अंजना टंडन की कविताएँ

अंजना टंडन
विजिटिंग प्रोफेसर, राजस्थान विश्वविद्यालय. आई क्रिएट नामक संस्थान में मास्टर ट्रेनर. छः काव्य संग्रह प्रकाशित. सम्पर्क :anjanatandon87@gmail.com
मो.09314881179 

1
प्रेम 
जो मुझ से लिखा गया
वो सहज नैसर्गिक स्वभाव था
प्रेम
जो रूप तुम से पढ़ा गया
वो दुर्लभ विशिष्ट सम्भावना थी
प्रेम की यह दुहरी प्रकृति
एक तरफ
सम्प्रेषणीय होने की आकांक्षा
साथ ही
निजी अनुभव में रूपायित होने की विवशता ने
एक सम्पूर्ण दैविक गुण को
अभिशप्त अधूरे अनुभव में बदल दिया
गूँगे को गुड़ से मधुमेह होने पर
इलाज में सिर्फ नजर धोनी चाहिए....

2
देखना
एक दिन
समय से पहले
तैयार हो जाएँगी सारी स्त्रियाँ ,
और तब
पुरूष
द्रवित सा
दाड़ी खुजला कर
तिनके ढूँढ रहा होगा.....

3
कभी किसी
स्त्री के बोद्घिसत्व तक पहुँचने की यात्रा लिखी जाएगी
तो हर बार
निकले क़दम
का लौटना लिखा होगा
पीछे के आती पुकार पर
.....सुनो........
हर बार वो लौटती रही
किसी और की
जातक कथाएँ
लिखने को...

4.

महानगर के किसी छोटे घर में
लथपथ थकहार कर
रात के खाने के बाद
वो स्त्री
जब आँखें बंद करती है
तुम्हारे साथ
दरअसल वो
दौड़ आती है सरसराते ईखों के खेतों के आरपार
गाँव में चाँदनी में पगे किसी संगीतमय टीले पर
पैर हिलाती प्रेम के शगुन रोप रही होती है
जब तुम दम्भ से खींचते हो उसके वस्त्र
उसका हाथ खींच कर मनचाही जगह रखते हो
ठीक उस समय
उसकी निर्वस्त्र आत्मा
लिपट रही होती है
अपने प्रेमी के छाती के बालों की स्निग्धता में
जब तुम गतिशील हो डूब रहे होते हो
ख़ुद के आनन्द की आख़िरी प्रक्रिया में
कोई हल्के हाथों से
सुलझा रहा होता है उलझी अलकें
हौली नजरों से चूमता है उनींदी पलके
जब तुम पौंछ रहे होते हो
गर्वित गाढ़ा पुरूषत्व
वो रोप रही होती है
ख़ालिस प्रेम की छुअन
छातियों के बीच बहते पसीने में
तुम थोड़ा परे खिसक करवट ले
सुलग रहे होते हो गोल लाल सिगरेट की कगार के साथ
उसी समय कहीं
उसके होंठों की गोलाई
गहरी डूबी होती है
शुरूआती किसी रससिक्त चुम्बन में
ठीक जहाँ तुम खत्म करते हो
वहीं से वो अपनी
कलाएँ सिद्ध करती है
जिन्हें कभी वात्स्यायन भी नहीं लिख पाया
उसके लिए मुश्किल है रखना
महज जिस्मानी प्रक्रिया और प्रेम एक क़तार में

5
सृष्टि के
तमाम वृक्षों की जड़े
धरा के मनपसंद घाव
झरते सूखे पत्ते
लौटाया गया नमक
नमक
स्त्री देह की लोनाई मात्र नहीं
स्त्रीत्व का लौटाया गया उधार है
तमाम वर्जनाएँ जकड़न नही थी
तमाम पीड़ाएँ
कृतज्ञता के ककहरे सी लौटी
मोल केवल दूध का ही नहीं
ह्रदय के कृत्य सब
अपनी दक्षिणा ले लौटे
जिसके पास जो हैसियत थी
आखिर वो ही तो वो लौटता
किसी नांदा बच्चे की तरह
परमार्थ की किसी आदिम गुफ़ा में
अब भी बचने के
सारे अलोने वास उपवास
जैसे इलाज में प्रगाढ़ विश्वास
नमक के संतुलन का सम्पादन
रसोईघर से अधिक मन में है
छाती के रसघन की रसालता को
इस क्षारता से बचाने का हुनर
प्रत्येक बेटी के नाम माँ की वसीयत
ऋृणी है विज्ञान
दुनिया की हर औरत का
जिससे ज्ञात हुआ कि
जहर को मारने के लिए
नमक का लोहा चाहिए
पुरूषों की रंगशाला का सबसे खूबसूरत
और संतुष्टिप्रदत चित्र
मन की पेशानी पर उभरे स्वेद कणों के साथ दिखती स्त्री
अब बहुत दुर्लभ होता जा रहा
भरते भरते आत्मा
नोनसारी समंदर बन बैठी
खून में मिलते नमक से
ललछौंही से डेड सी में
अब कोई डूब कर नहीं मरता

स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह 'द मार्जिनलाइज्ड' नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. 'द मार्जिनलाइज्ड' मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.
आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
लिंक  पर  जाकर सहयोग करें    :  डोनेशन/ सदस्यता 

'द मार्जिनलाइज्ड' के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें :  फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें  उपलब्ध हैं. ई बुक : दलित स्त्रीवाद 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com
Blogger द्वारा संचालित.