मैंने अमित शाह को गुंडा (इसलिए) कहा.....राना अय्यूब


मुकुल सरल 

 “ये किताब एंटी मोदी या एंटी अमित शाह नहीं है, ये किताब उन लोगों के लिए जस्टिस की किताब है। हम आपको सिर्फ ये याद दिलाना चाहते हैं कि जो 2002 में हुआ जो 1984 में हुआ इसका मतलब ये नहीं कि वो हुआ नहीं हम भूल चुके हैं, हमारा जमीर मर चुका है, इसलिए इसको हम भूल चुके हैं, ये किताब या ऐसे इवेंट हम इसलिए करते हैं कि आप अपने जमीर को याद दिलाते रहें कि ऐसी ज़्यादतियां हुई हैं और जिन लोगों ने ये ज़्यादतियां की हैं वो आज हमारे हुक्मरान हैं और आप और हमें इस चीज की शर्मिंदगी होनी चाहिए, मुझे इस बारे में बोलने में कोई शर्म नहीं आती कि हम शायद मुर्दा हो चुके हैं कि हमें शर्मिंदगी नहीं होती कि ऐसे लोग हमारे प्रधानमंत्री और पार्टी अध्यक्ष हैं।"


ये कहना है पत्रकार राना अय्यूब का जो शनिवार को दिल्ली के प्रेस क्लब में अपनी किताब ‘गुजरात फाइल्स’ के हिंदी संस्करण के विमोचन के अवसर पर बोल रही थीं।

इस मौके पर वरिष्ठ पत्रकार और टीवी एंकर रवीश कुमार ने कहा कि उस समय अविश्वास के माहौल में जो खूनी खेल खेला जा रहा था मुझे लगता है कि उसका ये दस्तावेज़ है। जब तक यह किताब है वो ये याद दिलाती रहेगी कि आप कुछ कहने से डर रहे हैं। और जब तक आपको याद है कि आप कुछ कहने से डर रहे हैं तो इस किताब का मकसद कामयाब है मेरी नजर में।

कार्यक्रम की शुरुआत पिछले दिनों अतिवादियों की गोली का शिकार हुईं पत्रकार और एक्टिविस्ट गौरी लंकेश की याद में दो मिनट के मौन के साथ हुई। ‘गुजरात फाइल्स’ की लेखक राना अय्यूब ने अपने सफर को याद करते हुए बताया कि “मुझे बहुत खुशी हुई क्योंकि हिंदी में इस किताब का आना बहुत ज्यादा जरूरी था। अंग्रेजी समेत 12 और ज़बानों में यह किताब आ चुकी है। इस मुल्क की जो हिंदी बेल्ट है हिंदी पापुलेशन है उसके लिए यह किताब बहुत जरूरी थी। हमारी मातृभाषा है हिंदी। मुझे अंदर से एक कुढ़न हो रही थी कि यह किताब हिंदी में नहीं आई है।”


शुक्रिया के बहाने...

राना ने थोड़े दुख और थोड़े व्यंग्य के साथ बताया कि “मई 2016 में इसका लांच हुआ और आज 1 साल तीन महीने हो चुके हैं। इस किताब की सच्चाई यही है इस सरकार ने अब तक न मेरे ऊपर डेफमेशन (मानहानि) का केस किया, न मेरी इस किताब को बैन किया। उनका शुक्रिया। अफसरों ने जिनकी स्टिंग आपरेशन हुआ है उनमें से किसी ने आज तक यह इल्ज़ाम नहीं लगाया कि इस किताब में जो कुछ लिखा है गलत लिखा है। उनका भी शुक्रिया। सवा साल हो गया है एसआईटी ने भी हमें एप्रोच नहीं किया है। उसका भी शुक्रिया।”

उनका यह शुक्रिया कई सवालों को जन्म दे रहा था। उन्होंने कहा कि “ये एक किताब थी ही नहीं, न मुझे किताब लिखने का कभी शौक था, यह एक जर्नलिस्टिक एफर्ट (पत्रकारीय प्रयास) था, 2010 में मेरी इन्वेस्टिगेशन (जांच-पड़ताल) के बाद अमित शाह जो जेल गए हैं उसके बाद मुझे इस बात की ज़रूरत लगी कि मैं अंडर कवर जाऊं और कुछ सच्चाई है, कुछ चीजें हैं जो बाहर नहीं आई थी, उन्हें बाहर लाऊं।

