जिंदगी की ओर लौटते हुए...

जयश्री रॉय
जयश्री रॉय कथा साहित्य में एक मह्त्वपूर्ण नाम हैं. चार  कहानी संग्रह , तीन उपन्यास और एक कविता संग्रह प्रकाशित हैं . गोवा में रहती हैं. संपर्क: jaishreeroy@ymail.com

दर्द की एक नीली नदी मेरी शिराओं-उपशिराओं के संजाल में फैली हुई है... बूँद-बूँद रिसते हुए  विष की तरह, देह के प्रत्येक-रंध्र में मर्मांतक कष्ट की गहरी जड़ें  रोपते हुए... सारी रात इसकी जद में रही हूँ- बहुत कातर और असहाय...अब बस, इसके उतार के इंतजार में हूँ, क्योंकि इसके सिवा कोई दूसरा विकल्प नहीं है मेरे पास... विकल्प का न होना- विवशता का चरम है ! इसी चरम से गुजरने के लिए प्रतिपल अभिशप्त हूँ- मुझे कैंसर हुआ है !

उसदिन खिडकी के बाहर आकाश के फीके नील में भोर का वह तारा कितना उजला था... मैं उसे न जाने कितनी देर तक देखती रही थी . पूरी रात न सो पाने से अंदर गहरी थकान और तनाव था, कनपटी पर कोर्ई नस रह-रहकर धडक उठती थी . दर्द... अब वह सारी सीमाओं के पार चला गया था, एक शून्य, अवश हो जाने की-सी स्थिति ! इस दर्द का स्वाद भी कितना अद्भुत है, अबतक के सारे दर्दों से अलग, इसमें डर का नील भी घुला हुआ है !

कल देर शाम मेरा ऑपरेशन हुआ है, सारे लींप नोड्स बगल से निकाल दिए गये हैं . शायद इक्कीस..अब उन्हें परीक्षण के लिए मुम्बई कैंसर फैला है या नहीं देखने के लिए.उसी के आधार पर मेरा आगे का ईलाज निर्धारित किया जायेगा. दस दिन के भीतर मेरा यह दूसरा ऑपरेशन है.लेपकटॉमी . मुझे स्तन का कैंसर हुआ है.दायीं तरफ .पता नहीं क्यों,ऑपरेशन के ऐन वक्त मेरा रक्तचाप सांघातिक रूप से बढ गया था. हालांकि मैं भीतर से बिल्कुल शांत थी.ओ. टी. में जाने से पहले तक सबसे हँसी-मजाक करती रही थी.गहरे नशे की-सी अवस्था में ऑपरेशन टेबल पर मैं अपने चारों तरफ मची हडबडी को महसूस कर सकती थी . मेरी इस हालत के लिए ओ. टी.में मौजूद स्टाफ एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहरा रहे थे.

होश में आने के बाद मेरी हालत पानी से निकली हुई किसी मछली की तरह हो रही थी . एक-एक साँस के लिए तडपती हुई... ओह , कैसा  गहरा आतंक से भरा अनुभव था वह- जीभ, गला सूखकर काठ, श्वासनली में गहरी पीडा... मैं जानती थी, मुझे एनेसथेसिया गलत ढंग से दिया गया है, या जरूरत से ज्यादा की मात्रा में . पहले भी एकबार ऐसा मेरे साथ हो चुका था . तब मैं कोलकाता में अपनी पहली बांगला फिल्म की शूटिंग में व्यस्त थी और अचानक से दायें सीने में निकल आये एक गाँठ का ऑपरेशन मुझे करवाना पड गया था . गलत एनेसथेसिया की वजह से मेरा गला जख्मी हो गया था . कई दिनों तक साँस लेने में भी तकलीफ होती रही थी . यह १९८७ की बात है .

न जाने इस तरह से हर साल कितने मरीज ऑपरेशन थियेटर में अपनी जान गँवा देते हैं . मेरे परिवार के लोग ओ. टी. के बाहर अधीर प्रतीक्षा में खडे थे . उन्हें मेरी इस स्थिति के विषय में कोई खबर नहीं दी गयी थी . मुझे लगा था, अंततः मैं भी डॉक्टर की लापरवाही की शिकार हो गयी .

