अस्तित्व के प्रश्न खड़े करती दलित स्त्री पात्र

शिप्रा किरण
सहायक प्राध्यापक, हिन्दी विभाग.बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय
लखनऊ,
संपर्क: kiran.shipra@gmail.com

अभिव्यक्ति के तमाम सशक्त माध्यमों में से एक है- सिनेमा. जिसके बहुत गहरे और गंभीर सरोकार हैं. आमतौर पर समझा जाता रहा है कि सिनेमा मात्र मनोरंजन का ही एक साधन है. यह मात्र मनोरंजन का साधन नहीं बल्कि अपने विभिन्न टूल्स के साथ प्रतिरोध का एक जरिया भी है. इसने अपने अन्दर तमाम सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों को समेटा है. लगभग सभी आधुनिक-उत्तर आधुनिक विमर्श फिल्मों का हिस्सा बने हैं. उन्हीं अस्मितामूलक विमर्शों में एक  है- स्त्री विमर्श. साहित्य या समाजविज्ञान की तरह हिन्दी सिनेमा ने स्त्री से सम्बंधित विषयों को विमर्श की तरह तो प्रस्तुत नहीं किया क्योंकि सिनेमा एक उद्योग है और उसके बाजार की अपनी एक सीमा है परन्तु यह अवश्य हुआ है कि विमर्श के तमाम पहलुओं को सिनेमा ने अपना विषय जरूर बनाया. स्त्री मुक्ति और उसकी अस्मिता की पहचान करना या उसे रेखांकित करने का कार्य हिंदी सिनेमा ने जरूर किया है. ध्यान देने वाली बात यह है कि आज स्त्री विमर्श के भीतर भी एक नई धारा की शुरुआत हो चुकी है जिसे ‘दलित स्त्रीवाद या अम्बेडकरवादी फेमिनिज्म’ कहा जाता है. साहित्य और सामजिक विज्ञानों के अंतर्गत दलित स्त्रीवाद, दलित स्त्रियों के अधिकारों और संघर्षों को मुखर आवाज देने वाला माध्यम है. खासकर दलित स्त्रियों का लेखन उनकी अभिव्यक्ति का एक औजार बन कर सामने आया है. सिनेमा ने भी समय≤ पर दलित स्त्री की विभिन्न छवियों को उनकी समस्याओं के साथ अभिव्यक्त किया है. साहित्य और सिनेमा दोनों ही कला के दो मजबूत स्तम्भ हैं साहित्य की तरह ही सिनेमा भी अपने दृश्य रूप में समाज पर गहरा प्रभाव छोड़ता है. कहीं न कहीं सिनेमा और साहित्य दोनों ही कला रूपों की यह जिम्मेवारी है कि वह समाज के हाशिये को केंद्र में लाने का प्रयास करे. दलित विमर्श के इस दौर में जब दलित स्त्रीवाद उस विमर्श की एक जरूरी शाखा बन कर हमारे सामने है साहित्य के क्षेत्र में अधिकांश दलित स्त्रियों का कहना है कि उनको अब भी दलित सहित्य में वह स्थान नहीं मिला है जबकि उनका शोषण सर्वाधिक और दोहरा-तिहरा है. इसी सन्दर्भ में प्रख्यात मराठी लेखक और अम्बेडकरवादी चिन्तक यशवंत मनोहर अम्बेडकरवादी फेमिनिज्म के एक स्वतंत्र श्रेणी में हो रहे साहित्यिक विकास के विषय में उसकी व्याख्या करते हुए कहते हैं- “यह फेमिनिज्म स्त्री को गुलाम करने वाली पूरी समाज व्यवस्था बदलना चाहता है...जिन जिन अविष्कारों ने स्त्रियों को पुरुषों की दासी बनाया है उन सब अविष्कारों को अम्बेडकरवादी फेमिनिज्म नकारता है...अम्बेडकरवादी फेमिनिज्म का पुरुष से विरोध नहीं है. उसकी लड़ाई पुरुष के अहंकार से है, उसके अन्दर की वर्चस्व भावना से है...स्त्री किसी की गुलाम नहीं होगी. वह स्वतंत्र, समंजस, बुद्धिवादी और सम्पूर्ण मानव होगी.”1 इधर के कुछेक वर्षों में दलित स्त्रीवाद विमर्श की एक नई शाखा बन कर भले ही उभरा है लेकिन दलित स्त्री के दोहरे शोषण को, उसकी अस्मिता पर आए संकटों को, उस पर हो रहे चैतरफा अत्याचारों को हिंदी सिनेमा अपने तरीके और अपने स्तर पर न जाने कितने वर्षों से चित्रित करता आ रहा है.


