मेरी रात मेरी सड़क आखिर क्यों?


बहुत कम ऐसे मौके आते हैं जब हिन्दी स्फीअर की लडकियां सोशल मीडिया या मीडिया में कोई मुद्दा ट्रेंड करा ले जाती हों. आज भी ट्वीटर और फेसबुक में अंग्रेजी ट्रेंड को पर लग जाते हैं. लेकिन श्वेता यादव, गीता यथार्थ और अन्य लडकियां इस मामले में उल्लेखनीय हैं जिन्होंने कई मुद्दे सोशल मीडिया और मीडिया में ट्रेंड कराये. सेल्फ़ी विदाउट मेकअप की मुहीम हो या अमेजन का स्त्री की योनि में सिगरेट बुझाने की प्रतीक वाला ऐश ट्रे का विज्ञापन और उसकी बिक्री वापस लेना, यह सब इन लड़कियों ने सफलता पूर्वक अंजाम दिया. और अब 12अगस्त को ‘अगस्त क्रान्ति दिवस’ के तीन दिन बाद और आजादी के दिन के तीन दिन पूर्व की आधी रात को #मेरीरातमेरीसड़क का आह्वान किया है-उस रात लड़कियों को अपने-अपने शहरों में सड़क पर निकलने का आह्वान. श्वेता बता रही हैं इस अभियान को शुरू करने के पीछे का मकसद: 
संपादक

फेसबुक पर लिखने के बाद बहुत सारे लोगों ने पूछा कि #मेरीरातमेरीसड़क आखिर क्यों? क्या यह वर्णिका के साथ जो हुआ उसके विरोध में है? ज्यादातर ने बिना कहे खुद से कयास लगा लिया कि यह वर्णिका केस के विरोध में ही है, जिसमें एक राजनेता ने विवादित बयान देते हुए कहा कि “लड़कियों को देर रात में घर से बाहर निकलना नहीं चाहिए”|

पर रुकिए जरा सोचिये क्या सिर्फ यह एक अकेली घटना है? जहाँ किसी घटना के बाद ऐसा बयान आया? क्या ऐसा पहली बार हुआ है कि किसी लड़की को इस तरह के अपमान से गुजरना पड़ा? क्या समाज में, घर-परिवार में आये दिन यह सुनना नहीं पड़ता कि घर से निकलो तो भाई को लेकर निकलो, आधी रात में मत जाओ, ऐसे मत बोलो, वैसे मत उठो, वैसे मत बैठो ऐसी न जाने कितनी बातें हैं जो सिर्फ लड़कियों के लिए है|  न जाने कितनी ऐसी घटनाएँ हैं जिनके बाद हमने कितने उल-जलूल बातें लड़की के मत्थे आती सुनी हैं|


उन तमाम बातों के विरोध में यह कैम्पेन है, एक छोटी सी गह्तना से आपको बताती हूँ शायद आपके लिए समझना आसन हो जाए कि हम लड़कियां आधी रात को भी सड़क अपने लिए सुरक्षित क्यों चाहती हैं|

यूँ तो आधी रात को घर से निकलने के बहुत वाकये हैं जहाँ झेलना पड़ा लेकिन कुछ वाकये ऐसे हैं जो आज भी नहीं भूलते उनमें से एक यह भी है......

