कांशीराम से मायावती तक: दलित राजनीति और दलित स्त्री-प्रश्न

प्रियंका सोनकर
 प्रियंका सोनकर  असिस्टेन्ट प्रोफेसर दौलत राम कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय. priyankasonkar@yahoo.co.in 

दलित राजनीति में महिलाओं की संख्या कम है । दलित राजनीति में कुल मिलाकर तीन-चार ही चेहरे हैं जिनका नाम लिया जा सकता है । सुश्री मायावती जी, उमा भारती, भूतपूर्व लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार, शैलजा । दलित महिलाओं की जो स्थिति है उससे लगता है कि इन दलित महिला नेताओं का कोई सरोकार नहीं है । दलित राजनीति के लिए दलित महिलाओं के मुद्दे हाशिए पर क्यों हैं ? जबकि बाबासाहेब डॉ.भीमराव अम्बेडकर ने दलित महिला आन्दोलन की शुरूआत कर दलित महिलाओं को विभिन्न आन्दोलनों में नेतृत्व प्रदान किया । उनका मानना था कि महिलाओं की प्रगति से ही किसी भी समाज की प्रगति तय है । दलित बहुजन नेता के रूप में अपनी श्रेष्ठ छवि बनाने वाले माननीय कांशीराम जी भी अपने शासन-काल में एक दलित महिला को नेतृत्व देकर दलित राजनीति में सराहनीय काम किया । किन्तु ऐसा क्यों है कि उनके बाद ऐसा कोई भी दलित पुरुष या महिला नेता दलित राजनीति में दलित स्त्रियों की भागीदारी के विषय में अपनी चिन्ता नहीं जताता । यह सवाल एक महत्वपूर्ण सवाल है । खासतौर से तब जब पूरी दलित राजनीति डॉ.अम्बेडकर  के सिद्धान्तों पर आधारित हो । पिछले कुछ दशकों से दलित राजनीति की दशा अत्यन्त खराब हुई है । यह अपने सिद्धान्तों से दिग्भ्रमित भी हुई है । इसी सन्दर्भ को लेते हुए मैं दलित राजनीति में दलित स्त्री-प्रश्न पर प्रकाश डालना चाहूंगी ।

कांशीराम : दलित राजनीति तथा राजनैतिक पटल पर दलितों के नेता 

बाबासाहेब अम्बेडकर के बाद अगर दलितों के नेता के रूप में कोई दूसरा व्यक्तित्व दिखायी देता है तो वह हैं कांशीराम । कांशीराम दलितों के मसीहा के रूप में जाने जाते थे । वे बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक, अध्यक्ष और दलितों के सामाजिक-राजनीतिक अधिकार के लिए लगातार संघर्ष करने वाले जुझारू नेता थे “आधुनिक भारत के इतिहास में कांशीराम ही वह प्रथम महान व्यक्ति हैं, जिन्होंने दलित शक्ति को संगठित कर शासन और सत्ता के सिंहासन पर बिठाया । इस अद्भुत संगठनकर्ता ने पहले पढ़े-लिखे कार्यरत लोगों को संगठित कर ‘बामसेफ’ और डी.एस.फोर जैसे गैर-राजनीतिक संगठनों का गठन किया और फिर ‘बसपा’ जैसी राजनीतिक पार्टी का गठन कर देश में दलित शक्ति का नया इतिहास रचा । संगठन क्षमता के जादूगर कांशीराम ने ब्राह्मणवादी चेतना के सबसे बड़े क्षेत्र उत्तर-प्रदेश को ही अपना कार्यक्षेत्र चुना और सफलता पायी ।’’

कांशीराम ने अपने मिशन को सफल बनाने के लिए वैचारिक स्तर पर तैयारी आरम्भ की । ज्योतिबा फुले, पेरियार और डॉ.अम्बेडकर के साहित्य का उन्होंने गहरा अध्ययन किया तथा उसके अनुसार ‘भारतीय समाज की जातिवादी संरचना’ (ब्राह्मणवादी समाज व्यवस्था)  तोड़कर बहुजन समाज की मुक्ति’ को अपने जीवन का लक्ष्य बनाया । यह ‘बहुजन समाज’ और कोई नहीं बल्कि देश की दलित पिछड़ी और अल्पसंख्यक जनता थी जिसका ब्राह्मणवादी समाज व्यवस्था ने सदियों से शोषण किया है । कांशीराम ने अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए 1964 में नौकरी छोड़ दी और पूरी तरह सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन के लिए स्वयं को समर्पित कर दिया ।

नौकरी छोड़ने के बाद  1964 में  कांशीराम ‘रिपब्लिकन पार्टी’   में अपनी सक्रिय भूमिका निभा रहे थे । ‘रिपब्लिकन पार्टी’ का हश्र और कांग्रेस के साथ उसकी घालमेल से वे काफी निराश थे तथा ‘दलित पैंथर’  छह घटकों में बंट चुका था । इसके अलावा ‘मॉस मूवमेंट’ नाम से एक और संगठन बन चुका था । शीघ्र ही उससे उनका मोहभंग हो गया । दरअसल, कांशीराम की नजर में आर.पी.आई., दलित पैंथर और अन्य दलित संगठन, दलित अस्मिता और चेतना को ठीक से परिभाषित नहीं कर पाए । साथ ही उन्होंने कांग्रेस के साथ उनकी घालमेल से चिढ़कर इस समय को ‘चमचा युग’ की संज्ञा दी । वे ज्योतिबा फुले के सत्यशोधक आंदोलन से निकली बहुजन थीसिस तथा डॉ.अम्बेडकर की ‘ऐनीहिलेशन ऑफ कॉस्ट’ को पढ़कर इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि डॉ.अम्बेडकर का कहना ठीक है कि एक जाति के आधार पर बनाया गया संगठन नष्ट हो जाएगा । इसलिए वे न केवल मजदूरों के संघर्ष से परिचित थे बल्कि नवबौद्धों की समस्याओं को भी जानते थे । दलितों पिछड़ों और सरकारी कर्मचारियों की पीड़ा का अहसास भी उन्हें था किन्तु इस समझ  के पीछे एक दलित आंदोलन की तैयारी थी ।


