और आप हमें पुरस्कार समारोह में दिल्ली आमंत्रित कर रहे हैं: हिन्दी अकादमी से कहा शिमला सामूहिक बलात्कार मामले से आक्रोशित लेखक ने

स्त्रीकाल डेस्क 

हिमाचल की राजधानी शिमला में जनता सडक पर है. शिमला जिले के एक गाँव में एक लडकी के बीभत्स बलात्कार के आरोपियों को पुलिस ने जब बचाना शुरू किया तो लोगों में आक्रोश फ़ैल गया.  4 जुलाई को हुए इस सामूहिक बलात्कार के मामले में पहले तो लोगों को लगा कि पुलिस जांच करेगी. लेकिन जब उन्होंने देखा कि पुलिस आरोपियों को बचाने में लगी है तो लोग सडक पर आ गये. पुलिस ने इस मामले में मुख्य आरोपी,  जो सेब व्यापारी का बेटा और प्रभावशाली परिवार से बताया जाता है,  के साथ कुछ नेपालियों को भी पकड़ा. मुख्य आरोपी को बचाने के लिए उन नेपालियों में से एक की ह्त्या लॉक अप में हो गई. ह्त्या के आरोप में दूसरे नेपाली पर मुकदमा दर्ज कर दिया गया. पुलिस का यह एक अनूठा कदम था कि हाजत में मौत के बावजूद पुलिस वालों पर मुकदमा नहीं हुआ. लगभग दो रूम के एक छोटे से थाने में पुलिस वालों के अलावा किसी आरोपी को कौन मार सकता है भला. यह सब मुख्य आरोपी को बचाने के लिए किया जा रहा है. इसके खिलाफ लोगों ने जगह-जगह हिंसक प्रदर्शन किया है, थाने को जलाने की भी खबर है.



आगत चुनाव और बढ़ते आक्रोश को देखकर अब बीजेपी भी मैदान में उतर चुकी है. परसो लोकसभा में अनुराग ठाकुर ने मुद्दा उठाया.

इस घटना से उद्वेलित और अपने लेखक बिरादरी की  चुप्पी पर व्यथित शिमला निवासी प्रसिद्द कहानीकार  राजकुमार राकेश ने अपने फेसबुक पेज पर दो आक्रोश भरे पोस्ट लिखे. गौरतलब है कि कल 20 जुलाई  हिन्दी अकादमी दिल्ली ने कुछ साहित्यकारों को सम्मानित किया था. इस अवसर पर राजकुमार राकेश को भी दिल्ली आमंत्रित किया गया था. राजकुमार राकेश ने  21 जुलाई को अपने पोस्ट में लिखा:




 हिन्दी के लेखक मित्रो! मेरा मन उद्वेलित है। इसलिए खुद को रोक नहीं पा रहा हूँ। वर्ना मैं कभी किसी को चुनौती नहीं देता। पर आज का दिन मेरे अवसाद का सबसे भयानक दिन है। इसलिए खुद को रोक पाना संभव नहीं रहा है।
#पिछले कल पूरा हिमाचल आंदोलित था। जनता सड़कों पर थी। बाज़ार और ट्रैफिक पूरी तरह बंद। मैं शिमला में हूँ। कल जो यहाँ हुआ, वैसे दृश्य मैंने इस शहर में पहली बार देखे। पिछले बीस दिन से जनता आंदोलित थी, तो भाजपा ने उसका फायदा उठाकर 20 अप्रैल को हिमाचल-बंध का ऐलान कर दिया था। लेकिन जनता के आक्रोश के आगे किसी राजनैतिक दल की कोई हैसियत नहीं होती। कल के आंदोलन में माकपा, कालेजों के विद्यार्थी और अनेक समाजसेवी व महिला संगठन पूरी सक्रियता के साथ शामिल थे। शासक पार्टी के नेता कहाँ दुबके पड़े हैं। पता नहीं।


#कल पता चला, शिमला सिर्फ एक सैरगाह नहीं है। यहाँ भी जीते जागते लोग बसते हैं। वैसे यह शहर हर किसी आने वाले का स्वागत करता है। अपने लेखकों का तो अभूतपूर्व स्वागत करता है। फिर चाहे कुछ बड़े लेखकगण अपनी आपसी बातचीत में अपना स्वागत करने वालों को 'यजमान' ही क्यों न कहते हों। हालांकि उसका भी यहाँ कोई बुरा नहीं मानता।
#लेकिन पिछले कल जब शिमला जल रहा था तब सुना है, दिल्ली की हिन्दी अकादमी कुछ लेखकों को पुरस्कार देने का भव्य समारोह आयोजित कर रही थी। अब आयोजन था, तो जरूर कुछ लेखक बंधु पुरस्कार ले भी रहे होंगे। मुझे नहीं मालूम वे कौन-कौन थे, लेकिन आज मैं उन्हें बधाई नहीं दे सकता।
#आज सुबह याद आया 2015 में जब पुरस्कार वापसी अभियान चल रहा था, तब मुझ जैसे नाचीज ने भी उसमें अपना योगदान देने के लिए अपना एक राज्यस्तरीय पुरस्कार वापस कर दिया था। मेरे पास वही था और मैं वही वापस कर सकता था। इससे बड़ा होता तो उसे भी जरूर कर देता। वह हाथियों के साथ एक चींटी भर का योगदान रहा हो, इसे मान लेने में भी मुझे कोई गुरेज नहीं है।
#किन्तु क्या दिल्ली में सम्मान देने वाली कोई सरकारी संस्था और उन सम्मानों को लेने वाले लेखकगण महज़ एक रोज़ के लिए उस समारोह को टाल नहीं सकते थे? क्या दिल्ली से बाहर एक लड़की का बलात्कार और हत्या हुई, एक आरोपी को पुलिस की कस्टडी में मार दिया गया, उससे आपके कोई सरोकार नहीं जुड़े हैं?
#मैं जानता हूँ, हमेशा की तरह आप इस पोस्ट को पढ़ चुकने के बाद भी आगे निकल जाएंगे, यही दिखाने को, मानो आपने इसे पढ़ा ही न हो! इस बात की मुझे कोई फिक्र नहीं है। बल्कि मुझे यही आशा है, कि यही होगा। यही होना चाहिए।
#दिल्ली में पुरस्कार देने और लेने वालों को यही करना चाहिए भी।