दिसंबर 2015 हमारे पूरे परिवार के लिए आज भी क़यामत ही है. 7 दिसंबर रविवार सुबह अचानक दी का फोन आया उसने बताया कि पापा को ब्रेन हैमरेज हो गया है| तमाम उठा-पठक में पापा को लखनऊ सुषमा हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया| पिता कोमा में और हम सब बदहवास, मैं आनन्-फानन में दिल्ली से लखनऊ पहुंची| होस्पिटल में माँ और भाई थे उनके अलावा तीसरी मैं| चूँकि दिमाग बिलकुल सुन्न पड़ गया था पापा का सुनकर तो जो कपड़े पहन रखे थे उन्हीं में जनरल से भागी थी दिल्ली से, लिहाजा पास में कुछ नहीं था| तीन दिन बाद भईया ने कहा हम तीनों में से किसी एक को घर जाना होगा, चूँकि तुम्हारे पास कपड़े वगैरह भी नहीं है एक काम करो तुम घर चली जाओ, वहां का सारा इंतज़ाम भी देख लेना और अपने कपड़े भी लेना आना| मैं घर चली गई, लखनऊ से हमारे घर की दूरी लगभग 220 किलोमीटर है| सब कुछ जल्दी -जल्दी निपटाते भी दुसरे दिन शाम हो गई, सर्दियों में सूरज यूँ भी घर जाने की जल्दी में होता है| दीदी और भाभी दोनों ने कहा कि रुक जाओ मत जाओ, लेकिन हालात रुकने वाले नहीं थे सो मैंने लखनऊ का रूख किया एक तो वैसे ही लेट हो गया था दूसरे कोई बस नहीं और कोहरा उसकी तो पूछिये मत इतना भयानक था उस दिन की हाथ को हाथ न दिखे .. समझ लीजिये  बस रेंग रही थी| भईया के चाचा ससुर उस समय हर पल साथ खड़े थे, हमारे लिए पिता समान| उनका मुझे फोन आया और उन्होंने कहा बेटा बस अड्डे तक मत जाना बेवजह की दूरी जायेगी और समय भी| चाचू ने मुझसे कहा बेटा तुम शहर में प्रवेश करने से पहले ही जो फ्लाई ओवर पड़ता है वहां उतर जाना मैं वही रहूँगा तुम्हें रिसीव कर लूँगा| खैर वह बेहद जिम्मेदार हैं आज तक कभी अपनी जिम्मेदारियों से नहीं चूके| लेकिन एक कहावत है न कि जब समय ही बुरा चल रहा हो तो फिर सारे सितारे उलटे पड़ जाते हैं|

अभी तक रॉड, तेज़ाब, मोमबत्ती और अब औरत के गुप्तांग में सिगरेट भी: सोशल मीडिया में आक्रोश

बस फ़्लाइओवर पर पहुंची और मैं उतर गई , एक तो कुहरे की वजह से सही जगह का अंदाजा न लग पाने के कारण मैं चाचू को सही समय का आइडिया नहीं दे पाई दूसरी मार यह पड़ी की कुहरे की वजह से चाचू मिस गाइड हो गए और गलत रूट ले लिया| अब कुछ नहीं हो सकता था सिवाय इंतज़ार के| मुझे याद है उसी फ़्लाइओवर से हाइवे शुरू होने के चलते गाड़ियों जिनमे ज्यादातर ट्रकों का ताता लगा हुआ था, बराबर आ जा रही थी या यूँ कह लीजिये रेंग रही थी| मैं डर और ठंढ के मारे लगभग सुनना पड़ चुकी थी क्योंकि मुझे अंदाजा हो गया था कि मैं बहुत गलत जगह फंस गई हूँ|


मैंने हुड उठाया सिर को ऐसे ढका की ठीक से बाल ढँक जाए आधे चेहरे को रूमाल से बाँधा पर शायद फिर भी मैं अपना लड़की होना छुपा नहीं पाई| जहाँ मैं थी वहां एक ट्रक आकर रुकी मैंने अपने आपको भरसक छिपाने की कोशिश की लेकिन मैं नाकाम थी| उस ट्रक में तीन लोग थे उन्होंने मुझे कैसे देखा, क्या सोचा मुझे नहीं पता लेकिन वह मेरी तरफ बढ़ रहे थे| मैंने इस बात को कन्फर्म करने के लिए अपनी जगह छोड़ा और थोड़ी अलर्ट होते हुए आगे की तरफ बढ़ गई| वे अब और तेजी से मेरी तरफ बढ़ने लगे मेरे पास सोचने का समय नहीं था बस बचाना था खुद को| पीठ पर सामान से लदा बैग और डरी सहमी मैं अपने आपको चाचा के आने से बिलकुल उलटी दिशा में भागी जा रही थी| मैं आगे और वो मेरे पीछे, मैं मार्शल आर्ट जानती हूँ पर मैं जानती थी कि मैं अकेली और डरी हुई हूँ और वे तीन मैं लड़ नहीं पाउंगी तो भागकर बचाना उचित लगा| भागते-भागते कुछ छोटी गुमटियां दिखी उन्ही में छिप कर खुद को बचाया| वह रात तो बीत गई लेकिन उस भयानक रात का जिक्र मैं अपने घर में किसी से नहीं कर पाई आज तक नहीं| पर जब भी सोचती हूँ सिहर उठती हूँ अगर उस रात मैं उनके हाथ लग गई होती तो क्या हुआ होता? क्या करते वे मेरे साथ?

