सुधा अरोड़ा की कहानियाँ :स्त्री नारी अस्मिता की संघर्ष-गाथा


पूर्णिमा रानी
प्रस्तावना
“हे स्त्री ! तू स्वयं को पहचान, तू सिंहस्वरूपा है। तू शत्रु रूपी मृगों का मर्दन करने वाली है। स्वयं में सामर्थ्य उत्पन्न कर। हे नारी ! तू अविद्या आदि दोषों पर सिंहनी की तरह टूटने वाली है। दिव्य गुणों के प्रचारार्थ स्वयं को शुद्ध कर। हे नारी ! तू दुष्कर्म एवं दुर्व्यसनों का सिंहनी के समान विध्वंस करने वाली है। धार्मिक जनों के हितार्थ स्वयं को दिव्य गुणों से अलंकृत कर।”1

यजुर्वेद के पाँचवें सूक्त के दसवें मंत्र का उक्त उद्बोधन इस तथ्य की ओर संकेत करता है कि भारतीय संस्कृति में वैदिक युग से ही नारी महत्त्वपूर्ण भूमिका में थी। धार्मिक कर्मकाण्ड हो या शिक्षा का क्षेत्र, सामाजिक संस्कार हो या परम्परागत आयोजन, नारी को प्रत्येक क्षेत्र में विशिष्ट स्थान प्राप्त था। स्त्री के कर्तव्य एवं अधिकार पुरुषों के समकक्ष थे। सिन्धुघाटी सभ्यता से प्राप्त मातृदेवी की मूर्तियाँ, वैदिक मंत्र एवं पौराणिक आख्यान नारी के शक्तिशाली तथा दैवीय स्वरूप को व्याख्यायित करते हैं। पौराणिक पुरुष राम शत्रु पर विजय प्राप्त करने हेतु शक्ति का आह्वान करते हैं और शक्ति के सहयोग से ही शत्रु पर विजय प्राप्त कर पाते हैं.


स्त्री की इस प्रतिष्ठित सामाजिक स्थिति में परिवर्तन का संकेत पहले-पहल महाभारत काल में देखने में आता है जहाँ परम्पराओं व रूढ़ियों में उलझी द्रौपदी सहधर्मिणी नहीं वरन् व्यक्तिगत संपत्ति है जिसे निस्संकोच दाँव पर लगा दिया जाता है। मध्ययुगीन समाज में नारी की दशा अपेक्षाकृत अधिक शोचनीय हो गई। अब उसके हिस्से में अधिकार के नाम पर मात्र दासता थी और कर्तव्य के नाम पर पुरुष व परिवार की सेवा। उन्नीसवीं शताब्दी तक आते-आते नारी मानवी से उपभोग की वस्तु बन गई। अपनी शारीरिक दुर्बलता और पितृसत्तात्मक समाज की अहंवादी सोच के कारण नारी की जीवन-यात्रा सामाजिक बन्धनों, कठिनाइयों तथा शोषण के दौर से गुजरी।

स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् विभिन्न नारी-सुधारवादी आन्दोलनों के प्रयासों तथा शिक्षा के प्रचार-प्रसार के कारण समाज और विशेष रूप से नारी वर्ग की सोच में क्रान्तिकारी परिवर्तन आया। विरोधों के मकड़जाल से संघर्ष करती नारी अब ताल ठोककर नारी-अस्मिता के रक्षार्थ प्रयास करने लगी। यह प्रयास समस्त नारी-वर्ग के लिए एक जागरण गीत बन गया। चूँकि, साहित्य समाज सापेक्ष होता है, इसलिए बदलते परिवेश में वह नारी विषयक दशा में परिवर्तन की उपेक्षा नहीं कर सका तथा इस चुनौती का सामना करने के लिए तत्पर हो गया। नारी के उत्पीड़न तथा संघर्ष ने साहित्यकारों को उद्वेलित कर दिया। उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से नारी की स्वाधीनता व पराधीनता से जुड़े रहस्यों पर से पर्दा हटाते हुए पुरुष-प्रधान समाज में नारी की वास्तविक स्थिति और उसमें नारी की भूमिका पर साफगोई के साथ अपने विचार प्रकट किए।

