मध्यकालीन ब्रजभाषा काव्य और स्त्री रचनाकार

आरती रानी प्रजापति
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में हिन्दी की शोधार्थी. संपर्क : ई मेल-aar.prajapati@gmail.com

सभ्यता के प्रारम्भ से ही दलित और स्त्री दोनों को समाज के दोयम दर्जे पर रखा गया है. ऐसे में इन दोनों वर्गों का पढ़ा-लिखा होना कैसे संभव हो सकता है? ब्राह्मणवादी, पुरुषसत्तात्मक सोच यही कहती है कि यह दोनों वर्ग कभी कुछ नहीं कर सकते. समाज में स्त्री-दलित दोनों को कम आंका जाता है. स्त्री की अस्मिता पर लगातार प्रहार किया जाता है, जिससे वह अपने को घर में बंद कर ले. स्त्री के विरुद्ध होने वाले शारीरिक, मानसिक अपराध इसी मानसिकता की देन हैं. साहित्य में भी यही धारणा रही है कि स्त्रियाँ कुछ नहीं कर सकतीं. किसी के लिए उपलब्धि के सारे अवसर बंद कर के यह धारणा बना लेना बहुत सरल काम है. किन्तु समाज की इस मानसिकता को भी स्त्रियों ने चुनौती दी है.

आज तक का लिखा गया साहित्य सवर्ण पुरुषों की देन है. यह गाथा हमारे इतिहास ग्रन्थ ही हमें बताते हैं. किन्तु क्या ऐसा संभव है कि स्त्रियों ने कभी कुछ रचा ही न हो? लोक साहित्य को जन्म देने और उसे आगे बढ़ाने का काम स्त्रियों ने ही किया है.घर-बाहर के कामों में व्यस्त स्त्रियाँ कार्यों के साथ ही कुछ न कुछ सृजन करती थीं. कामों में लगी स्त्रियों ने काम के साथ-साथ कई गीतों की रचना की जिनमें स्त्री समाज देखने को मिलता है. उनकी पीड़ा, अभिलाषाओं की अभिव्यक्ति मिलती है. ऐसे कई गीतों को अलग-अलग लोगों ने लिपिबद्ध करने की कोशिश की. हम जानते हैं कि लोक साहित्य की परम्परा को विकसित करने वाली स्त्रियाँ ही है. क्या लिखित साहित्य में भी ऐसा कुछ है जो स्त्रियों द्वारा लिखा गया?सावित्री सिन्हा कहती हैं कि:

‘सम्वत् 1000 से लेकर आज तक के विशाल साहित्य पर स्त्रियों की देन का प्रभुत्व है ऐसा तो नहीं कहा जा सकता; किन्तु वह अनुमान के अनुसार हीन भी नहीं है.’1

समाज में स्त्रियों को बोलने की आजादी नहीं है और यदि किसी तरह वह बोलती हैं तो उसे महत्वपूर्ण नहीं माना जाता. साहित्य इतिहास में स्त्रियों का न होना इस बात की ओर इंगित करता है. कुछ इतिहासकारों ने ऐसी विदुषियों के नामों का उल्लेख किया है जिनका स्त्री-साहित्य के आरम्भ के लिए महत्वपूर्ण योगदान माना जा सकता है. स्त्री द्वारा रचा गया साहित्य अधिकतर श्रुति परंपरा में ही मिलता है, वजह स्त्री को शिक्षा से दूर रखा जाना. वैदिक समय में कुछ विदुषियों के नाम स्मृत इतिहास में दर्ज हैं, जिनमें “रोमशा, लोपामुद्रा, श्रद्धा, कामायनी, यमीवैवस्वती, पौलोमी शची, विश्ववारा, अपाला, घोषा, सूर्या, शाश्वती, ममता एवं उशिज आदि ऋषिकाओं के नाम मन्त्र-द्रष्टा के रूप में प्राप्त होते हैं.”2

बौद्धकाल में वह स्त्री-पुरुष जो बुद्ध की शरण में गए उनके लेखन को थेर गाथा (पुरुष रचना), थेरी गाथा (स्त्री रचना) कहा गया. बौद्धकालीन समय से ही स्त्री रचनाकार अपनी उपस्थिति साहित्य में कराने लगी थीं.