अस्सी का दशक दलित राजनीति के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण था । जिस समकालीन दलित विमर्श की चर्चा जोरों पर थी, उसका उदय इसी काल में हुआ । इसी अस्सी के दशक में दलित राजनीति को अपना स्वतन्त्र अस्तित्व बनाने का अवसर मिला । 1980 में कांशीराम ‘बामसेफ’ (बैकवर्ड एंड मायनारिटीज शेड्यूल्ड कास्ट इंप्लाई फेडरेशन) के माध्यम से भारतीय समाज में एक नया दलित विमर्श लेकर अवतरित हुए । ‘रिपब्लिकन पार्टी’ के पतन के बाद कांशीराम ने दलित वर्गों को लामबंद करना शुरू किया । इसके तहत उन्होंने सबसे पहले दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक समुदाय के कर्मचारियों का फेडरेशन (बामसेफ) कायम किया, जिसकी स्थापना तो यद्यपि 1978 में ही उन्होंने कर ली थी पर उसका व्यापक असर 1980 में देश में दिखाई दिया । इस नए दलित विमर्श ने दलित वर्गों को सबसे ज्यादा प्रभावित किया ।

कांशीराम ने 6 दिसम्बर 1981 को डी.एस.फोर. संगठन बनाया अर्थात ‘दलित शोषित समाज संघर्ष समिति’ । इसके अन्तर्गत उन्होंने दलितों के छोटे-मोटे क्षेत्रीय स्तर के अधिकारों के लिए संघर्ष किया । यह आन्दोलन का वह प्लेटफार्म था, जिसने आगे चलकर राजनैतिक संघर्ष का रूप धारण किया । यह एक क्रान्तिकारी संगठन सिद्ध हुआ । इसी का विवादास्पद और प्रतिक्रियावादी नारा था-“तिलक तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार ।” देश की दलित राजनीति की दिशा तय करने में इस संगठन ने अपनी महान भूमिका निभाई । इस संगठन के बैनर तले कांशीराम ने लाखों स्वयंसेवकों के साथ देश भर में यात्राएं कीं ।

1982 में कांशीराम ने विभिन्न राज्यों के विधानसभा चुनावों में राजनीतिक प्रयोग के लिए डी.एस.फोर. को एक सीमित कार्यवाही के लिए उतारा जिसमें उन्हें अप्रत्याशित जीत भी हासिल हुई । किन्तु इस सीमित राजनितिक कार्यवाही का उद्देश्य चुनाव जीतना नहीं था बल्कि दलित वर्गों के लोग अपने अधिकारों के प्रति कितने जागरूक हैं? यह देखना था । 1984 में कांशीराम ने डी.एस.फोर. की राजनीतिक कार्यवाही से उत्साहित होकर ‘बहुजन समाज पार्टी’ की स्थापना की । इसी वर्ष उन्होंने लोकसभा का भी चुनाव लड़ा । कांशीराम ने 1988 तक अस्पृश्यता, अन्याय, असुरक्षा और असमानता के विरूद्ध एक सघन सामाजिक कार्यक्रम चलाया । 1990 तक उन्होंने पूरे देश में सामाजिक परिवर्तन और आर्थिक मुक्ति का आन्दोलन चलाया ।

14 अप्रैल 1984 में बहुजन समाज पार्टी की स्थापना के बाद की लोकसभाओं और राज्य की अनेक विधानसभाओं में अपने उम्मीदवार खड़े किये और विजयी भी हुए । इसका प्रभाव बढ़ता ही रहा । मायावती जैसी जुझारू युवा महिला सहयोगी के कारण इस दल को और महत्व मिला । इस पार्टी ने उत्तर प्रदेश में सत्ता हासिल की, जिसमें मायावती उसकी मुख्यमन्त्री बनीं।


सामाजिक परिवर्तन और आर्थिक मुक्ति के ये दोनों कार्यक्रम भारतीय राजनीति में एक नए युग का सूत्रपात थे । ये कार्यक्रम क्रांतिकारी थे, क्योंकि इन्होंने दलित विमर्श को ही नहीं, दलित राजनीति को भी नया आयाम दिया था । बसपा के इन कार्यक्रमों ने दलित समाज में जबरदस्त ध्रुवीकरण पैदा किया और वे हजारों वर्षों से असमानता पर टिकी व्यवस्था को बदलने के कार्यक्रम पर बसपा से जुड़ते चले गये ।

