हिन्दी आलोचना में स्त्री के प्रति संवेदना नहीं है: सविता सिंह

रेखा सेठी
  हिंदी विभाग, इंद्रप्रस्थ महिला महाविद्यालय, दिल्ली वि वि, में एसोसिएट प्रोफेसर. विज्ञापन डॉट कॉम सहित आधा दर्जन से अधिक आलोचनात्मक और वैचारिक पुस्तकें प्रकाशित  
संपर्क:reksethi@gmail.com

सविता सिंह ने स्वयं को घोषित तौर पर स्त्रीवादी कवयित्री कहते हुए समाज के स्थापित ढाँचों को कुछ इस तरह चुनौती दी कि साहित्य की लब्ध-प्रतिष्ठ अविरल धारा में एक नया मोड़ उपस्थित हुआ. उनकी कविताएँ लिंगाधारित असमानता के खिलाफ जिरह खड़ी कर एक नयी दुनिया की तस्वीर पेश करती हैं जो अधिक मानवीय, समानधर्मा और स्वतंत्र होगी. सविता ने जिस सजग ढंग से सामाजिक संबंधों की पड़ताल करते हुए पितृसत्तात्मक व्यवस्थाओं को प्रश्नांकित किया, उससे ‘स्त्री होने के संकट’ का बोध कवि और पाठक दोनों को समान रूप से होने लगा. उनकी कविताएँ उसी संकट और उससे उन्मुक्तता के अहसास को एक साथ पैदा करती हैं. असमानता, यातना और संघर्ष के असंख्य बिंब यदि सविता सिंह की कविताओं का प्रस्थान बिंदु हैं तो मुक्ति का अहसास (केवल स्वप्न या आकांक्षा के स्तर पर नहीं) उसकी अनिवार्य परिणति. स्त्री, प्रकृति और दमित समाज के अनेक चेहरे एक-दूसरे में घुल-मिल जाते हैं.

सविता सिंह की कविताओं का संसार हमारे सामने दुनिया के जिस रूप को प्रस्तावित करता है वह वैकल्पिक दुनिया का स्वप्न है.यह इलाका स्वप्न और यथार्थ के बीच अवस्थित है. एक ओर वे कविताओं में स्त्री जीवन के इतिहास को रचती, उसकी मुक्ति के सपने को पा लेना चाहती हैं तो दूसरी ओर पूरी तरह खुद को कविता के हवाले कर सहज भाव से पूछती हैं- ‘कहाँ लिए जा रही हो मुझे मेरी कविता’. उनकी कविताओं की संवेदना गहरी वैचारिक उर्जा से गढ़ी गई है. ये विचार स्त्री को लेकर उनके (वर्ल्ड-व्यू) विश्व-दृष्टि से पैदा होते हैं. वैकल्पिक विश्व-दृष्टि जो संभवतः ‘जेंडर न्यूट्रल’ दुनिया तक ले जा सके. सपनों की तरलता जेंडर के इस पाठ को मानवीय अनुभव में बदल देती है. इन कविताओं में जेंडर के ये सवाल जिस तरह उठे थे उससे यह आशंका भी बनी थी कि यह कविता कहीं स्त्री के इतिहास, संघर्ष या उसके अधिकारों की पक्षधरता का ऊपरी शोर बन कर न रह जाए, लेकिन सविता सिंह ने उस सीमा का अतिक्रमण किया. उन्होंने कल्पना, संवेदना और विचार के समुच्चय को साधकर उसे मानवता का ऐसा सवाल बना दिया है जो दर्शन और रहस्य की  पराकाष्ठा तक पहुँचता है. साहित्य परंपरा में उसका मूल्य इस बात से निश्चित होगा कि  चिंता और चिंतन की यह सलवटें किस तरह का सक्रिय हस्तक्षेप कर पाएँगी जिससे कविता में सविता जिसे पाने की ज़िद्द करती हैं उसे हम सामाजिक स्तर पर भी अर्जित कर सकें. मैंने (रेखा सेठी ने), जेंडर और कविता के अनेक सवालों उनसे लंबी बात-चीत की, प्रस्तुत हैं उसके कुछ अंश ....