विमलकीर्ति लिखते हैं- “थेरीगाथा में भगवान बुद्ध की समकालीन भिक्खुणियों के जीवनानुभव उन्हीं की वाणी में व्यक्त अभिव्यक्ति का अनुपम संग्रह हैं. थेरीगाथा काल के पहले भारतीय इतिहास में नारी को अपनी व्यथा को इतनी स्वतंत्रता के साथ प्रकट करते नहीं देखा जा सकता| वास्तव में थेरीगाथा नारी स्वतंत्रता को प्रकट करने वाला प्रथम ग्रन्थ है.” 3

उनकी आवाज को पुरुषवादी, ब्राह्मणवादी साहित्यकारों ने दबा दिया| कुछ-एक रचनाकार ऐसे हुए हैं जिन्होंने इन स्त्रियों के महत्व को समझा और इन रचनाओं का संग्रह किया. इसे भी दुर्भाग्य ही कहेंगे कि यह रचनाएं आज भी अपने प्रकाशन के इन्तजार में किन्ही-किन्ही पुस्तकालयों में रखी हुई अपनी अंतिम अवस्था में पहुँच चुकी हैं.


साहित्य के मध्यकाल में लिख रहीं स्त्रियाँ अपने आप में एक आश्चर्य पैदा करती हैं. उस समाज में स्त्रियाँ घर में बंद थीं| ऐसा कुछ नहीं था जिसके माध्यम से वे अपने मन की अभिव्यक्ति कर पातीं. वह ऐसा समय था जब राजमहल में रहने वाली मीरा को भक्ति करने तक का अधिकार समाज नहीं देता. मीरा अपने अधिकार के लिए लड़ाई इसलिए भी कर सकी क्योंकि वह राजघराने से थीं. मीरा के समान ऐसी बहुत सी स्त्रियाँ उस समय में रहीं होंगी जो भक्त होना या अपने अधिकारों को पाना चाहती थीं पर समाज ने उनको ऐसा नहीं करने दिया.मध्यकालीन साहित्य में लिख ब्रजभाषा में लिख रही स्त्री रचनाकारों के नाम हैं- मीरा, ताज, प्रवीनराय, रारिक बिहारी, दयाबाई, सुन्दर कुंवरी बाई, प्रताप कुंवरी बाई, सहजोबाई आदि.

इन कवयित्रियों ने सहज भाषा का प्रयोग किया| जो जैसा है उसे बिना लाग-लपेट के इन कवयित्रियों ने प्रस्तुत किया. अधिकतर ये कवयित्रियाँ कृष्ण प्रेम में डूब कर काव्य रचना कर रही थी| मीरा कहती हैं

पिय इतनी विनती सुण मोरी, कोई कहियो रे जाय
औरन सूं रस-बतिया करत हौ, हमसे रहे चितचोरी
तुम बिन मेरे और न कोई मैं सरनागत तोरी

अधिकतर स्त्री रचनाकार कृष्ण की उपासक हैं- मीरांबाई, वीरां गंगाबाई, सोन कुंवारी आदि. कुछ कवयित्रियाँ शृंगार काव्य की भी रचना करती हैं जैसे-प्रवीनराय पातुर, रूममती बेगम, शेख, तीन तरंग आदि. इन  रचनाकारों ने कृष्ण काव्य और शृंगार काव्य को प्रमुख रूप से क्यों अपनाया जबकि वहां रामभक्ति और सूफी काव्य भी उपलब्ध था. क्या इसकी एक वजह सामाजिक तौर पर स्त्रियों का शोषण है? क्या उन्हें समाज स्वतंत्रता नहीं देता कि वह अपने अधिकारों, घर से बाहर निकलने की सोचें भी, इसलिए सोलहवीं सदी की स्त्री रचनाकार कृष्ण काव्य को अपनाती हैं? यथा-

“कृष्ण काव्य में कृष्ण का परम सुन्दर और सरस रूप ही लिया गया है, वे परम मनोहर और परम प्रेमी तथा शीलवान नायक के ही रूप में विशेषतया चित्रित किये गए हैं. उनका प्रेम यद्यपि लौकिक होता हुआ अलौकिक रहा है साथ ही अन्य भावों के साथ कृष्ण भक्ति में दाम्पत्य अथवा माधुर्य भाव की ही विशेषता रही है यही सब ऐसे प्रमुख कारण हैं जिन्होंने हमारी बहुत सी देवियों को कृष्ण काव्य की ओर समाकृष्ट कर उन्हें उसकी ही सुधा धार में निमम कर रक्खा था.”4

कृष्ण के प्रेम में पड़कर ताज कवयित्री अपने धर्म तक को छोड़ देने से नहीं चुकती| प्रेम जीवन का ऐसा तत्व है जो स्त्री को स्वतंत्रता देता है. और प्रेम यदि ईश्वर से ही हो जाए तो मनुष्य सब छोड़ ही देता है. ताज कहती हैं-

