सुन्नत महिलाओं के पैदा होते ही कुचलने की मानसिकता है


 लेखिका: डा. नवल अल सादवी

प्रस्तुति एवं अनुवाद: सुधा अरोड़ा 

सामाजिक कार्यकर्ता और रचनाकार डॉक्टर नवल अल सादवी (हव्वा का पर्दानशीन चेहरा ) ने अपनी पुस्तक ‘द हिडेन फेस ऑफ ईव: वीमेन इन द अरब वर्ल्ड' में सुन्नत की क्रिया का दिल दहला देने वाला वर्णन प्रस्तुत किया है।

सुन्नत की अमानवीय प्रथा को समाप्त करने के लिए अन्तरराष्ट्रीय  स्तर पर कोशिशें की गई हैं। 1994 में काइरो में संपन्न अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन में यह स्वीकार किया गया कि महिला सुन्नत मानवाधिकार का उल्लंघन है और इससे महिलाओं के स्वास्थ्य और  जीवन  को खतरा है। कई देशों में इस प्रथा पर रोक लगाने के लिए कानून बनाए गए हैं !

गांव कप्र तहला में जन्मी लेखिका डा. नवल अल सादवी ने नी डाक्टरी की शुरुआत गांव की अनपढ़ औरतों के बीच ही की, उसके बाद वह काइरो अस्पताल और फिर पलिक हेल्थ की निदेशक रहीं। 1972 में अपनी पहली विवादास्पद पुस्तक ‘वीमेन एंड सेक्स’ के प्रकाशन के तहत उन्हें अपनी निदेशक के ओहदे से हटना  पड़ा और ‘हेल्थ पत्रिका के संपादन से भी  उन्हें हटा दिया गया। इसके बावजूद नवल अल सादवी का लेखन जारी रहा और उन्होंने औरतों की सामाजिक स्थिति, मनोविज्ञान और यौन संबंधी प्रश्नों पर लिखना जारी रखा। उनकी लिखी सभी पुस्तकों पर मिस्र, सऊदी अरब, सूडान और लीबिया में प्रतिबंध लगाया जा चुका है। लेबनान, बेरुत से उनकी पुस्तकों का प्रकाशन हुआ है।

 नवल अल सादवी

‘द हिडेन फेस ऑफ ईव’ सादवी की अंग्रेजी में अनूदित पहली पुस्तक है। आयरीन. एल. गेंजियर ने इस किताब की भूमिका में लिखा है, ‘कुछ किताबों की यह नियति होती है कि वे पढ़ते हुए आपको आनंद नहीं देती, उन्हें पढ़कर आप खुश नहीं हो सकते। इन किताबों की सार्थकता इसी में है कि उन्हें पढ़ते वक्त आपके भीतर पैदा हुआ घृणा, शर्म या गुस्से का भाव आपको बहुत बेचैन कर देता है।’

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सुन्नत की प्रथा: अरब देश की औरतें...

उस रात मैं छह साल की थी और अपने नर्म बिस्तर पर शांत और सुकून भरी नींद की उस खुमारी में थी जब जागने और सोने के बीच बचपन के गुलाबी सपने और खूबसूरत परियां पलकों पर तारी रहती हैं। उस नींद की खुमारी में मुझे लगा जैसे मेरे कंबल के नीचे अचानक कोई बड़ा-सा हाथ - ठंडा और रूखा - मेरे जिस्म पर कुछ टटोलता सा घूम गया है जैसे वह कुछ ढूंढ़ रहा हो। उसके साथ ही उतने ही बड़े और खुश्क हाथ ने मेरे मुंह को ढक लिया, होंठों से निकलती चीख को रोकने के लिए।

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वे मुझे उठाकर बाथरूम में ले गए। मुझे पता नहीं, वे सब गिनती में कितने थे, आदमी थे या औरतें, मुझे उनके चेहरे भी याद नहीं। मेरे सामने की पूरी दुनिया एक स्याह अंधेरे में कैद थी, जो मुझे देखने से रोक रही थी। मुझे बस इतना याद है कि मैं बेतरह डर गई थी और वे एक नहीं कई थे और मेरी हथेलियों, बांहों और मेरी जांघों पर उनकी पकड़ लोहे सी सख्त थी, जिसकी वजह से मैं हिल भी नहीं पा रही थी। मुझे अपने जिस्म के नीचे बाथरूम की ठंडी टाइलों का स्पर्श याद है, जिसके इर्द-गिर्द कई सारी फुसफुसाती आवाजें थीं, जिसे बीच-बीच में सान पर चढ़ाई जाती छुरी का स्वर तोड़ रहा था। मेरी बंद आंखों के सामने ईद का दिन कौंध गया, जब बकरे को जिबह करने से पहले कसाई अपने छुरे की धार तेज करता था।

