विश्वविद्यालय पढ़ायेगा इंद्रजाल, जादूगरी, प्रेत बाधा दूर करने की कला:संघ का एनजीओ दे रहा मंत्रालय की तरह निर्देश

मनीषा 

 बीएचयू के बाद एक खबर यह भी:

अभी 23 सितंबर की देर रात बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) में अपनी सुरक्षा की मांग के साथ शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रही छात्राओं पर डंडा बरसाने की खबर आयी ही थीं कि एक खबर और आ रही है विश्वविद्यालयों को संघ की विचार-परम्परा से जुड़े एक एनजीओ द्वारा संचालित करने की कोशिश की. विश्वविद्यालय प्राशासन में बैठे लोग या तो अपनी विचारधारा से प्रेरित होकर या संघ से डरकर उसके निदेशों का इस कदर अनुपालन कर रहे हैं, मानो यह एनजीओ नहीं यूजीसी हो या मानव संसाधन विकास मंत्रालय. इसके निर्देश के अनुसार पढ़ायेगा इंद्रजाल, जादूगरी, प्रेत बाधा दूर करने की कला आदि 64 कलायें.



12सितंबर को जागरुकता, देशभक्ति और राष्ट्रवाद के दृष्टिकोण से काम करने का दावा करने वाली संस्था       भारतीय शिक्षण मंडल ने ईमेल से महामा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय और कुछ संस्थानों को सुझाव भेजा है कि वे अपने पाठ्क्रमों को राष्ट्रवादी बनायें. विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार ने 22 सितम्बर को इस निर्देश के आलोक में यथाशीघ्र अपने विभागों को इसके सुझावों की दिशा में काम करने का निर्देश जारी किया है. यानी महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के छात्र अब इंद्रजाल (जादूगरी से लेकर प्रेत बाधा दूर करने की कला सीखेंगे. विश्वविद्यालय के कुलपति से जब स्त्रीकाल ने इसके बारे में सवाल किया तो उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया है.

'टच ही तो किया है न और कुछ नहीं किया न' : प्रशासन के जवाब से आक्रोशित लडकियां 


भारतीय शिक्षण मंडल संघ की विचार परम्परा से जुड़ा एक समाजिक संगठन है, जिसके कार्यक्रमों में मानवसंसाधन विकास मंत्री ( स्मृति इरानी, प्रकाश जावेडकर से लाकर भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्री के अतिरिक्त पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी तक जाते रहे हैं. संस्था अपने ऑफिसियल वेबसाईट पर अपनी कार्यकारिणी का विवरण कुछ यूं देती है:

"भारतीय शिक्षण मंडल की नई राष्ट्रीय कार्यकारिणी की घोषणा 18 नवंबर को आगामी आगरा के उत्तम इंस्टीट्यूट ऑफ मॅनेजमेंट, आगरा में की गई। देश भर से आये भारतीय शिक्षण मंडल की सर्वसाधारण सभा के सदस्यों द्वारा में अध्यक्ष के रूप में श्री. सच्चिदानंद जोशी,  सदस्य सचिव इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र तथा महामंत्री के रूप में श्री. वामनराव गोगटे को निर्विरोध निर्वाचित किया गया। महामंत्री श्री. गोगटे जी ने जानकारी देते हुए बताया कि शिक्षण मंडल के वयोवृद्ध कार्यकर्ता जयपुर से श्री. धर्मनारायण अवस्थी तथा विशाखापट्ट्नम से डॉ. विश्वेश्वरम संरक्षक के रूप में मार्गदर्शन करेंगे।"



12 सितम्बर के अपने ईमेल में संस्थान ने कुलपति को लिखा:

