70 साल गौरव के, लोकतंत्र और समतामूलक सपनों के

स्त्रीकाल (प्रिंट )के अक्टूबर-दिसंबर अंक का संपादकीय 
संजीव चंदन

आजादी के 70 साल में कुछ नहीं हुआ. यह हालिया समय का सबसे बड़ा और बार-बार दुहराया जाने वाला एक ऐसा असत्य है, जिसका मुख्य लक्ष्य समाज और देश को पुनरुत्थानवादी  विचारों और व्यवस्था की ओर ले जाना है.  मेरे जैसे लोग 15  अगस्त 1947 को केन्द्रीय सत्ता के हस्तान्तरण, और इस सत्ता का देश के शासक वर्ग के हाथ में आने की तारीख के रूप में देखते हैं, जिसका बड़ा महत्व यह था कि तत्कालीन शासक वर्ग का केन्द्रीय नेतृत्व प्रगतिशील विचारों वाले लोगों के हाथ में था और इसीलिए 26 जनवरी 1950 को समता आधारित सपनों के साथ संविधान लागू हो सका, जो इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण तारीख है, जो एक मील के  पत्थर की तरह है और अब उसका भी लगभग 70 साल होने जा रहा है. इस 70 साल को नकार देना 1950 के उस महत्वपूर्ण घटना और उसके हस्तक्षेप तथा असर को नकार देना है.


हालांकि इन 70 सालों में संविधान पर आधारित शासन व्यवस्था के सकारात्मक असर के बीज अभी अंकुरित ही होने शुरू हुए है कि उसपर 'कुश के ऊपर मट्ठे' के प्रयोग जैसे हमले होने लगे हैं, वह डराने वाला जरूर है. देश में बढ़ती असहिष्णुता, भीड़तन्त्र की हिंसा, धर्म और राष्ट्रवाद के सम्मिश्रण से पैदा हुआ 'राष्ट्रवादी आतंकवाद' राज्य संरक्षित शिक्षण संस्थानों के लोकतंत्र पर हमले और जब पीछे छूट गये समाजों की लगभग पहली पीढ़ी वहाँ आ ही रही है तब उनके लिए दरवाजे बंद करना, या स्पेस को सीमित करना, महिलाओं पर बड़ी संख्या में हो रहे हमले आदि एक भयावह चित्र प्रस्तुत करते हैं. इन स्थितियों में यह जरूरी है कि विचार करें कि 70 सालों का आखिर हासिल क्या है, क्या यही जो दिख रहा है या यह पुनरुत्थानवादियों का प्रतिक्रियावाद है और इससे आने वाले समय में हम निपट सकने वाले प्रगतिशील राष्ट्र की तरह उभरेंगे!

इस समय और इन 70 सालों के हासिल को समझने के लिए बहुत सचेत और सावधान समझ की जरूरत है ताकि समझा जा सके कि उस सपने पर कोई संकट तो नहीं है, जो समतामूलक समाज के लिए 26 जनवरी 1950 को देखा गया था, या उसके पहले भी देखा गया था जब पहली बार महिलाओं, वंचितों के हित में पहली व्यवस्था की कोशिश हुई थी, जब सतीप्रथा के खिलाफ क़ानून बना था, जब एज ऑफ़ कंसेंट पर बहस हुई थी, जब बाल-विवाह के खिलाफ कानूनी हस्तक्षेप हुआ था, जब छुआछूत उन्मूलन की दिशा में पहला कदम लिया गया था, जब सबके लिए सुलभ शिक्षा की पहली पहल ली गई थी, जब देश में व्यक्ति की स्वतंत्रता और उसके अधिकार की संरक्षा के उद्देश्य से पहली बार क़ानून और न्यायालय बना था, या ऐसे ही कई अन्य प्रगतिशील सामाजिक-राजनीतिक निर्णयों के वक्त!