मेरा खून मेरी पसलियों में जम गया था। मुझे लगा, मेरे घर में कुछ चोर घुस आए थे, जो मुझे मेरे बिस्तर से उठा लाए थे और अब मेरा गला काटने के लिए तैयार हो रहे थे। किस्सों-कहानियों में सुनी हुई बिल्कुल अपने जैसी उस बागी लड़की की तरह, जिनके किस्से मेरी गांव की दादी मां बड़े प्यार से मुझे सुनाया करती थी।
उस लोहे के औजार की घिसघिसाहट सुनने के लिए मैंने अपने कानों पर जोर डाला। जैसे ही वह आवाज रुकी, मेरे दिल ने उसके साथ ही धड़कना बंद कर दिया था। मैं देख नहीं पा रही थी और मेरी सांस भी उसके साथ ही थम गई थी, लेकिन मैं महसूस कर रही थी कि लोहे का वह औजार धीरे-धीरे मेरे बहुत नजदीक आ रहा था। उन सख्त हाथों का दबाव जरा भी ढीला नहीं पड़ रहा था और मुझे लगा अब वह तेज किया हुआ छुरा सीधे मेरे गले की ओर बढ़ रहा है, लेकिन वह मेरी गर्दन की ओर नहीं, पेट पर नीचे की ओर मेरी जांघों के बीच जैसे कुछ ढूंढ़ता सा बढ़ रहा था। उसी पल मैंने महसूस किया कि मेरे दोनों पैरों को, जांघों को और निचले हिस्से को जितना चौड़ा खींचा जा सकता था, खींच दिया गया था, फिर अचानक छुरे की तेज धार मेरी जांघों के बीच गिरी और मेरे शरीर से मांस का एक टुकड़ा अलग होकर जा पड़ा।


अपने मुंह पर पड़ी हथेली के सख्त दबाव के बावजूद मैं दर्द से बेइंतहा चीखी, क्योंकि वह दर्द सिर्फ दर्द नहीं था, जैसे आग की एक तीखी लपट मेरे पूरे शरीर को चीरती हुई मेरे भीतर से गुजर रही थी। कुछ पलों के बाद मैंने देखा, मेरे कूल्हों के आसपास खून का तालाब बन रहा था।

मुझे नहीं मालूम था, मेरे शरीर में से उन्होंने क्या काट डाला था। मैंने इसे जानने की कोशिश भी नहीं की। मैं सिर्फ रो रही थी और अपनी मां को मदद के लिए चीख-चीख कर पुकार रही थी और मुझे सबसे गहरा सदमा पहुंचा, जब मैंने अपने आसपास देखा और पाया कि मां मेरी बगल में खड़ी थी। हां, यह मेरा वहम नहीं था, वह मेरी मां ही थी, अपने हाड़-मांस के साथ, उन अजनबी औरतों के ठीक बीचोबीच, उनसे बतियाती और मुस्कुराती जैसे अभी कुछ मिनटों पहले उनकी बेटी को जिबह करने में उनकी कोई हिस्सेदारी न रही हो।

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वे मुझे उठाकर बिस्तर तक ले गए। मैंने देखा, अब वे मेरी बहन को, जो मुझसे दो साल छोटी थी, बिल्कुल उसी तरह उठाकर ले जा रहे थे, जैसे वे मुझे ले गए थे। मैं अपनी पूरी ताकत के साथ चिल्लाई - नहीं, नहीं। मैं उन बड़े-बड़े सख्त हाथों के बीच अपनी बहन का मासूम चेहरा देख रही थी। एक क्षण के लिए मेरी आंखों उसकी बड़ी-बड़ी काली आंखों में जमी दहशत से टकराई। उसकी आंखों का वह भयावह खौफ में कभी भूल नहीं सकती। दूसरे ही पल बाथरूम के उसी दरवाजे के पीछे वह बंद हो गई थी, जहां से मैं अभी-अभी होकर आई थी।

