रविकांत की कविताएं : तलाक दी गयी औरेतें और अन्य

रविकांत
   सहायक प्रोफेसर-हिन्दी विभाग,लखनऊ विश्वविद्यालय , लखनऊ.संपर्क:9451945847

तलाक दी गई औरतें
  ( हेमलता के लिए )

तलाक दी गई औरतें
दूसरी औरतों की तरह ही होती हैं
बल्कि, वे होती हैं, थोड़ी ज्यादा ही औरतें
क्योंकि, वे रोती हैं ज्यादा और हॅसती हैं कभी-कभी।
तलाक दी गई औरतें
होती हैं वे थोड़ी ज्यादा ही औरतें
क्योंकि, वे सोती हैं फकत पहर दो-पहर
पूरी बस्ती के  सो जाने बाद,
और, उठ जाती हैं भिनसारे
औरतों से भी पहले।
वे जिन घरों में रहती हैं
वहाँ कोई औरत (मेहरी) काम पर नहीं आती
तलाक दी गई औरतें टी0 वी0 सीरियल भी नहीं देखतीं
और वे घर में खटती हैं भौजाइयों से ज्यादा
क्योंकि वे होती हैं थोड़ी ज्यादा ही औरतें।
तलाक दी गई औरतें
अन्य औरतों से ज्यादा
प्यार करती हैं अपने आदमियों को
जैसे हेमलता आज भी करती है हमसे।
तलाक दी गई औरतें
बहुत ज्यादा औरतें होती हैं
जब, उनका इन्तजार होता है
लम्बा, बहुत लम्बा, इतना लम्बा
कि न जाने कितना लम्बा।

तलाक, चाहे कचहरी में हुआ हो
जज की निगहबानी में
या, पंचायत में मिला हो
रवायतों की मेहरबानी में
याकि, तलाक सौंपा गया हो
वकीलों के बैठकखानों में
वकील जब अकेले में पूछता है
निरे अकेले की बातों और गॉठों को
अपनी नंगी निगाहों से टटोलता है औरतपने को
तब भी उसकी नजरें नहीं गड़तीं
कील-कांटे की तरह
क्योंकि वे होती हैं थोड़ी ज्यादा ही औरतें।
तलाक दी गई औरतें
चाहे जिस धर्म, जाति या वर्ग-समुदाय की हों,
उनका दुख एक जैसा होता है, पहाड़-सा
क्योंकि, ग़म का कोई मजहब़ नहीं होता
अकेलेपन की कोइ जाति नहीं होती
ऑसुओं का कोई वर्ग या समुदाय नहीं होता
तलाक दी गई औरतों के ऑसुओं का सैलाब
होता है उफनाती- बरसाती नदी-सा।
तलाक दी गई औरतें
MOHSEN DERAKHSHAN
तब और ज्यादा औरत हो जाती हैं
जब दूर कहीं बजती है शहनाई
पल भर को जैसे खो जाती हैं वे
और, अगले ही पल वे महसूस करती हैं
कि ढेर सारा थूक और बलगम से
सनी हैं उनकी जांघें,
तब बेचैन हो उठती हैं तलाक दी गई औरतें,
और, पसीने से तर-बतर जब वे
धड़कनों को पकड़ने के लिए हाथ बढ़ाती हैं
तो वे पाती हैं कि लटक गईं सूखी छातियों पर
उग आए हैं कैक्टस, और
पेट पर छितरा गई हैं अनगिनत जलकुंभियाँ।
तलाक दी गई औरतें
औरतों से ज्यादा रहती हैं बीमार
कभी सन्निपात कभी मिरगी के दौरे उन्हें आते हैं अक्सर।
औरतों की तरह ही जब वे जाती हैं  अस्पताल
तो डॉक्टर कभी उॅगलियों से, कभी आले से
दबा-दबाकर ढूढँता-टटोलता है गदराइयों को
तब वे कुछ महसूस नहीं करतीं
न दुख, न दर्द।
तलाक दी गई औरतें
होती हैं, ज्यादा ही औरतें
क्योंकि , हारी - बीमारी में
न उन्हें दवा लगती है और न दुआ
धीरे-धीरे घुलती जाती है, उनकी जिंदगी
और एक दिन वे समा जाती हैं
धरती में सीता की तरह!

