आदिवासी लेखिकाओं ने की आदिवासी महिलाओं के खिलाफ लेखन की निंदा लेकिन लेखन पर प्रतिबंध के पक्ष में नहीं

देश की वरिष्ठ और युवा आदिवासी महिलाओं ने एक स्वर से हांसदा सौभेन्द्र शेखर के लेखन की भर्त्सना की है जिसमें उसने आदिवासी स्त्रियों की गरिमा का नकारात्मक चित्रण और गरिमा का हनन किया है. रांची में 7-8 सितंबर को आयोजित ‘अखिल भारतीय आदिवासी लेखिका सम्मिलन’ के अवसर पर जुटी उत्तर से लेकर कई राज्यों से आई आदिवासी महिला साहित्यकारों ने संयुक्त रूप से यह प्रस्ताव लिया था. प्रस्ताव में कहा गया है कि हम झारखंड की भाजपा सरकार द्वारा हांसदा सौभेन्द्र शेखर की किताब पर लगाए गए प्रतिबंध का विरोध करती हैं परंतु इसी के साथ कड़े शब्दों में लेखक की भी भर्त्सना करती हैं जिसने श्रमशील आदिवासी महिलाओं की बहुत ही आपत्तिजनक तस्वीर अपने लेखन में खींची है.


आदिवासी लेखिकाओं ने अपने प्रस्ताव में कहा है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए जरूरी है. लेकिन यह भी सच है कि स्वतंत्रता के साथ सामाजिक जिम्मेदारी भी अनिवार्य रूप से जुड़ी होती है. खासकर जब लेखन का विषय भारतीय समाज के कमजोर वर्ग हो. चिंता की बात यह भी है कि लेखक का समर्थन कर रहे लोग भारत के आदिवासी महिलाओं की गरिमा पर उसके लेखन के प्रभाव की अनदेखी कर रहे हैं. जबकि इस गंभीर मुद्दे पर कोई आदिवासी लेखक चुप नहीं रह सकता है. इसलिए, अखिल भारतीय लेखिका सम्मलेन, रांची में जुटी हम सभी आदिवासी लेखिकाएं कड़े शब्दों में हांसदा सौभेन्द्र शेखर के लेखन की निंदा करती हैं।

निंदा प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करने वाली प्रमुख आदिवासी लेखिकाएं हैं-
1. डॉ. रोज केरकेट्टा, खड़िया-हिंदी की वरिष्ठ साहित्यकार, रांची (झारखंड)
2. प्रो. स्ट्रीमलेट डखार, वरिष्ठ खासी साहित्यकार और विभागाध्यक्ष, खासी विभाग, नॉर्थ-हिल युनिवर्सिटी,           शिलांग (मेघालय)
3. डॉ. दमयंती बेसरा, वरिष्ठ संताली साहित्यकार और आलोचक, बारीपदा (उड़ीसा)
4. निर्मला पुतुल, चर्चित संताली कवयित्री, दुमका (झारखंड)
5. इंदुमती लमाणी, वरिष्ठ बंजारा लेखिका, बिजानगर (कर्नाटक)
6. क्रैरीमोग चौधरी, वरिष्ठ मोग साहित्यकार, (त्रिपुरा)
7. एस. रत्नम्मा, वरिष्ठ आदिवासी साहित्यकार, (कर्नाटक)
8. जोराम यालाम नाबाम, चर्चित आदिवासी कथाकार व एसोसिएट प्रोफेसर, राजीव गांधी विश्वविद्यालय,           ईटानगर (अरुणाचल प्रदेश)
9. सरोज केरकेट्टा, वरिष्ठ खड़िया कवियत्री, सिमडेगा (झारखंड)
10. डॉ. दमयंती सिंकु, वरिष्ठ हो आदिवासी लेखिका, रांची (झारखंड)
11. सोनलबेन राठवा, सोशल एक्टिविस्ट व आदिवासी लेखिका, (गुजरात)
12. प्यारी टूटी, वरिष्ठ मुंडारी लेखिका, खूंटी (झारखंड)
13. डॉ. शांति खलखो, वरिष्ठ कुड़ुख लेखिका, रांची (झारखंड)
14. डॉ. शोभा लिम्बू, वरिष्ठ आदिवासी लेखिका व प्राध्यापिका, हिंदी विभाग, कलिम्पोंग कॉलेज (प. बंगाल)
15. डॉ. हीरा मीणा, आदिवासी लेखिका व प्राध्यापक, दिल्ली विश्वविद्यालय (दिल्ली)
16. उज्ज्वला ज्योति तिग्गा, चर्चित आदिवासी कवयित्री (दिल्ली)
17. ज्योति लकड़ा, आदिवासी लेखिका, रांची (झारखंड)
18. विश्वासी एक्का, चर्चित आदिवासी कवियत्री (छत्तीसगढ़)
19. सुषमा असुर, चर्चित आदिवासी कवियत्री, नेतरहाट (झारखंड)
20. ग्लोरिया सोरेंग, वरिष्ठ खड़िया लेखिका, सिमडेगा (झारखंड)
21. डॉ. आइवी हांसदा, संताली लेखिका व प्राध्यापक, अंग्रेजी विभाग, जामिया मिलिया विश्वविद्यालय                  (दिल्ली)
22. के. वासमल्ली, वरिष्ठ टोडा साहित्यकार, निलगीरी (केरल)
23. डॉ. मिलन रानी जमातिया, आदिवासी लेखिका व प्राध्यापक, त्रिपुरा विश्वविद्यालय (त्रिपुरा)
24. वंदना टेटे, चर्चित आदिवासी लेखिका, रांची (झारखंड)
25. अलमा ग्रेस बारला, युवा आदिवासी लेखिका, बैंगलुरू (कर्नाटक)
26. कुसुम माधुरी टोप्पो, आदिवासी लेखिका (छत्तीसगढ़)
27. दीपा मिंज, सोशल एक्टिविस्ट और आदिवासी लेखिका, रांची (झारखंड)
28. सुषमा केरकेट्टा, आदिवासी कवियत्री, रांची (झारखंड)
29. प्रीति रंजना डुंगडुंग, नवोदित आदिवासी लेखिका, रांची (झारखंड)
30. सरोज तेलरा, आदिवासी कवियत्री, महुवाडांड़, (झारखंड)
      साथ में और 35 आदिवासी लेखिकाएं और लेखक।

     अखिल भारतीय आदिवासी लेखिका सम्मेलन की ओर से
     वंदना टेटे

      संलग्न: प्रस्ताव और हस्ताक्षर

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