स्त्री-कविता:अर्थ-आशय

मैं एक स्त्री हूँ और मेरी कविता में मेरी यह पहचान सम्मिलित है... मैं मानती हूँ और बहुत शिद्दत से महसूस करती हूँ कि मेरे साथ जो कुछ भी इस जीवन में घटित हुआ है और हो रहा है वह इस वजह से है...कविता में अपनी बात अभिव्यक्त करना (स्त्री की) अंदरूनी शक्ति का इज़हार है.यह मेरे लिए अपने निकट होने जैसा है. स्त्री-कविता  में अपने निकट होने का एक मतलब है. कहीं न कहीं यहउसके ‘स्व’ का मामला है और जो‘स्व’ है उसका आविर्भाव उसके साथ जन्म से ही होता है. हाँ, उसके साथ उसका विकास हो तो उसमें और भी बहुत-सी बातें आ जाती हैं I यह एक ख़ास यात्रा है. मेरे अपने ‘स्व’ का विकास. मेरे जीने के लिए यह बहुत है I मुझे अपने बारे में एक ख़ास तरह की समझ चाहिए जो मुझे संपन्न करे. यह संपन्नता कोई बाहर से महसूस न भी करे आप अपने भीतर उसे महसूस कर सकती हैं, वह एक रोशनी की तरह होती है, आपको आगे जो कदम रखने हैं उनकी दिशा दिखाती हुई.यह दिशा बहुत महत्त्वपूर्ण है क्योंकि कोई आपके भीतर से ही यह सुझा रहा होता है कि किधर जाएँ.यह आपका अपना फ़ैसला होता है.जीवन का गंभीर फ़ैसलाI दरअसल वही मुक्ति है, वही स्वतंत्रता.

....मेरे भीतर का स्त्री-आलोक मुझे दिशा देता है. इसका एक दूसरा पक्ष भी है, कविता और आपका द्वंद्वात्मक संबंध. आप और कविता एक दूसरे को बनाते चलते हैं. इस प्रक्रिया को मैं पहचानती हूँ. कविता के इस सच को मैंने अपनी कविताओं में परखा है और उसे ज़ाहिर भी किया है. ‘कविता का जीवन’, ‘कहाँ लिए जा रही हो मुझे मेरी कविता’, ‘कृतज्ञ हूँ मेरी कविता’ आदि अनेक ऐसी कवितताएँ हैं जिनमें यह प्रक्रिया देखी जा सकती है. यह प्रक्रिया इतनी जीवंत है, मनुष्य के दूसरे ‘स्व’ की तरह ही उससे बहुत मिलती-जुलती  मेरी उसके प्रति कृतज्ञता भी है, सवाल भी हैं और झगड़े भीIकविता के साथ मेरा बहुत ही घनिष्ठ एवं आत्मीय संबंध है. मैं स्त्री कवि हूँ और मैं मानती हूँ कि मेरी कविता स्त्रीत्व से जुड़ी है तो निश्चित तौर पर मैं चाहूँगी कि उन कविताओं को स्त्री-कविता  के रूप में पहचाना जाए. ‘स्त्री सच है’ मेरी ही एक कविता है, ‘नींद थी और रात थी’ में यहाँ सत्य का कविताकरण और राजनीतिकरण दोनों होता है.

स्त्री-कविता: स्त्री पक्ष और उसके पार

स्त्री-कविता और पाश्चात्य संदर्भ

बहुत से लोग स्त्रीवाद पर हमला करते
हुए कहते हैं कि वह पाश्चात्य अवधारणा से आया है. मैं भी मानती हूँ कि इसमें पाश्चात्यप्रभाव से उदय होने के कारण एक दृष्टिकोण है लेकिन हमें यह भी नज़रंदाज़ नहीं करना चाहिए कि अगर दुनिया में कहीं भी मनुष्य का कोई समूह (स्त्री तो छोड़ो) दुनिया को बदलने के लिए संघर्ष कर रहा है और उसका कोई परिणाम निकल रहा है तो हम क्यों उससे मुतासिर न हों, हम क्यों उसे स्वीकार न करें या उससे अपनी पहचान न जोड़ें ? यहाँ पाश्चात्य का सवाल बीच में आ जाने से इसका संबंध औपनिवेशिक संस्कृति से जोड़ दिया जाता है जिससे सांस्कृतिक दासता की ध्वनि आती है.यह सारी बातें हाइपर नेशनलिज्म या उग्र राष्ट्रवाद के संदर्भ से उभर कर आती हैं.बिना किसी धुंधलके के मैं यह कहना चाहती हूँ कि हमारा अपना जो राष्ट्रवाद है उसने हमारे लिए एक नए पितृसत्तात्मक समाज का निर्माण भी किया क्योंकि इस राष्ट्रीय व्यवस्था में स्त्री और पुरुष बराबर नहीं हैं. पितृसतात्मक व्यवस्था उसमें गुंथी हुई है इसलिए यह बहुत ज़रूरी है कि हम दुनिया की उन बहनों के साथ एक बहनापा स्थापित करें जिन्होंने विवेक के स्तर पर या जीवन के स्तर पर अपने यहाँ के पुरुषों से संघर्ष कर कुछ हासिल किया है.