‘बहुजन समाज पार्टी, की वैचारिक जड़ें भारतीय समाज की जन्म आधारित वर्ण-व्यवस्था (जाति-प्रथा) के अन्दर है । इसलिए कांशीराम की विचारधारा सदियों से भारतीय समाज में होने वाले जातीय भेदभाव, शोषण-उत्पीड़न और सामाजिक अत्याचार की नकारात्मक प्रतिक्रिया है ।’ स्वयं कांशीराम कहते हैं कि “मैं सामाजिक न्याय से ज्यादा सामाजिक अन्याय को बसपा के विस्तार के लिए महत्वपूर्ण मानता हूं । जितना ही सामाजिक अन्याय बढ़ेगा, बहुजन समाज में ब्राह्मणवादी व्यवस्था के खिलाफ़ आक्रोश बढ़ेगा और सामाजिक बदलाव की प्रक्रिया तेज होगी ।”(दिल्ली में ‘प्रेस से मिलिए’ कार्यक्रम में) कंवल भारती कांशीराम के संबंध में लिखते हैं...“अस्सी का दशक दलित विमर्श के उदय और राजनीति पटल पर दलित नेता कांशीराम का उभरना, याद किया जायेगा । भारतीय राजनीति में सामाजिक परिवर्तन की दस्तक देने का श्रेय उन्हीं को जाता है । यह समय दलितों की राजनीतिक चेतना के लिए भी जाना जायेगा ।”

दलित राजनीति में कांशीराम ने जाति के प्रश्न को जोर-शोर से उठाया, और उसे धारदार बनाया, जबकि पूर्व के नेताओं ने वर्ग की समस्या पर ही अपना सर्वाधिक ध्यान दिया था । यहां तक कि जगजीवन राम भी गरीबी के विरूद्ध आन्दोलन चाहते थे, जाति के विरूद्ध नहीं । किन्तु यह कांशीराम ही थे, जिन्होंने कहा था- “गरीब ब्राह्मण भी चमार के हाथ का छुआ पानी नहीं पीते । दोनों ही गरीब हैं, लेकिन उनके बीच जाति की खाई है, जो गरीब-गरीब को एक नहीं होने देती । इसलिए मैं कभी वर्ग-संघर्ष का पक्षधर नहीं रहा । मैं तो जाति-संघर्ष चाहता हूं  । कांशीराम के इन विचारों में डॉ.अम्बेडकर ही बोलते थे ।”

कांशीराम के लिए वर्ग-संघर्ष नहीं जाति-संघर्ष ज्यादा विचारणीय था । उनके अनुसार भारत का सम्पूर्ण इतिहास ही जातीय संघर्ष का इतिहास है । भारत जाति प्रधान समाज है और इस मायने में विश्व का एकमात्र विरल व विचित्र समाज है । लेकिन सिर से पैर तक एक जाति समाज होने के बावजूद इसकी सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक तथा सांस्कृतिक इत्यादि समस्याओं के पीछे जाति ही प्रधान कारक है, यह तथ्य कांशीराम से पहले और डॉ. अम्बेडकर के बाद किसी राष्ट्र नायक ने प्रमुखता से नहीं उभारा । हर समस्या के पीछे जाति की भूमिका उजागर होने के साथ ही जहां कांशीराम के सौजन्य से भारत में यह बौद्धिक विमर्श का प्रधान मुद्दा बनी, वहीं जाति ने अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर समाज विज्ञानियों को अभूतपूर्व रूप से आकर्षित किया । दलित राजनीति में कांशीराम का योगदान सदैव स्मरणीय रहेगा ।
   
       
मायावती : दलित राजनीति के बीच से उभरी एक सशक्त राजनीतिक दलित महिला 

 ‘आज के समय में दलित मुक्ति का राजनीतिक रास्ता दलित समुदाय की सर्वाधिक ठोस और दृश्यमान अभिव्यक्ति है । दलित समुदाय के एक व्यक्ति का देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर पहुंचना और दलित समुदाय की एक महिला का हिन्दी प्रदेश के एक बड़े राज्य के मुख्यमंत्री के पद पर आसीन होना पिछले दशक के बदले हुए राजनीतिक परिदृश्य का सूचक है । देश की आजादी के बाद दलित चेतना का ऐसा प्रदर्शन इससे पहले नहीं हुआ था । दलित राजनीति, जिसका प्रारंभिक रूप हमें डॉ.अम्बेडकर के नेतृत्व में चले आंदोलनों में दिखाई देता है आज एक नए दौर में पहुंच चुकी है ।”

राजनीति में दलितों को स्थापित करने के लिए कांशीराम ने राष्ट्रीय स्तर पर प्रयास किया । उन्होंने बसपा के नेतृत्व में मायावती और अन्य प्रतिनिधियों को उतारा । पहली बार राजनैतिक पटल पर एक दलित स्त्री का आना, सम्पूर्ण दलित समाज के लिए यह महत्वपूर्ण घटना थी । बद्रीनारायण लिखते हैं कि “1980 के दशक के अन्त में उत्तर-प्रदेश के राजनीतिक परिदृश्य में एक बड़े बदलाव का संकेत देते हुए कांशीराम ने एक दलित स्त्री, मायावती को एक जननेत्री के रूप में प्रस्तुत किया और लोगों से उनका समर्थन करने का अनुरोध किया । यह दिखाने के लिए कि उन्हें मायावती की योग्यताओं पर कितना विश्वास था, उन्होंने अपने कार्यालय में मायावती के तीन बड़े-बड़े चित्र भी टंगवा दिए ।”