सातवें दशक की कथा लेखिका सुधा अरोड़ा ने स्त्री-जीवन के विविध पक्षों को बड़ी संवेदनशील दृष्टि से देखा, परखा और अत्यन्त सादगी के साथ अभिव्यक्त किया। “सुधा अरोड़ा की कहानियाँ स्त्री जीवन के किसी अनछुए कोमल पक्ष को अभिव्यक्त करती कर्णप्रिय लोकगीत-सी लगती है। ........ इन कहानियों में लेखिका ‘दर्दमंद’ स्त्रियों की दरदियाँ बनकर अगर एक हाथ से उनके घाव खोलती हैं तो दूसरे हाथ से उन्हें आत्मसाक्षात्कार के अस्त्र भी थमाती हैं जिससे ये स्त्रियाँ भावात्मक आघात और संत्रास से टूटती नहीं बल्कि मजबूत बनती हैं।”2


सुधा अरोड़ा ने समाज के वर्चस्ववादी केन्द्रों पर निशाना साधा। उन्होंने स्वयं के देखे व भोगे हुए यथार्थ को अपनी कहानियों में अभिव्यक्त किया मानो वह रचना नहीं वरन् आईना हो। अपने लेखन में सुधा अरोड़ा ने पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक, पारम्परिक व पितृसत्तात्मक व्यवस्था के मुद्दों एवं चुनौतियों को आधार बनाकर नारी-जीवन के प्रति चिन्ता प्रकट की और नारी-जीवन की विसंगतियों, आर्थिक स्वायत्तता, स्त्री-पुरुष अन्तःसम्बन्ध, परम्पराओं एवं आधुनिकता के द्वन्द्व को अपनी कहानियों के माध्यम से प्रस्तुत किया।

सुधा अरोड़ा के नारी-पात्र शिक्षित हैं, वे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर भी हैं किन्तु कहीं-न-कहीं अपने ही निर्णयों के प्रति असमंजस की स्थिति में है। उनकी कहानी ‘महानगर की मैथिली’ की नायिका चित्रा एक ऐसी नारी है जो अर्थसंघर्ष व ममता के बीच जूझती रहती है। मैथिली की देख-रेख के लिए अच्छी आया न मिलने के कारण चित्रा बार-बार नौकरी छोड़ने का विचार करती है किन्तु “हर बार महानगर का अर्थशास्त्र उसे मात दे जाता था।”3 यद्यपि चित्रा को यह दोहरा व्यक्तित्व व्यथित कर रहा था फिर भी उसका आत्मबल उसे टूटने नहीं देता।

परम्परागत पुरुष-प्रधान समाज में नारी एक मूक पशु की तरह जीवन जी रही है। ‘नमक’ कहानी की नायिका सिया अपनी इच्छा को कह नहीं पाती। सिया शिक्षित है और स्कूल में नौकरी करना चाहती है किन्तु उच्च पदस्थ साहब अपनी पत्नी को घर की चौखट लाँघने नहीं देना चाहते। वे कहते हैं – “स्कूल में नौकरी ? ..... तुम्हारे नाम से कंपनी खोल दी मैंने। मेरा दोस्त उस कंपनी का सब कुछ देखेगा। तुम्हें सिर्फ मालिक की तरह चेक दस्तखत करने होंगे।”4

एक ओर पितृसत्तात्मक समाज अपनी अहंवादी सोच से नारी जीवन को प्रभावित कर रहा है तो दूसरी ओर नारी-शोषण की सक्रिय एजेंट के रूप में नारी ही नारी की शत्रु बन बैठी है। वंश चलाने की धारणा ने एक ऐसा चक्रव्यूह रच दिया है जिससे नारी की मानसिकता उबर ही नहीं पा रही है। सुधा अरोड़ा की कहानी ‘बड़ी हत्या, छोटी हत्या’ में सास को जब दाई ने लड़की होने की सूचना दी तो “सास ने चिलम सरकाई और बँधी मुठ्ठी से अँगूठे को नीचे झटके से फेंककर मुठ्ठी खोलकर हथेली से बुहारने का इशारा कर दिया – ‘दाब दे’। .......... जैसा बोला वैसा कर। बीस बरस पाल-पोस के आधा घर बाँध के देवेंगे, फिर भी सासरे वाले दाण-दहेज में सौ नुक्स निकालेंगे और आधा टिन मिट्टी का तेल डाल के फूँक आएँगे। उस मोठे जंजाल से तो यो छोटो गुनाह भलो।”5