समाज और कलाएँ खासकर साहित्य और सिनेमा हमेशा से एक दूसरे के पूरक रहे हैं. 1936 में आई अशोक कुमार-देविका रानी अभिनीत तथा हिमांशु राय द्वारा निर्मित ‘अछूत कन्या’ एक दलित स्त्री को केन्द्रीय पात्र के रूप में रखकर बनाई गई फिल्म है. जैसा कि शीर्षक से ही स्पष्ट है फिल्म एक ऐसी स्त्री की कहानी है जो अछूत बिरादरी या दलित समुदाय से सम्बन्ध रखती है. पूरी फिल्म दलित स्त्री पात्र कस्तूरी (देविका रानी) के इर्द-गिर्द ही रची-बसी है. एक दलित स्त्री और ब्राह्मण युवक प्रताप (अशोक कुमार) के प्रेम की कहानी कहती यह फिल्म उस सामंतवादी-जातिवादी समाज में एक साहसी उपस्थिति दर्ज कराती है. “फिल्मों की लगातार उपेक्षा के दौर में जमींदारी समाज को चुनौती देने वाली फिल्में आईं. अछूत कन्या 1936 में आयी थी. ब्राह्मण और हरिजन युवती के अंतरजातीय संबंधों पर बनी यह फिल्म स्त्री की स्वतंत्र इच्छा शक्ति को बिना लाग लपेट के रेखांकित कर सकी थी.”2 और यह सिर्फ एक युवा दलित स्त्री और युवा ब्राह्मण पुरुष के बीच के सहज आकर्षण और प्रेम की ही अभिव्यक्ति नहीं है बल्कि इन दोनों के पिता और परिवारों के बीच के मानवीय प्रेम और भाईचारे की कहानी भी बयान करती है. दलित कस्तूरी का पिता दुखिया, प्रताप के ब्राह्मण पिता मोहनलाल के शरीर से सांप का जहर चूस कर उसकी जान बचाता है वहीं से दोनों के दोस्ती की शुरुआत होती है. यह दोस्ती किसी भी जाति-धर्म के बंधन से बहुत परे थी. इसी दोस्ती के मजबूत दरख्त के साए में कस्तूरी और प्रताप का बचपन बीतता है. दोनों दो दोस्तों के प्रेम को देखते हुए जवान होते हैं. वही प्रेम उन्हें विरासत में मिलता है जो उम्र के साथ धीरे-धीरे विस्तार पा रहा होता है. दोनों के पिता अपने बच्चों कस्तूरी और प्रताप के प्रेम समबन्ध और उनके आपसी स्नेह से वाकिफ भी रहते हैं लेकिन उन्हें इस बात का अंदाजा भी अच्छी तरह रहता है कि इस सम्बन्ध की कोई अंतिम व सुखद परिणति नहीं हो सकती. प्रताप का पिता मोहनलाल एक जगह अपनी पत्नी अर्थात प्रताप की माँ से कहता है- “कस्तूरी हमारी जात की रहती तो प्रताप के लिए कैसी अच्छी थी? माँ जवाब देती है, कहती है- “होती तब न? पर वह तो अछूत की बेटी है.” दोनों का आपसी लगाव देख माता-पिता कुछ सशंकित भी हैं. प्रताप के माँ-बाप का यह संवाद उनकी शंका को अप्रत्यक्ष रूप से व्यक्त करता है- “अब भी कुछ नहीं बिगड़ा. हम प्रताप के लिए कन्या खोजते हैं उधर दुखिया से कहते हैं कि कस्तूरी के लिए भी वर ढूंढें.” दोनों का अपनी अपनी जाति में जल्द से जल्द विवाह कर देना ही उन्हें एक दूसरे से दूर करने का एकमात्र उपाय लगता है. प्रताप के माता-पिता को भी कस्तूरी से बहुत स्नेह है लेकिन जाति की श्रेष्ठता का अहसास भी उनके भीतर लगातार बना रहता है यह अलग बात है कि वह अहसास कभी अहंकार या झूठे गर्व में तब्दील नही हो पाता क्योंकि