सुनो पुरुष: असुंदर और वेश्यायें भी लेखिका हो सकती हैं, कवि, आलोचक और निर्णायक भी


Literary sexism has been wreaking havoc on the self-esteem of women writers for centuries — even in our seemingly more enlightened times. And now, suddenly, it's become fashionable to openly dismiss notions of gender inequality and brand complainants as "privileged whingers".
Jane Sullivan

साहित्यिक लिंगवाद सदियों से महिला लेखकों के आत्मसम्मान पर कहर बरपा रहे हैं - यहां तक कि हमारे प्रबुद्ध रूप से अधिक प्रबुद्ध समय में। और अब लैंगिक असमानता और ब्रांड शिकायतकर्ताओं को "विशेषाधिकार प्राप्त कातिल" के रूप में खारिज करना फैशन हो गया है

मंटों वेश्याओं की कहानियां लिखते थे, महान कथाकार थे. पुरुष साहित्यकार प्रेम की कथाएं पढ़ते, रचते हैं वे महान हैं. वे सब महान हैं जो पुरुष हैं और महिलाओं के साथ विशेषाधिकार प्राप्त प्रेमी का आचरण करते रहे हैं. ये सब अपनी रचनाओं से मूल्यांकित होंगे. लेकिन जब स्त्री लिखेगी तो उसके निजी रिश्ते किससे कैसे रहे, वह दिखती कैसी है, उसके सेक्स आचरण कैसे हैं, आदि उसके मूल्यांकन के आधार होंगे.


यह कोई नया सिलसिला नहीं है, लेकिन उस समय में जब सनी लियोन के लेखन का हमसब स्वागत कर रहे हैं लेखिकाओं के खिलाफ पुरुष साहित्यकारों, आलोचकों के एक खेमे से, जिनकी प्रगतिशील दावेदारी भी है, मूल्यांकन और आलोचना के सेक्सिस्ट हमले हो रहे हैं. एक बार फिर हिन्दी साहित्य के महारथियों ने सिद्ध कर दिया है कि मूलरूप से जातिवादी और स्त्रीविरोधी हैं-हाई कास्ट मेल हैं.

पिछले तीन दिन से हिन्दी साहित्य की दुनिया सोशल मीडिया पर स्वयं अपनी परतें खोल रही है. हालांकि सोशल मीडिया में सक्रिय लेखिकाओं ने जब जमकर प्रतिरोध किया तो परदे के पीछे भी डैमेज कंट्रोल की कवायाद शुरू हो गई है. इस दशक की शुरुआत में ही हिन्दी के एक लेखक और बड़े मठाधीश के रूप में तब उभरे और हिन्दी विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायाण राय ने लेखिकाओं को छिनाल और कामदग्ध कुतिया कहा था. काफी विरोध हुआ उनका. तब भी डैमेज कंट्रोल के खेल शुरू हो गये थे. अभी भी उनकी साम्रदायिकता विरोधी चैम्पियन की छवि से उनके इस सेक्सिस्ट आचरण का डैमेज कंट्रोल होता है. तब जो पर्दे के पीछे सक्रिय लोग थे उनमें से कुछ अभी भी हैं, लेकिन चूकी  मठ बड़ा नहीं है, गिरोह बड़ा नहीं है इसलिए उसकी संख्या भी उतनी बड़ी नहीं है. हालांकि विरोध भी उतना बड़ा नहीं है.

कवि कृष्ण कल्पित ने एक सम्मान में निर्णय के बहाने निर्णायक अनामिका के खिलाफ एक निहायत आपत्तिजनक टिप्पणी की, जिसका स्वाभाविक रूप से विरोध हुआ. विरोध के जवाब में कल्पित विरोध करने वाली लेखिकाओं के खिलाफ भी उसी अंदाज में हमलावर हुए. शुरू में उनसे माफी की मांग भी उठी जो धीरे-धीरे उनके अपने गिरोह की सक्रियता के असर से कमजोर भी होने लगी है. कल्पित के हमले न सिर्फ सेक्सिस्ट हैं उनकी प्रशंसाएं भी उतनी ही सेक्सिस्ट हैं. मसलन उनके तीन पोस्ट की बानगी है:

अनामिका के खिलाफ: 

अनामिका पिछले एक वर्ष से बहुत से युवा कवियों को अपनी कविता के साथ घर बुलाती रही हैं । उन्होंने उनमें से एक जवान कवि का चुनाव किया है । इसमें किसी को क्यों ऐतराज़ हो रहा है ? यह उनका व्यक्तिगत फ़ैसला है, जिसका हमें सम्मान करना चाहिये !
#भारतभूषणअग्रवालपुरस्कार_2017 १.
किसी को दाढ़ी वाला पसन्द आता है तो किसी को सफाचट - अपनी-अपनी सौंदर्याभिरुचि है !

लेखिका गीता श्री के खिलाफ: 

अपने छोटे से जीवन में मेरा सामना विकट औरतों से हुआ है, लेकिन गीताश्री जैसी फूहड़, बदतमीज, और गंवार औरत, जिसको लेखिका होने का भरम भी है; दूसरी नहीं देखी.
सुबह से यह औरत मुझे कुंजडियों की तरह गालियाँ दिये जा रही है. कुंजडी सुंदर हो तो गालियाँ भी मीठी लगती है, लेकिन यहाँ तो दीवार से सिर मारना ठहरा......