1960 के आस-पास अमरीका में जिस रेडिकल फेमिनिज्म की शुरुआत होती है या उससे भी बहुत पहले जब स्त्रीवादी चेतना उभरने लगी,मेरी वालस्टोनक्राफ्ट (1792) ने जब लिखना शुरू किया, या फिर सोशलिस्ट स्त्रीवादियों ने स्त्री श्रम की पड़ताल शुरू की. इनको भी हम अपने संघर्ष से जोड़कर देखते हैं. कम्युनिस्ट मूवमेंट में जो स्त्रियाँ रहीं उन सबका इतिहास हमारा इतिहास है. हमारे लिए इतिहास का अर्थ केवल राष्ट्र का इतिहास नहीं है, स्त्री संघर्ष का इतिहास है. हालाँकि यहाँ भी राष्ट्रीय आंदोलन में स्त्रियों की बहुत बड़ी भूमिका रही है लेकिन उसका प्रतिफल क्या हुआ ? यह हमारे सामने है कि सरोजिनी नायडू, राजकुमारी अमृत कौर तथा अन्य स्त्रियाँ जो स्वतंत्रता संघर्ष में शामिल थीं वे पुरुषवादी विवेक से प्रभावित रहीं. 1932-33 में जब स्त्री के प्रतिनिधित्व का सवाल उठा तो उनके द्वारा रखे गए विचार असमंजस में डालने वाले लगते हैंIवे राष्ट्रवादी होने के कारण ही अपनी योजना एवं लक्ष्य में पुरुषवादी लगते हैं.स्त्री-प्रतिनिधित्व के विषय में इन्होंनेकहा कि स्त्रियों को कोई आरक्षण नहीं चाहिए बस उनकी मनुष्यता को पहचाना जाए. कितना बड़ा अंतर्विरोध है इस कथन में,क्योंकि एक तरफ यह कहा जा रहा है कि स्त्रियाँ बहुत सशक्त हैं उन्हें विशेष दर्जा नहीं चाहिए, साथ ही उनकी,मनुष्यता को नहीं पहचाना जा रहा इसका भी स्वीकार है. कहीं बहुत बड़ी फाँक है यहाँIआप अपनी मनुष्यता की पहचान कराना चाहती हैं तो उसके लिए संघर्ष करने की ज़रुरत है I 1973-74 में जब ‘टुवर्ड्स इक्वालिटी रिपोर्ट’ आई तो स्थिति साफ़ हो गई. हिन्दुस्तान की औरतों की स्थिति कितनी खराब और दयनीय थी, चाहें उनकी शिक्षा हो या स्वास्थ्य सभी जगह उनकी स्थिति मिट्टी के बराबर थी. उसके बाद ही यह चेतना आई कि इसे बदलने के लिए विशेष यत्न करने होंगे.उनके उत्थान के लिए सरकारी नीतियाँ बनाने की शुरुआत हुई.

