कर्मानंद आर्य की कविताएँ

कर्मानन्द आर्य
कर्मानन्द आर्य मह्त्वपूर्ण युवा कवि हैं. बिहार केन्द्रीय विश्वविद्यालय में हिन्दी पढाते हैं. संपर्क : 8092330929

बलात्कारी कहाँ से आये थे द्रोपदी !

फँसी हुई
जैसे फड़फड़ाती है बंसी की मछली
वैसे फड़फड़ा रही है देह

मिट्टी होने का अर्थ
पानी होने का अर्थ
हवा होने का अर्थ
बदल रहा है धीरे धीरे

एक पति, दो पति, तीन पति
चार पति, पांच पति
क्या फर्क पड़ता है
कंचन काया के लिए

द्रोपदी चीखती है
मिट्टी होने के लिए
पानी होने के लिए
हवा होने के लिए

और देह छटपटाती है लगातार

लड़की

मैं खुद में ही जवान होती
एक भारतीय लड़की
जिसे सन्दर्भ की
शब्दार्थ की आशा नहीं

दोस्तों के संग-संग घूमना
बतियाना या छत पर जाना
सब पर ही हावी है
मेरा शारीरिक दोष

उपेक्षा अनदेखी के बीच खिली
मेरी अपनी ही जिन्दगी में
कितना अघुलनशील है
मेरा अपना ही अस्तित्व

बचपन को लेकर
नही है,
अतिरिक्त उच्छवास मेरे पास
न ही कोई स्पर्धा है
अपने ही छोटे भाई से
पर हाँ, मैं समझने लगी हूँ
मां की चिंतायें
इन दिनों माँ मुझे चुन्नी ओढ़ने को क्यों कहती है

देह

जिन्दगी का एहसास
अधूरेपन में खो गया
द्रष्टा और दृश्य
एकाकी हो गया

तुम्हारा शब्द
जिसको न मिल पायी पूर्णता
भावना की कोख
न उर्वर हो पायी
न बो पायी, शब्द बीज

प्यार पलता रहा
चलता रहा
अहर्निशं सेवामहे

तुमने जो पूछा था
यक्ष प्रश्न
देह का अर्पण क्या
प्रेम नही
मै सब जानता था,पर
तवायफ की देह!

शब्द वृत्त का आज भी
अपराधी हूँ

सीता स्वयंवर की तरह
मैंने शब्द चुना था
जिसे मेरे सिले होंठो ने
अचानक बुना था

शब्द दृश्य थे
हम द्रष्टा
था सत्य पर कड़वा

सच बोलो,
प्रिय बोलो
पर न बोलो
अप्रिय सच
जिसे
तब हमने जाना था
अब जी रहे हैं गीले अहसासों के साथ

चरित्रहीन

क्या तुम जानती हो/
चरित्रहीन होने का मतलब
शायद!
पर तुम्हारे सिवा/सब जानते हैं
अधूरे प्रेम की प्रस्तावना लिखना

तुम्हारे लिए 

धरती जो महकती है
लोबान की खुशबू से
घर जो कस्तूरी की गंध से भर आता है
वह कमरा जो महकता है
दुनिया के सबसे बेहतरीन इत्र से
चाहता हूँ तुम्हें देना
कई स्थाई सुख
जिसकी चाह में चिड़िया नाप आती है आसमान
पंडुको की टोली
एक दूसरे को लगा आती है गुलाल
एक दूसरे के पास जाकर पूछ आती है हाल चाल
देना चाहता हूँ तुम्हें वही चाँद

दुनिया की सबसे बेहतरीन किताबें
दर्शन और सौन्दर्यशास्त्र
जिन्होंने सिर्फ प्यार बांटा है
मैं तुम्हें ट्रेन देना चाहता हूँ
बहुत सारी खदाने, बहुत सारे उपनिवेश
तुम्हारी पसंदीदा मणिपुरी साड़ी
यानी की सारे भौतिक संसाधन
अपने सारे खेत जिसमें तुम्हारे नाम का पट्टा लिखा हो
महानगर विस्तार के इस चार बाई छः के कमरे में बैठा
सोचता हूँ
इतना सब पाकर तुम कितनी खुश होंगी !!!!!
जिन्दगी की संचित निधियां तुम्हें भी मिलनी चाहिए

मधुबनी पेन्टिंग्स

विदा होते वक्त/
उसने पूछा-
मुझे याद रखोगे हमेंशा ?
मैंने/ उसे विदा कर दिया/
और/भूल गया/ बचपन/
अपना भी / उसका भी

पहली बार वह ससुराल से लौटी/
तो साथ ले आयी/अपना घर/
घर के साथ आयी मधुबनी पेन्टिग्स्
फिर भाव को विस्तार मिला/
वह दीवार पर टांग दी गई/