हव्वा की बेटी: उपन्यास अंश 

इसके बाद सारी रात मैं सो नहीं पायी थी . मुझे प्रतीत हो रहा था,  किसी ने मुझे जिंदा काटकर छोड दिया है . दर्द के लिए बहुत अच्छी दवाइयाँ उपलब्ध होती हैं, मगर पता नहीं क्यों डॉक्टर मुझे कोई राहत पहुँचा नहीं पाये थे . मेरे बार-बार अनुरोध करने के बावजूद . मेरी स्थिति किसी जिबह किये हुए जानवर की-सी थी, रातभर दर्द से छटपटाते हुए, हर करवट... कुछ अनुभव शब्दातीत होते हैं .

उस रात की सुबह बहुत फिकी और उदास उतरी थी . रोशनी तो थी, मगर कहीं उजाला नहीं था... शायद यह मेरे अंदर का अंधकार था... सुबह की बैंजनी उजास में अपने अस्पताल की खिडकी से बाहर सोये पडे शहर को देखते हुए उसदिन अनायास लगा था, मैं जिंदगी से बहुत दूर, एक बहुत बडे शून्य में किसी नक्षत्र की तरह भटक गयी हूँ... अस्पताल के बिस्तर से उस दिन सबकुछ अपनी पहुँच से परे और कितना सुंदर लग रहा था- जिंदगी... नींद, स्वप्न और खुमार में डूबी हुई... क्या यह सब फिर कभी मेरा हो सकेगा ? अपनी मुट्ठी  में एक बहुत बडा शून्य बाँधे उसदिन मैं पडी रही थी, अंदर कुछ क्षरता रहा था निःशब्द, नीरव... पतझर के उलंग, उदास पेड की तरह . चुकने की, खत्म होने की वह  शुरूआत थी . आगे एक लबा सफर पडा था, सामान के साथ ढेर सारा हौसला भी बाँध लेना था . हर कदम पर जरूरत पडेगी इसकी .


अपने पीछे एक पूरी दुनिया छोड आयी हूँ-प्रांजल, स्नेहिल और एकदम टटकी, सब्ज ! कितनी बाँहें मुझे घेरी हुई हैं, कितनी विकल है आँखों की चावनी... प्रार्थना, मान-मनुहार, उपालंभ... कुछ भी तो मुझे रोक नहीं पाया !  नियति का इशारा ऐसा ही होता है- दुर्वार, सांघातिक... चल देना पडता है, सबकुछ छोडकर, एकदम से...

घर से आते वक्त मेरी नौ साल की बेटी का प्रश्न- माँ, तुम चली जाओगी तो स्कूल के लिए मेरी चोटी कौन गूँथेगा ! मेरे पास उसके सवालों का कोई जबाव नहीं . कलतक मेरे बिना मेरा घर एक पल के लिए भी नहीं चलता था, आज सबकुछ जस का तस छोड आयी हूँ ! विवशता किसे कहते हैं, बहुत शिद्दत से महसूस कर रही हूँ, मगर रोना नहीं चाहती, मेरे रोते ही सबका धैर्य तिनके की तरह आकुल वन्या में बह जायेगा . मुझे बाढ नहीं, तटबंध बनना है- अपने लिए, अपनों के लिए...

एक छोटा-सा क्षण पूरे जीवन की दिशा बदल देता है . एक पल सबकुछ है, दूसरे ही पल कुछ भी नहीं !   मुझे याद है, कितनी खूबसूरत थी वह शाम जब मुझे अपनी बीमारी का पता चला था . सुनहरी धूप में दुनिया नहायी हुई थी, रेशम की तरह मसृन थी हल्की बहती हवा . उसमें जाडे की खुनक अभी बाकी थी . बसंत की हल्की आहट भी . नहाते हुए मेरा हाथ सीने के उस सख्त गाँठ पर अनायास पड गया था . मैं तत्काल समझ गयी थी . मेरी माँ को भी स्तन कैंसर हुआ था .