बाबा साहेब अंबेडकर इस पर पहले बात कर चुके थे और मैं उनके योगदान को महत्त्वपूर्ण मानती हूँ कि उन्होंने उन लोगों के लिए संविधान में विशेष प्रोविज़न किए जिन्हें दलित या अस्पृश्य माना गया था. स्त्री की स्थिति में सुधार लाने के लिए भी बाबा साहेब ने हिन्दू कोड बिल में परिवर्तन लाने की कोशिश की. कम से कम उन्होंने इस आवश्यकता को राजनीतिक स्तर पर पहचाना तो सही.मेरे कहने का मतलब है कि हम राष्ट्रवाद को आँख मूँद कर स्वीकार नहीं कर सकते. हमें राष्ट्रवाद के अँधेरों को भी देखना चाहिए. औरतों के लिए उसकी अपनी मुसीबतें हैं.हमें यह बहस नहीं करनी चाहिए कि हम इसको पाश्चात्य मानें या भारतीय, और अगर पाश्चात्य है भी तो हम जैसे पश्चिम के उपनिवेशवाद को स्वीकार नहीं करते लेकिन उनके यहाँ जो प्रगतिशील आंदोलन हुए हैं उनको स्वीकार करते हैं. उसी तरह हमारे यहाँ जो राष्ट्रवादी चेतना है उसमें जो प्रगतिशील अवयव हैं, उसको हम स्वीकार करते हैं और जो प्रतिगामी हैं, जो हमें पीछे धकेलते हैं, पितृसत्ता के अधीन करते हैं, जो हमें परंपरा में व्याप्त प्रतिगामी मूल्यों की तरफ वापस धकेलते हैं उनको हम अस्वीकार करते हैं.उन्हें हम राष्ट्रवाद के नाम पर आत्मसात नहीं कर सकते.

स्त्री कविता: स्त्री पक्ष और उसके पार (क़िस्त दो)

स्त्री-कविता: मूल मुद्दे

स्त्री-कविता  के मूल मुद्दे वही हैं जो
दुनिया में आज तक स्त्रियों के मूल मुद्दे रहे हैं और जिन पर स्त्रियों ने लिखा भी है. मेरा यह मानना है कि स्त्री-कविता  तमाम सामाजिक संरचनाओं में जो असमानता व्याप्त है, चाहे वह स्त्री को लेकर हो चाहे दूसरे ऐसे समूहों को लेकर, उन सब के प्रति संघर्ष को जायज़ ठहराती है. वह संसार को हर तरह की कुरूपताओं से मुक्त करना चाहती है.वह पितृसत्ता की भयावहता से मनुष्य को निजात दिलाना चाहता है. इसके लिए वह सुंदर की पहचान करना चाहती है. मैंने भी यह कोशिश की है कि जिन असमानताओं से हमारा समाज प्रभावित है उसके दर्द और अंधेरों को सामने लाऊं. स्त्री-कविता भी लगातार यह कोशिश करती है कि अपनी कविताओं के ज़रिए वह समाज को कैसे बदल सकती है. सामानांतर स्तर पर ऐसी सभ्यता के विकास में सम्मिलित हो जिसमें अंततः जो भी हमारी भिन्नताएँ हैं वह हमारे शोषण के लिए इस्तेमाल न होकर हमारी उन्नति के लिए हों, जिससे हम कह सकें कि एक सामूहिक, विनम्र, विश्व समुदाय बनाने में हमारी कविताओं का योगदान रहा है.हमारी कविताओं को पढ़ते हुए लगे कि वे व्यस्क स्त्री नागरिक की कविताएँ हैं I यह एक उपलब्धि होगी.

स्त्री-कविता और स्त्री-विमर्श

मैं विमर्श को पुनः परिभाषित करना
चाहूँगी क्योंकि स्त्री-विमर्श किसी भी चीज़ को संकुचित करने के लिए नहीं है Iस्त्री-विमर्श  है ही इसीलिए कि वह जीवन की तमाम परतों को खोल सके और स्त्री-विमर्श  के भीतर जो कविताएँ लिखी जा रही हैं, मैं नहीं मानती कि वहसीमित हैक्योंकि विमर्श एक जगह स्थिर होकर नहीं रहता.विमर्श के इतिहास की अपनी यात्रा है. अगर स्त्री-विमर्श  की बात करें तो यह विमर्श वह नहीं है जहाँ 1960 में था. आज हम स्त्री-विमर्श  के तीसरे दौर से भी आगे निकल चुके हैं बल्कि,  विमर्श के इस फेज़ में या इस पड़ाव पर स्त्रियाँ लगातार पुरानी बातों को निरस्त कर रही हैं, उसमें नया जोड़ रही हैं, बिल्कुल नया यथार्थ भी हासिल कर रही हैं. वे खुद अपनी ज़मीन तलाश कर उसे उर्वर बनाकर, उसमें जो भी फसल उगानी थी, उगाकर, काटकर, उस जगह आ गई हैं जहाँ पर वे दार्शनिक स्तर पर मानुष के मनुष्यत्व को पहचान रही हैं. स्त्री-विमर्श  विकास की ओर अग्रसर है और ऐसे मुकाम पर पहुँचा हुआ है जहाँ चाहे कला हो, साहित्य या अलग से स्त्रियों पर कविता, उसे संकुचित करने के बजाए उसके लिए नई ज़मीन तैयार कर रहा है. अब आप पर है कि आप स्त्री-विमर्श  को कैसे समझती हैं.आप किस स्तर पर उससे जुड़ी हैं.आप स्त्री-विमर्श  के पहले चरण में, दूसरे या फिर तीसरे और उससे आगे के विमर्शों में हैं या फिर उससे भी आगे बिल्कुल अलग. मेरा मानना है कि आज-कल ज़्यादा पढ़ी-लिखी महिलाएँ जो एब्सट्रेक्ट विचारों  के क्षेत्रों में काम कर रही हैं सब तीसरे चरण में हैं, क्योंकि वे अपने आत्म-संघर्ष से यहाँ तक पहुँची हैं.किसी ने उनको पहुँचाया नहीं है.उन्होंने स्वयं देखा, जाँचा-परखा, सबको पढ़ा है.बहुत-सी स्त्री सिद्धांतकार हैं जिन्होंने मार्क्स के बाद,फ्रायड के बाद, फूको को महत्त्वपूर्ण माना है और उनसे प्रेरित हुईं.बहुत सारी स्त्रियाँ हैं जिन्होंने लकां के काम को बहुत महत्वपूर्ण माना है.फ्रायड की उन्होंने लकां के ज़रिए कठोर आलोचना कीI वे पुरुष के ज़रिए पुरुष को रिप्लेस कर रही हैं, विस्थापित कर रही हैं.


