'मैं हिन्दू क्यों नहीं' के लेखक पर हमला, 'दुर्गा' के कथित अपमान के आरोप में दिल्ली विवि का शिक्षक प्रताड़ित


स्त्रीकाल डेस्क 

हिन्दू भावनाओं के कथित अपमान के आरोप में देश भर में लेखकों, बुद्धिजीवियों पर होने वाले हमलों की कड़ी में कुछ और मामले जुड़ गये हैं. ताजा मामला  'मैं हिन्दू क्यों नहीं?' के लेखक पर हमले की है तो दिल्ली विश्वविद्यालय के  एक कॉलेज में प्राध्यापक केदार कुमार मंडल पर एफआईआर का है.

वारंगल जिले में शनिवार को वैश्य समुदाय के लोगों ने लेखक 'मैं हिन्दू क्यों नहीं?'  जैसी किताबों के  लेखक कांचा आयलैय्या पर हमला बोल दिया। इस दौरान उनपर चप्पल भी फेंके गए। द इंडियन एक्सप्रेस की एक खबर के मुताबिक आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में अपनी नई किताब 'सामाजिका स्मगलेर्लु कोमाटोलु' को लेकर लेखक कांचा आयलैय्या की वैश्य समुदाय के लोगों ने कथित रूप से हमला कर दिया।



आरोप है कि वैश्य समुदाय ने किताब के विरोध में उनके साथ कथित तौर पर चप्पलों से मारपीट की। पुलिस का कहना है कि कांचा इलैया तेलंगाना के वारंगल जिले में एक इवेंट में पहुंचे थे। जहां लोगों ने विरोध-प्रदर्शन शुरू कर दिया। इसके बाद इलैया को पुलिस स्टेशन ले जाना पड़ा। हालांकि इसके बाद पुलिस स्टेशन में तनाव और बढ़ गया।

क्यो हो रहा है विरोध

एक वकील करुणसागर ने सईदाबाद पुलिस स्टेशन में इलैया के खिलाफ मामला दर्ज करवाया। वकील ने आरोप लगाया कि उन्होंने अपनी किताब में हिंदुओं के खिलाफ आपत्तिजनक बातें कही हैं। पुलिस ने बताया वकील का आरोप है कि लेखक ने अपनी चार किताबों में हिंदुओं के खिलाफ अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया था।

जीभ काटने की धमकी

लेखक डॉ. कांचा इलैय्या ने सोमवार दावा किया कि वह उन्हें रविवार की दोपहर के बाद से कई फोन कॉल आ रहे हैं, जिसमें उनकी जीभ काट देने की भी धमकी दी गई। उन्होंने कहा,"किसी ने मेरी जीभ काटने की धमकी दी, मेरा पुतला जलाया गया, मुझे लगता है कि उनके दुर्व्यवहार, फोन कॉल और संदेशों द्वारा बहुत खतरा है। यदि मेरे साथ कुछ भी होता है तो वे जिम्मेदार होंगे”

मिथक और स्त्री आंदोलन का अगला चरण

डीयू के प्रोफेसर के खिलाफ सक्रिय संघ-समूह 

दिल्ली विश्वविद्यालय से सम्बद्ध एक कॉलेज के प्राध्यापक द्वारा दुर्गा के कथित अपमान पर उनके खिलाफ उनके ही शिक्षक संगठन के पदाधिकारियों ने एफआईआर करा दिया है. 'जिस असुर नायक, (महिषासुर)की ह्त्या के उत्सव के रूप में दुर्गा पूजा मनाया जाता है, उसकी परम्परा पर विस्तृत शोध करने वाले बुद्धिजीवी और फॉरवर्ड प्रेस के संपादक प्रमोद रंजन ने अपने फेसबुक पेज पर केदार कुमार मंडल की प्रताड़ना की निंदा की है:

