किरायेदार

अनुपमा तिवाड़ी
कविता संग्रह “आइना भीगता है“ 2011 में बोधि प्रकाशन, जयपुर से प्रकाशित. संपर्क : anupamatiwari91@gmail.com

मकान नंबर ए – 41 मीता और उमेश ने देखते ही पसंद कर लिया था.छोटी - सी गृहस्थी के लिए दो कमरे, किचिन और लेटबाथ पर्याप्त थे. दोनों ही कामकाजी थे इसलिए बच्चों और अपनी सहूलियतों को देखते हुए वे शहर में घर बदलते रहते थे. किराए का घर टोकरे में होता है जब चाहे बदल लो. हाँ, किराएदार को मकान मालिक का मिजाज़ मापते रहना होता है जिस दिन मकान मालिक का पारा ऊपर चढ़ता है उस दिन किराएदार सोचने लगता है कि अब तो उसे दूसरा घर ही देखना पड़ेगा. ये एक किरायेदार की त्रासदी होती है जिसे वे दोनों खूबसमझते थे.

उस दिन मकान मालकिन आंटी के पोते का जन्मदिन था तो आंटी थाल में दो बड़ी – बड़ी घी में डूबी बाटी, चूरमा और कटोरे में दाल ले कर आईं. इसी बहाने थोड़ी बातचीत हुई. कहने लगीं बेटा, तुम्हारे अंकल जी तो सीधे – साधे आदमी हैं. चार बेटियाँ हैं बड़ी दो जबलपुर ब्याही हैं एक यहीं अपनी ही कॉलोनी में पीछे की गली में रहती है. छोटी वाली यहीं डिजाइनिंग की कम्पनी में नौकरी करती है. छोटी वाली ब्याही तो मुम्बई है लेकिन क्या करें जवाईं से तोये बहू लगी हुई है न !अब दामाद तलाक की बात कर रहा है.

बहू प्रीति भी समय निकाल कर मीता के पास आ कर मन की बात कहने की कोशिश करती.एक दिन बोली दीदी, आप तो देखते ही हो न, मैं सारे दिन घर के काम में लगी रहती हूँ. ये पीछे वाली दीदी और छोटी दीदी आपके भैया को हमेशा भड़काती रहती हैं और फिर ये मुझ पर हाथ उठाते हैं. मैंने एक दिन आपके भैया से कह दिया कि तुम्हारी बहन के साथ ऐसा हो तब तुम्हें कैसा लगे ? इस बात पर आपके भैया ने मुझे बाल पकड़ कर मारा और बोले मेरी बहन तेरी जैसी थोड़े ही है. बहुत बार करते हैं ये ऐसे. एक बार तो मैंने छोटे नंदोई को चिठ्ठी में लिखा कि “आप ही मेरे दुःख को समझ सकते हो, ये दोनों बहनें घर में बहुत झगड़ा करवाती हैं और फिर इनके भैया का स्वभाव, गुस्सा तो जैसे नाक पर ही रखा रहता है”यह बात नंदोई जी ने घर में सबको बता दी तब से तो ये और भी ज्यादा ऐसे करने लग गए हैं. मम्मीजी कहती हैं नंदोई है तेरा सगा है, अब जा उसी के पास. मीता समझ रही थी कि प्रीति भाभी को एक भावनात्मक सहारे की ज़रुरत थी इसलिए उन्होंने नंदोई को पत्र लिखा और तब से प्रीति भाभी को ससुराल में ये कलंक मिल गया कि वह नंदोई से लगी हुई हैं. उस चिट्ठी ने उनके दुःख कम नहीं किए बल्कि और बढ़ा दिए.

मीता ऑफिस जाते- आते अपने पड़ौस की महिलाओं और बच्चों से थोड़ा - बहुत बतियाती. महिलाएं कभी – कभी तो मीता से खूब बातें करतीं.कभी – कभी आंटी की बुराई भी लगे हाथ करके, घर की टोह लेने की फ़िराक में रहतीं कि छोटी बेटी ससुराल क्यों नहीं जाती ?तीसरे नंबर की बेटी रोज़ – रोज़ क्यों आती है ? इनके घर में रोज़ – रोज़ झगड़ा क्यों होता है ? मीता इन बातों से कन्नी काटने की कोशिश करती.उसे तो उस घर में रहना था न,किरायेदार जो ठहरी ! ये पड़ोसिनें, आंटी से तो खूबप्यार से बात करतीं. उन्हें अपने घर होने वाले आयोजनों में बुलाती. हाँ, वो मीता से खूब बतियाने के बावज़ूद अपने घर में होने वाले आयोजनों में उसे नहीं बुलातीं.