आजकल मैं फ्रेंच फेमिनिज्म से बहुत मुतासिर हूँ. उनके काम में जूलिया क्रिस्टेवा हों या हेलेन सिक्सू, इन लोगों के काम में आपको वो उन्नति दिखती है जिसको आप संकुचित अर्थ में स्त्री-विमर्श  नहीं कह सकतीं. वह एक सभ्यता-विमर्श है जिसमें स्त्रियाँ अपना विकास कर चुकी हैं और इतने प्रगतिशील ढंग से सोच रही हैं जैसा पुरुषों ने भी नहीं सोचा होगा.इनका जो नया इलाका है उसमें अपने दायरे से बाहर निकलकर सोचने समझने की कोशिश हो रही है. यह संघर्ष बहुत बड़ा है. यह कभी भी कविता या किसी अन्य चीज़ को संकुचित कर ही नहीं सकता.यहाँ एक नया सिंबॉलिक ऑर्डर यानी व्यवस्था बनाने का अथक प्रयास चल रहा है जिसमें अर्थव्यवस्था का भी रूपांतरण हो जाना चाहिए.

समकालीन कविता की परंपरा में स्त्री कविता 

मैं जब अन्य कवियों को पढ़ती हूँ तो मेरे
सामने कई चित्र अपने बिंबों के ज़रिए उभरने लगते हैं – कई आईने आने लगते हैं जिनमें मैं अपना चेहरा और अपनी स्थिति देखती हूँ. मेरे लिए यह बहुत ही अंतरंग अनुभव होता है. जैसे जब आप महादेवी को पढ़ते हैं तो शुरू में उनकी आलोचना इस तरह हुई कि उनके यहाँ संघर्ष से ज़्यादा व्यक्तिगत संताप है लेकिन उस संताप-विलाप का स्वर इतना करूण है कि वह स्त्री को ज़्यादा छूता है या पुरुष को यह भी समझने की बात है.किसी भी कविता का पाठ एक राजनीतिक मसला भी है. आप स्त्री कवि को कहाँ से पढ़ रहे हैं, उससे यह बात साफ़ हो जाती है कि आपका पाठ कैसा होगा. मैं जब स्त्री कवि को पढती हूँ, गगन गिल पर मैंने इधर लिखा भी है, उसमें से मुझे एक ऐसी गूँजती हुई आवाज़ आती है जो अपनी ही छूटी हुई आवाज़ लगती है. मेरा ख्याल है कि स्त्री-कविता  चाहे वो जिस दौर में लिखी गई हो, मीरा की कविता हो या अक्क महादेवी की, उन सबको पढ़ते हुए लगता है कि यह मेरी अपनी ही कविताएँ हैं, मेरी छूटी हुई आवाज़ जिसे सहज ही अपना लेने को जी चाहता है.