उन्होंने इस किताब के लिए मैथिली त्यागी के किरदार का सफर बताया। और छुपे कैमरे और माइक्रोफोन से की गई इस पूरी पड़ताल की कहानी जिसमें तमाम मुश्किलें और जोखिम रहे, उन्हें संक्षेप में बताया।

"सबने स्टिंग छापने से मना किया"

राना ने कहा कि “8 महीने तक मैंने मैथिली त्यागी बनकर उन्हीं के समाज का हिस्सा बनकर यह स्टिंग ऑपरेशन किया। ‘तहलका’ ने छापने से मना कर दिया, फिर मैं इसे हिंदुस्तान में जितने भी एडिटर दोस्त हैं मेरे, उनके पास लेकर गई, उन सबका मेरे लिए एक सजेशन (सुझाव) था कि अब 2014 में मोदी पावर में आ रहे हैं, इसे करने की जरूरत नहीं है। जब किताब आई तो हिन्दुस्तान के सब एडिटर जो मेरे दोस्त हैं सबने मुझे बधाई दी कि बहुत साहस का काम किया लेकिन किसी ने भी अपने पब्लिकेशन में इसके बारे में कुछ मेंशन नहीं किया, जैसे यह किताब एग्ज़िस्ट (वजूद) ही नही करती।”

"बड़े जर्नलिस्ट, कन्सलटेंट बन गए हैं"

राना ने कहा कि “आजकल हिंदुस्तान में जितने भी बड़े अच्छे जर्नलिस्ट हैं वे सब कन्सलटेंट बन गए हैं। या सबने अपनी-अपनी पर्सनल वेबसाइट खोल ली है, बहुत कम लोग हैं जो इस पावर में रहकर इस पोजिशन में रहकर सच्चाई बोल पा रहे हैं। रवीश यहां पर हैं लेकिन  कभी कभी मुझे लगता है कि हम रवीश पर बहुत ज्यादा बोझ डाल देते हैं।”


"हां, मैंने अमित शाह को गुंडा कहा"

राना ने भावुक अंदाज में कहा कि मैं जो इस किताब को पिछले एक साल से पागलों की तरह हर जगह लेकर ढो रही हूं, अपने साथ लेकर घूम रही हूं, इसकी बात कर रही हूं ताकि मैं शायद आपके जमीर तक इस बात को पहुंचा पाऊं कि जिन लोगों को आपने आज पावर में बैठाया है, उन लोगों से हमारी कोई पर्सनल दुश्मनी नहीं है, किसी की कोई पर्सनल दुश्मनी नहीं है, हम सिर्फ एक सहाफी (पत्रकार) के तौर पर काम कर रहे हैं। मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि जिस तरह मुझे बना दिया गया है कि मैं एंटी मोदी हूं, एंटी अमित शाह हूं, नहीं, मैंने अमित शाह को गुंडा इसलिए कहा क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह वो एक इंसान है, सुप्रीम कोर्ट ने एक्सटॉर्शनिस्ट (Extortionist) कहा। एक्सटॉर्शनिस्ट का सीधा सीधा हिंदी शब्द होता है गुंडा, तो इसलिए मैंने उन्हें गुंडा कहा जिसे कहने में मुझे कोई शर्म  नहीं आती। न  मुझे कोई नौकरी बचाने का डर है न किसी एडिटर का डर है तो मैं कुछ चीजें तो कह सकती हूं जो मेरे कलीग नहीं कह सकते हैं। कई कलीग मुझसे कहते हैं कि तुम्हें कई चीजों का फायदा मिलता है, तुम्हे कोई नौकरी नहीं बचानी है, तुम्हारे बच्चे नहीं है, तुम्हारे कोई लोन नहीं है देने के लिए, मेरा उनसे एक ही सवाल है कि अगर लोन  के लिए आए थे या नौकरी बचाने के लिए आए थे या पैसे कमाने के लिए आए थे तो फिर जर्निलिज़्म में क्यों आए, फिर कुछ और कर लेते। कुछ लोग हमें सनकी भी कहते हैं। लेकिन यह सफर जो है इस किताब का मैं आपको यकीन दिला सकती हूं कि ये यहीं पर नहीं खत्म होगा, ऐसे कई लोग हैं जिन्होंने हमारा साथ दिया है, ऐसे कई लोग हैं जिनको मैं रोज़ देखती हूं, जिनके बारे में जानती हूं। रवीश के मेरे पास बड़े सारे वीडियो आते रहते हैं कि देखो एक बहादुर जनर्लिस्ट। कभी कभी चिढ़ भी हो जाती है कि आप लोग (मीडिया के लोग) जो हमें बहादुर कहते हैं हमारे कंधे पर बंदूक रखके चलाते हैं तो आप यह बहादुर कहना बंद कर दीजिए, पहले खुद बहादुर बनिये हम आपकी लड़ाई नहीं लड़ने वाले हम अपने जमीर को जवाब देने के लिए ये काम कर रहे हैं। आगे अपने जमीर को जवाब देने की लड़ाई आपको खुद लड़नी होगी।”