उनकी मनुष्यता उस जातिवादी श्रेष्ठता पर कहीं अधिक भारी पड़ती है. छुआछूत और जातिवाद मनुष्य के चेतन-अवचेतन पर इस तरह हावी है कि कस्तूरी के प्रति अगाध स्नेह रखने के बावजूद प्रताप की माँ जब यह जानती है कि प्रताप कस्तूरी के हाथ का बना खाना खाया करता है. माँ की त्योरियां चढ़ जाती हैं- “बाम्हन का पूत होके इसके हाथ का खाता है?” प्रताप की माँ के स्नेहिल रूप का अचानक इस तरह कठोर हो जाना कस्तूरी को असहज कर देता है. जो कस्तूरी थोड़ी देर पहले प्रताप को खाना खिलाकर इतरा रही थी अब डर सी जाती है. जल्दी जल्दी कहने लगती है- “माँ, गुस्सा न हो अब मैं इसे कभी न खाने दूंगी. माँ, मैं कसम खाती हूँ अब कभी न खाने दूंगी.” कस्तूरी दुखी तो होती है पर अधिक देर नहीं क्योंकि उसे अपनी अछूत स्थिति स्वीकार्य है. उस रुढ़िवादी समाज में किसी दलित कन्या के लिए इतना ही काफी था कि उसका किसी ब्राह्मण परिवार से सहज सम्बन्ध है. वह एक ब्राह्मण युवक के साथ खेलती और घूमती है. तब वहाँ जाति चेतना, वर्ग चेतना या जातीय अस्मिता का तो प्रश्न ही नहीं था. अपने जातिवादी-सामंती समाज और इस मेल-मिलाप के परिणामों का भान भी इन दोनों परिवारों को बखूबी है और अपने भाईचारे और दोस्ती को रिश्ते या पारिवारिक सम्बन्ध में न बदल पाने का दुःख भी दोनों तरफ है. जब प्रताप की माँ दोनों को ना मिलने का आदेश देती है. प्रताप का पिता कस्तूरी के पिता से कहता है- “दुखिया, हम एक जात के होते तो कैसा अच्छा था!” तब कस्तूरी का पिता कहता है- “हाँ भैया, ये दोनों एक दूसरे पर जान देते हैं.” यह संवाद दोनों की ही विवशता और व्यथा की तीव्रता बताता है. निश्छल और सच्चे-एकनिष्ठ प्रेम के बावजूद जाति की दीवार उन्हें मिलने नहीं देती. प्रताप का विवाह एक ब्राह्मण लड़की से कर दिया जाता है. कस्तूरी अकेली रह जाती है. हमेशा की हंसती-चहकती कस्तूरी अब उदास सी हो जाती है. पिता के समझाने पर कहती है- “बचपन में खेलना बुरा नहीं था तो अब कैसे हो गया? पिता कहता है- “अब तुझसे कौन दलील करे? वह जवाब देती है- मैं दलील नहीं करती बापू मैं तो बस जानना चाहती हूँ....बोलो जवाब दो” पिता उसके सवाल को अनसुना करने का प्रयास करता है “अगर वह बाम्हन है और मैं अछूत तो इससे हमारा साथ क्यों छूटे?” वह बार-बार यही प्रश्न करती है. तब तक जब तक कि पिता उसके प्रश्न का उत्तर नहीं दे देता. इसलिए उस समय और सन्दर्भ को ध्यान में रखते हुए प्रमोद भारद्वाज ने इस फिल्म की रीलीज को उस समाज में ‘पहला उपद्रव’ कहा है- “पहला उपद्रव ‘अछूत कन्या’ (1936) से हुआ. यह एक वस्तुनिष्ठ, वैज्ञानिक और ईमानदार अभिव्यक्ति थी. यह उपद्रव किसी खास दर्शक समूह में नहीं हुआ, क्योंकि इस फिल्म का मकसद किसी को सताना या चिढ़ाना कतई नहीं था. आजादी का आन्दोलन था. समाज शुद्धिकरण की प्रक्रिया में था. मनुष्य को हमेशा दूसरा नागरिक बनाने