नन्द के कुमार, कुर्बान ताणी सूरत पर,
हौं तो तुरकानी हिन्दुआनी ह्वौ रहूँगी मैं

मीरां की तरह प्रताप बाला ने भी कृष्ण भक्ति को अपनाया और उसके प्रेम में रंग करा अपने को धन्य माना साधारणत: इनकी रचनायें अच्छी हैं, और उनमें इनकी भक्ति-संलग्नता दिखाई देती है. वे लिखती हैं

 सखी री चतुर श्याम सुन्दर सों मोरी लगन लगी री
लाख कहो अब एक ण मानूं उनके प्रीति पगी री 5



ऐसी मान्यता है कि पुरुषों ने ही चारण कार्य किया है किन्तु मध्यकालीन साहित्य में उपस्थित झीमा इस धारणा को खारिज करती हैं. सावित्री सिन्हा अपनी पुस्तक मध्यकालीन हिन्दी कवयित्रियाँ में लिखती हैं-

“झीमा की कहानी उस अंधकारमय नारी के इतिहास में जुगनू की चमक की भाँति दिखाई देती है. कई युद्धों के अवसर पर उसने चारिणी का कार्य किया. कला और सौन्दर्य की कोमलता में राजनीति और युद्ध की कटुता मिलाकर उसने एक नई भावना को जन्म दिया.”6

सोलहवीं सदी के साहित्य को ध्यान से देखा जाए तो उसमें स्त्रियों द्वारा ऐसे अनेक काम मिलेंगे जिसके लिए पुरुष ही स्वीकार किए जाते हैं. कई रचनाएं ऐसी भी हैं जिस पर रचनाकार ने अपनानाम नहीं दिया. पुरुष रचनाकार के साथ ऐसी समस्या नहीं ही होती. वे या तो अपनी रचना पर अपना नाम स्वयं लिख देते हैं या उनके पदों में उनके नाम का उल्लेख होता है. स्त्री रचनाकार ऐसा नहीं कर पाती| पद ही उनके स्त्री अस्तित्व का बोध करवाते हैं. इन रचनाकारों ने कृष्ण-राम-शृंगार को अपना काव्य विषय बनाया.

साहित्य में आलम के साथ शेख का नाम भी लिया जाता है. शेख ने बहुत नहीं लिखा उनका कोई अलग गांठ प्राप्त नहीं होता पर आलम की रचनाओं के साथ उनकी रचना संययुक्त रूप से देखी जा सकती है. कई विचारक मानते हैं की शेख नाम की कोई रचनाकार हुई ही नहीं है. ऐसा कहना स्त्री के अस्तित्व को पूरी तरह नकार देना है. स्त्री है इसलिए उसे सिरे से खारिज कर दो क्या ऐसा किसी पुरुष के साथ भी किया जाता है? शेख की रचना उनकी प्रतिभा का प्रमाण हैं. इसलिए आलम जैसे कवि भी शेख के कायल हुए बिना नहीं रह सके.

शेख के लिए करुना शंकर शुक्ल कहते हैं-शेख कविता में किसी से आगे नहीं, तो बहुत पीछे भी नहीं दिखाई देती. इनके स्त्री ह्रदय ने कही-कहीं नायिकाओं के वर्णन में बहे अनूठे चमत्कार का प्रदर्शन किया है. नायक नायिकाओं के प्रेम को जागृत करने के लिए शेख ने जिन उक्तियों का आश्रय लिया है, वे सजीव होने के साथ ही साथ चमत्कार-पूर्ण भी हैं. भेल ही शेख की कविता में शीमित कल्पना हो, किन्तु शेख में अपने ह्रदयगत भावों को कविता में प्रस्फुटित करने की सफल शक्ति अवश्य थी.


पुरुष कवियों ने भरपूर मात्रा में नख शिख अंगों का वर्णन किया है.  पर खोज बताती है किमध्यकाल की स्त्री रचनाकार भी इस कार्य में पीछे नहीं थी. सीता के नेत्रों का वर्णन रघुराज कुंवरी कुछ इस तरह करती हैं.
मृग-मनहारे, मीन खंजन निहारि वारे, प्यारे रतनारे कजरारे अनियारे हैं.