कुछ हो जाने पर कौन ये मानता कि उस दिन और उसके बाद भी कई रातें मुझे देर रात घर से बाहर निकलना पड़ा अपनी इच्छा या घूमने के शौक के चलते नहीं अपनी जरूरत के चलते| ऐसी ही न जाने कितनी लड़कियां हैं जिन्हें अकेले निकलना होता है रात में जरूरत के वक्त, उन्मन कुछ अकेली रहती हैं, कुछ नौकरी करती हैं, कुछ सिंगल मदर हैं| सबके पास अपने-अपने कारन है पर इसका यह मतलब कत्तई नहीं होना चाहिए कि कोई लडकी रात को घर से निकले तो वह रेप कर दी जाए, मार दी जाए और उस पर यह आधे तिरछे बयान आएं| बस अब बहुत हुआ इनका विरोध करना ही होगा| लोगों को यह बताना ही होगा कि यह सड़क जितनी किसी आदमी के लिए सुरक्षित है उतनी ही किसी महिला के लिए भी होनी चाहिए| यह कैम्पेन उसी के विरोध में उठाया गया छोटा सा कदम है| शुरू में हम कुछ लड़कियां थी अब तो लगभग देश का हर कोना जुड़ चुका है|

मान लीजिये कि हम लड़कियां खुरापाती हो गई हैं .. आपके हिसाब से बहुत भयानक आइडिया हम लड़कियों के दिमाग में घूम रहा है.. जल्द ही हम आधी रात को सडको पर निकलेंगी .. नहीं नहीं हमारा इरादा किसी भी सरकार को चुनौती देना नहीं है.. बस इस समाज को समझाना चाहते हैं कि सड़कें हमारे लिए भी सुरक्षित कर दीजिये .. मैं यह मानती हूँ कि हम अपराध युक्त समाज का हिस्सा बन चुके हैं इसलिए आधी रात को सड़कें किसी के लिए भी सुरक्षित नहीं है फिर चाहे वह महिला हो या पुरुष.

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लेकिन जानते हैं आधी रात में निकलने पर पुरुष और महिला के डर में बड़ा अजीब अंतर है| अगर अपनी कहूँ तो मैं बिना वजह खुद रात को निकलने से बचती हूँ| लेकिन जब जरूरत होती है तो निकलने से घबराती भी नहीं बिना हिचक निकल जाती हूँ| हजारों अनुभव हैं मेरे पास ऐसे जब आधी रात को घर से बाहर निकलना पड़ा है वो भी अकेले.. आप जानते हैं क्या होता? नहीं ?? रुकिए बताती हूँ हाँथ, पैर कांपते हैं एक अनजाना डर दिमाग में भरा रहता है और वह डर बहुत वाहियात है क्योंकि वह डर सिर्फ लड़की होने से उपजता है.. रेप कर दिए जाने का डर, मार दिए जाने का डर, मोलेस्ट किये जाने का डर| और इस सब के साथ अगर आपके साथ कुछ गलत हो जाए तो लोगों की नसीहत निकली ही क्यों थी आधी रात को .. इन सब वर्जनाओं को तोडना है .. फिलहाल हम कुछ लड़कियां मन बना चुकी हैं .. आप सब का भी मन करे तो आ जाइए साथ ...


कई लोगों का यह सवाल भी आया कि एक दिन से क्या होगा क्या बदलेगा| उनसे मेरा एक सवाल कुछ नहीं किया तो भी क्या बदलेगा? आज नहीं तो कल कुछ न कुछ तो करना होगा| बड़ी नहीं तो छोटी ही सही शुरुआत तो होनी चाहिए| तो बस समझ लीजिये यह शुरुआत ही है

श्वेता यादव  टेढ़ी  उंगली वेब पोर्टल के संपादक है.
संपर्क :yasweta@gmail.com

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