भारतीय शिक्षण मंडल का पाठ्यक्रम एवं शिक्षा पद्धतिके पुनर्निमाण हेतु आह्वान

आदरणीय कुलपति महोदय जी,
सादर प्रणाम।

भारतीय शिक्षण मंडल ने सन् 1969 में शैक्षणिक क्षेत्र में जागरुकता, देशभक्ति और राष्ट्रवाद के दृष्टिकोण से अपना कार्य प्रारंभ किया। शिक्षण मंडल भारत के 22 राज्यों और 220 जिलों में सार्वभौमिक सिद्धांतों के आधार पर काम कर रहा है। भारतीय शिक्षण मंडल राष्ट्रीय उत्थान के लिए ‘भारतीयता’ के साथ भारतीय शिक्षा के विषय पर करने वाला संगठन है। शिक्षण मंडल का मुख्य उद्देश्य गुरु-शिष्य परंपरा पर आधारित एक शिक्षा प्रणाली तैयार करना जो विद्यार्थी के संपूर्ण ज्ञान का भी मूल्यांकन करे। भारतीय शिक्षण मंडल ने इस उद्देश्य के लिए एक पांच आयाम प्रारूप विकसित किया है. अनुसंधान, प्रबोधन, स्वाध्याय, प्रकाशन और संगठन।
भारतीय शिक्षण मंडल, शैक्षिक प्रकोष्ठ पाठ्यक्रम एवं शिक्षण पद्धतिमें भारतीयता के समावेश हेतु इस वर्ष से नवीन पाठ्यक्रमों का निर्माण तथा विषयानुकूल अध्यापन पद्धतिके विकास पर कार्य प्रारंभ कर रहा है।
ध्येय: पाठ्यक्रम एवं शिक्षण पद्धतिका निर्माण इस प्रकार से हो कि जिससे विद्यार्थी का समय व्यक्तित्व विकास एवं राष्ट्रीय एकता के साथ उसका भावनात्मक जुड़ाव सुनिश्चित किया जा सके। सत्व एवं रजस की उसके जीवन में प्रधानता रहे, निष्काम भाव से किये जाने वाले कर्म के महत्व को समझकर एक कर्मयोगी के रूप में अपने समसत कर्तव्यों का निर्वहन कर सके। 16 विद्याओं एवं 64 कलाओं में से कम से कम एक विद्या व एक कला पर उसका अधिपत्य हो, शास्त्रीय एवं मौलिक, विजिक्षु दृष्टिकोण हो, विश्वबंधुत्व के भाव से संपूर्ण विश्व को आच्छादित करने का अजिसमें सामथ्र्य हो, अभय के साथ पूर्णता अथवा शून्य की ओर उन्मुख होकर आने वाले युग का पथ प्रदर्शक बन सके। स्वामी विवेकानंद के शब्दों मेंµ‘मनुष्य, मनुष्य मात्रा हमें चाहिए’, इन्हीं मनुष्यों का निर्माण हमें पाठ्यक्रम एवं शिक्षण पद्धतिद्वारा करना है। यही शैक्षिक प्रकोष्ठ का ध्येय है।