ब्रजभाषा काव्य की प्रमुख कवयित्रियों में दयाबाई और सहजो बाई का नाम भी आता है इन्होंने भक्ति के पद लिखे| दयाबाई के लिए करुणाशंकर शुक्ल लिखते हैं- वे ईश्वर प्रेम और उसकी पीड़ा में इतनी डूबी हुई दिखाई देती हैं, की उन्हें उसके आगे संसार की क्या, अपना भी ध्यान नहीं है. यथा :

दया प्रेम प्रगट्यो तिन्है, तन की तनि न संभार 7  

संत कवयित्रियों ने कबीर आदि संत कवियों की भांति गुरु की महिमा का वर्णन अपने काव्य में किया. सहजो कहती हैं-

‘सहजो’ गुरु दीपक दियौ, रोम रोम उजियार
तीन लोक द्रष्टा भयो, मिट्यो भरम अंधियार||8  

इस सभी कवयित्रियों से अलग प्रवीण राय हैं. अधिकतर कवयित्रियों की भाषा जहाँ सहजता  लिए हुए है वहीं प्रवीण की भाषा में काव्य शास्त्र के सारे तत्व मौजूद हैं. प्रवीण राय की भाषा दरबारी कवियों जैसी है. कारण वह दरबार में रहने वाली स्त्री थी. ‘उनकी कविता की शब्द योजना और भावों को परिस्फुटित करने वाली उनकी उपमाओं को देखकर यह कहना पड़ता है, कि प्रवीन राय काव्य के अंगों से भली भाँति परिचित थीं, और उनमें भावों को प्रगट करने की पर्याप्त क्षमता थी. ’ 9

विनती राय प्रवीन की, सुनिए साह सुजान||
जूठी पतरी भखत हैं, बारी-वायस, स्वान|| 10

एक ओर कवयित्रियों ने ईश्वर की उपासना की है तो, दूसरी ओर पति को परमात्मा मानने वाली स्त्रियाँ भी मध्यकाल में हुई. आज नारीवादी विमर्श के कारण हम इस बात को भले ही न समझे पर एक स्त्री के लिए खासकर मध्यकालीन स्त्री केलिए जहाँ परकियाओं की पूरी कतार है अपना पति चाहे जैसा हो अच्छा ही होगा.आज समाज हमें विकल्प प्रस्तुत कर रहा है लेकिन तब अधिकतर स्त्रियों के पास पति का कोई विकल्प नहीं था| रानी रघुवंश कुमारी लिखती हैं

पग दाबे ते जीवन-मुक्ति लाही|
विष्णु पद  सैम पति पद-पंकज छुवत परम पद होवे सही 11



हिन्दी साहित्य के इतिहास में सिर्फ  मीरां, महादेवी का नाम लिया जाता है. जबकि सिर्फ मध्यकाल में ऐसी बहुत सी कवयित्रियाँ हैं जो लिख रही थी. उन्होंने क्या लिखा, कैसा लिखा यह अलग विषय है लेकिन प्रत्येक साहित्य को समान सौन्दर्य के प्रतिमानों पर नहीं उतार सकते. सबकी अपनी विशेषता और जरुरत होती है और जब लिखने वाले भी पुरुष आलोचक भी वही तो सोचने की जरुरत है की किसे साहित्य में वो स्थान दे रहे हैं किसे नहीं. मध्यकालीन साहित्य में यदि सिर्फ ब्रजभाषा की बात की जाए तो बहुत सी स्त्रियाँ लेखन करती मिल जायेंगी. जरूरत है की उन स्त्रियों पर काम किया जाए उनके यदि एक पद भी उपलब्ध होते हैं तो उसका भी मूल्य समझा जाए.

संदर्भ सूची
 1.मध्यकालीन हिन्दी कवयित्रियाँ- सावित्री सिन्हा, पृष्ठ-2  
 2.हिन्दी साहित्य का आधा इतिहास, पृष्ठ-18 
 3.थेरी गाथा, सम्पादक और अनुवादक-डॉ विमलकीर्ति, पृष्ठ-3    
 4.हिन्दी काव्य की कलामयी तारिकाएँ, पृष्ठ-3 
 5.वही-पृष्ठ-85
 6.मध्यकालीन हिन्दी कवयित्रियाँ-पृष्ठ 28
 7.हिन्दी काव्य की कलामायी तारिकाएँ-52 
 8.वही- 49 
 9.मध्यकालीन हिन्दी कवयित्रियाँ पृष्ठ-24  
 10.वही, पृष्ठ-27 
 11.हिन्दी काव्य की कलामयी तारिकाएँ- पृष्ठ-88 

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