बताने वाली मान्यताओं की सीवनें उधड रही थीं.”3  सन1936 में अपने परिवार, उस समाज से सहज और आवश्यक प्रश्न करती, जवाब मांगती दलित स्त्री है अछूत कन्या की कस्तूरी. जिस समाज में स्त्री होने का अर्थ मुंह बंद कर हर तरह के अत्याचार को सहना, पुरुष सत्ता को सिर झुका कर स्वीकार करना, ना हँसना और न ही कुछ बोलना हो उस समाज में एक दलित लड़की कस्तूरी का एक ब्राह्मण युवक के साथ खूब घूमना, खुल कर हँसना, उछलना कूदना और गाने गाना, अन्य स्त्री पात्रों की तरह सिर पर आँचल ना रखना पूरी सामंती और ब्राह्मणवादी पितृसत्ता को चुनौती है. यह ठीक है कि दोनों विवाह बंधन में नहीं बंध सके लेकिन उनका प्रेम अंत तक उस समाज को बेचैन किये रहा और पितृसत्ताक समाज के आँख की किरकिरी बना रहा. कस्तूरी का विवाह एक दलित युवक मन्नू से कर दिया जाता है. वह अपने पति के प्रति समर्पित रहने का हरसंभव प्रयास करती है लेकिन प्रताप को नहीं भूल पाती. कस्तूरी के मन में अपने पति की पहली पत्नी के लिए भी कोई दुर्भावना नहीं रहती किन्तु पहली पत्नी कजरी प्रताप की पत्नी मीरा के साथ मिलकर कस्तूरी के खिलाफ उसे बदनाम करने की एक साजिश रचती है. एक दलित स्त्री ही यहाँ दलित स्त्री के खिलाफ खड़ी हो जाती है. जहां प्रताप की पत्नी को अपने अधिकारों के प्रति कोई चेतना नहीं थी वहीं मन्नू की पहली पत्नी अपने पति से मिलने वाले अधिकारों के प्रति सजग थी. लेकिन इसी सजगता में वह अनजाने ही नकारात्मक भूमिका में आ जाती है. जबकि वह अपने पिता और पति दोनों की ही ज्यादती का शिकार थी. वह अपने पति के साथ रहना चाहती थी लेकिन उसके पिता को यह मंजूर नहीं था. जब वह अपने पिता का विरोध कर पति के साथ रहने आती है तो पति उसे स्वीकार नहीं करता. दलित स्त्री अपनी जाति में भी पुरुषवादी मानसिकता और शोषण का शिकार है. दलित स्त्रियों पर होने वाले दोहरे शोषण के विषय में मोहनदास नैमिषराय लिखते हैं- “वैसे तो पूरे भारतीय समाज की स्त्रियाँ पितृसत्ता के बोझ के नीचे कराह रही थीं लेकिन दलित स्त्रियों को न केवल अपने समाज की पितृसत्ता को झेलना पड़ता था बल्कि सवर्ण समाज की पितृसत्ता भी उनका शोषण और दमन करती थी.”4 यह ठीक है की फिल्म में कस्तूरी किसी विद्रोही भूमिका में नजर नहीं आती किन्तु उस दौर में जब लोग इश्क का नाम जबान पर लाने से डरते हों, एक स्त्री का खुलकर प्रेम करना वह भी एक दलित स्त्री का किसी ब्राह्मण युवक से प्रेम करना. प्रेम को छुपाने की जगह खुलकर उसे अभिव्यक्त करना, अपने विवाह, अपने प्रेम सम्बन्ध, जातियों के अंतर जैसे मसलों से जुड़े सवाल उठाना, भयानक रुढियों में जकड़े उस गुलाम-सामंती समाज में एक दलित स्त्री के लिए इससे बड़ा विद्रोह और क्या होगा. 