 कांशीराम ने मायावती के हरसंभव विकास के लिए अपना सहयोग दिया । कांशीराम का राजनीतिक आंदोलन तीन सिद्धांतों पर आधारित था पहला जातीय सम्मान, दूसरा भागीदारी और तीसरा वोट को लुटने और बिकने से बचाना । उन्होंने जाति के उभार को अपनी राजनीति के केन्द्र में रखा ।समकालीन परिदृश्य में मायावती एकमात्र ऐसी सशक्त दलित महिला हैं, जिन्होंने सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन का नया सूत्र गढ़ा । वह ऐसी पहली दलित मुख्यमंत्री हैं जिन्होंने सत्ता में आने के बाद दलितों का ब्राह्मणों के साथ गठबंधन के लिए सोचा । किन्तु ऐसा करने से सपा और बसपा में दरारें उत्पन्न होने लगीं । इसे भाजपा की चाल कहें या उसकी महानता की, उसने सपा और बसपा में दरार का बीज बोकर बसपा के साथ हाथ मिलाने की सोची । सरकार बनने के बाद से ही सपा-बसपा गठबंधन को तोड़ने की कोशिश शुरू हो गई थीं । भाजपा ने मायावती को मुख्यमंत्री बनाने का लोभ दे कर सत्ता का सूत्र अपने हाथों में रखने में सफलता हासिल कर ली । 1993 से मई 1995 तक सपा-बसपा में भाजपा द्वारा अनर्गल टिप्पणियों की वजह से राजनीतिक तनाव पैदा किया गया । परिणामस्वरूप गठबंधन टूट गया और जून 1995 में मायावती भाजपा के समर्थन से मुख्यमंत्री बन गईं । दूसरी बार 1997 में रामविलास पासवान को हराकर और 2002 में मायावती भाजपा के सहयोग और समर्थन से मुख्यमंत्री बनीं । इन चुनावों के माध्यम से बहुजन समाज, एस.सी., एस.टी.ओबीसी, गरीब, मजदूर, अल्पसंख्यक और अन्य सामाजिक रूप से कमजोर लोगों के अधिकारों और उनको राजसत्ता प्राप्त कराने का प्रयास किया । आरंभ में उन्होंने आर्थिक मुद्दे को भी उठाया तथा दलितों पर होने वाले अत्याचारों और आरक्षण के मुद्दों पर भी संघर्ष किया किन्तु जल्दी ही ये सब राजनीतिक सत्ता के आगे गौड़ हो गये । इस सन्दर्भ में प्रफुल्ल कोल्ख्यान लिखते हैं कि- ‘‘संसदीय लोकतन्त्र के रास्ते (जिस पर डॉ.अम्बेडकर बार-बार जोर देते थे) जाति-उन्मूलन तथा समता की स्थापना का यही एकमात्र रास्ता उन्हें लगता था । लेकिन उनके अनुयायियों ने उनके बताए रास्ते को छोड़कर व्यक्तिगत स्वार्थों को साधने का रास्ता अपनाया । रिपब्लिकन पार्टी के आधा दर्जन धड़े इसलिए हुए कि हर नेता अपनी शक्ति और अपना वैभव बढ़ाने की कोशिश में लगा रहा ।  इस उद्देश्य के लिए वे कभी कांग्रेस की गोद में खेलते रहे, कभी भाजपा और कभी शिव सेना जैसी रूढ़िवादी और सांप्रदायिक पार्टियों का खिलौना बने  रहे । उत्तर भारत की दलित राजनीति में भी यही हुआ ।’’

बसपा दलितों के उत्थान के लिए जिन सिद्धान्तों को लेकर चल रही थी, सत्ता प्राप्ति के उद्देश्य के चलते वह उन सिद्धान्तों से बाद में मुंह मोड़ती भी दिखाई दी । सामाजिक परिवर्तन और सामाजिक न्याय की बात करने वाले कांशीराम जी भी तथा उनके बाद आये दलित नेताओं ने सामाजिक न्याय और परिवर्तन का लक्ष्य भूलकर केवल सत्ता की प्राप्ति के लिए जुट गये । इस संबंध में प्रफुल्ल कोल्ख्यान का मत देखने योग्य है- ‘‘बसपा के संस्थापक कांशीराम जो कभी खड़ी व्यवस्था को पड़ी व्यवस्था बनाने की बात करते थे और तिलक तराजू और तलवार के खिलाफ़ मोर्चा लेने का संकल्प व्यक्त करते थे, सिद्धान्तहीन और बेमेल समझौतों के रास्ते सिर्फ सत्ता हथियाने की राजनीति का समर्थन करने लगे । उनके अनुयायी उन्हें अम्बेडकर से भी बड़ा दलित नेता सिद्ध करने के लिए यह तर्क देने लगे किए अम्बेडकर जो काम नहीं कर सके (अर्थात दलित सरकार नहीं  बना सके) यह उन्होंने कर दिखाया । मायावती ने सोचा कि यदि वे राजसी ठाटबाट में वसुंधरा राजे जैसी महारानियों को मात दे देंगी तो दलित समाज अपने आप उठ जाएगा । इसलिए उन्होंने पार्टी के पद और टिकट बेचकर अपने लिए धन संपत्ति जुटाने तथा भाजपा एवं कांग्रेस जैसी रूढ़िवादी पार्टियों से समझौता कर सत्ता में आने का जुगाड़ ही किया । इन पार्टियों द्वारा बार-बार दुत्कारे जाने पर भी उन्होंने अपना रास्ता नहीं बदला ।”


