प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने जन्मदिन पर जनता को दिया जल समाधि का तोहफा


आज भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने जन्मदिन पर सरदार सरोवर बांध के 30 दरवाज़े खोल कर इस परियोजना का उदघाटन किया. हालांकि इसका एक परिणाम जहां कुछ राज्यों को मिलने वाली ऊर्जा की सुविधायें हैं तो दूसरा परिणाम है, कई गांवों का जलमग्न हो जाना. इस कहानी का सच यह भी है कि इन डूब रहे गांवों के विस्थापितों का समुचित पुनर्वास नहीं हुआ है. इसीलिए  सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर अपने सहयोगियों के साथ मध्य प्रदेश के छोटा बड़दा गांव के घाट पर जल सत्याग्रह कर रही हैं. नर्मदा बचाओ आंदोलन की संस्थापक मेधा पाटकर सहित 30 से ज्यादा महिलाएं जल सत्याग्रह कर रही हैं. उनका आरोप है कि बेहतर पुनर्वास किए बिना सरदार सरोवर बांध की ऊंचाई बढ़ाने से बड़ी संख्या में लोग विस्थापित होंगे. मेधा पाटकर ने कहा है कि जल समाधि ले लेंगे लेकिन इस जगह को खाली नहीं करेंगे.
मेधा का आंदोलन अभी भी जारी है, सरकार ने उन्हें नजरबंद कर रखा है


मेधा पाटकर का सरकारी उत्पीड़न जारी
सरदार सरोवर का जलस्तर बढ़ाने से मध्य प्रदेश के 192 गांव पूरी तरह डूब जाएंगे. वहीं रविवार को अपने जन्मदिन पर प्रधानमंत्री नर्मदा नदी पर बने सरदार सरोवर बांध के 30 दरवाज़े खोले. ज्ञात हो कि सरदार सरोवर का जलस्तर बढ़ाने से मध्य प्रदेश की नर्मदा घाटी स्थित धार, बड़वानी, सहित अन्य इलाकों के 192 गांव और एक नगर का डूब में आना तय माना जा रहा है. धीरे-धीरे जल स्तर बढ़ रहा है और कई गांवों में पानी भी भरने लगा है. इसके बावजूद प्रभावित गांव के लोगों ने अब तक घर नहीं छोड़े हैं.



समाज, संसाधन और संविधान बचाने के लिए एकजुट हों - मेधा पाटकर
बेहतर पुनर्वास और मुआवजा दिए बिना सरदार सरोवर की ऊंचाई बढ़ाए जाने का लोग विरोध कर रहे हैं. इसी के तहत मेधा पाटकर ने शुक्रवार से सत्याग्रह शुरू किया, वे नर्मदा नदी के छोटा बड़दा गांव के घाट पर बैठी हैं, जहां पानी लगातार बढ़ रहा है, स्थिति यह है कि उनका सत्याग्रह जल सत्याग्रह में बदल गया है. मेधा ने उद्घाटन से पूर्व कहा था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन को धूमधाम से मनाने के लिए हजारों परिवारों की जलहत्या की तैयारी हो रही है. यह कैसा जश्न है कि एक तरफ लोग मरने की कगार पर होंगे और गुजरात में 17 सितंबर रविवार को जश्न मनाया गया. यह दिन देश के सबसे बुरे दिनों में से एक होगा.


मुल्‍क में बड़े जन आंदोलन की जमीन तैयार हो रही है: मेधा पाटेकर
सवाल है कि क्या लोकतंत्र में राज्यों का यही आचरण होगा कि विकास के नाम पर हजारो लोग जल-समाधि के लिए मजबूर किये जायेंगे? क्या प्रभावितों के बिना समुचित पुनर्वास के ऐसी योजनाओं के लिए राजहठ जनता के खिलाफ राज्य का निर्णायक युद्ध और अधिनायकवाद नहीं है.

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