दुनिया इन दिनों स्याह है

देह की गिरहें उठाऊं तो
फफोलों पर गवाही देता है मन
अकाल का सारस दुर्दिन में बढ़ा लेता है दुःख
दर्द रिसता है, लोहित होता है लहू
यहाँ मन की बात कौन सुने
कोई है भी तो नहीं
जिसे लगा सकूं आवाज
जिससे दिल के तार जोड़ सकूं
जिसपर चीख सकूं जी भर, फिर मांग लूँ मुआफ़ी
अकाल के दिन हैं

भूख भूत हुई जाती है
अकेलापन डसने लगता है
निराशा में भर आता है मन
कुंठा का ताल लबालब उतिराता है
पसीजती हैं मुट्ठियाँ
दूर दूर तक एक चिड़िया पर नहीं मारती
पंडुको की तरह जबान सिल
तरणताल में गोते लगाता है एक अजनबी मन
राततीन बजे तक किसी चाँद का इन्तजार
जो पिछले कई दिनों से
किसी पथिक की तरह भटक गया है जंगल में
करता हूँ इन्तजार
एक बड़ा पत्थर रख लिया है सीने पर
मन है कि गिरहें तोड़ता है
फफोलों से भरती जाती है रात
स्याह रात !!!!!!

तुम भी हो!
इन दिनों तुम्हें भी फुरसत कहाँ है

लिखो

कवि प्यार से मत छुओ
उस औरत को

मत निहारो उसकी जंघाओं में
उपजा हुआवनपाखी

उसे मत बताओ
अजन्ता कला का एक नमूना मात्र

स्त्री जो तुम्हारे पड़ोस में
जल उठी उस रोज
उसके बारे में भी लिखो

कविता ने स्त्री को पतनशील बनाया है
स्त्री देह से आगे की चीज है
लिखो.........मैथ....साइंस......

तुम्हारी दो तस्वीरें 

मेरे पास तुम्हारी दो तस्वीरें हैं
हमेशा की तरह
एक थोड़ी खंडित है
थोड़ी नाराज सी
थोड़ी ढुलमुल
पलाश के फूल सी जो है दूसरी
ढीठ बहुत कोमल
ले लेती है जान
खुद को उन्हीं फोटुओं में चिपकाये हुए
मैं विचरता हूँ
एक देशांतर से दूसरे देशांतर
बिना यह परवाह किये हुए
तुमने आज रोटी खाई कि नहीं
तुम आज स्कूल गईं की नहीं
बाबू सच कह रहा हूँ
ये दो ही तस्वीरें हैं
इस धरती पर सबसे अकेली
सब से अलहदा
जोगनिया सी
जो बार बार आँखों में खुलती हैं
और घुल जाती हैं आँखों में
बार बार

तुम्हारे शहर से वापस आकर 

इस काली अँधेरी रात में
तुमसे नाभिनाल का जुड़ना
चरम तक पहुँचना
और वापस चले आना, जहाँ से शुरू किया था फिर वहीँ
फिर तुमसे जुड़ना, फिर वापस आना
ऊष्मा से भरी किसी बर्फीली गुफा में एक दो रोज
किसी थके हुए पथिक सा सुस्ताना
सोचता हूँ क्या यही है प्यार

देह के भीतर देह को महसूस करना
जीवन की एक लम्बी श्रृंखला का राही होना
मैंने ऐसे जी ली
भटकाव और अनंत में किसी योगी सा ध्यानस्थ
ढूंढ़ता हुआ तुम्हें
सोचता हूँ क्या यही है प्यार

रात का गहराना
जब और गहरा रही है रात
जब नाभिनाल विखंडित हो रहा है

मैं पुनः एक लम्बी यात्रा पर निकल पड़ा हूँ

सोचता हूँ तब
क्या यही है प्यार

उधार की कोख

आओ देवी! स्वागत !!
स्वागत !!
ममत्व भरी इस रात में
पहरेदारों के बीच
खेल रहे इस बच्चे कि तरफ से
तुम्हारा स्वागत!
स्वागत !!

तुमने उधार दी गर्भ की चाहत
ममत्व का सुख दिया बंध्या रात को
अपने हाथ से छुआ तुमने
कोमल, मांसल भ्रूण
रात ने महसूस किया
कोई टहलता है उसके भीतर
उससे बतियाता है
दिलाता है अहसास

गंधक सुलगती थी
तूतिया नीली हो जाती थी सांझ
गुबार भर आता था भीतर
कहते हैं जम आई थी
तुमने नोच फ़ेंक दिया
व्यंग्य की तीखी चर्बी

तुमने माँ बनाया है !
कोमल भाव भरे हैं
तुमने माँ होने का अहसास दिया है
स्तनों में उडेला है दूध
स्वागत ! स्वागत! स्वागत
स्वागत जननी !!

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