इस प्रकार बीएसपी का प्राथमिक उद्देश्य सत्ता प्राप्ति रह गया । इसके लिए उसने कई बार अपनी विचारधारा के विरूद्ध जाकर ऐसी पार्टियों से समझौता किया जिन्होंने हमेशा दलितों के अधिकारों की अनदेखी की । दलित राजनीति की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है कि दलित आन्दोलन जिस अम्बेडकरवादी विचारधारा को लेकर चला क्या दलित राजनीति डॉ.अम्बेडकर के उसी विचारों और सिद्धान्तों के पथ पर चला या उसकी दिशा में भटकाव दिखायी देता है ? इसके अतिरिक्त मायावती के बाद दलित राजनीति में कोई अन्य सशक्त दलित महिला क्यों नहीं दिखायी देती है ? क्या मायावती के तानाशाही रवैये से दलित स्त्रियां राजनीति में आने से हिचकती हैं ? दलित राजनीति में दलित महिलाओं की कितनी भागीदारी है ? प्रश्न यहां यह भी है कि जिस दलित स्त्री विमर्श की शुरूआत और लेखन की चर्चा अभी तक होती रही है उनके लेखन में मायावती का उल्लेख तक नहीं दिखायी देता है ? इसके पीछे क्या कारण है ? दलित राजनीति में मायावती ही एकमात्र सशक्त दलित नेता के रूप में दिखायी देती हैं फिर दलित स्त्रियां उन्हें अपना आइकन क्यों नहीं मानतीं ? सवाल यह भी है कि मायावती जिनका हाथ पकड़ कर राजनीति में आयी क्या उन्हीं के कदमों पर चलीं ? दलित नायकों की मूर्तियों का निर्माण कराकर उनके सिद्धान्तों को प्रतिफलित करने और उन्हीं के आदर्शों पर वे चली या नहीं ? दलित समाज के लिए मायावती ने क्या किया ? दलित समाज की महिलाओं की वह प्रेरणा क्यों नहीं बन पायीं । अपने राज्य (उत्तर-प्रदेश) में दलित महिलाओं की समस्या का वे कितना समाधान कर पायीं ? बदायूं में दलित महिला के बलात्कार पर उनकी चुप्पी क्यों रही ? मैला प्रथा जैसी सामाजिक बुराई आज भी उत्तर-प्रदेश राज्य में उसी तरीके से मौजूद है इसके उन्मूलन के लिए उन्होंने क्या किया ?  आदि प्रश्नों को सामने रखकर सही मूल्यांकन का प्रयास किया जाएगा ।
                                                                                                                                                                     मायावती ने दलितों और दलित महिलाओं के लिए क्या किया?

आज किसी भी राजनीतिक दल के लिए दलितों की खुले रूप में उपेक्षा करना संभव नहीं है । दलित राजनीति के लिए यह एक नया युग ही था जब उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी ने सत्ता हासिल की थी । ‘एक दलित महिला के मुख्यमंत्री बनने से यह आशा की जा रही थी कि अब जातिवाद के विरूद्ध एक नए आंदोलन का सूत्रपात होगा, परन्तु डॉ.अम्बेडकर के नाम पर भव्य उद्यान और स्वमूर्तियां स्थापित करने के अतिरिक्त दलित समुदाय की प्रगति और उत्थान की दिशा में कोई महत्वपूर्ण कार्य नहीं हो सका । ऐसे भी आरोप लगाये गये कि मायावती केवल चमार जातियों के उत्थान के बारे में सोचती हैं । आश्चर्य की बात यह थी कि बाद में मायावती ने धुर दक्षिणपंथी भाजपा का समर्थन लेना स्वीकार किया, जबकि उत्तर प्रदेश ही नहीं, संपूर्ण देश भर में जातिवादी वर्ण व्यवस्था के जरिए दलितों के और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के जरिए अल्पसंख्यकों के अलगाव की व्यवस्था भी यही पार्टी कर रही थी ।’इस प्रकार बीएसपी और कांशीराम-मायावती का नेतृत्व अम्बेडकरवादी विचारधारा ‘समता, स्वतन्त्रता और बंधुता’ से भटककर सत्ता प्राप्ति का पर्याय बनकर रह गया ।

अपने स्त्रीकाल के दलित स्त्रीवाद विशेषांक के एक साक्षात्कार में तुलसीराम जी ‘मायावती और दलित स्त्री राजनीति’ में दलित लेखिकाओं की नगण्य भूमिका को रेखांकित करते हुए कहते हैं कि ‘ब्राह्मणवाद को मायावती ने स्थापित किया । उसने ‘हाथी नहीं, गणेश है, ब्रह्मा विष्णु महेश है’ का नारा दिया । वह दलित राजनीति की भटकी हुई दिशा पर अपनी चिन्ता व्यक्त करते हैं । इस तरह की राजनीति से दलितों की मुक्ति संभव नहीं है । उनका मानना है कि यह दलित आंदोलन नहीं है बल्कि दलित सत्ता का आंदोलन है, जो दलित आंदोलन से भिन्न है । सामाजिक आंदोलन का हमेशा राजनीतिक आंदोलन पर वर्चस्व होना चाहिए ।

