पांच रूपये और पांच मिनट का क्रूर फेयर और लवली व्यापार

दक्षम द्विवेदी
content writer संवाद 24 वेब पोर्टल. सम्पर्क : mphilldaksham500@gmail.com 

स्त्रियों की स्थिति और दशा को लेकर पिछले कई दशकों से एक वैचारिक क्रांति देखने को मिली किन्तु उस चिंतन का केंद्र बिन्दु प्रायः यौनिकता पर आधारित हिंसा ही रहा। अगर हमें स्त्रियों की दशा का समग्र विकास करना है तो हमें रंगभेद को भी ध्यान में रखना अति आवश्यक है जो एक अत्यंत महत्वपूर्ण पहलू होकर भी प्रायः मुख्य चर्चा से छुट जाता है। रंगभेद यानि गोरे और साँवले का भेद । वैसे ये रंगभेद का असर स्त्री-पुरूष दोनों से सबंधित होता है पर पर एक स्त्री को रंगभेद का दंश पुरुष से ज्यादा झेलना पड़ता है ख़ासकर शादी जैसे अवसरों पर आप सबको याद होगा कि स्टार प्लस पर 2007 में एक धारावाहिक प्रारंभ हुआ था जिसकी मुख्य किरदार एक सांवली लड़की थी और वह धारावाहिक इसीलिये चर्चा में रहा था कि उसकी मुख्य क़िरदार का रंग सांवला था .इसी बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि रंगभेद के बारे में समाज की क्या सोच है एक दुःखद पहलू ये भी है कि पूंजीवाद की इस जकड़न से लड़कियां भी प्रभावित हैं उन्हें भी गोरेपनका प्रभाव अपनी जकड़न में ले रहा है वो जानते हुए भी उन उत्पाद का प्रयोग करती है जो त्वचा के लिए हानिकारक होता है जिस द्रुतगति से पूंजीवादी समाज आगे बढ़ रहा है उसी गति से रंगभेद की ये खाई भी बढ़ रही है। पूंजीवादी समाज आर्थिक असमानता तो बढ़ा ही रहा है रंगभेद की असमानता को भी उसी गति से बढ़ा रहा है। गोरेपन का पागलपन हमारे ऊपर तेज़ी से हावी हो रहा है । ये पागलपन बहुत पहले से चला आ रहा है।

अगर कोई लड़की गोरी पैदा नहीं हुई तो उसमें उस लड़की का क्या दोष है ?उसके अंदर भी वो सारे गुण अंतर्निहित है जो अन्य लोगों में है किन्तु हमारा ये समाज उन गुणों को इसलिए नहीं देख पाता क्योंकि बचपन से हमारे अंदर गोरेपन को ही सुंदरता के मानक के रूप में हमारे दिमाग में स्थापित कर दिया जाता है। इकीसवी सदी में प्रवेश करता हुआ यह समाज रंगभेद के इस विकृत विचार से कब बाहर निकलेगा? एक लड़की जो गोरी नहीं है सारी प्रतिभाओं से परिपूर्ण होने के बावजूद क्यों अपने को क्यों कुंठित महसुस करती है?

आप हिन्दी सिनेमा का उदाहरण देख ले, कुछ चुनिन्दा अभिनेत्रियों को छोड़ कर सब गोरे रंग के प्रभाव से सराबोर हैं या बहुराष्ट्रीय कंपनियों में कार्य कर रहीं रिसेप्शनिष्ट ज़्यादातर गोरेपन का ही वर्चस्व दिखेगा। हमारे समाज को एक और जागरूकता दिखानी होगी एक और व्यापक मानसिकता को स्थापित करना होगा। ये सोचने का वक़्त आ गया है कि जो लड़की गोरी नहीं है उसकी भी अपनी एक सोच होती है, उनके भी सपने भी होते, उनकी भी आगे बढने की ललक है ,उनकी भी आगे बढ्ने की कसक है,वो भी जिंदगी से अपेक्षा करती है उनकी भी आकांक्षाएँ हैं।