84 का जिक्र

दूसरे दौर की बातचीत में राना ने 84 और गुजरात दंगों की तुलना भी की। उन्होंने वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह की बात का उल्लेख किया कि अगर हम 84 को नरसंहार कहते तो 1993 नहीं होता, 1993 नहीं होता तो 2002 नहीं होता।

मीडिया पर सवाल

उन्होंने मीडिया पर भी खुलकर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि आज जो कुछ हो रहा है या आज मोदी और अमित शाह जहां पर बैठे हैं उसकी जिम्मदारी या जवाबदेही हम पत्रकारों को भी लेनी होगी, क्योंकि आज भी हम मोदी और अमित शाह के बारे मे बड़ा खुसर-पुसर कर बात करते हैं, जोर से बात नहीं करते।
गौरी लंकेश को याद करते हुए उन्होंने कहा कि सारी पत्रकार बिरादरी के लिए कहा कि ये हमारे घर में घुसकर हमें मारने की इजाजत हमने खुद दी है क्योंकि हम कभी साझा थे ही नहीं।


इस किताब से डरिये मत : रवीश

वरिष्ठ पत्रकार और टीवी एंकर रवीश कुमार ने कहा कि हिंदी पट्टी में ऐसी किताबें आती हैं तो मुझे व्यक्तिगत रूप पर बहुत खुशी होती है। क्योंकि खुद भी इन सब चीजों को जानने के लिए संघर्ष  कर पहुंचना पड़ता है खासकर गुजरात की रिपोर्टिंग हो रही थी जब उस वक्त ज्यादातर लोग खासकर पत्रिकाएं जो एक हद से आगे जाकर जानने की कोशिश कर रही थीं वो अंग्रेजी की ही थीं। उन्हीं के जरिये चीजें पहुंच रही थीं तो हिंदी के प्रदेशों में इसके बारे में कम सूचनाएं हैं, धारणाएं बहुत हैं, तरह तरह की धारणाएं हैं चाहे वो झूठ हों चाहे वो सही हों, यह किताब उनको एक तरह से एंपावर (सशक्त) करेगी, उनको ताकत देगी, चीजों को फिर से लौटकर समझने की।

"हमें भूल जाने की आदत"

उन्होंने कहा कि भूल जाने की हमको आदत होती है, हर दंगे को हम भूल गए, हम बड़े बड़े दंगों को भूल गए, हम जब बिहार में होते थे तो लगता था कि भागलपुर का दंगा कोई नहीं भूलेगा लेकिन हम वो भूल गए, दिल्ली आए तो पता ही नहीं था कि इतना बड़ा नरसंहार इस शहर में हुआ है लेकिन उसको भी भूल गए, लेकिन कुछ लोग हैं जो उसकी याद को लेकर कहीं प्रदर्शन कर रहे होते हैं, इतनी ही संख्या में छोटी संख्या में लोग जमा हो रहे होते हैं और नारे लगा रहे होते हैं उसे याद दिलाने के लिए कि किसी नतीजे पर हम नहीं पहुंच सके।

रवीश ने कहा कि कई बार सोचता हूं कि हम क्यों भूल जाते हैं इन सब अपराध को। लगता है कभी कभी कि हम नेताओं के अपराध को जनता के तौर पर अपना अपराधबोध बना लेते हैं और उस अपराधबोध से भागने के लिए हम नेता के अपराध पर परदा डालने लगते हैं। उसे हर साल दर साल बड़ा करते चले जाते हैं। और नतीजा यह होता है कि वो पर्दा इतना बड़ा हो जाता है कि किसी किताब को फिर कहीं से लौटकर आना पड़ता है, किसी न्यायाधीश को जिस तरह अभी राम रहीम के मामले में जस्टिस जगदीप सिंह ने फैसला दिया कोई अकेला आता है और वो अपनी कलम चला देता है तो ये वो किताब है जिसपर कोई बात नहीं करना चाहता है। मैंने जब यह किताब पढ़ी थी तो मुझे लगा था कि इस किताब पर बात करने से लोग डरेंगे। उनके डर को मैं समझता हूं, यही इस किताब का मकसद है कि जब तक यह किताब है वो ये याद दिलाती रहेगी कि आप कुछ कहने से डर रहे हैं। और जब तक आपको याद है कि आप कुछ कहने से डर रहे हैं तो इस किताब का मकसद कामयाब है मेरी नजर से।

