स्त्री आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति की कविताएं

अरुण नारायण
युवा आलोचक.बिहार विधानसभा में कार्यरत संपर्क :मोबाईल 8292253306

उत्तिमा केशरी हिंदी कविता में वर्षों से सक्रिय एक जरूरी कवयित्री हैं। लेकिन दिल्ली या राज्यों की राजधानी से दूर रहने के कारण हिंदी काव्य परिद्रश्य में उनको जो जगह मिलनी चाहिए, उनपर जो चर्चाएं होनी चाहिए, उससे वह वंचित रही हैं। अभी हाल ही में 115 कविताओं का उनका संकलन ‘उदास है गांव’ नाम से आया है, जिसे उद्भावना प्रकाशन गाजियाबाद ने साया किया है।

एक स्त्री का आत्मसंघर्ष इन कविताओं का मूल स्वर है। उनका यह संघर्ष घर, परिवार, समाज, धर्म, पुरुष सत्ता और परंपरा से हर जगह, हर मोर्चें पर है। इसीलिए इस संग्रह की कविताओं में जो स्त्रियां आई हैं उनमें पर्याप्त विविधता है। यहां कई तरह की स्त्रियों की चिंताएं हैं। उनके यहां ‘मीरगंज वाली चाची’ हैं, कई मिथकीय चरित्र हैं। रामायण की अहिल्या, सुमित्रा और उर्मिला हैं, मांएं हैं, मजदूरिनें हैं, साहित्यिक कृतियों में आए चरित्र भी हैं। इन कविताओं को पढ़ते हुए मेरे जेहन में यह सवाल कौंधता रहा कि आखिर इन सब को कोई कवयित्री क्यों याद करती है? इन सवालों का जवाब उत्तिमा जी की इन कविताओं में ही निहित है। अपनी एक कविता ‘कैकेयी और परंपरा’ में वे लिखती हैं, ‘राजा दशरथ की तरह/जब-जब करेंगी पुरुष सत्ता छल/स्त्री से/तब-तब ऐसी ही होगी, उनकी परिणति’;128द्ध।

पौराणिक और मिथकीय प्रसंगों का अस्मितावादी विमर्श अपने नजरिये से व्याख्या कर रहे हैं तो स्त्री भला पीछे क्यों रहे। उसके साथ तो कदम कदम पर अवमानाना की साजिशें की जाती रही हैं। हिंदी कविता का जो शुचितावादी और एकांगी विमर्श था, उसको ये कविताएं व्यापक फलक पर विस्तारित करती हैं। ‘एकाकी जीवन’ मां पर केंद्रित कविता है जो रामायण की मिथकीय स्त्रियों के एकाकीपन की परतों को उधेड़ती हुई मां के अकेलेपन को उससे जोड़ती है। ‘अहिल्या एक रासायनिक पदार्थ’ में कवयित्री पितृसत्ता को टारगेट करते कहती लिखती हैं, ‘तीर्थ को क्या गए/कि/इंद्र ने छल से कर लिया/तुम्हें वरण/तुमनेही तो कहा था अहिल्या/कि हे गौतम ऋषि /तुम तो किरण विज्ञान के ज्ञाता हो/तम के पार जाने की क्षमता है तुममें/क्योंकि तुम गौतम हो!/मैं तो एक रासायनिक पदार्थ हूं/तुम्हारे प्रयोगशाला के/इंद्र है सूरज मंडल के अंतस की किरण/और श्राप दिया, यही तो थी उनकी खोज/जब तक पूरी नहीं हुई खोज/मैं प्रयोगशाला में स्थापित रही।/आखिर कब करोगे प्राण प्रतिष्ठा/इस रासायनिक पदार्थ में?/उतर दो न/हे महामानव/गौतम ऋषि’ ’;144द्ध