इन दिनों.........
(पेशावर आतंकी हमले में मारे गए बच्चों
      की याद में.....)
इन दिनो,
मुझे नींद नहीं आती
जबकि,
मैं आगरा या अलीगढ़ में
नहीं रहता।

न मैं मुसलमान हूँ,
न घर वापसी
न घर से बेघर होने,
न घर का न घाट का रहने
का खतरा है, मुझ पर।
फिर भी,
इन दिनों.......
मुझे नींद नहीं आती।

मैं बस्तर कभी नहीं गया
इस देश  के आदिवासियों को भी
मैं नहीं जानता,
मैं नहीं जानता उनका माओवादी बनना
और पुलिस के एनकाउण्टर में मारा जाना।
मैं सोनी सोरी से कभी नहीं मिला
और,
न ही मैंने मुँह खोला है,
इरोम शर्मिला के समर्थन में।
मैं पढ़ता-पढ़ाता जरूर हूँ
लेकिन,
बहस नहीं करता
गीता-कुरान पर,
और, न ही मेरे थैले या
आलमारी में है क्रान्ति का साहित्य
न मैं दाढ़ी रखता हूँ,
न भाषण  देता हूँ।
फिर भी,
इन दिनों.......
मुझे नीद नहीं आती।
LEYLA KAYA KUTLU

मेरा कोई बच्चा
स्कूल नहीं जाता,
मैं, किसी बच्चे की माँ नहीं हूँ,
किसी स्कूल की प्रिंसिपल भी नहीं,
जो कहूँ कि सारे बच्चे मेरे हैं
और पेशावर
हमसे बहुत दूर,
पाकिस्तान में है।
फिर भी,
इन दिनों.......
मुझे नींद नहीं आती।

हाँ हजूर.......
मैं दलित जरूर हूँ
लेकिन,
बेलछी या झज्जर में नहीं रहता,
नवाबों के शहर लखनऊ में,
रहता हूँ।
छोड़ दिया मैंने कब का
चम्बल का वह गाँव
जहाँ कभी फूलन अंगारा बनी थी।
मैं विधानसभा या पुराने लखनऊ में भी
नहीं रहता,
मेरा घर भी कहाँ है
विश्वविद्यालय के पुराने मकान में
निपट बुद्धिजीवियों के बीच रहता हूँ,
फिर भी,
इन दिनों...
मुझे नींद नहीं आती।

और सबसे बढ़कर
मैं स्त्री नहीं हूँ
अफस्पा मेरे राज्य का कानून नहीं है
मुझे चिंकी भी कोई नहीं कहता
कश्मीर  मेरे मुल्क में है
लेकिन मैं कश्मीरी  नहीं हूँ
तालिबान, बोकोहरम, आई. एस.
मैंने सिर्फ टी0 वी0 पर देखे-सुने हैं
और,
इराक, अफगानिस्तान, सीरिया, नाईजीरिया
मेरे मुल्क नहीं हैं।
फिर भी,
इन दिनों...
मुझे नींद नहीं आती।

तुलसीराम को याद करते हुए

(1)

मृत्यु जीवन का अन्त नहीं
अनंत द्वार है जीवन का।’
बुद्ध के इस दर्शन  को
समझने के लिए,
तुम्हारे जीवन से ज्यादा
मुफीद
क्या है मेरे लिए।
JORGE MUNGUIA

तुम्हारे जीवन और
तुम्हारे मृत्युबोध से
कितना सीखा जा सकता है
बुद्ध की सीख के बिना भी।

बुद्ध राजा थे
तुम राजा नहीं थे
बुद्ध क्षत्रिय थे
तुम क्षत्रिय नहीं थे
तुम हलवाहे थे
किसी बांभन के
तुम चमार थे
इस मृतप्राय समाज के
और उतने ही पवित्र
जितनी पाक थी
रैदास की कठौती।