आज के दलित आन्दोलन की उल्टी धारा पर निराशा व्यक्त करते हुए तुलसीराम जी कहते हैं कि “आज लोग पहले सत्ता की चिन्ता करते हैं फिर सामाजिक बदलाव की बात करते हैं । बिना सामाजिक जागरूकता ना सत्ता मिलती है और ना ही सामाजिक बदलाव आता है । सामाजिक जागरूकता का ही परिणाम था कि दलितों को सत्ता मिली और सत्ता मिलते ही सामाजिक जागरूकता का अभियान बन्द कर दिया । मायावती का हवाला देते हुए वे कहते हैं कि ‘दलित स्त्री सत्ता में चार बार मुख्यमंत्री बनी परन्तु एक भी दलित महिला को किसी भी मंच पर नहीं आने दिया । नेता के रूप में भी किसी को मंच पर नहीं आने दिया । दलित राजनीति में अगर स्त्री सत्ता में है तो वह सबसे अधिक नुकसान दलित स्त्री का करती है ।’


दलित स्त्री आंदोलन कोई विशिष्ट राजनीतिक पहल नहीं कर रहा है, उसे सिर्फ लेखन तक ही सीमित मान कर देखा जाता रहा है कुछ लोगों का ऐसा मानना है । जिस तरह से विभिन्न साहित्यिक और सामाजिक आन्दोलन किसी न किसी राजनीतिक विचारधारा या राजनीति से जुड़े हुए हैं वैसा दलित स्त्री आन्दोलन क्यों नहीं है? दलित स्त्री आन्दोलन राजनीति जैसे विषय पर चुप्पी क्यों साधे हुए है ? प्रसिद्ध आलोचक मैनेजर पाण्डेय का मानना है कि “भारत जैसे देश में राजनीति में महिलाओं ने अपने कदम रखें हैं । किन्तु वे किसी न किसी पार्टी से जुड़े रहकर ही अपना स्थान बना पाई हैं खासतौर से जो पुरुषों द्वारा बनायी गयी पार्टियां हैं । उनके अनुसार स्त्रियों से राजनीतिक पहल की उम्मीद करना इसलिए ज्यादती होगी क्योंकि जो स्त्रियां राजनीति और सत्ता में हैं उन्हें स्त्रियों की कितनी चिन्ता है ? मायावती हो या ममता बनर्जी, स्त्रियों की यातना की चिन्ता तो है नहीं, फिर राजनीतिक पहलकदमी की चिन्ता क्यों होगी ।”   तुलसीराम और मैनेजर पाण्डेय के विचारों से यह स्पष्ट है कि मायावती हो या और कोई महिला राजनीतिज्ञ किसी ने भी दलित महिलाओं के उत्थान के लिए न तो कोई विशेष योजना बनाई और नहीं कोई ठोस कदम उठाया ।

मायावती  ने अपने शासन काल में दलित महिलाओं के मुद्दों पर कितना ध्यान दिया यह दलित स्त्री लेखन और दलित स्त्री विमर्श के लिए गहन-चिंतन का विषय है । दलित महिलाएं गांवों में अभी भी खेतों में शौच के लिए जाती हैं । मैला प्रथा तबसे लेकर अब तक जारी है । दलित महिलाओं को अभी भी डायन और चुड़ैल करार देकर बस्तियों में नंगा घुमाया जाता है । वे गांव और शहर में बलात्कार की शिकार हैं । स्वच्छ पानी की समस्या, शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएं, समान वेतन, रोजगार आदि समस्याओं से दलित स्त्री निरन्तर जूझती है, इन महिलाओं के लिए मायावती ने एक दलित राजनीतिक नेता होने के नाते अपने शासन काल में कितनी योजनाएं लागू कीं ? समानता, स्वतन्त्रता और बंधुता के राह पर क्या उनमें राजनीतिक चेतना दिखायी देती है?
दलित राजनीति में मायावती  का ऐसा ही चेहरा दिखायी देता है जो ब्राह्मणवाद के गठबंधन से सरकार चला रही थीं जबकि डॉ.अम्बेडकर ब्राह्मणवाद और पूंजीवाद को दलितों का शत्रु मानते थे । अम्बेडकरवादी विचारधारा से ओत-प्रोत दलित स्त्री विमर्श मायावती को किसी भी राजनैतिक नेता के रूप में अपना प्रेरणा स्रोत नहीं मानता है । दलित स्त्री लेखन में शायद ही कहीं  मायावती की चर्चा सकारात्मक रूप में की जाती हो ।

2011 में रजनी तिलक और रजनी अनुरागी के संपादन में आयी पुस्तक ‘समकालीन भारतीय दलित महिला लेखन’ में एक अध्याय ‘मेरे जीवन का संक्षिप्त सफरनामा : कु.मायावती’ के नाम से सम्मिलित है, जिसमें उनके निजी जीवन के अनुभव तथा राजनीतिक जीवन में उनका प्रवेश पर, चर्चा की गयी है । जबकि इसके अलावा अनिता भारती की पुस्तक ‘समकालीन नारीवाद और दलित स्त्री का प्रतिरोध’ में कहीं भी राजनीतिक महिला के रूप में मायावती पर एक पृष्ठ भी नहीं है । सम्यक प्रकाशन से मंजू सुमन के संपादन में ‘दलित महिलाएं और दलित नारी: एक विमर्श’ पर दो पुस्तकें आईं, इनमें से एक पुस्तक में एच.एल.दुसाध का केवल एक लेख मायावती पर है वो भी एक पुरुष लेखक का है कारण यह है कि लेखक बहुजन पार्टी से प्रभावित हैं । यह साफ है कि दलित महिलाएं मायावती को अपना आदर्श नहीं मानती । इसीलिए मायावती दलित स्त्री विमर्श और लेखन में उतनी जगह नहीं घेर पाती जितनी उन्हें अपनी जगह बनानी चाहिए थी ।