एक दिन मीता की बेटी ने कहा मम्मा,आज राघव जन्मदिन है अपन शाम को राघव के घर चलेंगे न !मैं उसके बर्थडे में ये गुलाबी फ्रॉक पहन कर जाऊंगी और तुम कौन सी साड़ी पहन कर चलोगी ? बताओ न, बताओ न ! उस दिन मीता ने बेटी के सवालों से मुश्किल से पीछा छुड़ाया था. क्या समझाए वह बेटी को, यह वह खुद ही नहीं समझ पा रही थी. जब बेटी पीछे ही पड़ गई तब वह बोली“मैं भीगुलाबी साड़ी पहनूंगी, अब चुप हो जा”.
राघव पिछले चार दिन से अपने जन्मदिन को ले कर हमउम्र बच्चों के झुण्ड में इठला रहा था. मीता बेटी को क्या और कैसे समझाती कि राघव की मम्मी ने राघव के बर्थडे में अपने को नहीं बुलाया है सो उसने उमेश के साथ पार्क में बिटिया को आइसक्रीम खाने चलने के लिए राजी कर लिया. पार्क में बिटिया लगातार जिद कर रही थी कि पापा अब घर चलो, चलो, कब चलोगे ? कितनी देर बाद चलेंगे ?राघव की बर्थडे पार्टी ख़त्म हो जाएगी.
मीता और उमेश जानबूझ कर समय को पार्क में खींचे जा रहे थे. जब तक वे घर लौटे. बर्थडे पार्टी खत्म हो चुकी थी.बिटिया भी पार्क में झूले, झूल – झूल कर थक गई तो घर पर पहुँचने से पहले ही रास्ते में स्कूटर पर ही सो गई. चलो अच्छा हुआ, सो गई. मीता ने धीमे से कहा और गोद से उतार कर उसे बेड पर सुला दिया. पड़ोसियों के बीच मन में चाहे अलगाव हो लेकिन फिर भी औपचारिकता के नाते आना – जाना रहता है, रहना होता है न लम्बे समय उनके साथ.. “ कुछ अच्छे बुरे में रिश्तेदार तो बाद में आयेंगे पहले तो पड़ोसी ही काम आयेंगे” ऐसी उक्तियाँ पड़ोसी के महत्व को और बढ़ा देती हैं. किरायेदार की क्या हैसियत होती है ? चला जाता है एक दिन, घर खाली करके, उसे कॉलोनी में होने वाले आयोजनों में क्या बुलाना ? ये बात किराएदार को समय – समय पर यह अहसास करवाती रहती है कि वह किराएदार है और उसकी समाज में क्या औकात है.

सुनो! ये प्रीति भाभी को मार रहे हैं ......मीताकी आँख एक रात,सटाक – सटाक किसी डंडे की फटकार सुनते हुए खुली. उमेश भी जाग गया. उस रात मीता फिर रात भर नहीं सोई.वो धीरे-धीरे सुनने की कोशिश करते हुए कुछ-कुछ उमेश को होठों में कहती रही लेकिन सुबह उसने आंटी को ये जाहिर नहीं होने दिया कि रात को जो कुछ आपके यहाँ हुआ उसके बारे में हमें पता है.

सुबह प्रीति भाभी के पीहर से भाई और माँ गेट पर आ कर खड़े हो गए,भाभी बिना कुछ भी सामान लिए उनके साथ पीहर चली गईं और रास्ते में जिस स्कूल में दोनों बेटे और छोटी बेटी पढ़ने जाते थे उस स्कूल से अपनी बेटी को भी साथ में ले गईं.शाम को मीता ऑफिस से लौटी तो आंटी बहू की कमियाँ गिनाने लगीं और बोलीं“हमको नहीं रखनी ऐसी बहू. रात को ही उसके पीहरवालों को फोन कर दिया, भई ले जाओ अपनी बेटी को.सुबह उसका भाई और माँ आ कर ले गए,बहू अपने साथ बेटी को तो ले गई और दोनों बेटों को छोड़ गई”

मीता के अन्दर पता नहीं कितने सारे सवाल और कितना सारा क्षोभ बाहर आने को उमड़ रहा था लेकिन वो जान रही थी कि उसकी हैसियत किरायेदार की है.क्या हो जाता है कभी-कभी कि आदमी के होठ खुलने को तैयार होते हैं और फिर सिल जाते हैं. एकदम चुप्प से !


लगभग डेढ़ महीने के बाद मीता ने दूसरा घर बदल लिया. घर दूसरा लेने के बाद भी दिमाग में यह बात चलती रही कि वो प्रीति भाभी अब भी अपने पीहर में रह रही होंगीं या ससुराल आ गई होंगी ? यह जानने के लिए सात साल बाद एक दिवाली पर मीता, सपरिवार आंटी से मिलने गई. ड्राइंग रूम में प्रीति भाभी की बच्चों के साथ बात करने की धीमी – धीमीआवाज़ अन्दर से आ रही थी. प्रीति भाभी यहाँ अपने आप आई होंगी या इन्होंने बुलाया होगा या वहां से भी धकेल दी गईं पता नहीं !मीता की आँख, कानऔर दिमाग जैसे तेजी से काम करने लगे.आंटीके घर उस समय बड़ी बेटी,जबलपुर से अपने परिवार के साथ आई हुई थी जिसे आंटी ने बताया कि ये मीता है पहले अपने किराए पर रहती थी.

कुछ हालचाल जानने के बाद आंटी ने सोफे पर बैठे – बैठे ही आवाज़ लगाई प्रीति, मीता आई है चाय – पानी तो ले कर आ. प्रीति भाभी के चेहरे पर क्या लिखा था वह मीता एक नज़र में पढ़ नहीं पाई और पढ़ती भी क्या – क्या और क्या वो सही- सही पढ़ पाती ? मीता तो बस अकेले में प्रीति भाभी का हाथ,अपने हाथ ले कर बस कहना चाहती थी कि भाभी, अब आप कैसी हो ? मुझे माफ़ कर देना, उस रात मैं आपको बचा नहीं सकी !

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