1936 में ही प्रकाशित प्रेमचंद के गोदान की दलित पात्र सिलिया और मातादीन के प्रेमसंबंध वाले प्रकरण को भी इस सन्दर्भ में याद किया जा सकता है. अंतर यह है कि वहां विद्रोह का तीव्र और अधिक मुखर रूप था. और यह अंतर विधाओं के बीच के अंतर के कारण था. उनके दर्शक और पाठक वर्ग के अंतर के कारण था. इसी सन्दर्भ में अरुण कुमार ने लिखा है- “हिन्दी के कथा साहित्य में ऐसे उदाहरण तो थे. फिल्मों में इसे जगह मिल जाने को सामाजिक ढाँचे के लिए चुनौती भी समझा गया. संयोग या दुर्योग से राजनैतिक आन्दोलन के उस दौर में कुछ ऐसे अंतरजातीय दाम्पत्य सम्बन्ध भी हुए जिन्हें कांग्रेस के कई नेताओं ने अच्छा नहीं समझा. इसे राजनैतिक सरगर्मी का सामाजिक प्रभाव भी मना जा सकता है...बिहार कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के एक नेता कुलानंद झा ‘वैदिक’ एक हरिजन युवती से परिणय सूत्र में बंधे थे. दरभंगा के विप्र समाज ने उनका बहिष्कार किया.”5  हिंदी सिनेमा और उससे जुड़े लगे कहीं न कहीं इन सब बातों के साक्षी थे, उन्हें भी खबर थी. और उन्हें ऐसे मुद्दों से अपनी फिल्म के लिए विषय भी मिले. लेकिन सभी जातिगत और स्त्री मुद्दे के भी कुछ पक्षों को उठाने के बावजूद यह हमारे समाज की विडम्बना ही थी कि निर्देशक एक दलित स्त्री और ब्राह्मण पुरुष का विवाह करा पाने का साहस नही कर पाता और फिल्म के अंत में कस्तूरी एक तेज गति से आती ट्रेन को दुर्घटना से बचाने के प्रयास में अपने प्राण गँवा देती है. अपनी तमाम सीमाओं के बावजूद अछूत कन्या हिन्दी सिनेमा के इतिहास की पहली साहसिक फिल्म कही जा सकती है जो दलित स्त्री की आवाज बन कर हमारे सामने आती है. इसी फिल्म के बारे में फिल्म आलोचक प्रहलाद अग्रवाल लिखते हैं- “अछूत कन्या में अछूत नायिका को छोड़ने की दुर्बलता उस समय की भीषणतम सच्चाई थी...अछूत कन्या में छुआछूत के अमानवीय कृत्य को बड़ी तीव्रता से उकेर कर उसकी भर्त्सना की गई थी. यह उस समय आसान बात नहीं थी. यह बीसवीं सदी का पूर्वार्द्ध था और राष्ट्र इस समस्या से गहराई तक ग्रस्त था.”6


अछूत कन्या के 23 वर्ष बाद अर्थात 1959 में एक फिल्म आती है- सुजाता. कुछ समानताओं और असमानताओं के साथ यह फिल्म भी दलित युवती और ब्राह्मण युवक के प्रेम की कहानी है. नूतन और सुनील दत्त के अतिरिक्त तरुण बोस-सुलोचना के अभिनय से सजी विमल राय की यह फिल्म हिन्दी सिनेमा के इतिहास में अपनी खास जगह बना चुकी है. सुजाता एक दलित परिवार की लड़की है जिसके माता-पिता हैजे की महामारी का शिकार हो चुके हैं. उनकी दुधमुंही बच्ची को बस्ती के लोग वहाँ के इंजीनियर उपेन्द्रनाथ चैधरी (तरुण बोस) के घर लेकर आते हैं और उस बच्ची को सँभालने की गुहार लगाते हैं. पहले तो इंजीनियर बच्ची को सँभालने के लिए राजी नहीं होता लेकिन पत्नी चारू (सुलोचना) के कहने पर वह इस शर्त पर उसे रखने को तैयार हो जाता है कि जल्द ही उसके बिरादरी वाले आकर उसे ले जाएंगे. लेकिन परिस्थितियाँ कुछ ऐसे बनती हैं कि वह बच्ची वहीं