 ऐसी मानसिकता से स्वयं नारी प्रभावित है। सुधा अरोड़ा की कहानी ‘तीसरी बेटी के नाम – ये ठण्डे, सूखे, बेजान शब्द’ में सुनयना के जन्म पर बूढ़ी बुआ ने जैसे ही चद्दर हटाई तो अपनी कुत्सित मानसिकता का परिचय देती हुई बोली – “हाय मेरे रब्बा ! इक होर कुड़ी? बनाण वाले दे घर मिट्टी थुड़ गई सी ?”6 किन्तु सुनयना की माँ इन दकियानूसी बातों को ख़ारिज करती हुई कहती है – “बुआ, ऐसे मत बोल ! यह मेरी बेटी भी है और बेटा भी ! बेटा होता तो भी इतनी ही तकलीफ देकर, इतना ही खून बहाकर पैदा होता।”7


सुधा अरोड़ा ने अपने चारों ओर के परिवेश को समझा और प्रत्येक वर्ग की नारी को अपनी कहानियों में स्थान दिया। चाहे उच्च वर्ग हो, मध्यम वर्ग या सामान्य से निचले स्तर का वर्ग, सुधा अरोड़ा ने प्रत्येक तबके की नारियों के प्रति होने वाली हिंसा तथा प्रतिक्रियास्वरूप होने वाले संघर्ष को पाठकों के सम्मुख रखा। उनके अनुसार हिंसा सभी वर्गों की औरतों के साथ होती है। उच्च वर्ग में मौन रहकर मानसिक प्रताड़ना दी जाती है तो मध्यम और निम्न वर्ग में शारीरिक रूप से औरत को प्रताड़ित किया जाता है। सामान्य तौर पर संभ्रांत पति मामूली-सी बात पर पत्नी के प्रति व्यंग्य बाणों की वर्षा करता है और उसके बाद चुप्पी साध लेता है। उसका यह मौन-व्रत पत्नी के दिल व दिमाग को विचलित करने के लिए काफी होता है। सुधा अरोड़ा की कहानी ‘काला शुक्रवार’ एक धनाढ्य वर्ग के पति-पत्नी की कहानी है जहाँ दोनों में कोई आपसी सामंजस्य नहीं है। पत्नी ड्राइवर मिराज के साथ बाजार जाती है और वहाँ नगर में हो रहे दंगों में फँस जाती है। ड्राइवर के बुद्धि-कौशल से वह सकुशल घर लौट आती है किन्तु जब दिन-भर की बैचेनी और तनाव को पति के समक्ष व्यक्त करना चाहती है तो पति कहता है कि “तुम्हें वहाँ जाने की जरूरत क्या थी ........ आगे से ये सब एडवेंचर्स मत करना।”8 धनाढ्य वर्ग के पुरुष का यह अहंकार औरत के अन्तर्मन को आहत कर देता है।

जहाँ शिक्षित वर्ग में पुरुष द्वारा मानसिक हिंसा के उदाहरण देखने को मिलते है वहीं निम्न स्तर पर जीवनयापन करने वाली नारी शारीरिक हिंसा की भयावह स्थिति से जूझ रही है। हिंसक पुरुष अपनी तमाम कुंठाओं का विरेचन अपनी पत्नी पर करता है। सुधा अरोड़ा की कहानी ‘ताराबाई चाल : कमरा नंबर एक सौ पैंतीस’ के पति-पत्नी के बीच सम्बन्धों में एक ओर क्रूरता है तो दूसरी ओर घृणा। “हमेशा की तरह उसके मरद ने सहवास के बाद आदतन बीड़ी सुलगाई थी और आखिरी कश खींच कर उसके बाएँ वक्ष पर जलती सलाई-सा चुभो दिया था।”9

सुधा अरोड़ा का यह उद्देश्य कदापि नहीं है कि वे अपनी कहानियों के नारी पात्रों को पीड़ित, अबला या बेचारी बनाकर प्रस्तुत करें। उनके नारी-पात्र पारम्परिक हैं और दोहरी भूमिका का निर्वहन करना जानते हैं किन्तु जहाँ पीड़ाओं का अतिरेक होता है वहाँ वे विद्रोही स्वरूप में सामने आते हैं। ‘भागमती पंडाइन का उपवास यानी करवाचौथ पर भरवां करेले’ कहानी में परम्परा का निर्वाह करती भागमती जीवनपर्यन्त अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त नहीं हो पाती और अपने पति को परमेश्वर मानती है किन्तु जैसे ही पति-पत्नी के सम्बन्धों के मध्य सुमेधा का आगमन होता है और पांडेजी भागो से छल करते हैं तो भागमती उनकी हत्या कर देती है किन्तु उसे इसका कोई पछतावा नहीं है। वह जज साहब को कहती है – “बाकी ये बात बताओ ! सब कुछ बरदास करे का मेवा क्या मिला ? ये तो हमारे लिए ही सोच लिए – ना रही बाँस, न बजी बंसरी। आज नहीं तो कल, दूनों मिलकर हमरा काम तमाम कर देते। वो ही काम हमरे हाथ से हो गया तो कौन गुनाह हो गया ? बताओ साहेब ........ बताओ ........ बताओ ?”10