20 जुलाई  का पोस्ट 

एक पखवाड़ा पहले शिमला ज़िला के कोटखाई के एक गाँव में 14 साल की लड़की का जो भयावह रेप और हत्या हुई है, वह कांड दिल्ली के निर्भया कांड से भी ज्यादा डरावना, जघन्य, क्रूर और अमानवीय है।
क्या दिल्ली तक ये खबर पहुंची है? जंतर मंतर पर किसी ने प्रदर्शन किया हो कृपया बताएं? पुरस्कार बाद में लिए दिये जा सकते हैं।


गत रात इस कांड के एक आरोपी की कोटखाई पुलिस थाने में हत्या हो गई है।
जनता भड़की हुई है।
आज पूरा शिमला बंद है। दूध, ब्रैड कुछ नहीं। दूरस्थ कालोनियों तक की छोटी छोटी दुकानें तक बंद हैं। कहीं कोई रेहड़ी वाला भी नजर नहीं आ रहा।
जनता सड़कों पर है।
और आज सुबह ही मित्र सुरेश शांडिल्य Suresh Shandilya ने सूचित किया है, रामपुर में एक बस दुर्घटना में 30 लोग मारे गए हैं।
इतनी आग!
और आप हमें पुरस्कार समारोह में दिल्ली आमंत्रित कर रहे हैं?



बीभत्स था यह काण्ड 

4 जुलाई को  10वीं में पढ़ने वाली छात्रा गुड़िया को देखकर आरोपियों ने गाड़ी रोकी और  उसे घर तक लिफ्ट देने की बात कही. गुड़िया इलाके में नई आई थी और बीते मई ही उसने स्कूल में दाखिला लिया था. गुड़िया एक आरोपी  को जानती थी, लिहाजा वह उसके साथ गाड़ी में बैठ गई.  वह आरोपी अक्सर स्कूली बच्चों को ले जाता था, जिससे गुड़िया को भी उस पर शक नहीं हुआ.

पुलिस के अनुसार सारे आरोपी  दोस्त शराब के नशे में धुत थे. इसी दौरान उनकी नीयत बदली और उन्होंने बीच जंगल में सामान उतारने का बहाना बनाते हुए गाड़ी रोक दी. जिसके बाद उन्होंने मासूम के साथ गैंगरेप किया. आरोपियों ने अपने तीन साथियों को भी वहां बुला लिया और फिर गुड़िया की बेरहमी से हत्या कर उसकी लाश को जंगलों में फेंक दिया. गैंगरेप के दौरान दरिंदों ने मासूम गुड़िया के साथ हैवानियत की इंतेहा कर दी थी.

गुड़िया के शरीर पर मिले दांतों के निशान

दरअसल गैंगरेप के दौरान उन्होंने गुड़िया को कंटीली झाड़ियों पर फेंक दिया था. गुड़िया की पीठ पर कांटों के कई निशान मिले हैं. गुड़िया के शरीर पर तीन जगह दांतों से काटने के निशान मिले हैं. सभी आरोपियों ने मासूम के साथ बारी-बारी से रेप किया था. इस दौरान उन्होंने गुड़िया का मुंह दबाए रखा, जिससे उसकी मौत हो गई. आशंका जताई जा रही है कि आरोपियों ने गुड़िया की मौत के बाद भी उसकी लाश के साथ रेप किया. इसके बाद वह लोग उसे वहीं नग्न हालत में फेंककर फरार हो गए.



उठ रहे कई सवाल 

1- जब 4 जुलाई को गुड़िया की हत्या कर दी गई थी, तो आखिर 6 जुलाई तक खूंखार जंगली-जानवरों वाले इस इलाके में उसकी लाश कैसे बची रही?

2- अगर दो दिन तक लाश वहां पड़ी थी तो उसके हाथ-पैर और पूरा शरीर बिल्कुल साफ-सुथरा कैसे बचा रहा?

3- शव के पास अगर उसके कपड़े पड़े थे तो वे बारिश होने के बावजूद वहीं पर सही सलामत कैसे थे? बारिश या तूफान का इन पर कोई असर नहीं पड़ा. कपड़े खराब तक नहीं हुए.

4- गैंगरेप के दौरान छटपटाहट की वजह से गुड़िया के हाथों और शरीर पर मिट्टी क्यों नहीं लगी? पुलिस को मौका-ए-वारदात से कोई निशान क्यों नहीं मिले? पहले खुद पुलिस भी घर या गाड़ी में गैंगरेप की बात कह रही थी.

5- आमतौर पर इतनी बड़ी वारदात को अंजाम देने के बाद आरोपी भाग जाते हैं, लेकिन इस केस में आरोपी कहीं नहीं भागे.

6- जो दो नेपाली युवक पकड़े गए, उनके निवास से घटनास्थल की दूरी करीब 200 मीटर है. यह सवाल उठता है कि अगर उन्होंने इस वारदात को अंजाम दिया होता तो वह अपने घर के पास ही शव क्यों फेंकते?

7. थाने में बंद एक आरोपी की हत्या कैसे हो गई. और हुई तो फिर थाने के पुलिसकर्मियों पर कोई एफआईआर क्यों नहीं हुआ?

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