मेरा परिवार एक अशिक्षित परिवार नहीं था। उस समय के स्तर से मेरे माता-पिता पढ़े-लिखे थे। पिता अपने प्रांत के ग्रेजुएट थे और शिक्षा नियंत्रक के औहदे पर थे। मेरी मां की शिक्षा फ्रेंच स्कूल में हुई थी और उनके पिता सेना में थे, लेकिन गांव हो या शहर, उच्च वर्ग हो, मध्य या निम्न मध्यवर्ग, सुन्नत की प्रथा का प्रचलन हर क्षेत्र में कायम था। कोई भी लड़की अपनी योनि के ऊपरी हिस्से (clitoris) को कटवाए जाने से बच नहीं सकती थी। जब मैंने स्कूल में अपनी साथिनों से अपने अनुभव को बांटा तो मुझे पता चला कि बिना किसी अपवाद के हर एक लड़की इस मर्मांतक अनुभव का शिकार हो चुकी थी।

इस हादसे की याद बहुत बाद में भी एक दुःस्वप्न की तरह मुझे पीछे धकेलती रही। मुझमें एक असुरक्षा की भावना ने घर कर लिया था कि मेरे साथ कुछ भी घट सकता है। जिस दिन मैंने जिंदगी में आंखें खोलीं, समाज ने मुझे बता दिया था कि मैं लड़की हूं और कि ‘बिंत’ (लड़की) शब्द का जब भी उच्चारण किया जाएगा, माथे पर सलवटों के साथ ही किया जाएगा।


1955 में जब मैं डाक्टर बनी, मैं कभी वह दर्दनाक घटना भूल नहीं पाई, जिसने एकबारगी मेरा बचपन छीन लिया था और शादी के बाद भी जिसने मुझे जिंदगी की पूर्णता और यौन के आनंद से मरहूम रखा, जो अंततः एक मनोवैज्ञानिक संतुलन से ही हासिल किया जा सकता है। जब मैं गांव में प्रैक्टिस कर रही थी, मुझे अपने दुःस्वप्न से कई-कई बार फिर से गुजरना पड़ा। अक्सर मुझे उन लड़कियों का इलाज करना पड़ता था, जो सुन्नत के बाद खून से तरबतर वहां आती थीं। सुन्नत करने वाली दाइयां अप्रशिक्षित होती हैं, जो आमतौर पर कांच के टुकड़े या विशेष किस्म के चाकू का इस्तेमाल करती हैं। सुन्नत करने के दौरान न तो एनस्थीसिया दिया जाता है, न किसी तरह का एंटीसेप्टिक लगाया जाता है। रक्तस्राव रोकने के लिए तरह-तरह की चीजें रगड़ दी जाती हैं, जिनसे संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। इस किस्म के अमानवीय और आदिम तरीके की वजह से बहुत सी लड़कियां सुन्नत के दौरान अपनी जान से भी हाथ धो बैठती थीं। कइयों को गंभीर किस्म का इंफेक्शन और सेप्टिक हो जाता था। और उनमें से अधिकांश इस बर्बर अनुभव की यातना के कारण मानसिक और यौन विक्षिप्ति का शिकार हो जाती थीं।

मुझे अपने डाक्टरी पेशे के कारण एक बार अरब देश के अलग-अलग हिस्सों से आई औरतों का परीक्षण करने का मौका मिला। इनमें सूडान की औरतें भी थीं। मैं उन्हें देखते हुए दहशत से भर गई कि सूडानी लड़की को सुन्नत की जिस प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है, वह मिस्र की सुन्नत प्रथा से दस गुना ज्यादा क्रूर और बर्बर है। इस आपरेशन में जननेन्द्रिय के सभी बाहरी हिस्सों को निकाल दिया जाता है। योनि का ऊपरी हिस्सा तो वे काट ही देते हैं, साथ ही बाहरी पटल (labia majora) और भीतरी पटल (labia minora) को भी काट दिया जाता है। फिर उस घाव को सिला जाता है। इस दौरान सिर्फ योनि का छिद्र ही छोड़ दिया जाता है, जो घाव की मरम्मत के दौरान कुछ अतिरिक्त टांकों से छोटा कर दिया जाता है। इसका नतीजा यह होता है कि आमतौर पर शादी की रात उस संकुचित जगह को दोनों ओर से काट कर कुछ चौड़ा करना पड़ता है ताकि पुरुष का लिंग उसमें प्रवेश कर सके। जब किसी सूडानी औरत का तलाक होता है तो इस बाहरी खोल को फिर से कुछ टांकों द्वारा छोटा किया जाता है ताकि वह किसी से शारीरिक संबंध स्थापित न कर सके और अगर वह फिर से शादी करती है तो फिर से टांकों को खोला जाता है।