रूपक के जरिये साज़िश का परदाफ़ाश

रवीश ने मुख्य पृष्ठ (आवरण) के रूपक के माध्यम से राजनैतिक साजिशों की तरफ इशारा किया। उन्होंने कहा कि “मुझे लगता है कि एक छिपकली एक अंधेरी सुरंग के पास पहुंची है और अंदर कुछ साजिशों की आवाज आ रही है जिससे वह ठिठक  गई है और गर्दन उठाकर देखना चाहती है कि कोई यहां पर है या नहीं मेरे अलावा कोई जानता है या नहीं। तो मैं इसे इस रूप में देखता रहता हूं तो उसी छिपकली के रूप में यह किताब है। तो तकलीफ होगी। अगर लोगों को इमरजेंसी पर फिल्में बनाने से फुर्सत हो गई हो मेरी राय में वो गुजरात फाइल्स पर भी फिल्में बना सकते हैं।”


"गुजरात दंगों का दस्तावेज़"

रवीश ने कहा कि “उस समय अविश्वास के माहौल में जो खूनी खेल खेला जा रहा था मुझे लगता है कि उसका ये दस्तावेज़ है। इसके प्रथम पाठक कौन होने चाहिए इसके पाठक वो होने चाहिए जिन्होंने गुजरात दंगों में सज़ा पाई है चाहे वो हिंदू परिवार हों या चाहे मुस्लिम परिवार हों, मेरे लिए बेहतर स्थिति यही है कि मैं उनको पढ़कर सुनाऊं और देखना चाहता हूं कि उनकी अपनी प्रतिक्रिया क्या है। यह अधूरी किताब है क्योंकि इसे किसी और को पूरा करना है, वो अभी विपक्ष को निपटाने में लगी है सीबीआई, वो एक राष्ट्रीय जिम्मेदारी का काम कर रही है आजकल, उसने अभी तक लोअर कोर्ट के जो फैसले हैं उनको शायद चुनौती नहीं दी है, कौसर बी का पता नहीं है, नजीब का भी पता नहीं है, तो बहुत सारे सवाल हैं और अक्सर जब भी वंजारा साहब को तलवार लेकर नाचते देखता हूं घबराहट होती है। मुझे डर लगता है कि वो शायद हमारी हैवानियत का एक ऐसा प्रतीक है जो हमे ललकार रहा है कि लो हमारी तलवारें खून से सनी हुई हैं भले ही अदालतों ने हमें बरी किया है। लेकिन उनके नाचने का अंदाज बहुत डरावना है।

“मैं चाहूंगा जो हिंदी के पत्रकार हैं इस किताब पर प्रोजेक्ट रिपोर्ट करें और कोई न भी दे तो प्रोजेक्ट रिपोर्ट करके अपने प्रोफेसर साहब को दे दें कि ठीक लिखा है या नहीं लिखा है। और उम्मीद करता हूं कि इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्युनिकेशन के जितने भी जनर्लिजम के कोर्स हैं वहां पर यह किताब होगी।

मेरा यही कहना है कि इस किताब से डरिये मत। मुझे यकीन है कि राना ने स्टिंग के दौरान तहलका और हिंदू की कापी जिस कमरे में देखी थी उनके कमरे में यह किताब होगी।”

विपक्षी दलों से भी सवाल

रवीश ने कहा कि आज भी बिहार में भी उसी तरह से है, यूपी में भी उसी तरह से है और गुजरात में भी ऐसा नहीं कि उसी वक्त था आज भी वही काम हो रहा  होगा, उसी तरह साजिशें रची जा रही होगी तो यह ज्यादा याद दिलाने की जरूरत है कि लीगल स्टेटस इस केस का क्या है, क्यों नहीं विरोधी राजनीतिक दल हैं वो मांग करते कि इस मामले की अभी तक क्यों नहीं बड़ी अदालत में अपील की गई है। कुछ आता है फिर सब गायब हो जाता है कुछ भी कानूनी चीज आगे नहीं बढ़ती है, हमें एक अच्छे पाठक होने के नाते यही जिम्मेदारी निभा देने की जरूरत है कि कि हम उन पहलुओं को जाने और कम से कम दस लोगों को बता दें।