धर्म (बौद्ध) कहता है
कि सिद्धार्थ ने देखा
एक सपना
सपने में देखे-
हाथी, घोड़ा, शेर .....
इतिहास खमोश है,
लेकिन धर्म कहता है
कि बुद्ध भागे थे
इस सपने की खातिर।

सपने भी जिंदगी से
सीधे बावस्ता होते हैं
तुलसीराम जी......
तुमने देखे होंगे
सपने में
ढोर ढगर, कुत्ते, गिद्ध
क्योंकि, तुम राजकुमार नहीं थे,
चमार थे।

यह अब इतिहास है
और सत्य है
कि तुम भागे थे
सपने नहीं, हकीकत देख।
तुम भागे थे
बीएचयू से जेएनयू तक
मार्क्स से अम्बेडकर तक
जैसे भागे थे कबीर
काशी  से मगहर तक
मौत से जीवन तक
मरते हुए समाज को
जीना सिखाते हुए।

2

धर्म नहीं, इतिहास कहता है
कि बुद्ध भागे नहीं थे
देश निकाला मिला था
उन्हें,
धर्म इतिहास नहीं होता
  अलबत्ता,  इतिहास
बन सकता है धर्म,
इतिहास वह नहीं कहता
जो धर्म कहता है।
भागे तो तुम थे
‘मुर्दहिया’ और मरते
हुए समाज से;
जहाँ मौत के लिए
मरते हुए,
जीवन की कोई आशा  नहीं होती।
YELENA LEZHEN

तुम्हारा भिनिष्क्रमण
भी कितना अजीब था
एक मौत (मुर्दहिया) से
दूसरी मौत (मर्णिकर्णिका)
की यात्रा का।
मुर्दहिया; मौत का पहला ठीया
जहाँ मौत पर मंडराते हुए गिद्ध
महाभोज में उतराते हुए गिद्ध।
मणिकर्णिका; मौत का दूसरा ठीया
यहाँ भी ब्रह्मभोज के लिए
मंडराते हैं गिद्ध,
लेकिन,  वे हैं सिद्ध ।
नोंच-नोंचकर खाते हुए
आदमी का मांस
हजारों सालों से
वे जीवित  हैं
जीवित  है  उनका  वर्ण
जीवित  है  उनका धर्म
और
जीवित  है उनका कर्म (कांड)।

गिद्धों की दृश्टि
सैकड़ों कोस की होती है
उनकी उम्र भी तो होती है
सैकड़ों बरस
मणिकर्णिका  पर  मंडराने
वाले गिद्ध भी
बड़ी पैनी - धारदार नजर रखते हैं
इसलिए  तो  वे  यहाँ
काबिज हैं
हजारों-हजार  सालों से।

उनकी उम्र भी लंबी
होती है गिद्धों की तरह,
दरअसल, दूसरों पर
पलने वालों की
उम्र लंबी होती ही है।
होरी की उम्र कितनी थी
जब उसका दम, निकल गया था
सड़क पर
गिट्टी तोड़कर ढोते हुए......

कमलेश्वर  (कितने पाकिस्तान)
के अदीब से पूछो,
दंगों में मरने वालों की
उम्र क्या थी?
हाँ, ठीक सुना आपने
कुछ गिद्ध मंडराते हैं
दिल्ली के आस-पास
और दूसरी राजधानियों में भी।
क्या कहा......?
अब दिखते कहाँ हैं गिद्ध?
अमाऽऽ   अपने मोतियाबिंद
का ऑपरेशन कराइए!
अपना रूपरंग-हुलिया
सब बदल चुके हैं गिद्ध,
आजकल बड़ी शाइस्तगी
से शिकार करते हैं
गिद्ध!

तुलसीराम देख पाते थे
इन गिद्धों को
अपनी एक आँख से
  (काने जो थे वे)
गिद्धों और इंसानों में
फर्क करने के लिए
और उन्हें पहचानने के लिए
आँखें भले ही
दोनों सही-सलामत हों
लेकिन,
दृष्टि  एक चाहिए,
तुलसीराम की तरह।


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