प्रथम चरण में स्नातक एवं स्नातकोत्तर स्तर पर निम्न विषयों के पाठ्यक्रमों का निर्माण करना है.
1. इतिहास, 2. समाजशास्त्र, 3. दर्शनशास्त्र, 4. राजनैतिकशास्त्र, 5. मनोविज्ञान, 6. अर्थशास्त्र, 7. लोक प्रशासन, 8. अंतर्राष्ट्रीय संबंध, 9. व्यूहरचनात्मक अध्ययन, 10. शिक्षा एवं शिक्षण पद्धतियाँ, 11. मानव कर्तव्य एवं अधिकार, 12. भूगोल, 13. हिन्दी साहित्य, 14. अंग्रेजी साहित्य, 15. संस्कृत साहित्य, 16. क्षेत्रीय साहित्य, 17. नाट्यकला, 18. नृत्यकला, 19. संगीत एवं गायन, 20. चित्राकला, 21. खगोलशास्त्र, 22. रसायनशास्त्र, 23. भौतिकशास्त्रा, 24. गणित, 25. तकनीकि का भारतीय इतिहास, 26. कम्प्यूटर प्रोग्राम में संस्कृत, 27. नृशास्त्र, 28. खाद्य विज्ञान, 29. गृह विज्ञान, 30. कृषि शास्त्र, 31. पर्यावरण विज्ञान, 32. शोध प(ति, 33. पर्यटन, 34. आपदा प्रबंधन, 35. सेवा प्रबंधन, 36. उध्यमिता विकास, 37. पत्राकारिता एवं संचार, 38. वित्तीय प्रबंधन, 39. नैतिकशास्त्र, 40. स्थापत्य एवं वास्तुकला, 41. वनस्पतिशास्त्र, 42. प्राणीशास्त्र, 43. विधि
इसी राष्ट्रीय कार्य में आहूति देने हेतु शैक्षिक प्रकोष्ठ विशेषज्ञों का आह्वान करता है। आपसे निवेदन है कि भारतीय शिक्षा पद्धतिएवं पाठ्यक्रम के पुनरुत्थान हेतु आपके अमूल्य विचार, सुझाव एवं पाठ्यक्रम ;संदर्भ सहितद्ध दिनांक 19 अक्टूबर 2017 ;दीपावलीद्ध तक ई-मेल द्वारा भेजने का कष्ट करें।

इस कार्य हेतु निम्न बिन्दुओं पर विचार किया जा सकता है.
1. विद्यार्थी को पुस्तकीय ज्ञान के साथ-साथ अनुभूतिजन्य ज्ञान कैसे दिया जा सकता है?
2. विद्यार्थी में राष्ट्रीय स्वाभिमान का जागरण कैसे हो सकता है? अध्यापन में भारतीय ज्ञान परम्परा का समावेश कैसे हो सकता है? उसी के अनुरूप पाठ्यक्रम का निर्माण कैसे हो?
3. विषयों के चयन में जिस प्रकार विद्यार्थी को विकल्प दिए जाते हैं, उसी प्रकार से परीक्षा पद्धतिमें भी विकल्प किस प्रकार दिए जा सकते हैं? उदाहरण स्वरूप राजनैतिक विज्ञान की परीक्षा एवं गणित की परीक्षा एक ही तरीके से होती है, यह न तो विद्यार्थी के साथ न्याय है न ही विषय के साथ।
4. विषय तो बहुत हैं पर उनके अध्यापन का तरीका लगभग एक जैसा है। विषयानुरूप अध्यापन-पद्धतिहो?
5. सिद्धांतों के व्यावहारिक अनुप्रयोग के शिक्षण की व्यवस्था किस प्रकार से की जा सकती है?

भारतीय शिक्षा में परिवर्तन हेतु शिक्षकों का सहयोग परम आवश्यक है। इस राष्ट्रीय कार्य में आपकी एवं आपके विश्वविद्यालय के विद्वान आचार्यों की सक्रिय सहभागिता की हम आशा करते हैं, अतः आपसे विनम्र अनुरोध है कि विश्वविद्यालय के समस्त आचार्यों को इस प्रकल्प से अवगत करावें ताकि उन सभी के सुझावों से एक सुदृढ़ शिक्षा व्यवस्था का निर्माण किया जा सके। इस हेतु हिंदी, अंग्रेजी अथवा किसी अन्य भारतीय भाषा में  भेज सकते हैं।

क्यों कर रही हैं लडकियां पीएम मोदी का विरोध (!)

