जातिवाद का दंश: दिल्ली विश्वविद्यालय की प्राध्यापक को राजधानी में नहीं मिल रहे फ़्लैट


रजनी अनुरागी 
पिछले लगभग 10 दिन से किराए पर दो शयनकक्ष वाला फ्लैट देख रही हूं। रोहिणी दिल्ली में डीडीए की और अन्य कई ग्रुप हाउसिंग सोसायटीज़ के आवासीय परिसर हैं। रोहिणी हर लिहाज से बढ़िया जगह है। मैं, जैसा कि सभी जानते हैं दिल्ली विश्वविद्यालय के जानकी देवी मेमोरियल कॉलेज में पढ़ाती हूँ। मेरे पापा रूप नगर , नम्बर 1 के सीनियर सेकेंड्री बॉयज स्कूल से उपप्रधानाचार्य पद से सेवानिवृत्त हुए। पेशे की दृष्टि से मेरी जाति/ वर्ण क्या होना चाहिए?? जबकि मैं इस जाति व्यवस्था की घोर विरोधी हूँ।

अपने कॉलेज में रजनी अनुरागी 


यह सब मैं क्यों लिख रही हूं?? इसका कारण यह है कि मकान मालिकों को मेरे पेशे की बजाय जाति जानने में दिलचस्पी का होना है। आपका सरनेम क्या है ? किस जाति से हैं? वैसे तो हम जाति वाति मानते नहीं , पर कौन कैसा आ जाए? (क्योंकि जाति विशेष के लोग 'सत्धर्मी' होते है!!!) मकान मालिक तो मकान मालिक प्रोपर्टी डीलर के पानी पिलाने वाले और मकान की तालियां लेकर मकान दिखाने का संयुक्त काम करने वाले सहायक तक(यहां मार्क्सवाद लाने की आवश्यकता नहीं) ने पहले सीधे कास्ट फिर मेरे ये कहने पर कि क्या मतलब... उसने सकपकाते हुए पूरा नाम जानने की कोशिश की।

रजनी अनुरागी की कवितायें

 प्रॉपर्टी डीलर परिचित था सो उसने तुरंत उसे मकान पता करने और दिखाने को कहा।डीलर ने बात सम्भालते हुए कहा," जी क्या करें मकान मालिक पूछते हैं!! मैंने कहा ऐसे किसी जातिवादी का मकान हम बिल्कुल नहीं लेंगे और हम वहां से आ गए। जबकि दूसरा वाकया ये है कि दिल्ली के सरकारी स्कूल से प्रधानाचार्य पद से सेवानिवृत्त जातिवादी ने मुँह खोलकर जाति पूछी और हमने अपनी जाति उनके मुँह पर फेंक दी । जाति को हाथ में लिए वे बोले....जाति से क्या होता है!! हे हे हँसने लगे। जब कुछ होता नहीं तो पूछते क्यों हो ??

अभी तक फ्लैट नहीं मिला है जबकि 30 सितम्बर तक वर्तमान फ्लैट खाली करना है।

रजनी अनुरागी का फेसबुक पोस्ट 

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