किसी केस में अपील नहीं : वृंदा ग्रोवर

इस मौके पर वरिष्ठ वकील वृंदा ग्रोवर ने कहा कि सीबीआई किसी मामले में अपील नहीं डाल रही, कौन सवाल पूछेगा उससे, जाहिर है देश के गृहमंत्री ही पूछ सकते हैं हमें नहीं मालूम की क्या बातचीत चल रही है उनके बीच में लेकिन अपील किसी केस में नहीं डाली जा रही है।

84 और 2002 के दंगे अलग : पंकज बिष्ट

कार्यक्रम में वरिष्ठ लेखक-पत्रकार पंकज बिष्ट ने कहा कि “मैं जिस भाषा से आता हूं और एक लेखक के नाते भी मैं मानता हूं कि किसी किताब का महत्व या कोई समाज या उसकी विश्वसनीयता इस बात पर निर्भर करती है कि उस समाज या भाषा का मीडिया उसे किस तरह लेता है, किस तरह से वो बताता है अपने पाठकों को, अपने समाज को कि यह किताब क्या है और इसका क्या महत्व उनके लिए हो सकता है। जैसी हालत आज के हिंदी मीडिया की है, हालांकि अंग्रेजी मीडिया की भी बहुत अच्छी हालत नहीं है लेकिन उसकी तुलना में हिंदी मीडिया की जो हालत है तो बड़ा शक होता है। इसके बावजूद मैं मानता हूं कि एक हिन्दी में भी एक बड़ा समाज है जो बेचैन है, जो चीजों को जानना चाहता है, समझना चाहता है। अपनी बातचीत में उन्होंने 1984 और 2002 के दंगों के अंतर को भी स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि वो (1984) दंगा एक हद तक अचानक स्वत शुरू हुआ था, वो करवाया नहीं गया था, बाद में उसको भड़काया गया, इसमें कहीं कोई शक नहीं है, मैं उसका विरोध आजीवन करता रहा हूं, लेकिन गुजरात का जो दंगा हुआ उसका आज तक यह फैसला नहीं हो सका कि गोधरा में उस गाड़ी में आग कैसे लगी, इसके बारे में आज तक कोई अंतिम निर्णय नहीं है कोई फैसला नहीं है, ये बताता है कि यह पूरी की पूरी घटना संदेह के दायरे में है। इसलिए मैंने कहा कि आजाद भारत के इतिहास में इससे बड़ा ऑर्गनाइज़ क्राइम (संगठित अपराध) जिसमें राजनीति है, ब्यूरोक्रेसी है, जिसमें मीडिया इनवाल्व है और बाद में ज्युडेशरी (न्यायपालिका) इनवाल्व है। ऐसा लग रहा है कि इस लोकतंत्र की सारी संस्थाए एक साथ अपनी विश्वसनीयता खो रही हैं। ये सब तभी बचेगी जब लोग उठेंगे। ऐसे छोटे छोटे प्रयास और होंगे।


ताकि बनी रहे लहूलुहान याददाश्त : अजय सिंह

प्रकाशक गुलमोहर किताब की ओर से वरिष्ठ कवि और पत्रकार अजय सिंह ने इस किताब की हिंदी में जरूरत को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि गुलमोहर किताब की ओर से इस किताब का हिंदी अनुवाद इसलिए लाया जा रहा है ताकि हम गुजरात-2002, को हरगिज़ न भूलें और उसे अपनी लहूलुहान याददाश्त का हिस्सा बराबर बनाए रखें। मानवता के खिलाफ अपराध करने वाले असली गुनाहगारों को सज़ा मिलनी अभी बाक़ी है।

कार्यक्रम का संचालन पत्रकार भाषा सिंह ने किया। इस मौके सवाल-जवाब का भी छोटा सा दौर हुआ। कार्यक्रम में यह उपलब्धि रही कि इसमें वरिष्ठ लेखक, पत्रकारों के साथ बड़ी संख्या में युवा खासकर पत्रकारिता के छात्र भी मौजूद रहे।
साभार: जनचौक 

स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह 'द मार्जिनलाइज्ड' नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. 'द मार्जिनलाइज्ड' मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.
आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
लिंक  पर  जाकर सहयोग करें :  डोनेशन/ सदस्यता 

'द मार्जिनलाइज्ड' के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें :  फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं. ई बुक : दलित स्त्रीवाद 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com
Blogger द्वारा संचालित.