जब मैंने 1969 में सूडान की यात्रा की तो वहां की औरतों से बात कर और यह देखकर कि वहां गांव, कस्बे और बड़े शहरों की शत-प्रतिशत लड़कियां इस प्रथा की शिकार थीं और इस प्रथा की जड़ें गहरे धंसी हुई थीं, मुझमें गुस्से और विद्रोह का भाव कई गुना बढ़ गया। अपनी सारी डाक्टरी पढ़ाई और अपने अपेक्षाकृत खुले माहौल में बड़े होने के बावजूद मैं यह समझ पाने में असमर्थ थी कि लड़कियों को इस बर्बर प्रक्रिया से क्यों गुजरना पड़ता है। मैं हमेशा अपने आप से सवाल करती, क्यों? आखिर क्यों? मुझे इसका कोई जवाब नहीं मिलता। और यह सवाल मेरे दिमाग में उसी दिन पैदा हो गया था, जब मुझे और मेरी छोटी बहन का सुन्नत किया गया था।
बाद में अपने शोध के दौरान मैंने पाया कि मिस्र के अशिक्षित परिवारों में 97.5 प्रतिशत लड़कियां इस प्रथा का शिकार होती हैं, लेकिन शिक्षित परिवारों में यह प्रतिशत घटकर 66.2 प्रतिशत रह गया है।

जब-जब मैंने इस बारे में उन लड़कियों से बात की तो पाया कि उन्हें इसका कतई इलम ही नहीं था कि सुन्नत से उनके शरीर को कितना नुकसान पहुंचता है, बल्कि कुछ तो यह समझती थीं कि यह उनकी सेहत के लिए मुफीद है और उनके शरीर को पाक साफ रखने के लिए निहायत जरूरी है। सुन्नत की प्रक्रिया से गुजरी पढ़ी-लिखी औरतें भी इस तथ्य से अनजान थीं कि योनि के ऊपरी हिस्से को काट फेंकने का उनके मनोवैज्ञानिक और यौन संबंधों पर नकारात्मक असर पड़ता है। इन औरतों के बीच और मेरे बीच आमतौर पर इस तरह का एक औसत संवाद चलता था -
‘सुन्नत के समय तुम्हारी उम्र क्या थी?’
‘मैं बच्ची थी तब। यही कोई सात-आठ साल।’
‘तुम्हें आपरेशन की सारी बातें याद हैं?’
‘बिल्कुल! भला उन्हें कैसे भूला जा सकता है!’
‘क्या तुम्हें डर लगा था?’
‘बेहद! मैं जाकर अल्मारी के ऊपर छिप गई थी ( कोई कहती पलंग के नीचे, कोई पड़ोसियों के घर) लेकिन उन्होंने मुझे पकड़ ही लिया और उनके हाथों में मेरा पूरा शरीर कांप रहा था।’
‘दर्द महसूस हुआ?’
‘बेहद! मैं चीखी थी। मेरी मां ने मेरा सिर पकड़ रखा था ताकि मैं हिल भी न सकूं। मेरी चाची ने मेरा बायां हाथ पकड़ा था और दादी ने दायां। दो अजनबी औरतें, जिन्हें मैंने पहले कभी देखा नहीं था, मेरी दोनों जांघों को एक दूसरे से जितनी दूर तक अलग खींच सकती थीं, खींच रही थीं ताकि मेरे जरा भी हिलने की गुंजाइश न रहे। इन दोनों चेहरों के बीच हाथ में तेज धार वाला चाकू लिए दाई बैठी थी। जैसे ही उसने मेरे एक हिस्से को काटा, मेरे पूरे शरीर में आग की लपटें दौड़ रही थीं और मैं तेज दर्द से बेहोश हो गई थी।
‘आपरेशन के बाद क्या हुआ?’
‘मेरे पूरे शरीर में भयंकर दर्द था और मैं हिल भी नहीं सकती थी। कई दिन मैं बिस्तर पर ही रही। हर बार जब मैं पेशाब करने जाती तो कटी हुई जगह पर असहनीय जलन होती थी। घाव में से खून बहता रहता था और मेरी मां दिन में दो बार उस जगह की ड्रेसिंग बदलती थी। कितने ही दिन तक मैं पानी पीने से डरती थी ताकि पेशाब करने न जाना पड़े।’