प्रश्न यह है कि वर्षों से दलित महिलाओं के साथ अवमानना की घटना घटती रही । मायावती सरीखी अन्य दलित महिला नेता दलित महिलाओं की बजबजाती जिन्दगी से उन्हें मुक्ति दिलाने में क्यों सफल नहीं हुईं ? दलित पुरुष नेताओं द्वारा दलित महिलाओं के नारकीय जीवन का संज्ञान न लेना एक हद तक उनकी पितृसत्तात्मक सोच की तरफ इशारा करती है किन्तु जब दलित महिला नेता ही दलित स्त्रियों की दशा की खबर न लें तो उनकी इस प्रकार की उपेक्षा का दोष हम किसी और पर नहीं डाल सकते हैं ।

आजादी के 68 वर्ष बाद भी देश के विभिन्न राज्यों में मैला प्रथा अभी भी जीवित है और इस घृणित कार्य को मजबूरन दलित महिलायें ही अपने सिर पर उठाये घूम रही हैं, जिनके बेहतर रोजगार तथा आर्थिक स्थिति की जिम्मेदारी सरकार नहीं उठा रही है । दलित स्त्री विमर्श को सामाजिक-आर्थिक पहलुओं के अतिरिक्त राजनीतिक पहलू पर विचार करने की अधिक आवश्यकता है, तभी उसकी राजनीतिक चेतना विकसित हो पायेगी । मीरा कुमार लोकसभा अध्यक्ष पद को सुशोभित करने वाली देश की पहली दलित महिला नेता के रूप में जानी जाती हैं । दलित महिला राजनेता मीरा कुमार ने अपने कार्यकाल में दलित स्त्री मुद्दों पर न तो अपनी चिन्ता जतायी और न ही देश भर में गैर-कानूनी ही रूप से चल रहे मैला प्रथा और इसमें मजबूरन लगी दलित महिलाओं का संज्ञान लिया । हरियाणा के अम्बाला शहर से सांसद दलित चेहरा शैलजा कुमारी ने भी इस मुद्दे पर कुछ न करने की मजबूरी जता दी । उमा भारती जो सत्ता में बी.जे.पी. की तरफ से केन्द्रीय जल संसाधन मंत्री हैं । जिनके ऊपर गंगा जैसी पवित्र नदी की स्वच्छता का भार 2014 में सौंपा गया । किन्तु दलित महिलाओं के मैला प्रथा, उनके मुद्दे, पानी की समस्या के विषय में उन्होंने कोई योजना नहीं बनाई है । मैला-प्रथा को हटाना इनका प्रथम मुद्दा न होकर गंगा नदी की सफाई इनके लिए महत्वपूर्ण मुद्दा है । यह साफ है कि दलित महिला नेताओं ने अपनी कुर्सी के लालच में दलित महिलाओं का वोट तो लिया है किन्तु उनकी सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक दशा तथा उनके सामाजिक विकास में कोई योगदान नहीं दिया ।

निष्कर्ष रूप में हम देख सकते हैं कि दलित राजनीति में जो भी दलित महिला नेता हैं उनमें दलित स्त्री के प्रश्नों को लेकर कोई खास चिन्ता नहीं दिखायी देती है । सब अपनी ढपली-अपना राग अलापते नज़र आ रहे हैं । दलित राजनीति आज डॉ.अम्बेडकर के सिद्धान्तों को छोड़कर अपने हितों की पूर्ति के लिए दांवपेंच खेल रहा है । निजस्वार्थ ही दलित राजनीति का मकसद बनता जा रहा है । उत्पीड़ित, शोषित, दमित, दलित स्त्रियों की समस्याएं हाशिए पर रख दिये गये हैं । आज भी दलित स्त्रियों को कहीं-कहीं चुनाव में खड़ा होने पर उनके साथ बलात्कार किया जाता है, कहीं सरपंच बनने पर उनको नंगा कर पूरे गांव-मोहल्ले में घुमाया जाता है । तिरंगा झंडा फहराने पर उनको अश्लील गालियां दी जाती हैं, पंचायती चुनाओं में यौन-शोषण का शिकार हो रही हैं इत्यादि समस्याओं से निरन्तर दलित महिलाएं जूझ रही हैं । इसलिए जब-तक दुनिया की आधी आबादी में सबसे उत्पीड़ित और निम्न मानी जाने वाली दलित स्त्री को मुक्ति नहीं मिलती तब तक विकास के सभी दावे झूठे सिद्ध होंगे । आप उन्हें प्रलोभन देकर और झूठे वायदे करके दलित राजनीति का स्तम्भ नहीं खड़ा कर सकते ।