इसके बाद अस्पताल और लैब्स  के अन्तहीन चक्कर... हाथ में फाईल लिए मैं यहाँ-वहाँ अपनी जिंदगी की मियाद पूछती फिर रही थी . कहीं कोई सटीक जबाव नहीं था . बहुत कठीन और दुरूह था सबकुछ . पहले मेरे पास एक साधारण रूटीन चेकअप के लिए भी समय नहीं हुआ करता था . बच्चों का स्कूल, यह काम, वह काम... अब समय ठहर गया था हमारे लिए . सबकुछ छोडकर अस्पताल में पडे थे . पीछे एक पूरी दुनिया तहस-नहस हो रही थी- बच्चे बिना टीफिन के स्कूल चले जाते, होम वर्क पूरा न होने की वजह से उन्हें डाँट पडती, उनके युनीफार्म पर प्रेस नहीं होता . संजय (मेरे पति) के हाथ खाना बनाते हुए कई बार जल चुके थे . उसदिन माही (बेटी) के लंबे बाल काटकर कंधे तक कर देने पडे . उससे चोटी बनायी नहीं जाती थी . कितने खूबसूरत लंबे बाल थे उसके... मैंने उसे समझाया था, जब मैं घर वापस आ जाऊंगी, वह फिर से अपने बाल बढा सकेगी . उसदिन मैंने बडी मुश्किल से अपने आँसू रोके थे . आखिर किस-किस बात का दुख मनाती !

हव्वा की बेटी : उपन्यास अंश, भाग 2

मेरा कैंसर दूसरे स्टेज पर था . गनीमत थी कि काँख के लींप नोड्स में नहीं फैला था . रिपोर्ट ने कैंसर की पुष्टि की थी- डक्टल इनवेसिव कारसीनोमा... पढकर अंदर कोई प्रतिक्रिया उत्पन्न नहीं हुई थी . मेडिकल एनसाइक्लोपेडिया पढते रहने के कारण मैं अधिकतर बीमारियों के विषय में जानती- समझती हूँ . न जाने क्यों मैं शुरू से अस्वाभाविक रूप से शांत और सयंत थी . बहुत निरपेक्ष भाव से सबकुछ देख-सुन रही थी . जैसे यह सब मेरे साथ न होकर किसी और के साथ घट रहा हो . अंदर विश्वास था, मुझे कुछ नहीं होगा . ईश्वर के प्रति गहरी आस्था ने ही मुझे यह बल  दिया था . जीवन समर में गीता मेरा संबल थी, कृष्ण मेरे सारथी... विजयी मुझे होना ही था . अपनों का साथ तो था ही .


ऑपरेशन के करीब एक महीने बाद से मुझे केमो थेरापी करवानी पडी . छह चक्र- २१,२२   दिन के अंतराल से . इसके लिए मुझे पूने जाना पडा . वहाँ ईलाज की बेहतर सुविधाएँ उपलब्ध हैं . मेरी छोटी बहन भी थी वहाँ .

वहाँ कितने बडे-बडे अस्पताल, लोगों की भीड... आदमी अचानक स्वयं को ऐसी जगह पहँचकर खोया हुआ महसूस करता है . कैंसर डिपार्टमेंट का दृश्य ही अद्भुत होता है . सभी यहाँ सहमे और आतंकित दिखते हैं . नरक के बाहर का दृश्य यहाँ से मिलता-जुलता होगा . आतंक- कुछ भीषण के घट जाने का, अपनों से बिछड जाने का, मौत का... अज्ञात का डर- न जाने क्या होनेवाला है उनके साथ !  और इसी में दुनियादारी, लेनदेन से जुझना...