‘गांधारी का शाप’ योगेश्वर कृष्ण पर एकाग्र कविता है। जो संग्रह की उल्लेखनीय कविताओं में है। गांधारी के शाप के बाद जरा के वाण से घायल कृष्ण की मनःस्थिति और राधा से उनके प्रेम-यह है इस कविता का प्रतिपाद्य। कविता की यह पंक्ति द्रष्टव्य है, जिसमें कृष्ण की प्रेम की उत्कटता को कवयित्री ने इनकी मार्मिक काव्य पंक्तियों में समेटा है, ‘अच्छा हुआ जरा पारधी/कि/ये तीर पैर में लगा/वरना/हदय में राधा थी/अनर्थ हो जाता’;186द्ध कवयित्री ने कुछ चर्चित चरित्रों पर भी अपनी कलम चलाई है। ‘हामिद का चिमटा’, ‘चित्रलेखा’, और लीडिया एविलोव’ आदि कविताओं में उनका यह रूप हम पाते हैं। जहां वे इन चरित्रों की संवेदना में गहरे डूबकर कविता को एक भिन्न आस्वाद में विस्तारित करती हैं। अपनी ‘चित्रलेखा’ कविता में वह लिखती हैं, ‘योग और साधना की सीढ़ियां/ चढ़ते-चढ़ते/तुमने भी पा लिया-/प्रेम की पूर्णता को..../ तुम बंधी रहो सदा, पति के आलिंगन पाश में/ठीक कुमारगिरी की तरह’;161-62द्ध यक्षिणी प्रश्न’ संग्रह की एक बहुत ही भाव प्रवण कविता है। यूं तो इस तरह के हिंदू मिथकीय चरित्रों पर उत्तिमा जी की कई कविताएं हैं, मसलन ‘अहिल्या एक रासायनिक पदार्थ’, ‘कैकेयी और परंपरा’, जो स्त्रीवादी नजरिए से लिखी गई है। इनमें पुरुष चरित्र को चुनौती के स्वर में संबोधित हैं ये कविताएं जो अपने काव्य कहन की भंगिमा में बहुत ही सटीक उतरे हैं। ‘यक्षिणी प्रश्न’ में कवयित्री शिव को भी नहीं बरजती। यक्षेश्वर को संबोधित कर कहती है, ‘तुम तो भोगते रहे उनके शाप/और, मेरे वियोग को/वे अल्कापुरी के स्वामी/करुणानिधान हैं/तुम्हें शाप देकर/स्वयं किया अभिशाप मुक्त/मगर, /मेरा यौवन तो चुका यशेश्वर!/ अब मैं जाना चाहती हूं/देवयोनि का त्यागकर/मानवों की नगरी में।’;181-82द्ध अपनी एक ‘मैना’ शीर्षक कविता में वह लिखती हैं, ‘जब उड़ती है फुर्र से/अपना गत्वाजोन दिखाकर/तब/मैं भी रचने लगती हूं/रस निष्पति के सारे अलंकार’ ;167द्ध

उत्तिमा केशरी ने समकालीन स्त्री की विडम्बना को भी अपनी कविताओं में बहुत शिद्द से उतारा है। ‘निवेदन कवि पत्नी का’ में में वह लिखती हैं-‘क्या तुम लौटते हो कभी/रात से आने से पहले/अपना घर/तुम्हें पता नहीं/कि/रात सबका अपना होता है/फिर भी/तुम लिख रहे हो,/समय के विरूद्ध कविता!/दोस्तों के लिए चिट्ठियां/और भर रहे हो कूचियों से /सूर्य में/सूर्योदय का सुनहरा रंग।’ ;77द्ध मां पर संग्रह में यूं तो कई कविताएं हैं। लेकिन उनमें ‘कई-कई छत’ कविता अव्वल है। इसमें वे लिखती हैं, ‘तुम थी तो एक छत था/अब/कई-कई छत बनते जा रहे हैं-मां’;61द्ध ‘मेरी बहन’ शीर्षक कविता पिता को संबोधित है। पारंपरिक रूढ़ियों से बंधे पिता से कवयित्री पूछती हैं, ‘आखिर क्यों बांध दिया आपने/ उसे/जाति के कोल्हू में!/जहां उसे /टूटना पड़ता है-/अपनी हर अतृप्त पल/देह के ताप से।’;76द्ध हिंदी में किसी कवयित्री ने इतनी साहसिक और विवेक वाली कविताएं शायद ही लिखी हों। जिसमें पिता को कटघरे में खड़ा किया जा रहा हो। संग्रह में स्त्री-पुरुष संबंधों को लेकर भी कई कविताएं हैं।‘उफनती नदी’ एक वैसी ही कविता है। जिसमें उत्तिमा ने एक अधवयस दंपति की प्रेम की प्यास को अभिव्यक्ति दी है। आदिवासी जीवन पर भी कई कविताएं इस संग्रह में हैं।अपनी एक कविता ‘मन की पवित्रता’ में वे लिखती हैं, ‘आज की स्त्री/देह की पवित्रता में नहीं/ मन की पवित्रता में जीती है।’ ;184द्ध