...कविता आपके सच की आवाज़ है, जब आप ऐसी किसी विधा में लिख रही हैं तो यह आवश्यक है कि आपके अंदर एक स्वच्छता हो, सच्चाई हो उसकी आभा हो कम से कम.उसे पढ़ते हुए और परिभाषित करते हुए भी हमें चाहिए कि कविता को उसके अपने इतिहास और भूमिका के संदर्भ में पढ़ें, लेकिन ऐसा नहीं हो रहा.यही चिंता का विषय है.जो लोग इस समय सक्रिय हैं यह उन लोगों की कमी है कि वे उन चीज़ों पर बात नहीं कर रहे. कोई एक अच्छी स्त्री-कविता  किसी भी पुरुष को पसंद आनी चाहिए और कोई अच्छी कविता जो किसी पुरुष द्वारा लिखी गयी है वह स्त्रियों को पसंद आनी चाहिए, इसमें कोई मुश्किल नहीं है लेकिन उसका समझकर बहस और विश्लेषण होना चाहिए.पंकज सिंह की स्त्री पर लिखी कवितायेँ किसे पसंद नहीं आएँगी या फिर विष्णु नागर की माँ पर लिखी कविता बेमिसाल लगती है.कुमार अंबुज की बहनों पर लिखी कविता भी एक ऐसा ही उदाहरण है. मंगलेश जी के यहाँ भी माँ पर एक कविता है जो ज़ेहन में रहती है. असद ज़ैदी की अधिकतर कविताओं की मैं अच्छी पाठिका हूँ. विजय कुमार की एक कविता ‘मार खाई हुई स्त्री’ है जो गला रुद्ध कर देती है या फिर लीलाधर मंडलोई की माँ पर कविताएँ, इतनी करूण हैं कि आप यहाँ पता नहीं कर सकते स्त्री या पुरुष भावना में. हमारे सीनियर पुरुष कवियों की कविताएँ अपनी विलक्षणता में हम सबको भाती हैं कुँवर जी हों, केदार जी अशोक वाजपयी जी या फिर विष्णु खरे या विनोद कुमार शुक्ल और प्रभात त्रिपाठी जी,वैसे ही अनीता वर्मा, निर्मला गर्ग, कात्यायनी, नीलेश, सविता भार्गव, विपिन चौधरी – सबके यहाँ सामान्य सामाजिक चेतना पर लिखी कविताएँ पुरुष कवियों को खूब भाती हैं. यहाँ वे स्त्री-विमर्श की तलाश नहीं करते लेकिन जहाँ स्त्रियों का संसार अपनी स्व-चेतना में कविताओं में खुलता है, उसकी चमक ही विशेष होती है.

स्त्री कविता: स्त्री पक्ष और उसके पार (क़िस्त तीन)

हिंदी आलोचना और स्त्री-कविता 

स्त्री-कविता की कोई आलोचनात्मक
प्रवृति नहीं है जिससे उसे समझा जाए. आलोचना बातचीत के लिए एक आधार देती है जिस पर आप सभी सहमत हो सकते हैं कि यह कविता यह कह रही है. अगर आप अभी समकालीन स्त्रियों को पढ़ें तो लगेगा कि उसमें एक स्वर है जो उनका है, क्योंकि वो उनके अनुभवों से आ रहा है और वे अनुभव सार्वभौमिक भी हैं क्योंकि स्त्री कहीं भी हो किसी भी वर्ग की, किसी भी धर्म की, उसे पितृसत्ता समान रूप से दमित करती है.इसलिए स्त्रियों का अनुभव एक स्तर पर एक ही किस्म का अनुभव होगा लेकिन उसके बाद उसमें बहुत सी भिन्नताएँ भी हैं.अगर यह सत्य कोई मिस कर जाए तो कविता समझने में दिक्कत होगीI यदि किसी स्त्री कवि को यह कहा जाए कि उसकी कविता तो पुरुषों की तरह है या सामान्य साहित्य की तरह तो इस बात को शाबाशी की तरह थोड़े ही लेना चाहिए. इसको इस तरह से लेना चाहिए कि कहीं आलोचना ने अपना काम नहीं किया और इस बड़ाई ने आपको वह भाषा और वह समझ नहीं दी जिससे आप पहला कदम या दूसरा कदम पार कर चुके होते हैं और दूसरे स्तर पर जाकर बहस करें I मेरा अपना मानना है कि स्त्रियों की कविताओं की बहुत ज़्यादा चिंता इस आलोचना में नहीं रही है. हाँ, लेकिन मैं यह भी मानती हूँ की अब जो आलोचना हो रही है उसमें यह चिंता भी है, संवेदना भी और समझने की कोशिश भी.इसलिए निराश होने की कोई ज़रूरत नहीं है.