विचित्र विरोधाभास की स्थिति है, जो एक तरह से शातिर शतरंजी चाल भी है, कि जो विचार परंपरा या ताकतें अपने युग की हर प्रगतिशील पहल के खिलाफ थीं और उन पहलों के बरक्स खुद दकियानूस, परंपरावादी और प्रतिक्रियावादी थीं, वह आज प्रगतिशीलों की शब्दावालियों में ही प्रगतिशील मूल्यों के खिलाफ माहौल बना रही हैं, क्रमिक युद्ध की स्थिति में हैं. बहुत पीछे जाने की जरूरत नहीं है, इसी 70 साल की अवधि के भीतर भी उनके व्यवहार, विचार, राजनीतिक एजेंडे और पहलों को देखें तो  समतामूलक मूल्यों के जो अवरोधक थे आज समतावादी समूहों की शब्दावली के साथ ही अपने लक्ष्य के प्रति निरंतर गतिशील हैं. उनका लक्ष्य उनके महान ‘यज्ञ’ का अंतिम फलाफल है, जिसमें वे कभी-कभी शातिर, चालाक और पैतरे बदलकर समिधा डाल रहे हैं. वे समाज में समानता के लिए पीछे छूट गये समाजों के अधिकार के लिए राज्य और समाज द्वारा किये जा रहे प्रयासों के खिलाफ थे, आंदोलनरत थे, लेकिन आज वे उन्हीं समाजों से मुट्ठी भर लोगों के अधिकार सम्पन्नता के खिलाफ उनसे भी पीछे छूट गये और असंतुष्ट समुदायों के साथ खड़े होने का भ्रम रच रहे हैं. हिन्दू महिलाओं के समान अधिकार के सिद्धांत की खिलाफत करने वाले लोग मुस्लिम महिलाओं के समान अधिकार के पक्ष में खड़े होने का छद्म रच रहे हैं. धन-अर्थ-काम-मोक्ष जैसे सारे तत्कालीन अधिकारों से एक बड़े समूह की वंचना की वकालत करने वाले लोग आज कश्मीर में वंचितों-दलितों के छिन गये अधिकार के पक्ष में खड़े होने का छद्म रच रहे हैं. 1984 में शाहबानो केस में, गुजारे भत्ते के सावाल पर वे काफी मुखर हुए और अब तीन तलाक के खिलाफ मुहीम के पक्ष में. विरोधाभास है कि भारत सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में मुस्लिम महिलाओं द्वारा दायर याचिका के समर्थन में अपनी दलीलें दीं, वहीं विवाह के भीतर 15-16 साल की लड़कियों का होने वाला जबरन बलात्कार के समर्थन में कोर्ट में हलफनामादाखिल किया. यानी वे मुसलमान महिलाओं के लिए फिक्रमंद हैं और हिन्दू महिलाओं के सांस्थानिक बलात्कार के पक्षधर!


उनके झांसे में आने से बचना होगा. सच यही है कि तीन तलाक के खिलाफ लड़ने वाली मुस्लिम महिलाओं को समर्थन देने वाला भी मुसलमान समाज ही है. मुस्लिम महिलाओं का संगठन, लड़ने वाली महिलाओं के मायके के लोग या उनके समर्थक, शाहबानो प्रकरण पर राजीव गांधी सरकार से इस्तीफा देने वाले आरिफ मोहम्मद खान जैसे लोग, क्योंकि राजीव गांधी शाहबानो के खिलाफ मुसलमान समाज के तबके के विरोध से डर कर झुक गये थे और उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ अपनी सरकार के फैसले लिए.