संदर्भ सूची
1. दलित विमर्श की भूमिका, पेज नं.87-91
2.डॉ.भीमराव अम्बेडकर ने क्लास और कॉस्ट मॉडल का समन्वय कर एक नई राजनैतिक पार्टी ‘भारतीय  रिपब्लिकन पार्टी’ की स्थापना का विचार किया था । यह दुःखद था कि उनका सपना पूरा नहीं हो पाया और    उनकी मृत्यु हो गई । अपनी मृत्यु से पूर्व उन्होंने भारतीय जनता के नाम एक खुला पत्र लिखा जिसमें उन्होंने  रिपब्लिकन पार्टी की संकल्पना, समानता, बंधुत्व और स्वतन्त्रता के मूल्यों को बुलंद करने वाले संगठन के रूप  में की । अपनी मृत्यु से पहले डॉ.अम्बेडकर ने एक बड़ी पार्टी को स्थापित करने की इच्छा जाहिर की जिसे  ‘रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया’ के नाम से जाना जाता है । ‘रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया’ का पहला सत्र  अक्टूबर 1957 नागपुर में हुआ था; दूसरा औरंगाबाद में 1959 में; तीसरा अलीगढ़ में 1961 में, चौथा  अहमदाबाद में 1963  में, पांचवां दिल्ली में 1966 में, छठा नागपुर में 1969 में, तथा सातवां पुणे में 1975 में  हुआ था । ‘रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया’ भारतीय संविधान के न्याय, स्वतन्त्रता, समानता तथा भाईचारा  जैसे सिद्धांतों को मानती थी । वह इस अभिप्राय को भी स्वीकार करती थी कि संविधान का उद्देश्य इन प्रयोजनों  को संसदीय लोकतंत्र के माध्यम से स्थापित करना है ।
3. भारत की यथास्थित व्यवस्था के विरोध स्वरूप जिस आन्दोलन का उदय हुआ वह ‘दलित पैंथर आन्दोलन’ था । यह सामन्तवादी हिन्दू राजशाही का कट्टर विरोधी था जो यथास्थिति के स्थान पर क्रान्ति या समग्र क्रान्ति द्वारा सामाजिक न्याय स्थापित करना चाहता था जिसमें अम्बेडकर और मार्क्स विचारधारा की झलक थी । जिस समय 1971 में आर.पी.आई. में टूट-फूट चल रही थी उस समय युवाओं का एक नया संगठन ‘दलित पैंथर’ तेजी से राजनैतिक पटल पर उभर रहा था । राजा ढाले और नामदेव ढसाल इसके नेता थे । यह आन्दोलन अमेरिका के ‘ब्लैक पैंथर’ आन्दोलन से प्रभावित था । इस संगठन का अमेरिका के ‘ब्लैक पैंथर’ आन्दोलन से केवल नाम ही नहीं लिया गया बल्कि जिस प्रकार से ब्लैक पैन्थर ने ऑफिस के पद धारण किए थे वैसे ही इस संगठन ने भी धारण किये । ये लोग अपने को पैंथर कहते थे । क्योंकि उनका मानना था कि अपने अधिकारों के लिए पैंथर की भांति लड़ा जाए तथा अब वे अत्याचारियों की शक्ति तथा ताकत से नहीं दबेंगे । राजा ढाले के लेख ‘काला स्वतन्त्रता दिन’ जो 15 अगस्त 1972 को साधना के विशेष अंक में प्रकाशित हुआ था, ने अत्यधिक जागरूकता पैदा की तथा पूरे महाराष्ट्र में दलित पैन्थर को सार्वजनिक कर दिया ।  दलित पैंथर आन्दोलन ने दलित साहित्य आंदोलन की भी नींव रखी । बाबू राव बागुल, पी.ई.सोनकांबले आदि ने कविता, कथा साहित्य,     आत्मकथा के माध्यम से दलित राजनीति को एक दिशा दी और इन पैंथरों ने जातिवाद व ब्राह्मणवाद के          खिलाफ़ जुझारू संघर्ष का ऐलान किया ।
4. दलित विमर्श की भूमिका, पेज नं.87-91
5. कांशीराम के दो चेहरे, पेज नं.8
6. सं. राजकिशोर-आज के प्रश्न (18) दलित राजनीति की समस्याएं, लेख –दलित मुक्ति के रास्ते- राकेश              कुमार, वाणी प्रकाशन 2012, पेज नं.145
7.  दलित वीरांगनाएं एवं मुक्ति की चाह, पेज नं.178
8. दलित राजनीति की समस्याएं, उद्धृत, लेख –प्रफुल्ल कोलख्यान-दलित राजनीति की समस्याएं, पेज नं.34
9  वही, पेज नं.34
10. वही, पेज नं.146
11. सं.संजीव चंदन, स्त्रीकाल, दलित स्त्रीवाद पर केन्द्रित, अंक-9, सितम्बर, 2013 पेज नं.65
12. वही, पेज नं.79
13. ‘दलितों के लिए आयरन लेडी (लौह महिला तथा मसीहा) माने जाने वाली, बहुजन से सर्वजन तक का सफर     करने वाली उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती का मैला प्रथा के मुद्दे के विषय में कुछ न कहना कम से कम    यह तो बता देता ही है कि उनके दलित एजेण्डे में मैला उन्मूलन कभी शामिल नहीं रहा । जबकि उत्तर प्रदेश      एक ऐसा तबका है जहां बहुत से इलाकों में यह प्रथा अभी जीवित है ।’ (भाषा सिंह: अदृश्य भारत)

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