आजकल के अस्पताल एक व्यवसायिक केंद्र ही होते हैं . बस, पैसे कमाने का जरिया . आपके सामने तरह-तरह के पैकेज रखे जाते हैं . आप जितना पैसा खर्च करेंगे आपको उतनी ही सुविधाएँ दी जायेगी . साथ में आपके प्रति उनका रवैया भी इसी पैसे से निर्धारित होता है . अमीर मरीजों को ईलाज के साथ डॉक्टर, नर्स तथा दूसरे मेडिकल स्टाफ से अच्छा सौहाद्रपूर्ण व्यवहार मिलता है . उनके लिए डॉक्टरों की मुलायम आवाज तथा नर्सों की स्पेशल हँसी होती है . साथ में ए. सी. कमरा, टी. वी. अवेन, फ्रिज, अच्छी रूम सर्विस तो है ही . मतलब की जितनी चीनी, उतना मीठा . हमारे देश में हेल्थ इंशोरेस का अभी उतना चलन नहीं है . ऐसे में जब कोई गंभीर बीमारी होती हैं, लोग रास्ते में बैठ जाते हैं . ईलाज बहुत महंगा हो गया है . वहाँ ख्याल आया था, गरीबों के लिए तो जीवन से भी अधिक मृत्यु महंगी हो गयी है . अब उसके पास मरने का विकल्प भी नहीं .

कितने सारे टेस्ट, कितने मशविरे और राय . मेरा जीवन अब डॉक्टरों के हाथों में है . वह तय करेंगे, मेरा क्या करना है . कोई कहता है, मेरे बीमार अंग को शरीर से काटकर फेंक दिया जाय, कोई कहता है, इसकी जरूरत नहीं . मैं सुनती हूँ, ठीक जैसे कोई अपराधी अपनी मौत की सजा सुनता है . बाहर सडकों पर लोग चल रहे हैं, हंस रहे हैं, बातें कर रहे हैं... उन्हें पता नहीं, आज कौन उनसे छुट कर जिंदगी में पीछे रह गया है... ऐसा तो शायद हमेशा से होता आया है, खबर मुझे आज हो रही है . मैंने भी भला कब पीछे मुडकर देखा था कि कौन चलते-चलते रूक गया है, कौन गुमनामी के अंधकार में धीरे-धीरे खो रहा है... आज मैं पीछे रह गयी हूँ तो मुझे लग रहा है, यह दुनिया कितनी स्वार्थी है, ऐसा ही होता है...

मेरी दुनिया बदल गयी है- सिरे से ! पहले सबकुछ टेकेन फॉर ग्रॉटेड हुआ करता था, अब कुछ भी निश्चित नहीं . एक कदम उठाते हुए नहीं जानती, दूसरे कदम पर क्या घटनेवाला है . अचानक लोभी हो गयी हूँ- मुझे सबकुछ चाहिए... आषाढ की नीली संध्या, बसंत की अबीरी धूप, चाँद रात, सोनिया सांझ... यह भी, वह भी...इतना मोह ! पूरी दुनिया को अपनी बाँहों में बाँध लेना चाहती हूँ . गालों में चूम लेना चाहती हूँ... छोटी-छोटी बातें लुभा रही है, अपने पास बुला रही है... शरत् की निझुम दुपहरी में खिडकी से झरते हुए नीले आकाश के नीचे टैगोर की स्वप्निल कविताओं की मायावी दुनिया, देवदास की रोमानी उदासी, खुले वातायन में बूँद-बूँद रिसता अगस्ती रातों का शबनम भीगा चाँद, नवम्बर का चटक सुर्ख गुलाब...गुलाबी जाडे की  पशमिने-सी नर्म हरारतभरी धूप... सबकुछ कितना दुलर्भ, कितना लोभनीय हो गया है !

केमो लेने के लिए 10-12 घंटे बिस्तर में बिना हिले-डुले पडे रहना पडता है . एक गहरे पीले या नारंगी रंग का जहरीला कॉकटेल धीरे-धीरे जिस्म में उतार दिया जाता है . जितनी ज्यादा तकलीफ, दवाई उतनी ही कारगर.. मेरा हैंडसम डॉक्टर मुझे समझाता है . उसकी देह से महंगी आफ्टर सेव की गंध उठ रही है . सुबह-सुबह एकदम ताजा- स्वास्थ्य और आत्मविश्वास से चमकता हुआ चेहरा, डिजाइनर कपडों में किसी फिल्म अभिनेता की तरह... देखकर रश्क होता है, अच्छा भी लगता है .मेरे हाथों में अब कोई नस नहीं मिलती . आई. वी. लगाने में मुश्किल . नर्से कोशिस करके हार गयी हैं,  मेरे दोनों हाथ सुजकर काले पड गये हैं, फर्श पर खून ही खून... बचपन में टीका लगवाने से इतना डरती थी, अब तो पूरा जिस्म ही जैसे छलनी हो गया है . खासकर एनेसथेसिस्ट को बुलाया गया है, मेरे हाथों में कोई नस नहीं, वे स्ट्रा की तरह कडे हो गये हैं . अब वे मेरे पाँवों में नस ढूँढ रहे हैं . मैं सोचती हूँ, जो हो रहा है, मेरे भले के लिए हो रहा है . यह सोच मुझे तसल्ली देती है.