उस ब्राह्मण इंजीनियर के परिवार में पलती और बड़ी होती है. चारू और उपेन्द्र नाथ सुजाता को अपनी सगी बेटी रमा (शशिकला) के साथ पालते हैं. पत्नी चारू सुजाता की व्यवस्था अपने घर से कहीं अलग करने का हरसंभव प्रयास करती है लेकिन चारू का सहज मातृत्व उसकी जातिवादी सामजिक बुद्धि के आड़े आ जाता है. व्यवहारिक बुद्धि पर भावना की जीत होती है और अंततः सुजाता उनकी सगी बेटी रमा के साथ ही खेलते-खेलते युवा होती है. विवशता में बना यह सम्बन्ध अब एक गहरे मानवीय सम्बन्ध में बदल जाता है. यही मानवीय स्नेह और सरोकार ‘अछूत कन्या’ के मोहनलाल और सुजाता के उपेंद्रानाथ को एक समान स्तर पर लाकर खड़ा करता है. “सुजाता (1959) विमल राय की यह बहुचर्चित फिल्म, दलित विमर्श पर बनी पूर्व की अछूत कन्या का परिष्कृत रूप है...यहाँ भी अछूत कन्या की तरह दलित युवती (नूतन) और ब्राह्मण युवक (सुनील दत्त) है.”7 कुछ अर्थों में तो यह अछूत कन्या का परिष्कृत रूप कही जा सकती है लेकिन ‘अछूत कन्या’ में प्रताप की माँ और ‘सुजाता’ में भी रमा की माँ चारू की लगभग एक सी ही स्थिति है. पिताओं या पुरुषों से अधिक माओं या स्त्रियों में जातिवाद और छुआछूत की भावना अधिक प्रबल रूप में दिखाई देती है. इसके कारण भी हैं. हजारों वर्षों से स्त्रियाँ एक खास तरह से प्रायोजित, योजनाबद्ध और खतरनाक मानसिक कंडिशनिंग का शिकार रही हैं. ये कंडिशनिंग इतनी बारीकी से की गई है कि उन्हें स्वयं इसका रत्ती भर भी अहसास नहीं होता. उन्हें पता ही नहीं होता कि दूसरी स्त्री से किया गया उनका दुर्व्यवहार जाने-अनजाने ही उन्हें पूरी स्त्री जाति का शत्रु बनाता जा रहा है. उन्हें जरा भी समझ नहीं कि वह पितृसत्तात्मक समाज द्वारा किस तरह सदियों से इस्तेमाल की जा रही हैं. उन्हें इसी तरह अपने फायदे के लिए इस्तेमाल कर, स्त्रियों को ही स्त्रियों के खिलाफ खड़ा कर ‘स्त्री ही स्त्री की शत्रु’ जैसे पुरुषवादी जुमले फेंकती पितृसत्ताक मानसिकता ऐसे गढ़े गए जुमलों को भी अपने लाभ में इस्तेमाल कर ले जाती है. स्त्रियाँ भी इस तरह के ‘अस्मिता-विरोधी’ जुमले धड़ल्ले से प्रयोग करती हुई धीरे-धीरे उसी पुरुषवादी मानसिकता का शिकार होती जाती हैं. दोनों फिल्मों की माँओं को वर्तमान सन्दर्भों में इस तरह भी देखे जाने की जरूरत है. यह जरूर है कि ‘अछूत कन्या’ और ‘सुजाता’ के समय और सन्दर्भ वर्तमान से बहुत हद तक भिन्न हैं लेकिन पूरी तरह भिन्न भी नहीं. उन्हें वर्तमान से पूरी तरह काटकर न देखा जा सकता है ना ही समझा जा सकता है. वह भी कहीं न कहीं पुरुषवाद के भवन को मजबूत करने की प्रक्रिया का ही एक हिस्सा हैं. माँ चारू जब-जब सुजाता को मेहमानों के सामने “यह हमारी बेटी जैसी है” कहती है सुजाता का दिल चाक-चाक हो जाता है. माँ का ममतामयी मन तो उसे अपनी बेटी स्वीकार करता है लेकिन वर्णवादी बुद्धि उससे बार-बार यही