मिथकीय चरित्रों पर लिखी गई ज्यादातर कविताओं में पितृसत्ता को टारगेट किया गया है। लेकिन ‘शकुनिया काकी’ कविता के आरंभ में ही कवयित्री लिखती हैं, ‘बिषपुरवाली शकुनियां काकी/जब निकलती है-/नहा-धोकर पूजा करने मां काली थान/तो महमहा उठता है खुशबुओं से/गांव की गलियां।;154द्ध यह किसी समाज का सच हो सकता है। लेकिन यह किसी यथार्थ को देखने का बिलकुल ही एकांगी दृष्टिकोण है। कोई स्त्री लेखिका इसे कविता में क्यों लाए, इससे क्या अभिप्राय सिद्ध होता है, यह तो यथास्थितिवाद का पृष्ठपोषण कहलाएगा क्योंकि यहां धार्मिक कर्मकांडों में आस्था जमाई जा रही है। जो स्त्रियों की पराधीनता की सबसे बड़ी कारक रही है।

उत्तिमा ने हाशिए का जीवन जी रही कामगार स्त्रियों की पीड़ा की भी थाह ली है। ‘कमली’में वह लिखती हैं, ‘कमली खो चुकी है/वक्त के पहले ही/अपने यौवन का भूगोल/बचपन के इतिहास में’;152द्ध आगे वह लिखती हैं, ‘थकी कमली,/ बंद करना चाहती है-/यह घिनौना खेल/जेहाद करना चाहती है/सेठ केषवमल के खिलाफ/ताकि /कोई और कमली, विमली, शिमली/न आए सेठ के कोठी पर/काम करने’;152-53द्ध‘वह स्त्री’ में कवयित्री की मान्यता है, ‘प्रेम एक रसायन है/जो लोहे को सोना बना देता है/और साधारण को असाधारण/तभी तो वह /जीती है सुख-दुख में भी/अपने प्रेम के साथ’;151द्ध  संग्रह की एक छोटी-सी कविता है-‘वह’ नाम से, जो बच्चे की कल्पनाशीलता को सामने लाती है। उसकी कुछ पंक्तियां द्रष्टव्य है, ‘छोटी लड़की/बना रही है-/कोरे कागज पर/कभी कोठी, कभी अटारी/कभी पौधे को/कभी आकाश में /उगे चांद तारे को/तो कभी जमीं पर /दाना चुगती चिड़िया को/चित्रों को/मानो वह बचा लेना चाहती है-/चिड़िया के घोंसले की गर्माहट/और ओस की बूंदों की तरलता को/अपनी निष्कपटता में/आकुलता के साथ’। ’;149द्ध  संग्रह की कई कविताओं में स्त्री-पुरुष के अंतरंग क्षणों के अनुभव हैं, जो बहुत सूक्ष्मता के साथ इन कविताओं में उतरे हैं। संग्रह में मां और पिता पर भी कई कविताएं हैं। एक कविता में वे लिखती हैं, ‘रामचरण जब-जब बाज की तरह/उसपर झपटता है/तब वह ऐसे कांप उठती है/जैसे कि कोई वृक्ष/अपनी ही परछाई से डरकर/कांप उठता है।’’;147, सुनैनाद्ध

 संग्रह की ‘चुपके-चुपके’, सिर्फ एक बार’, ‘तुम्हारा आना’ आदि अच्छी प्रेम कविताएं हैं। ‘स्मृति की सीढ़ियां’, ‘फटकनी’ आदि कविताएं भी महत्वपूर्ण हैं। ‘वह छोटी चिड़ियां’ में कवयित्री फर्माती हैं, ‘वह स्वाभिमानिनी/जब घुम-घुमकर गाती है/अपनी किलंगी/आकाश की ओर उठकर/तो/ लगता है/मानो!/वह गा रही है-प्रार्थना के गीत’’ ;141द्ध  संग्रह में ‘दादी और आजादी’, ‘सूरजी’, ‘वह स्त्री है,’ जो काली होने के कारण पहले घर परिवार से ही उपेक्षा, अपमान सहती है और बाद में सामंती यौन शोषण के कारण दम तोड़ देती है। कवयित्री ने बेसरी की पीड़ा को मार्मिक स्वर दिया है। ‘कुली’ भी एक खूबसूरत कविता है जिसमें उसकी बेचारगी को कवयित्री ने पकड़ा है। ‘नायाब तोहफा’ शीर्षक कविता में बच्चे की फिलिंग्स को बहुत गहरे डूबकर उतारा गया है। मां बच्चे को कितना प्रेम करती है उसकी एक-एक फिलिंग्स उसे गहरे झकझोरती है। कविता की पंक्ति है, ’जहां-जहां तुम छुपते थे,/बचपन में/वहां-वहां पैबस्त हो गई है-/तुम्हारी उपस्थिति।’ ;111द्ध  ‘खंडहर और बूढ़ा आदमी’ शीर्षक कविता में विधुर जीवन जी रहे बूढ़े की पीड़ा को अभिव्यक्ति दी गई है। उस बूढ़े के दोनों बेटे विदेश जा बसे हैं और बेटी ससुराल। पत्नी दिवंगत हो चुकी हैं। कवयित्री को उस बूढे विधूर और खंडहर में समानता नजर आती है। वह लिखती हैं, ‘एक बिना सांस का/एक दूसरा, सांस से जीता है।’;106द्ध