केमो का असर दो, तीन दिन बाद शुरू होता है . मुझे प्रतीत हो रहा है, किसी ने मुझे जहर देकर मरने के लिए छोड दिया है . उस भीषण अनुभूति को शब्दों में बाँधा नहीं जा सकता ! दर्द, घबराहट और तकलीफ... रातदिन कहाँ से गुजर रहे हैं, नहीं जानती . बस, एक अंधेरे कमरे में पडी हूँ . कुछ खाया-पीया नहीं जाता, भोजन की गंध से उल्टी आती है .कुछ सोच, समझ नहीं पाती, दिमाग में एक कुहरीला अंधकार है और भीतर लहरों की तरह उठता हुआ एक बीमार अनुभूति .

परहेज करना जरूरी है . साफ-सफाई, ताजा भोजन, यह नहीं, वह नहीं... डॉक्टर की कडी हिदायतें... साथ में इतनी सारी दवाइयाँ... निगली नहीं जाती, उल्टी हो जाती है . साथ में हजार दिक्कतें- ब्लड काउंट गिर गया है, खून आना शुरू हो गया है, आँखों में इनफेक्शन, सीने में दर्द... डायबिटीज है, उच्च रक्तचाप भी . इन्हें संभालना बहुत जरूरी . केमो थेरापी रोककर अब मेरा हजार तरह का परीक्षण करवाया जा रहा है- सीटी स्कैन, सोनोग्राफी, आँखों का परीक्षण, कारडियोग्राम, हेमोग्राम... बैठकर एक साथ कई लीटर पानी पीना पड रहा है, कभी-कभी उल्टी आ जाती है . सोचती हूँ, अब भले प्यास से मर जाऊँ, पानी कभी नहीं पियूंगी .  हिरो डॉक्टर तसल्ली देता है- यह दवाई जहर है, तुम्हें जिंदा रहने के लिए जहर पीना है- इट्स अ नाइस पॉयजन, गीवस् यु लााईफ...

लोग मुझे मेरी आँखों और बालों से ही पहचानते थे- बंगाली बाला- बड़ो-बड़ो शोख- एक माथा चुल... जिंदगी के कुछेक नियामतों मे से एक मेरे बाल थे- खूब लंबे, घने, बकौल सबके रेशम से... केमो के पहले चक्र में ही झर गये ! सुबह उठकर आईने में देखा, बाल जटा बनकर पीछे लटक रहे हैं, सामने का पूरा हिस्सा साफ ! गंजे माथे पर बिंदी कितनी भद्दी लग रही थी !

संजय-मेरे पति-कभी उन्हें  केस  को हाथ भी लगाने नहीं देता था, आज उसी को हाथ में कैंची लेकर मेरा सर मुंडाना पडा...! गर्मी हो रही थी, बालों के उतरते ही माथे की त्वचा में हवा लगी, ठंडा हो गया . सोचा सबके कुछ न कुछ फायदे होते हैं . बी पासीटिव ! जयश्री बी पासीटिव!
दो दिन सर पर रूमाल लपेटकर घूमी, फिर छोर दिया- मुझे नहीं छुपना है, कोई अपराध नहीं किया है मैंने . बस, परिचित देखते तो पहचान नहीं पाते . बेटे ने कहा, माँ नाउ यु लुक लाईक ए बुद्धीस्ट मंक... चलो, बौद्ध भिक्षुणी बनने की इच्छा भी पूरी हो गयी .