कहलाती है. एक  माँ और एक ब्राह्मण स्त्री के द्वंद्व को चारू के चरित्र में स्पष्ट देखा जा सकता है. किन्तु पिता जिसे वह बापू कहती थी का बराबरी वाला स्नेह उसे बुरी स्थितियों में भी सांत्वना देता है. एक दिन जब सुजाता की अम्मी चारू उसे मेहमानों के लिए चाय लाने से मन करती है तो सुजाता हैरान रह जाती है. वह अम्मी से पूछती है- “मैं कौन हूँ? मैं ये जानना चाहती हूँ कि मैं हूँ कौन?...मेरे हाथ की चाय वो क्यों न पीते? क्या मेरे हाथ से छू जाने से चाय जहर बन जाती?” लेकिन अम्मी उसके सवालों को टाल जाना चाहती हैं. सुजाता जिद करती है- “बिना जाने नहीं छोडूंगी? बताओ.” ‘अछूत कन्या’ की कस्तूरी की तरह यहाँ भी दलित स्त्री प्रश्न करती है. वहां प्रश्न कुछ भोले थे. वो जाति और वर्ण की सीमा के भीतर थे लेकिन यहाँ सुजाता का प्रश्न जाति-वर्ण से आगे जाकर स्त्री-प्रश्न और दलित स्त्री के प्रश्न का प्रतिनिधित्व करता है. यह उसकी पहचान, उसके व्यक्तित्व को अभिव्यक्त करने वाला और उन तमाम संकटों से जूझने के बाद पूछा जाने वाला स्वाभाविक प्रश्न है जो किसी भी स्त्री-दलित स्त्री द्वारा पूछा ही जाना चाहिए. वर्तमान समय में जब स्त्री विमर्श में स्त्री और दलित स्त्रीवाद के अंतर्गत दलित स्त्री पहचान के संकटों से लगातार जूझ रही1959 में सुजाता यदि ऐसे ज्वलंत प्रश्न खड़े कर रही थी तो सहज ही यह समझा जा सकता है यह फिल्म क्यों हिंदी सिनेमा के लिए मील का पत्थर साबित होती है. इसके माध्यम से हम स्त्री के विशेषकर दलित महिलाओं के दोहरे दमन की स्थितियों से भी रूबरू होते हैं. जो आज का एक महत्वपूर्ण प्रश्न बन कर हमारे सामने है. आज जब दलित स्त्रीवाद एक आन्दोलन के रूप में हमारे सामने है. इस विषय पर मोहनदास नैमिषराय ने लिखा है- “दलित समाज जहां एक ओर अपने अन्दर एक मध्यवर्ग के उदय से जुड़ी समस्याओं से जूझ रहा है वहीं उसे दलित आन्दोलन के भीतर एक और आन्दोलन की आहटें भी सुननी पड़ रही हैं. यह है दलित महिलाओं का आन्दोलन जो समग्र महिला समुदाय के मुक्ति आन्दोलन का हिस्सा होने के साथ-साथ दलित समाज में पितृसत्ता का प्रश्न उठाता है. दलित महिलाओं की त्रासदी यह है कि उन्हें एक गाल पर ब्राह्मणवाद का तो दूसरे गाल पर पितृसत्ता का थप्पड़ खाना पड़ता है.”8 अपने अछूत होने की सच्चाई जानकर और यह जानकर कि वह इस ब्राह्मण परिवार पर एक बोझ है सुजाता को आघात पहुंचता है. वह आत्महत्या करने निकल पड़ती है पर नदी किनारे गांधीजी की मूर्ती और उनका यह सन्देश कि “मरें कैसे? आत्महत्या करके? कभी नहीं. आवश्यकता हो तो जिंदा रहने के लिए मरें.” देख आत्महत्या का विचार त्याग घर लौट आती है. जबरीमल पारिख सुजाता में दिखाए गए आत्महत्या के दृश्य और गाँधी जी के उस सन्देश को केंद्र में रखकर लिखते हैं- “यह फिल्म गांधी और रवीन्द्र के इसी सन्देश को आधार बनाती है.”9 इन्हीं