ग्रामीण सामूहिकता में अकेला रोता हंस


मनीषा कुमारी 

मैं कहानियों  और साहित्य की बिलकुल नई पाठक हूँ. मनोविज्ञान की विद्यार्थी रही हूँ, 12 वीं तक विज्ञान की किताबों  से साबका रहा उसके बाद  मनोविज्ञान की किताबों से . यह संयोग ही है कि पहली साहित्यिक समीक्षा भी जिस लेखिका की कहानियों पर अपनी बात कह रही हूँ, वह भी मनोविज्ञान की छात्रा रही हैं. स्वाभाविक है लेखिका  सिनीवाली की कहानियों में मनोविज्ञान एक विशेष पहलू है  और मैं भी वहाँ पात्रों के मनोविज्ञान को ही समझती रही.  कहानी संग्रह ‘ हंस अकेला रोया’ कुल 8 कहानियां हैं, लगभग सभी कहानियां ग्रामीण परिवेश में घटित हैं.

शीर्षक कहानी ‘हंस अकेला रोया में'  लेखिका ने समाजिक दवाब के साथ -साथ मनोवैज्ञानिक मनोदशा को भी बखूबी दर्शाया है.किस तरह से लोग समाज के बनाये भवंर जाल में फंसते जाते है.. विपिन के पिता के देहांत के बाद विपिन पर सामाजिक दवाब बनाया जा रहे है .दान-दक्षिणा से लेकर पंडित  के गौ दान और  फलाहार तक में कर्मकांड के पाखंड हैं.  इस लम्बी  कहानी का नायक बिपिन न चाहते हुए भी सामाजिक दवाब के आगे झुकता जाता है. होता यही है एक व्यक्ति के मानोविज्ञान को तय करने ,में समाज की बड़ी भूमिका होती है और यदि वह इस सामाजिक दवाब के खिलाफ अड़ जाता है तो उसकी इच्छाशक्ति महत्वपूर्ण हो जाती है, मजबूत इच्छाशक्ति है तो ठीक अन्यथा मनुष्य पराजित होता है. कहानी के अनुसार , ‘ विपिन कर्ज लेकर और पत्नी के गहने बेच कर इस सामाजिक कुप्रथा का निर्वाह करता है -पशु -पक्षी से लेकर आदमी तृप्त हो गया भोज खाकर. पर इस तृप्ति , प्रशंसा से क्या उसके परिवार का कर्ज उतर जाएगा या उसके परिवार को भूखा नही रहना पड़ेगा ? श्राद्ध के बाद उसकी सबसे बड़ी चिंता है कि कैसे चुकायेगा वह कर्ज’. मुझे यह कहानी पढ़ते हुए लगा कि एक ओर तो  कहानी का नायक सामाजिक मनोविज्ञान और दवाब के आगे घुटने टेक देता है, दूसरी ओर कहानी भी उसके जद्दोजहद को दिखाने के अलावा कोई  ख़ास आदर्श स्थापित नहीं कर पाती हैं, कहानी के अंत में श्राद्ध  का विरोध नहीं होता है बल्कि शास्त्र की दलील देकर श्राद्ध की अनिवार्यता ही सिद्ध करती है. कहानी का अंत है, ‘ जबकि शास्त्र भी कहता है कि कर्ज लेकर श्राद्ध नही करनी चाहिये पर धर्म के नाम पर ही कहाँ सुनता है समाज, शास्त्र और रामायण की बाते और बिपिन के आंसू....’


'उस पार '  कहानी में लेखिका ने बिहार के ग्रामीण परिवेश को बखूबी दर्शाया है. एक पिता किस तरह आर्थिक तंगी के कारण पैसे के अभाव में अपनी बेटी का  विवाह वित्तरहित किरानी से कर देते हैं  हमारे समाज में बेटी को बोलने का अधिकार नही दिया गया है.बेटी को सिर्फ सुनना ही है बोलना कुछ भी नही. खास कर  विवाह उपरान्त बेटी को मायके में बोलने का अधिकार ख़त्म हो जाता है इस कहानी में एक पिता के जीवन की असफलता ,आर्थिक स्थिति ,नीरसता को भी दर्शाया  गया है, साथ ही पिता के सम्पति में बेटी का कोई अधिकार नही होता है उसका न सिर्फ परिवार से गाँव समाज सबसे नाता टूटता है वो सबके लिए पराई हो जाती है.

