वाम गठबंधन की जीत, बापसा का शानदार प्रदर्शन, कन्हैया कुमार पर बरसे संगठन के ही लोग


स्त्रीकाल डेस्क 

पिछले कुछ सालों से जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के भगवाकरण की मुहीम को झटका लगा. विद्यार्थी समुदाय ने भारतीय जनता पार्टी के छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद को बुरी तरह नकार दिया, यहाँ तक कि मतदान के लिए भारी संख्या में डे स्कॉलर को लाना भी उनके काम न आया, जेएनयू विद्यार्थियों की मानें तो वे जितने डे स्कॉलर को गाड़ियों में भरकर लाये उतने भी वोट उन्हें नहीं मिले. इस चुनाव के और उसके परिणाम के कई और रंग  हैं .



 वाम   गठबंधन (अइसा, एसएफई और डी एस एफ) ने सेन्ट्रल पैनल की सभी सीटों, यानी अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, महासचिव और संयुक्त सचिव, पर अपना कब्ज़ा जमा लिया. इन पदों पर वाम गठबंधन के उम्मीदवार गीता कुमारी, सीमओं जोया खान, दुग्गीराला श्रीकृष्णा और शुभांशु सिंह क्रमशः 464,848, 1107 और 835 मतों के मार्जिन से जीते.

जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय का यह चुनाव कई मायने में अभूतपूर्व था. एक तो यह चुनाव भगवा ताकतों की जेएनयू प्रशासन के साथ मिलकर विश्वविद्यालय के भगवाकरण की कोशिशों के दौरान हुआ, तब जब जेएनयू में बड़े पैमाने पर सीट कट हुआ है. सभी संगठनों ने अध्यक्ष पद के लिए महिला उम्मीदवार खड़े किये, यह जेएनयू में पहली बार संभव हुआ.

छात्र संगठन बिरसा-फुले-अम्बेडकर स्टूडेंट्स असोसिएशन (बापसा) के लिए जेएनयू का यह दूसरा चुनाव था. पिछले चुनाव में बापसा ने अध्यक्ष पद के लिए वाम संगठनों को जबरदस्त टक्कर दी थी और दूसरे पोजीशन पर रहा था. हालांकि तब उसे सेन्ट्रल पैनल के अन्य सीटों पर अपेक्षाकृत कम वोट मिले थे. इस बार बापसा का पैनल वोट बेहतर रहा और हर पद के लिए  800 से अधिक वोट मिले. हालांकि इस बार सभी संगठनों को पैनल वोट बेहतर मिले.



चुनाव पर नजर रखने वाले जेएनयू के सीनियर विद्यार्थियों ने बताया कि इस बार नोटा और निर्दलीय उम्मीदवार को तुलनात्मक रूप से काफी वोट मिले. उन्होंने बताया कि निर्दलीय विद्यार्थी चुकी इस स्थिति में होते हैं कि वे बिना किसी जिम्मेवारी के सभी संगठनों पर हमला कर सकते हैं इसलिए अध्यक्षीय डिबेट में वे खूब तालियाँ बटोरते हैं, लेकिन पहली बार एक निर्दलीय उम्मीदवार को 400 से अधिक वोट मिले.

चुनाव की गिनती के दौरान कई अजीबोगरीब वाकये हुए. जेएनयू के पूर्व अध्यक्ष और देश भर में अपने भाषणों के लिए चर्चित कन्हैया कुमार को उनके  ही संगठन के लोगों ने सार्वजनिक तौर पर खूब भला-बुरा कहा. वे सार्वजनिक तौर पर आलोचना न करने की दुहाई देते रहे. विद्यार्थियों का आरोप था कि कन्हैया ने अपने संगठन के उम्मीदवारों के लिए प्रचार नहीं किया, बल्कि एंटी कैम्पेन करते हुए भी पाये गये.  जेएनयूएसयू की एक पूर्व  उपाध्यक्ष  को उसे यह कहते हुए सुना गया कि वह चाहता तो एसआईएस के काउंसिलर पद के लिए, यानी जो उसका अपना स्कूल है, उसके काउंसिलर पद के लिए उसके संगठन  की उम्मीदवार जीत जाती. फेसबुक पर एआईएसएफ के सदस्य उसपर व्यंग्य भरे पोस्ट लिखते रहे. एआईएसएफ के ही एक सदस्य ने कहा कि “इस बार संगठन में गैर सवर्ण सदस्य सक्रिय थे, पैनल में भी गैर सवर्ण सदस्यों की संख्या बड़ी थी, शायद इसीलिए कन्हैया कुमार न सिर्फ इनएक्टिव रहे बल्कि मौक़ा मिलने पर एंटी प्रचार भी किया. हमलोग सबूत इकट्ठा कर रहे हैं और इस मामले को संगठन में उठायेंगे.”



जेएनयू के पूर्व छात्र, जीतेन्द्र कुमार, जिनका दावा है कि उन्होंने एआईएसएफ के पूर्व में सफल रहे उम्मीदवार लेनिन कुमार और कन्हैया के लिए भी प्रचार किया था, ने कहा कि ‘यह संगठन यह विश्वास दिलाने में असफल रहा कि इनकी उम्मीदवार अपराजिता लेफ्ट गठबंधन  और एबीवीपी दोनो को हारने में सक्षम है. पहले वे तभी जीते हैं जब वे ऐसा विश्वास दिला पाये.” उन्होंने कन्हैया कुमार का बिना नाम लिये कहा कि ‘ऐसा संगठन के वरिष्ठ और लोकप्रिय विद्यार्थी भी ने नहीं किया, न करने का प्रयास किया.’

वाम गठबंधन की जीत को उसके विरोधी अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की जीत का खौफ पैदा कर जीतने की रणनीति को श्रेय दे रहे हैं. जाहिर है कि अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद को जेएनयू के खिलाफ जेएनयू में ही अपनी राजनीति पर पुनर्विचार करना होगा. बापसा के सामने भी चुनौती लगातार दो असफलताओं के बाद भी कैम्पस में अपनी धमक बनाये रखने की होगी.

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