और लेखिका वंदना राग की प्रशंसा में: 

वंदना राग जी मैं आपके लिखे का कायल हूँ, आपको ध्यान से पढ़ता रहता हूँ. आपकी संवेदना, पारदर्शी गद्य, आपकी मुस्कराहट और घुंघराले बालों का मैं प्रशंसक हूँ.
.......................................................................मेरी स्त्री सम्मान को कम करने की मंशा नहीं थी. कुछ बदमाश औरतों और मेरे दुश्मनों ने बात का बतंगड बना दिया.

ये तीनो ही उद्धरण भाषा और समझ के स्तर पर लेखक के स्त्रीविरोधी और जातिवादी मानसकिता को सामने लाते हैं. और तुर्रा यह कि वे अपने बचाव में या फिर उनके बचाव में दूसरे लोग यह समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि भले मानुष का यह आशय नहीं था. आशय यदि पुरस्कार के चयन का विरोध ही था यदि मान लिया जाये तो क्या पुरस्कारों के निर्णायकों का विरोध इसी भाषा के साथ अब तक होता रहा है. पिछले साल इसी भारतभूषण अग्रवाल सम्मान के निर्णायक उदय प्रकाश थे, उनके निर्णय का भी विरोध हुआ, लेकिन विरोध की भाषा वह क्यों नहीं थी जो अनामिका के प्रसंग में है. क्या कल्पित या दूसरे लोग  पुरुष रचनाकारों के लेखन की प्रशंसा करते हैं तो उसके रूप सौन्दर्य, मुस्कान और घुंघराले बालों की प्रशंसा करते हैं, या अपनी प्रशंसा की कसौटी बनाते हैं. वंदना राग की प्रशंसा की भाषा क्या कल्पित जी के पद्य-गद्य की प्रशंसा की भाषा हो सकती है. क्या मुस्कराहट और बिना घुंघराले बालों के वंदना राग के गद्य की पारदर्शिता और उनकी संवेदना कुछ कम जाती हैं ?

समर्थन की भाषा और भंगिमा भी सेक्सिस्ट

यह तो हुई विरोध की भाषा और भंगिमा अनामिका के समर्थन में भी सोशल मीडिया में जो पोस्ट हो रहे हैं वे भी अंततः स्त्रीविरोधी वक्तव्य और भंगिमा ही हैं. कोई उन्हें स्नेहिल बहन बता रहा है, कोई ममतालू माँ. यदि वे ये दोनों ही नहीं होतीं तो उससे उनके लेखन का क्या संबंध होने वाला है या उनके उस निर्णय से. अनामिका इन रिश्तों के अलावा किसी की पत्नी, किसी की प्रेमिका या किसी की दोस्त भी हो सकती हैं. इन सबसे बढ़कर वे किसी की कुछ भी नहीं हो सकती हैं वे सिर्फ अनामिका हो सकती हैं तो इस होने से लेखन और आलोचना का क्या संबंध है?

समर्थन और विरोध की इस भाषा और भंगिमा में हमारी लेखिकाएं भी पीछे नहीं हैं. उषा किरण खान ने लिखा:

कृष्ण कल्पित जी,मैं एक प्रगल्भ माँ थी और आप बीए में पढ़ने वाले किशोर ।मेरी कहानी और आपकी कालजयी कविता "बेटा इकलौता" आदरणीय भारती जी ने बड़े विज्ञापन करके छापा था। तबले आपकी प्रतिभा की मैं क़ायल हूँ । आपने भी सदा बड़ी बहन वाला आदर दिया है।आप हमारे शहर में दो बार अधिकारी बन दूरदर्शन में आये जो साहित्यकारों के विचरण का स्थल है ज़ाहिर है हम मिलते रहे। कभी आपको अभद्र नहीं पाया। आपने यहाँ परिश्रम किया यह हम देखते रहे। आपने कई बार जिसे पसन्द नहीं किया उसे भी बुलाते रहे ।आपकी छवि मेरे मन में सदा एक किशोर की रही। साहित्य आपका ओढ़ना बिछाना है । उसके सहित को लेकर चलने में क्या हर्ज है? मुझे पता है आपकी मात्र एक बिटिया है ,क्या उसे महिलाओं के सम्बन्ध में आपके ये विचार (जिसे अपशब्द कहे और जिसका नखशिख वर्णन किया)रुचेंगे?
आपने विराट अध्ययन किया है उसका मान रखें। कुछदिन मौन रहकर मनन करें। आप शेखावटी के हैं , राखी के समय का ध्यान रखें।
मैं यात्री काका(नागार्जुन ) से भी कहती और रोकने में सफल होती थी.

हिन्दी साहित्य और समाज का लिटमस 

उषा किरण खान अपने पोस्ट में कुछ यूं लिख रही हैं मानो कल्पित कोई एक ऐसा पीडित गुट हों, जिनसे दूसरा गुट लड़ रहा है. मैं इस पोस्ट  के साथ दांग रह गया कि क्या हमारी सम्मानित लेखिकाएं भी इसे एक साहित्यिक संघर्ष के रूप में देख रही हैं? क्या मामला इतना भर है. नहीं. यह प्रसंग साहित्य के भीतर हाई कास्ट मेल की दृष्टि का है. इसकी आलोचना होनी चाहिए थी और इसे एक हिन्दी साहित्य और समाज के लिटमस की तरह देखा जाना चाहिए था.

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