इधर मैंने एक बहुत छोटी कोशिश की है और उसकी सराहना हुई है जिससे पता चलता है कि हिंदी में ऐसी आलोचना की कमी है Iमैंने कोशिश की कि जो आलोचनात्मक टिप्पणियाँ अब तक स्त्री कवियों पर की गई हैं उनसे अलग कुछ देखूँ, जैसे नीलेश की ज़्यादातर कविताओं को जो प्रशंसा मिली वह उसके वर्ग विश्लेषण के कारणI नीलेश एक ख़ास वर्ग से आती हैं और उस अनुभव को उन्होंने कविता में पिरोया, लेकिन मैंने उनकी कविताओं में उस स्वर को ढूँढा जिसे स्त्री स्वर कह सकते हैं I अगर आप उन्हें पढ़ना चाहते हैं तो उनकी स्त्री को आप अनुपस्थित नहीं कर सकते. इसी तरह गगन गिल के बारे में मैंने लगातार देखा कि लोग उनकी आलोचना करते हैं कि वे अँधेरे में चली गई हैं, बुद्ध की ओर चली गई हैं और यथार्थवादी जीवन से उनका संबंधविच्छेद-सा हो गया हैलेकिन जब मैं उन्हें पढ़ती हूँ या उनका पाठ करती हूँ तो पाती हूँ कि वे कहीं नहीं गई हैं.अपने ही स्पेस में हैं.एक स्त्री के स्पेस में. उनका जीवन जो उनकी वेदना का स्रोत है वो उनके स्त्री होने को लेकर ही है.संतान न होने का भयानक दुःख उनके भीतर है और उनकी कविताओं में भी अभिव्यक्त होता है. कोई भी स्त्री उस स्वर को समझ सकती है और उसके बाद वे देखतीं हैं कि इस दुःख से निजात पाने के लिए उन्हें एक दूसरी कॉस्मोलोजी का ही सृजन करना होगा.उस तलाश में वे बुद्ध के पास जाती हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि दुःख को पहचानने की एक दार्शनिक दृष्टि यहाँ है| इसलिए यह पाठ बहुत अलग है.आप इस विषय को बिना समझे उनकी आलोचना करके उनको ख़ारिज करते रहिए तो आप उनकी कविताओं को नहीं पढ़ सकेंगे.आप उन कविताओं को भी ख़ारिज कर देंगे जो महत्त्वपूर्ण कविताएँ हैं. स्त्री चेतना के लिए यह उसकी अपनी दिशा है. उसे समझने के लिए आपको इस तरह के पाठ से मदद मिलेगी.

मैं यह मानती हूँ कि यह पाठ मैंने यह स्थापित करने के लिए किया है कि स्त्रियों द्वारा लिखी गई कविताओं का पाठ थोड़े अलग ढंग से करना चाहिए क्योंकि यह जिस चेतना की उपज हैं उसमें उसका स्त्री होना केंद्र में है. अगर आप इसको नदारद कर देंगे तो आप उसके आस-पास तो पहुँच सकते हैं लेकिन बहुत करीब नहीं जा सकते और पाठ को खोलना बहुत ज़रूरी है.ख़ासकर आज आलोचना की जो स्थिति है वह स्त्रीवादी नहीं है उसमें स्त्री के प्रति वह संवेदना नहीं है.मेरा ख़याल है कि जब इस तरह के कुछ और पाठ होंगे तो पाठ करने का जो यह ढंग है वह हिंदी आलोचना में ज़रूरी तौर पर शामिल हो जाएगा और इस अर्थ में यह हो सकता है कि यह प्रतिमान बने लेकिन उसकी मुझे ज़्यादा चिंता नहीं है.मुझे केवल इस बात में रूचि है कि जब हम इन कविताओं को पढ़ते हैं तो उनको थोड़ा सही ढंग से, थोड़ा करीब जाकर पढ़ सकें.