समाज का चाहे कोई भी वर्ग क्यों न हो ! छल हमेशा औरत के साथ होता ही है और इसका मुख्य कारण है प्रतिवाद की अनुपस्थिति। सुधा अरोड़ा अपने आलेख ‘सहनशील धारित्री का आत्मपीड़क आनन्द’ में कहती हैं – “एक औरत के संस्कार उसे सात फेरों की मर्यादा और गरिमा में इस कदर जकड़ लेते हैं कि वह बहुत-सा अनचाहा स्वीकार करती चलती है।प्रतिरोध वह तभी करती है, जब चीजें उसकी बर्दाश्त के बाहर चली जाती हैं।”11


सुधा अरोड़ा की कहानियों की नायिकाएँ जब अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए संघर्ष करती हैं, परिवार और विवाह का विरोध करती हैं तो वे केवल पुरुष-वर्चस्व से ही विद्रोह नहीं करती बल्कि परम्परा से चली आ रही तमाम बासी रूढ़ियों से भी संघर्ष करती हैं। ‘स्वप्नजीवी’ कहानी की नायिका ‘मित्रा दी’ आधुनिक नारी का प्रतिनिधित्व करती है। वैवाहिक जीवन के संस्कारों के प्रति उसके मन में आक्रोश है। वह कहती है – “हिन्दुस्तानी लड़कियों के दिमाग ही मजबूत नहीं होते। हुंह एकनिष्ठ बनती हैं। पूछो भला! वह उधर विदेशी लड़की के साथ गुलछर्रे उड़ा रहा है और यह उसके नाम को रो रही है। जिसके साथ इतने महीने ‘टेंशन’ में काट दिए उसके प्रति भावुकता ?”12 नारी धैर्य व साहस की प्रतिमूर्ति है किन्तु उसकी यह सहिष्णुता धीरे-धीरे विद्रोह में बदल रही है। ‘सत्ता संवाद’ कहानी की नायिका घर की तमाम जिम्मेदारियाँ निभाती है किन्तु नाकारा पति की जेब से जब प्रेम-पत्र मिलता है तो वह स्पष्ट कह देती है – “इसे कह दो, आने को तैयार है तो मेरी ओर से कोई रुकावट नहीं। आए संभाले तुम दोनों को। मेरी जान छूटे।”13 आधुनिक नारी पति के प्रेम-प्रसंग का पता लगने पर मजबूर होकर अपमानित होने की बजाय छल-छद्म से युक्त रिश्तों से मुक्ति चाहती है। वह अब उस पारम्परिक पत्नी-बोध से मुक्त हो गई है जिसमें केवल पतिव्रता धर्म ही उसके जीवन का सार था।

सुधा अरोड़ा की कहानी ‘अविवाहित पृष्ठ’ की नायिका सुधा वैवाहिक जीवन के बजाय अकेलेपन का जीवन जीने की प्रबल इच्छा रखती है। वह कहती है – “मेरा मन कई बार होता है कि इसी तरह अकेले-अकेले, चौरंगी भीड़ भरी शाम में अकेले घूम लें।”14  नारी स्वातंत्र्य की प्रबल समर्थक ‘अविवाहित पृष्ठ’ कहानी की नायिका सुधा न केवल पारिवारिक बन्धन से मुक्त होना चाहती है अपितु वह तो अपनी भावनाओं को डायरी में लिखते समय शब्दों की भी स्वतन्त्रता चाहती है। उसका मानना है – “हमारी भाषा ऐसी हो जिसमें अभिव्यक्ति के लिए शब्दों का सहारा न ढूँढना पड़े, भाव स्वतः अंकित होते चले जाएँ।”15 परिवर्तित युग प्रवाह में नारी का स्वरूप भी बदला है। कल तक स्वयं को सीता बनाने में प्रयासरत नारी आज आदर्शवादी बनकर कष्ट सहन करने को कमजोरी मानती है। ‘स्त्री-शक्ति की भूमिका से उठते कई सवाल’ आलेख में स्वयं सुधा अरोड़ा कहती हैं – “जाहिर है स्त्री की भूमिका भी बदली है और स्वरूप भी। अब सीता बेवजह अग्नि-परीक्षा देने के लिए तैयार नहीं है, धोबी के लांछन से वह घर छोड़ने से इन्कार करती है। स्त्री मुखर हुई है, उसकी शक्ति ज्यादा धारदार हुई है।”16