आज तीन तलाक के खिलाफ अदालत और स्टेट की दखल का विरोध कर रहे वे वैसे ही लोग हैं जैसे हिन्दू कोड बिल, सती उन्मूलन, विधवा विवाह उन्मूलन आदि का विरोध करने वाले पुनरुत्थानवादी हिन्दू. वे लोग शरियत चाहते हैं तो पुनरुत्थानवादी हिन्दुओं के समविचारी पूर्वज मनुस्मृति के समर्थक थे. आज भी जब हिन्दू व्यवस्था में सुधार का प्रसंग आता है तो वे उसके खिलाफ होते हैं, लेकिन मुसलमान समाज को बुरा समाज सिद्ध करने के लिए उनके दकियानूस मुद्दों को जोर-शोर से उठा रहे हैं. यह खतरनाक है क्योंकि उनके मुद्दे गलत नहीं हैं इरादे गलत हैं, मुद्दे वही हैं जो प्रगतिशील जमातों के थे या उनके होने चाहिए थे.

इन 70 सालों में बहुत कुछ हासिल है वंचित जातियों और लिंग का, जिसे सुनिश्चित किया है संविधान ने. आज महिलायें ज्यादा स्वतंत्र हुई हैं, पितृसत्तात्मक जकड़न की गाठें कुछ हद तक ढीली हुई हैं, स्त्री-शिक्षा दर बढ़ा है, स्वास्थ्य का स्तर सुधरा है, विभिन्न संसाधनों में उनकी हिस्सेदारी बढ़ी है, स्पेस पर उनकी हिस्सेदारी और दावेदारी बढ़ी है, जिसकी प्रतिक्रिया में पितृसत्तात्मक वर्चस्व के एजेंट हमलावर हैं. यदि बलात्कार की घटनाओं की संख्या बढ़ी है तो उसका कारण है कि उसकी रिपोर्टिंग बढ़ी है. अब छेड़छाड़ खबरें बढ़ी हैं तो उसका कारण है कि महिलायें इनके खिलाफ सूचित कर रही हैं, मुंह खोल रही हैं. इसी हासिल के खिलाफ वर्चस्ववादी समूह आक्रामकता के साथ हमलावर भी है, इसलिए घटनाओं के कारण वे आक्रामक हमले भी है. वंचित जातियों के हासिल के संदर्भ में भी यही सच है तो इसी अनुपात का सच यह भी है कि उनपर भी आक्रामक हमला है और यह भी सच है कि वे भी आज संवैधानिक दायरे में अपने हक़ की आवाजें उठा रहे हैं, संघर्ष कर रहे हैं, इसलिए उनपर हमलों की घटनाएँ रिपोर्ट हो रही हैं. हाशिये के समाज का थोड़ा ही सही आगे आ जाना और लोकतंत्र तथा 70 साल पहले लागू हुआ संविधान अपना काम कर रहे हैं तो प्रतिक्रियावादी और पुनुरुत्थानवादी जमातें अपना.

वर्चस्वावादी, ब्राह्मणवादी ताकतों के हालिया हमलों और इरादों को निष्प्रभावी बनाने के लिए वंचित समूहों के नेतृत्व को इन 70 सालों के हासिल की चर्चा और उसका प्रसार करना चाहिए. बात करनी चाहिए इन प्रयास, समता के लिए जारी संघर्ष के सपनों की और उसे देखने तथा लागू कराने में संघर्ष करने वाले महान लोगों की, जनता को इसके लिए तैयार करना चाहिए कि शिक्षा, लोकतंत्र, न्यायालय, संविधान, संसद जैसे संस्थाओं की अक्षुण्णता सुनिश्चित हो अन्यथा वर्चस्वावादी ताकतों का पहला शिकार ये संस्थायें ही होंगी, जिनसे समाज के हाशिये के लोग ताकत पाते रहे हैं.