क्या हैं चौसठ कलायें

1- नृत्य – नाचना
2- वाद्य- तरह-तरह के बाजे बजाना
3- गायन विद्या – गायकी।
4- नाट्य – तरह-तरह के हाव-भाव व अभिनय
5- इंद्रजाल- जादूगरी
6- नाटक आख्यायिका आदि की रचना करना
7- सुगंधित चीजें- इत्र, तेल आदि बनाना
8- फूलों के आभूषणों से श्रृंगार करना
9- बेताल आदि को वश में रखने की विद्या
10- बच्चों के खेल
11- विजय प्राप्त कराने वाली विद्या
12- मन्त्रविद्या
13- शकुन-अपशकुन जानना, प्रश्नों उत्तर में शुभाशुभ बतलाना
14- रत्नों को अलग-अलग प्रकार के आकारों में काटना
15- कई प्रकार के मातृका यन्त्र बनाना
16- सांकेतिक भाषा बनाना
17- जल को बांधना।
18- बेल-बूटे बनाना
19- चावल और फूलों से पूजा के उपहार की रचना करना। (देव पूजन या अन्य शुभ मौकों पर कई रंगों से रंगे चावल, जौ आदि चीजों और फूलों को तरह-तरह से सजाना)
20- फूलों की सेज बनाना।
21- तोता-मैना आदि की बोलियां बोलना – इस कला के जरिए तोता-मैना की तरह बोलना या उनको बोल सिखाए जाते हैं।
22- वृक्षों की चिकित्सा
23- भेड़, मुर्गा, बटेर आदि को लड़ाने की रीति
24- उच्चाटन की विधि
25- घर आदि बनाने की कारीगरी
26- गलीचे, दरी आदि बनाना
27- बढ़ई की कारीगरी
28- पट्टी, बेंत, बाण आदि बनाना यानी आसन, कुर्सी, पलंग आदि को बेंत आदि चीजों से बनाना।
29- तरह-तरह खाने की चीजें बनाना यानी कई तरह सब्जी, रस, मीठे पकवान, कड़ी आदि बनाने की कला।
30- हाथ की फूर्ती के काम
31- चाहे जैसा वेष धारण कर लेना
32- तरह-तरह पीने के पदार्थ बनाना
33- द्यू्त क्रीड़ा
34- समस्त छन्दों का ज्ञान
35- वस्त्रों को छिपाने या बदलने की विद्या
36- दूर के मनुष्य या वस्तुओं का आकर्षण
37- कपड़े और गहने बनाना
38- हार-माला आदि बनाना
39- विचित्र सिद्धियां दिखलाना यानी ऐसे मंत्रों का प्रयोग या फिर जड़ी-बुटियों को मिलाकर ऐसी चीजें या औषधि बनाना जिससे शत्रु कमजोर हो या नुकसान उठाए।
40-कान और चोटी के फूलों के गहने बनाना – स्त्रियों की चोटी पर सजाने के लिए गहनों का रूप देकर फूलों को गूंथना।
41- कठपुतली बनाना, नाचना
42- प्रतिमा आदि बनाना
43- पहेलियां बूझना
44- सूई का काम यानी कपड़ों की सिलाई, रफू, कसीदाकारी व मोजे, बनियान या कच्छे बुनना।
45 – बालों की सफाई का कौशल
46- मुट्ठी की चीज या मनकी बात बता देना
47- कई देशों की भाषा का ज्ञान
48 – मलेच्छ-काव्यों का समझ लेना – ऐसे संकेतों को लिखने व समझने की कला जो उसे जानने वाला ही समझ सके।
49 – सोने, चांदी आदि धातु तथा हीरे-पन्ने आदि रत्नों की परीक्षा
50 – सोना-चांदी आदि बना लेना
51 – मणियों के रंग को पहचानना
52- खानों की पहचान
53- चित्रकारी
54- दांत, वस्त्र और अंगों को रंगना
55- शय्या-रचना
56- मणियों की फर्श बनाना यानी घर के फर्श के कुछ हिस्से में मोती, रत्नों से जड़ना।
57- कूटनीति
58- ग्रंथों को पढ़ाने की चातुराई
59- नई-नई बातें निकालना
60- समस्यापूर्ति करना
61- समस्त कोशों का ज्ञान
62- मन में कटक रचना करना यानी किसी श्लोक आदि में छूटे पद या चरण को मन से पूरा करना।
63-छल से काम निकालना
64- कानों के पत्तों की रचना करना यानी शंख, हाथीदांत सहित कई तरह के कान के गहने तैयार करना।



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