"दिल्ली यूनिवर्सिटी के दयाल सिंह कॉलेज में प्राध्यापक  केदार कुमार मंडल के एक फेसबुक पोस्ट से कल हंगामा खडा हो गया। । उन्होंने दुर्गा को लेकर जिस अंदाज में बातें कहीं थीं, वे कुछ हद तक अशोभनीय थीं।
लेकिन ​उसके बाद जो कुछ हुआ, वह उससे कहीं अधिक अशोभनीय था। बीजेपी से जुडे शिक्षक संगठन ने उन पर एफआईआर दर्ज करवाई, उन्हें फेसबुक पर भद्दी गालियां दीं गई और कहा गया कि नौकरी से बर्खास्त करवा दिया जाएगा। भयभीत केदार ने माफी मांग ली।

यात्रा वृतांत : महोबा में महिषासुर

लेकिन सवाल यह कि वे कौन से हिंदू हैं, जिनकी भावनाएं केदार के पोस्ट से आहत हो गईं थीं? क्या केदार स्वयं हिंदू नहीं हैं? शायद नहीं। वे शूद्र हैं। हिंदू धर्म तो कहता है कि सभी शूद्र-अतिशूद्र वर्णसंकर हैं। वेश्याओं की औलाद हैं। ढोल हैं, ताडन के अधिकारी हैं। जिन धर्मग्रंथों में यह लिखा है, उनका सडकों पर खुलेआम लाऊडस्पीकर लगाकर पाठ होता है। इन्हीं में से कुछ ग्रंथों को राष्ट्रीय ग्रंथ बनाने की मांग भी भाजपा वाले करते रहते हैं। इनसे किसी की भावना आहत होती है या नहीं?


केदार जी ने जो लिखा था, वह कथानक अनेक आदिवासी समुदायों की कथाओं में अलग-अलग रूपों में आता है। अनेक लेखकों ने इस पर लिखा है। भाजपा वाले बताएं कि महिषासुर, रावण, मेघनाथ आदि को जलाने से आदिवासी समुदायों की भावनाएं आहत होतीं हैं या नहीं?
दुर्गा पूजा के अवसर पर दुर्गासप्तशती के जिन श्लोकों का पाठ होता है, उनमें आदिवासी समुदायों में पुरखा के रूप में पूजे जाने वाले महिषासुर के बारे में अशोभनीय बातें होतीं हैं। महिषासुर को अप्राकृतिक यौनाचार की पैदाइश बताया जाता है। कहा जाता है कि "भैंस के गर्भ से पैदा हुआ वह असुर पशुओं से भी नीच है"। यही कारण है कि छत्तीसगढ में कुछ जगहों पर आदिवासियाें ने महिषासुर का अपमान करने वालों पर मुकदमा दर्ज करवाया था और हाईकोर्ट से जमानत खारिज होने के बाद आरेापी पिछले कई महीने तक जेल में थे।
भावनाएं तो सबकी होतीं हैं। केदार कुमार मंडल को अपनी भावनाओं के लिए लडना चाहिए था।"

नाटक : असुरप्रिया

जामिया मिल्लिया इस्लामिया के हिन्दी विभाग की विभागाध्यक्ष ने अपने फेसबुक पेज पर लिखा:
"तुम स्तन निचोड़ कर शादीशुदा होना चिन्हित करो तो जायज़
तुम आदिवासी स्त्री की योनि में पत्थर ढूँसो तो क़ानून सम्मत
पर केदार कुमार मंडल  तुम्हारी कहानी को ढोने से इंकार कर दे, अपना पक्ष बताए तो अपसंस्कृति है।
इतने वर्षों से तुम आदिवासी भावनाओं से खिलवाड़ कर रहे हो तो कुछ नहीं और एक में तुम्हारा समर्थन नहीं किया तो पिल पड़े।
तुम्हारी संस्कृति में दम होगा तो खड़ी रहेगी वरना उसे भहराकर गिरने से कोई नहीं रोक सकता।"

आउटलुक और फेसबुक से साभार 


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