स्त्री-कविता और जेंडर निरपेक्षता 

हमारा पहला कदम तो जेंडर संवेदनशीलता
का ही होना चाहिए यानी कि एक संवेदना होनी चाहिए जिससे यह समझा जाए, कि दो लैंगिक समुदायों के बीच संबंध ठीक-ठाक नहीं हैं. इनको ठीक करने के लिए जेंडर सेंसिटाईज़ेशन ज़रूरी है.आज हम जो बहुत सारा लेखन कर रहे हैं वह उस संवेदना को पैदा करता है लेकिन जेंडर न्यूट्रल होना एक बहुत वृहत किस्म की ऐतिहासिक-सामाजिक प्राप्ति होगी.जेंडर न्यूट्रल वही समाज हो सकता है जहाँ जेंडर की असमानताएँ समाप्त हो चुकी हों I स्वीडन वगैरह ख़ास कर नोरडीक देशों में जेंडर निरपेक्ष पॉलिसिज़ बन रही हैं.यह बहुत ही प्रसन्न करने वाली बात है क्योंकि जेंडर के स्तर पर उनके समाज में जो असमानताएँ थीं उन्हें उन्होंने ख़त्म करने की कोशिश की है. कैसे ? औरतों के लिए सबसे बड़ी मुसीबत यह है कि पितृसत्ता ने हमारे समाज को श्रम विभाजन के आधार पर विभाजित किया है.बहुत ही ठोस ढंग से स्त्री और पुरुष को असमान बनाया है.हम कौन से काम करते हैं उससे निश्चित होता है कि समाज में हमारी भूमिका क्या होगी. अगर हमारे देश मेंस्त्री जानवरों से भी ज़्यादा काम करती है (जिसके आँकड़े भी हैं) और वो काम इतने भारी काम हैं कि अगर वे न किए जाएँ तो दूसरे काम भी नहीं हो सकते तो इससे क्या असमानताएँ पैदा हो रही हैं, इसे तो समझना ही पड़ेगा. बात यह है कि इसके बावजूद उसके श्रम का कोई मूल्य नहीं है.स्वीडन जैसे देशों में आप पाएँगे कि जेंडर के आधार पर इस तरह के विभाजन को समाप्त करने की कोशिश की गई है.वहाँ पर वेल-बीइंग की बात होती है यानी हम कैसे स्वस्थ जीवन जिएँ घरेलू काम कौन करेगा? वह किस तरह बँटेगा, सरकार सिर्फ स्त्रियों को ही प्रसूति के लिए छुट्टी देगी या पुरुषों को भी छुट्टी देगी.अगर बच्चे हैं तो पिता को भी छुट्टी मिलनी चाहिए.एक दिन में कितने घंटे काम किया जाना चाहिए जिससे कि आपकी मनुष्यता विकसित हो. जब आप इस तरह से विचार करने लगेंगे सारा समाज ऐसे सोचेगा तब वहाँ अर्थव्यवस्था या पितृसत्ता पर टिकी असमानताएँ सुलझने लगती हैं. यहसब हमारे देखते-देखते हुआ है कि जेंडर निरपेक्ष पॉलिसिज़ बन रही हैं. इसीलिए जेंडर निरपेक्षता को हासिल किया जा सका हैI  अगर हम जुट जाएँ कि हम उन चीज़ों को अपने समाज से दूर करें, निकाल बाहर करें जो हमें असमान बनाती हैं Iतब हम एक साथ गरिमापूर्ण समाज में गरिमा के साथ जीने वाले स्त्री-पुरुष बना ही सकेंगे.

सामाजिक परिवर्तन में स्त्री-कविता की भूमिका 

सामाजिक परिवर्तन में स्त्री-कविता
अपनी भूमिका निभाएगी क्या, वह निभा रही है. वह सबके बीच यह चेतना स्थापित कर रही है कि हर मनुष्य चाहे वह कहीं हो, यह कविता चाहती है कि उसकी गरिमा हो.उसे एक न्याय मिले, उसके निम्नतर होने की चेतना निरस्त हो. बहुत सारी स्थितियाँ जो हमारे लिए तकलीफदेह हैं--हिकारत, असामनता, हिंसा, अन्याय, इन सारी स्थितियों को बदलने का काम हिंदी की स्त्री-कविता कर रही है और सिर्फ राजनितिक ढंग से ही नहीं, दर्शन और सभ्यता विमर्श के तहत भी वह उस काम को कर रही है. मुझे अपनी समकालीन स्त्री कवियों से बहुत उम्मीदे हैं.

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