अस्पताल के बिस्तर में पडे-पडे बस मैंने सपने देखे और इंतजार किया- न जाने किन-किन चीजों का- अपने घर लौटने का, एकबार फिर छत में बैठकर बारिश देखने का, अपनों के बीच होने का- जिनसे हम छुट गये, अब वो जहाँ कैसे हैं, शाखे-गुल कैसी हैं, खुशबू के मकां कैसे हैं... सारे सवाल अनुत्तरित पडे रहे, समय के पास उनका जवाब था, और कहीं नहीं... छह महीने इसी तरह कटे तो नहीं, मगर बीत ही गये .
!
इस बीच मेरे लेखन ने मेरा साथ दिया- हर जगह, लंबे इंतजारों के बीच- हस्पताल के बिस्तर पर, डॉकटरों की क्लीनिक में, लैब में- लिखती रही... मेरे अंदर कोई चिंता, डर नहीं था, कुछ थी तो बस गहरी चाह और उम्मीद, बहुत भरोसा और खूबसूरत संवेदनाएँ- कहानी, कविताओं में  में ढलती हुई...बचपन में थोडा बहुत लिखती थी, फिर लिखना छुट  गया था . बीमार पडी तो ख्याल आया- अंदर कितना कुछ रह गया है कहने के लिए, शेयर करने के लिए... कलम उठायी तो लगा किसी नदी का बाँध टूट गया !! उफन आयी संवेदनाएँ, कूल-किनारा डूब गया... एक प्लावन जो न जाने कब से अंदर बंधा पडा था .

पहले लिखकर अपनी रचनाएँ बिस्तर के नीचे छिपाकर रख  देती थी, मेरे बिस्तर के नीचे न जाने कितनी कविता, कहानियाँ आज भी दबी पडी हैं . पहली बार इच्छा हुई कि मेरी बात लोगों तक पहुँचे, गोवा में हिन्दी पत्रिकाएँ मिलती नहीं . कहीं से कुछ पते मिले तो बिना सोचे-समझे उन पत्रिकाओं में मेरी रचनाएँ भेज दीं . पहली कहानी हंस में मुबारक पहला कदम के लिए स्वीकृत हुई, इसके साथ ही छपने का सिलसिला चल निकला- कथादेश, वागार्थ, पाखी, परीकथा, नया ज्ञानोदय, वसुधा, कथाक्रम आदि-आदि... शायद कुछ बुरा होता है कुछ बहुत अच्छा होने के लिए ही .

केमो थेरापी के बाद मुझे रेडियेशन लेना था - पूरे ३१ सायकलस्! दो महीने तक पूने में रहना था . हफ्ते में पाँच दिन लगातार- ५ मिनट तक . फिर वही लंबे इंतजार- घंटों वेटिंग रूम में बैठे रहना . चारों तरफ मुंडे हुए सर, झुकी हुई नजरें, उनमें ठहरा हुआ सन्नाटा . एक डर जिसकी अब आदत हो गयी है . पेट में कुछ धडकता है, नसों में बेआवाज सडता है, सब थक गये हैं- अपनी ही चौंक और बेतरतीव धडकनों से . अपने दर्द से निजात के लिए दूसरों के जख्म में झाँकते हुए पूछते हैं वह सवाल जो खुद से नहीं पूछे जाते- क्या कहते हैं डॉक्टर, क्या चांसेस हैं ? एक-दूसरे को तसल्ली देकर स्वयं को बहलाते हैं, एक झूठ जो जीने के लिए बहुत जरूरी हो गया है... सच तो बस आतंक है !


एक बच्ची की तरल आँखें, उसकी पारे-सी चमकती हुई चावनी... वहाँ अब भी जीवन, उसका पूरा सपना है . अपने दर्द से बेखबर हँसती है, अपनी दादी की गोद में सिमटकर सोती है, शायद सपने भी देखती है . उसके गालों के खूबसूरत गड्डों में एक गुलाबी मुस्कान नींद में कुनमुनाती है . उसे देखकर अक्सर सोचने लगती हूँ, हम इतने बडे क्यों हो गये, रोना-गाना सब भूल गये...