सुधा अरोड़ा 

‘जब तुम्हें पता चला कि तुम्हारे शरीर का एक छोटा-सा हिस्सा काट दिया गया है तो तुम्हें कैसा महसूस हुआ?’
‘मुझे सिर्फ यह बताया गया था कि यह एक मामूली सा आपरेशन है जो हर लड़की को पाक-साफ रखने के लिए किया जाता है और इससे उसकी इज्जत बची रहती है। जिस लड़की का आपरेशन नहीं किया जाता, उसका बर्ताब खराब होता है, वह लड़कों के पीछे भागने लगती है और उसके बारे में लोग-बाग बातें बनाने लगते हैं, जिसकी वजह से शादी की उम्र आने पर उससे कोई शादी करने को राजी नहीं होता। मेरी दादी ने बताया कि जांघों के बीच उस छोटे से हिस्से का बना रहना मुझे नापाक बना देगा और शादी के बाद मेरा शौहर मुझसे नफरत करने लगेगा।’
‘क्या तुम्हें इन दलीलों पर भरोसा हुआ?’
‘हां, हुआ। आपरेशन के बाद जब मैं बिल्कुल ठीक हो गई तो मुझे खुशी हुई कि मैंने उस चीज से छुटकारा पा लिया जो मुझे गंदा और नापाक बना सकती थी।’

मुझे कमोबेश सबसे यही जवाब मिलते थे। वहां ऐन शम्स स्कूल आफ मेडिसन के आखिरी साल की एक छात्रा थी। जब उससे मैंने यह सवाल किया कि क्या वह इसे मानती है कि औरत की योनि का ऊपरी हिस्सा काट दिया जाना एक सेहतमंद क्रिया है या कम से कम हानिकारक नहीं है?

‘मुझे तो सबने यही बताया है’, उसने कहा, ‘हमारे परिवार में सभी लड़कियां इस क्रिया से गुजरी हैं। मैंने डाक्टरी पढ़ी है पर मुझे आज तक किसी प्रोफेसर ने नहीं बताया कि एक औरत के शरीर में उसकी योनि के ऊपरी हिस्से (clitoris) की कोई अहमियत है, न ही हमारी मेडिकल किताबों में इसका कोई जिक्र है।’
‘यह सच है! आज तक चिकित्सा विज्ञान में औरत के जिन अंगों पर अलग से चर्चा की जाती है, वे उसकी जननेन्द्रियों से सीधे ताल्लुक रखते हैं जैसे योनि (vagina), गर्भाशय (uterus) और अंडकोश (ovaries)। चिकित्सा शास्त्र में योनि के ऊपरी हिस्से को उपेक्षित रखा गया है, उसी तरह जैसे वह समाज द्वारा उपेक्षित और तिरस्कृत है।’

‘दरअसल, एक बार एक छात्रा ने प्रोफेसर से क्लिटोरिस के बारे में पूछ लिया तो प्रोफेसर का मुंह तमतमा गया और उन्होंने रूखा-सा जवाब दिया कि आगे से कोई इस बारे में सवाल न पूछे क्योंकि औरत के जिस्म में इसकी कोई अहमियत नहीं है।’

यहीं से मेरी शोध शुरू हुई। मुझे यह जानना था कि सुन्नत की प्रथा का लड़की पर मानसिक रूप से और उसके सेक्स जीवन पर क्या असर होता है। पर मैंने जिनसे भी पूछा - सबने आंखें झुकाकर मेरी ओर देखे बिना यही उत्तर दिया कि उन पर कोई असर नहीं पड़ा। दरअसल, मिस्र की औरतें जिस तरह के सख्त और घुटे हुए माहौल में बड़ी होती हैं, वहां उनके लिए शादी के बाद शौहर के हाथ का पहला स्पर्श पाने से पहले किसी भी तरह के यौन सुख या अनुभव की बात करना भी गुनाह समझा जाता है। बहुत कोंचने पर शादीशुदा औरतों ने स्वीकार किया कि अपने पति के साथ सहवास के दौरान भी उन्होंने कभी रत्ती भर भी आनंद महसूस नहीं किया।
अपने शोध में 651 औरतों से सुन्नत के बारे में लंबी बातचीत करने के बाद जो नतीजे हाथ लगे, ये हैं -