‘आठ जून दो हजार नौ’ नाटककार हबीब तनवीर पर लिखी कविता है। वह लिखती हैं, ‘वे जानते थे/कैसे बनाया जाता है/मिट्टी से सोना जैसा आकर्षण।’;39द्ध संग्रह में कुछ और भी उल्लेखनीय कविताएं हैं जिनमें ‘आंखें, ‘प्रेम एक यौगिक तत्व है’, ‘किन्नरों की प्रार्थना’, ‘पुस्तक और कैनवास’, ‘बूट पाॅलिश करती फुनियां’, ‘महक की खोते’, जिंदगी’, ‘आत्मिक न्याय का युद्ध’, मुहावरों मंे आंखें’, ‘सिर्फ मैं थी तुम्हारे साथ’,‘खटरी का आत्मयुद्ध’, ‘परदेशी बेटा के लिए बूढ़े बाप का खत’, ‘दादाजी’ और ‘तीसरी जगह’ आदि संग्रह की महत्वपूर्ण कविताएं हैं। ‘कला के अधिनायक हुसैन’ में वह लिखती हैं, ‘तुमने जिश्म/पर/रूह तो/तुम्हारा/हर कलाकार प्रेमी के पास/आज भी /प्रे्ररणास्रोत बन/एक विलक्षण धरोहर के रूप में है।’ ;19.20द्ध उम्र की देहरी पर बुढ़ापे का आना कितना भयावह होता है इसका अहसास संग्रह की ‘दादाजी शीर्षक कविता को पढ़ते आप कर सकते हैं। रिटायर दादाजी की मनःस्थिति को इन पंक्तियों में देखें, ‘अब/सब कुछ/छूटता जा रहा है/पुरानी डायरियां/और /और फटे वस्त्रों की तरह/संबंधों की डोर/दादाजी का अपना ही घर/अब लग रहा है/उन्हें/अपरिचित-घर!’ उम्र के इसी पड़ाव को लक्षित कर ‘परदेशी बेटा के लिए बूढ़े बाप का खत’ और ‘तीसरी जगह’ शीर्षक कविताएं भी लिखी गई हैं।

उत्तिमा ने बाल मजदूर, आदिवासी स्त्री हर वह व्यक्ति और प्रवृति की कविताएं लिखी हैं जो दबे कुचले हैं। वह दवाब व्यक्ति, व्यवस्था और परंपरा-हर तरफ से है। अगर वो धार्मिक रूढ़ियों को अपनी कविता में लाने से परहेज करतीं तो हिंदी कविता में किसी भी समकालीन बड़ी कवयित्री होने से उन्हें कोई रोक नहीं सकता था।
इस काव्य संग्रह का आवरण  बिहार के प्रसिद्ध चित्रकार आनंदी प्रसाद बादल ने बनाया है, जो अपनी कलात्मक दक्षता से पाठकों को गहरे अभिभूत करता है।

किताबः उदास है गांव
कवयित्रीः उत्तिमा केशरी
प्रकाशकः उद्भावना प्रकाशन, एच 55, सेक्टर-23, राजनगर गाजियाबाद
पेज संख्याः 190
कीमतः 150 रुपया


संदर्भ 
उत्तिमा केशरी का काव्य संग्रह ‘उदास है गांव’

स्त्रीकाल का संचालन 'द मार्जिनलाइज्ड' , ऐन इंस्टिट्यूट  फॉर  अल्टरनेटिव  रिसर्च  एंड  मीडिया  स्टडीज  के द्वारा होता  है .  इसके प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें : 

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