अस्पताल के बाहर कांक्रीट के जंगल में एक कोयल तपती दुपहरी में गाती रहती है- बिना रूके, निरंतर... मैं किसी अमराई की घनी, सब्ज छाँव में पहुँच जाती हूँ, ए. सी. से पानी की बूँदें टपकती है, मुझे लगता है, रसभीना महुआ टपक रहा है- बेघर मन कहाँ-कहाँ टप, टप...टरेडियोलॉजिस्ट ने कहा था नो साइड अफेक्ट, बहुत विश्वास के साथ मान ली थी उनकी बात . मगर रेडियेशन के साथ ही त्वचा लाल पडने लगी थी . पहले हल्की गुलाबी, फिर लाल, फिर गहरा लाल ! साथ में जलन, बेचैनी . और फिर पूरी चमडी जले हुए बैगन की तरह काला पडकर यहाँ-वहाँ से फटने लगी, अंदर का लाल मांस बाहर झाँकता, खून और पानी रिसता . हिलना-डूलना तक मुश्किल हो गया . कपडों में रहना कठिन था, एक ही तरह से रातभर लेटने से त्वचा थोडा दुरूस्त होने लगती, मगर जरा सा  हिलते ही चमडी में खिंचाव पडता और तेज दर्द से मैं दुहरी हो जाती .

इसी हाल में शाम के समय मैं अपनी बहन और जीजाजी के साथ पूने के मशहूर रेस्तराँ और क्लबों में जाती, लोगों से हँसती-बोलती . जब लोगों को पता चलता, मैं वहाँ घूमने नहीं, बल्कि कैंसर के ईलाज के लिए आयी हूँ, सब आश्चर्य से मुझे देखते रह जाते . एकबार किसी के मेरे बालों की तारीफ करने पर मैंने अपने बालों का विग खोलकर उसके हाथों में रख दिया था . इस आक्समिक् घटना से आसपास के लोग स्तब्ध रह गये थे . पूरी पार्टी में सन्नाटा छा गया था .

जिस दिन मेरा रेडियेशन खत्म हुआ था, मैं उसी दिन घर वापस आ गयी थी . घर लौटकर मैंने महसूस किया था, मैंने अपने परिवार को इन कई महीनों में कितना मिस किया था . जो बात, जो दुख मैं खुद से भी छिपाती थी, वह इस कैंसर से भी ज्यादा तकलीफदेह थी, इससे भी ज्यादा कठिन... जीवन छुट जाय, मगर मेरे अपने नहीं... अपनी माही से लिपटकर मैं उसदिन बहुत रोयी थी . खुशी में रोने का यह मौका मुझे बहुत दिन बाद मिला था .

घर लौटकर मैंने एक नये सिरे से जीवन को जीना शुरू किया है, छोटे-छोटे निबालों में- अपने घर के टेरास में बैठकर एक कप चाय पीना, सुबह का अखबार पढना, बच्चों को उनके स्कूल के लिए तैयार करना-इनमें  जीवन का भरपूर स्वाद है और मैं इन्हें पूरी तरह एनज्वाय करना चाहती हूँ .  आगे भी बार-बार चेकअप करवाना है, सावधान रहना है, कैंसर के लौट आने की भी संभावना है, मगर मुझे इन बातों की बिल्कुल चिंता नहीं . जानती हूँ, मरने से पहले नहीं मरूंगी और फिर मौत भी कौन- सी बडी मौत है. हम जीवन में सबकुछ करते हैं , और इस भागदौड में बस जीना ही भूल जाते हैं . अब मैं पहले यही करना चाहती हूँ, जीना चाहती हूँ  ! मौत से पहले मरना नहीं चाहती . बाकी चीजें होती रहेंगी . आराम से- जिंदगी रही तो !  और वह तो है मेरे पास- इत्ता सारा...

स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह 'द मार्जिनलाइज्ड' नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. 'द मार्जिनलाइज्ड' मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.
आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
लिंक  पर  जाकर सहयोग करें :  डोनेशन/ सदस्यता 

'द मार्जिनलाइज्ड' के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें :  फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं. ई बुक : दलित स्त्रीवाद 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com
Blogger द्वारा संचालित.