1. सुन्नत एक ऐसा आपरेशन है, जो औरत के शरीर पर हानिकारक असर छोड़ता है। इससे उसकी कामवासना मंद पड़ जाती है और इससे औरत की यौन संबंध के चरम सुख तक पहुंचने की क्षमता कम हो         जाती है। अरब समाज में औरतों का सेक्स संबंधी ठंड़ापन (frigidity) मुख्यतः इसी कारण से है।

2. अशिक्षित परिवार आज भी परंपरा के तरह इसी धारणा को मानते हैं       कि लड़की की कामेच्छा के दमन का  एकमात्र तरीका सुन्नत ही है और     सुन्नत द्वारा ही उसके कौमार्य और इज्जत को शादी से पहले बरकरार      रखा जा सकता है।

3. यह धारणा भ्रामक है कि सुन्नत द्वारा औरत के प्रजनन अंगों में           कैंसर की संभावना कम हो जाती है। सच्चाई यह है कि सुन्नत - वह         किसी भी रूप में और पहली, दूसरी   किसी  भी डिग्री का हो (खासतौर    पर  सूडानी, जो चौथी डिग्री का माना जाता है और सुन्नत का सबसे बर्बर स्वरूप है) अपने साथ इंफेशन, सेप्टिक या हेमरेज और मूत्रनली में गांठ  (cyst) या सूजन लेकर ही आता है, साथ ही इससे योनि का द्वार  संकुचित होता है और पेशाब के बहाव में  काफी समय तक रुकावट महसूस होती है।

 4. सुन्नत की गई लड़कियों में हस्तमैथुन की क्रिया बहुत कम पाई जाती है बजाय उन लड़कियों के, जिनका          आपरेशन नहीं किया गया है।

5. इसमें कोई शक नहीं कि सुन्नत लड़की के यौन जीवन के लिए एक सदमा साबित होता है और                          मनोवैज्ञानिक विकास में बाधा पहुंचाता है। अंततः यह लड़की को उसके माहौल के अनुरूप यौन संबंधी              ठंडेपन (sexual frigidity) की ओर ही धकेलता है। शिक्षा ही एकमात्र रास्ता है जिसमें पढ़े-लिखे मां-बाप            अपनी बेटियों को इस अमानवीय प्रथा से गुजरने से इनकार कर सकते हैं। आज के शिक्षित मां-बाप यह               समझ गए हैं कि यह आपरेशन किसी भी रूप में लाभदायक नहीं है और इसलिए इसका बहिष्कार किया             जाना  चाहिए।

आइन शम्स यूनिवर्सिटी में ‘वीमेन एंड न्यूरोसिस’ पर अपना शोध शुरू करने से पहले काइरो यूनिवर्सिटी के कस्त्र अल आइनी मेडिकल कालेज से इसे करने की मैंने बहुत कोशिश की पर हर बार मुझे कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा। हमारी सबसे बड़ी रुकावट सत्तारूढ़ दकियानूसी मानसिकता वाले प्रोफेसरों से ही थी जिन्होंने ‘सेक्स’ को हमेशा ‘शर्म’ के साथ जोड़कर ही देखा है। उनके अनुसार ‘प्रतिष्ठित’ शोध सेक्स जैसे विषय पर नहीं हो सकती थी। मैंने अपने शोध के आलेख का शीर्षक दिया था ‘मिस्र की आधुनिक औरत के यौन जीवन में आने वाली समस्याएं।’ (¼problems that confront the sexual life of modern eypytian women) लेकिन लंबी चर्चा और बातचीत के बाद आखिर मुझे शीर्षक से ‘यौन’ शब्द हटाकर ‘मनोवैज्ञानिक’ (psychological) शब्द डालना पड़ा।

(‘द हिडन फेस आफ ईव’ के पहले भाग ‘द म्यूटिलेटेड हाफ’ के पहले और छठे अध्याय के कुछ चुने हुए अंश ) 

( अन्तरंग संगिनी 1999 / हंस मार्च 2000 में प्रकाशित )


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