पेंडुलम

'सिकडी कहानी'  में लेखिका ने स्त्री के आभुषण प्रेम के साथ - साथ सोना और सुखी जीवन के गठजोड़ को भी बखूबी बताया है स्त्री के लिए विपत्ति के समय जेवर ही सबसे बड़ा सहारा होता है . सिकडी कहानी में सिकडी को लेकर शक की सुई कई लोगों पर घूमती है और सोचने की प्रक्रिया शुरू होती है लेकिन अंत में इस बात पर आकर अटक जाती है कि आखिर सिकडी गई तो कहाँ गई .


'नियती' कहानी में लेखिका ने स्त्री के सामाजिक और मानसिक मनोदशा को बताया है इस कहानी में उन्होंने एक स्त्री के अपने पति के खो देने  का डर ,समाज  और संस्कार का डर और किसी  भी हाल में अपने पति की प्रतिष्ठा पर आंच न आने देने का डर ने सबकुछ जानते हुए  भी अपनी बहु के लिए न्याय के पक्ष में खडी नही होती  है और एक हद तक इन्ही सब कारणों ने विमला को भी मानसिक उत्पीडन सहते हुए  चुप रहने को विवश किया  है,  वही दूसरी ओर विमला जो एक ग्रामीण स्त्री है उसके  साहस को भी दर्शाता है कि किस तरह जब उसके गर्भ में पल रहे अनचाहे बच्ची को गिराने की बात जब उसकी  सास कहती है तो इस जुल्म के खिलाफ खड़ी हो जाती है.  खुद को दैहिक शोषण से बचा नहीं पाती है लेकिन अपनी बच्ची को किसी भी हद तक जाकर बचाना चाहती है.   इस समाज की झूठी मायाजाल ,कूरीतियाँ ,रीतिरिवाज के कारण बलात्कृत पुरुष( ससुर )के पक्ष में लोग खड़े हो जाते है और शोषित बहु (विमला) को झूठी ,पगली और मानसिक विक्ष्प्ता समझाता जाता है

'चलिये' अब कहानी में लेखिका  ने भौतिकवादी परिस्थितियों के आगे इंसान को घुटने टेकते हुए दिखाया है आज  व्यक्ति   पैसे के लालच में इस कदर अंधा हो गया है कि हर रिश्ते से विश्वास उठ गया है परमानंद बाबु की पत्नी के देहांत के बाद हर लोग उन्हें अपने साथ ले जाना चाहते है किन्तु जैसे ही पता चला कि उनके पास देने के लिए कुछ नहीं है सबने अपना-अपना रिश्ता तोड़ लिया अर्थात् व्यक्ति की  जैसे जैसे परिस्थितियों बदलती है व्यक्ति के साथ रह रहे लोगों के व्यवहार में परिवर्तन होते जाता है इसके अलावा इस कहानी में पत्नी-पति के प्रेम और बिछड़ने की मनोदशा को अच्छे तरह से दर्शाया है.उनके निश्छल प्रेम को बयाँ किया है परिवार के लोगों  द्वारा  अपमानित होनो के बाद भी घर छोड़ कर जाना नही चाहते है. उनको लगता है कि अगर वो चले गए तो उनकी पत्नी कहीं आकर उनका इन्तजार करेगी और उनके न रहने पर वे परेशान होंगी

घर कहानी में लेखिका ने आज के बदलते दौर में एकल परिवार के बढ़ते प्रचलन को दर्शाया है आज संयुक्त परिवार का दौर ख़त्म हो गया है अब बच्चे जैसे बड़े होते है वैसे ही घर की बंटवारे  की बात करते है. लोग अब हम से अलग होकर अपना घर बनाना चाहते है.

संग्रह पठनीय है. ग्रामीण भारत की कहानियों से जोड़ता है. बिना किसी नोस्टेल्जिया के गाँव के यथार्थ से जोडती है.

कहानी संग्रह : हंस अकेला रोका
लेखिका : सिनीवाली
प्रकाशक : बोधि प्रकाशन, 0141 2503989, 9829018087
प्रकाशन: 2016

समीक्षक मनोविज्ञान पढ़ाती हैं: संपर्क: manishamishra5559@gmail.com

स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह 'द मार्जिनलाइज्ड' नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. 'द मार्जिनलाइज्ड' मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.
आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
लिंक  पर  जाकर सहयोग करें    :  डोनेशन/ सदस्यता 

'द मार्जिनलाइज्ड' के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें :  फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें  उपलब्ध हैं. ई बुक : दलित स्त्रीवाद 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com
Blogger द्वारा संचालित.