विज्ञापनों की भूमिका इस भेद को और बढ़ा रही है हर जगह यही विज्ञापन कि एक हफ्ते में गोरापन पाइए, एक महीने में गोरापन पाइये. क्या कभी हमने कोई भी ऐसा विज्ञापन देखा जिसमें ये बताया जा रहा हो कि आप जैसे हो अपने में विशिष्ट हो. सादगी में ही सुंदरता होती है, जो प्राकृतिक है वह अनमोल है. शायद ही कभी ऐसा विज्ञापन देखा देखने को मिलता है. विज्ञापन बाज़ार को इस ओर ध्यान देना चाहिए क्योंकि आप ही लोग ग्राहकों की रुचि तय करते हैं अगर आप ही गोरेपन को सर्वोपरि रख देंगे तब समाज उसी ओर आकर्षित होगा.

वैसे रंगभेद को लेकर जब भी बात होती है तब अफ्रीका का ही उदाहरण दिया जाता है. लेकिन भारत भी रंगभेद से ज्यादा अछूता नहीं है, बहुत दूर जाने की ज़रूरत नहीं है नज़र दौड़ाइए और अपने अगल बगल किसी छोटे से कार्यक्रम या पुरस्कार वितरण समारोह को देखिए आपको वहीं गोरापन नज़र आ जायेगा एक थाली लिए हुए एक लड़की खड़ी रहती है जो प्रायः गोरी ही होती है फिर अतिथि महोदय उसी थाली में से पुरस्कार उठाकर वितरित करते हैं.ये उदाहरण बस एक बानगी है औऱ गहराई से समझना हो तो आप विवाह को देख सकते हैं, जिसमें लड़की वालों को दहेज़ की राशि बस इसलिए ज्यादा देनी पड़ती है क्योंकि लड़की का रंग थोड़ा सा दबा रहता है .मेरा ऐसा लिख देने मात्र से आप इसको मत मानिये कभी खुद अपने अगल-बगल इसको महसूस करने का प्रयास करिये, तस्वीर ख़ुद ब ख़ुद आपके सामने होगी.


इसका सबसे दुःखद पहलू यह होता है कि ढेर सारी प्रतिभाओं औऱ गुणों से संपन्न होने के बाद भी रंग की वजह से एक कुंठा जन्म लेती है, जो अंदर ही अंदर उसको खोखला करती है. सच में समाज की ये रंगभेद की सोच खोखली है जो एक इंसान को बस इसलिए नज़रअंदाज़ कर रही है क्योंकिं उसकी चमड़ी का रंग आपसे अलग है.जब ये बुराई हमारे बीच की है तो खत्म भी हमें ही करना चाहिए. आवश्यकता है अपनी समझ को विकसित करने की, लोगों को जागरूक करने की, ये समझाने की कि किसी का आकलन उसके व्यक्तित्व से करिये उसके स्वभाव से करिये उसके रंग से नहीं, तभी हम शिक्षित कहलाने के हकदार हैं, अन्यथा हम लोग एक पढ़े-लिखे बेवकूफ हैँ. अपने मन में ये निश्चय करिये की अगर आपके सामने कोई रंगभेद की इस गलत सोच का शिकार हो रहा तो आप उसे समझाएंगे भले ही वह कितना करीबी क्यों ना हो.अगर आप हिंदी फिल्मों के गानों पर भी नज़र डालें तो उनके बोल इस प्रकार के रहते हैं जैसे "गोरे गोर मुखड़े पे काला काला चश्मा, गोरी है कलाईयां, गोरी तेरी आंखे कहें, ये गोरे-गोरे से छोरे इत्यादि गाने गोरेपन की मानसिकता को विकसित करने में सहायक होते हैं. अतः रंगभेद की इस मानसिकता को गहराई से समझना होगा तभी गहराई से अपने मन मस्तिष्क से इसको निकाला जा सकता है.

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