थोड़ा गौर करते हैं कि इन पुनरुत्थानवादियों के सपनों का समाज क्या है, वह ब्राह्मणवादी हिंदुत्व का राष्ट्रवाद कैसा समाज बनायेगा. इसे एक प्रसंग से समझते हैं. अभी विलियम डेलरिम्पल और अनिता आनंद की एक किताब खत्म की है:  'कोहिनूर, दुनिया के सबसे मशहूर हीरे की कहानी'(जगरनॉट). एक ऐतिहासिक उपन्यास सा लिखा गया यह कोहिनूर हीरे का प्रमाणिक इतिहास-लेखन है. किताब भरसक कोशिश करती है कि इसके ऐतिहासिक वजूद की विकास यात्रा को परत-दर-परत डॉक्यूमेंट किया जाये. वहीं इसके कालखंड की और हीरे की कहानी की अवांतर कहानियां, जो तब की मुख्यधारा का इतिहास हैं, इसे एक रचना के रूप में ऐतिहासिक उपन्यास का स्वरूप दे देती हैं. नायक कोहिनूर , रहस्यों, अफवाहों और अतिशक्योक्तियों की लिबास में लिपटा सर्वाधिक चर्चित नायकों में से एक है, जो बाद में हिन्दू राष्ट्रवादी भावना से जा जुड़ा. किताब का फलक विस्तृत है, जानकारियों और विभिन्न संवेदनाओं के लिए महत्वपूर्ण आश्रय और उद्दीपन हैं इसमें. लेकिन राष्ट्रवाद की कड़वी सच्चाइयों के भीतर आहों और अनसूनी कर दी गई कराहों के कब्र डरा देते हैं. राष्ट्रवादी अस्मिता, खासकर हिन्दू राष्ट्रवादी अस्मिता  की डरावनी तस्वीर है महाराणा रणजीत सिंह के साथ उनकी चंदन की चीता में उनकी 11 महारानियों का ज़िंदा जल जाना और साथ में अनेक दासियों का उपलों और कंडों की आग में-वीभत्स सती प्रथा का यह चित्र रूह तक हिला देता है. रणजीत सिंह के बाद भी अनेक राजाओं के साथ यह सिलसिला दुहराया जाता रहा, जलने वाली रानियों में 16 से लेकर 50 तक की उम्र की रानियाँ और इन्हीं उम्रों की दासियाँ लिजलिजाती, बूढ़ी वासना और महानता की उन्मत्त आकांक्षा  की आग में  पीढी-दर-पीढी जलती रही हैं, कितनी जीवित कराहती रही हैं. सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का (दुः) स्वप्न इसी लिए डारता भी है, और इन 70 सालों पर, बल्कि पिछले दो सौ-ढाई सालों पर गर्व करने को जी चाहता है, जिसे वे सर्वाधिक बुरा समय मानते हैं- उनके शब्दों में कलियुग का चरम ! वे इसे 'हंस चुगेगा दाना और कौआ मोती खायेगा वाली शब्दावाली में समझते, समझाते हैं.

स्त्रीकाल का यह अंक महिला आरक्षण को विशेष रूप से केन्द्रित है. आज आजादी के 70 सालों बाद भी संसद, विधानसभाओं में महिलाओं का प्रतिशत नगण्य है. पिछले दो दशक से महिला आरक्षण बिल संसद में पारित नहीं हो पा रहा है, कारण किसी भी राजनीतिक दल का इसके प्रति गंभीर नहीं होना है. स्त्रीकाल न सिर्फ समय-समय पर इस मुद्दे को उठाता रहा है, बल्कि सांस्थानिक रूप से इसके लिए सक्रिय है.

2012 में स्त्रीकाल के दलित स्त्रीवाद अंक के बाद हम इसे त्रैमासिक पत्रिका के रूप में पुनः एक शुरुआत दे रहे हैं. इसके पहले यह पत्रिका अनियतकालीन रही है. 2012 के बाद हालांकि इसका वेब वर्जन (www.streekal.com) 2014 से निरंतर और दैनिक प्रकाशन है. इसे विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने भी शोध-पत्रिका के रूप में मान्यता दी है. हम द्विमासिक ऑनलाइन शोध जर्नल भी प्रकाशित कर रहे हैं. आपका सहयोग अपेक्षित है.

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