर सरनेम रखता था. . उन्होंने बीमारी में बाबा साहब की देख-भाल की. बाबा साहब की तबियत भी ठीक नहीं रहती थी इसीलिए बाबा साहब ने उनके सामने प्रस्ताव रखा कि मैं शादी करना चाहता हूँ इसलिए कि मुझे किसी केयर टेकर की आवश्यकता है. और मैं ऐसे ही किसी औरत को रखूँगा तो मेरे बारे में गलत-फ़हमी बनाई जा सकती है. मेरे साथ अभी कोई भी नहीं है इसीलिए शादी का प्रस्ताव उन्होंने रखा. उनकी उम्र का काफी अंतर भी था. उसके बावजूद माई साहब, जिनका नाम शारदा कबीर था  और पेशे से डाक्टर थीं, इतने बड़े आदमी के प्रस्ताव को ठुकरा नहीं पायीं और उन्होंने इस प्रस्ताव को सहर्ष स्वीकार कर लिया. उनका नाम बाबा साहब ने सविता रख दिया.  वे कई सालों तक बाबा साहब के साथ रहीं. लगभग आठ सालों तक.

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