निष्कर्ष
आधी दुनिया कही जाने वाली आबादी आज भी संघर्ष के रास्ते पर है । स्त्री के अधिकारों का अधिकांश हिस्सा अभी भी पुरुषों के अतिक्रमण की त्रासदी झेल रहा है । इन स्थितियों में सुधा अरोड़ा की कहानियाँ संजीवनी का काम करती हैं । त्रिभुवन राय के शब्दों में, “सुधा अरोड़ा की चर्चित कहानियाँ सवाल ही नहीं उठातीं, मौजूदा विद्रूप के खिलाफ कारगर मुठभेड़ भी करती दीखती हैं । प्राप्त स्थितियों के दंश के चलते इनकी स्त्रियाँ रोती-कलपती नहीं, इसके विपरीत उनका इस तरह से मुकाबला करती हैं कि पाठकीय चेतना आन्दोलित एवं क्षुब्ध हुए बिना नहीं रहती । इस तरह सुधा अरोड़ा का स्त्री विमर्श यथार्थ का विस्फोटक चित्र ही उपस्थित नहीं करता, भविष्य के पथ को संकेतित करने के कारण आश्वस्त भी करता है।”17
सन्दर्भ सूची 
01. यजुर्वेद, सूक्त क्रमांक : 5, मंत्र क्रमांक : 10.
02. अरोड़ा, सुधा, बुत जब बोलते हैं (कहानी संग्रह), आवरण पृष्ठ, लोकभारती प्रकाशन, नई दिल्ली.
03. अरोड़ा, सुधा, रहोगी तुम वही (कहानी संग्रह), पृ.क्र. 22, रेमाधव पब्लिकेशंस प्रा.लि., नोएडा.
04. अरोड़ा, सुधा, एक औरत : तीन बट्टा चार (कहानी संग्रह), पृ.क्र. 49, बोधि प्रकाशन, जयपुर.
05. अरोड़ा, सुधा, 21 श्रेष्ठ कहानियाँ (कहानी संग्रह), पृ.क्र. 184, डायमंड पॉकेट बुक्स, नई दिल्ली.
06. अरोड़ा, सुधा, एक औरत : तीन बट्टा चार (कहानी संग्रह), पृ.क्र. 51, बोधि प्रकाशन, जयपुर.
07. वही, पृ.क्र. 51.
08. अरोड़ा, सुधा, काला शुक्रवार (कहानी संग्रह), पृ.क्र. 27, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली.
09. अरोड़ा, सुधा, एक औरत की नोटबुक (कथा विमर्श), पृ.क्र. 43, मानव प्रकाशन, कोलकाता.
10. अरोड़ा, सुधा, भागमती पंडाइन का उपवास यानी करवाचौथ पर भरवां करेले, बुत जब बोलते हैं, पृ.क्र. 114,          लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद.
11. अरोड़ा, सुधा, एक औरत की नोटबुक (कथा विमर्श), पृ.क्र. 46, मानव प्रकाशन, कोलकाता.
12. अरोड़ा, सुधा, काँसे का गिलास (कहानी संग्रह), पृ.क्र. 120, आधार प्रकाशन, हरियाणा.
13. अरोड़ा, सुधा, एक औरत : तीन बट्टा चार (कहानी संग्रह), पृ.क्र. 35, सुधा अरोड़ा, बोधि प्रकाशन, जयपुर.
14. अरोड़ा, सुधा, बगैर तराशे हुए (कहानी संग्रह), पृ.क्र. 69, इकाई प्रकाशन, इलाहाबाद.
15. वही, पृ.क्र. 71
16. अरोड़ा, सुधा, स्त्रीर शक्ति की भूमिका से उठते कई सवाल (विमर्श), स्त्रीकाल पत्रिका.
17. राय, त्रिभुवन, पीड़ित के पक्ष की कहानी, अंक : मार्च-अप्रैल 2009, पृ.क्र. 11, पुस्तक-वार्ता,                                म.गां.अं.हिं.वि., वर्धा.

पी-एच॰ डी॰ शोधार्थी, हिन्दी विभाग, जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय, जोधपुर, राजस्थान
संपर्क: Email address: poornima.rani19@yahoo.in

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