ऊहापोहों और अलग-अलग घटनाओं के बीच एक दिन अधीर (सुनील दत्त) नामक ब्राह्मण युवक का सुजाता के जीवन में प्रवेश होता है. दोनों एक दूसरे से प्रेम करने लगते हैं. अधीर एक आधुनिक युवक है वह जाति को नहीं मानता. सुजाता को विवाह के लिए मना लेना चाहता है. उसे महात्मा बुद्ध के शिष्य आनन्द को एक चांडाल कन्या चांडालिका द्वारा पानी पिलाने की कथा सुना  कर आत्मनिंदा व आत्महत्या को पाप बताते हुए सुजाता के मन में बसे हीनभाव और द्वन्द्व को दूर कर देना चाहता है. लेकिन सुजाता असमंजस में है. वह कहानी सुन कर कहती है- “वह तो पुराने जमाने की बात है. आजकल ऐसा हो सकता है?” तब अधीर कहता है- “हमारे जमाने में भी ऐसा महापुरुष हुआ है जिसने अपना सारा जीवन छुआछूत को मिटाने में लगा दिया. गांधीजी.” फिर वह सुजाता को अछूत लड़की लक्ष्मी की कहानी बताता है जिसे गांधीजी ने अहमदाबाद के आश्रम में रखा था. जिससे आश्रम को चंदे मिलने बंद हो गए थे किन्तु गांधीजी अपने निर्णय पर अटल रहे थे. सुजाता इन कहानियों को सुनकर उत्साहित हो जाती है लेकिन वह विवाह के लिए फिर भी तैयार नहीं है वह नहीं चाहती कि उसके कारण अधीर उसकी बहन रमा से विवाह करने से इनकार कर दे. किन्तु अधीर सिर्फ और सिर्फ सुजाता से ही विवाह करना चाहता है वह अपनी नानी (ललिता पवार) से कहता है कि- “मैं सुजाता के अलावा और किसी से ब्याह नहीं करूंगा.” और घर छोड़ कर जाने लगता है तब उसकी नानी बुझे मन से यह सम्बन्ध स्वीकार कर लेती है. और इस रिश्ते की बात करने सुजाता के घर जाती है. पूरी बात जानकर रमा की माँ तथा सुजाता की अम्मी अर्थात चारू सुजाता को भला-बुरा कहती है और इसी दौरान सीढियों से फिसल कर गिर जाती है. अंत में सुजाता के रक्त दान से ही चारू की जान बचती है. होश में आने पर जब चारू को यह पता चलता है कि उसकी जान किसी और ने नहीं सुजाता ने बचाई है और उसका खून सिर्फ सुजाता के खून से ही मिल सका तो वह अपने अपराधों का पश्चाताप करती है. तब वह पहली बार कहती है- “तू भी तो हमारी ही बेटी है.” इस तरह सर्वसम्मति से अधीर और सुजाता का विवाह हो जाता है. फिल्म का सुखद अंत होता है. “यह फिल्म यह सन्देश भी देती है कि सवर्ण और दलितों के बीच सिर्फ छुआछूत का मिटना पर्याप्त नहीं है बल्कि उनके बीच हर तरह की दूरी का मिटना भी जरूरी है...बिना किसी तरह की उग्र मुद्रा अपनाए और किसी को खलनायक बनाए फिल्म सही और गलत का विवेक प्रस्तुत करती है.”10 ‘अछूत कन्या’ में जो दलित नायिका कस्तूरी एक ब्राह्मण युवक के प्रेम में होने के बावजूद उसके साथ विवाह बंधन में नहीं बंध पाती और ब्राह्मण-दलित दोनों समुदाय के सामने अपनी पवित्रता और सच्चाई का सबूत देते हुए अपनी जान गवां देती है, ‘सुजाता’ तक आते-आते वही दलित नायिका अपने प्रेमी के साथ विवाह कर लेने की स्थिति में अवश्य आ गई है. यह घटना 1936 और 1959 के मध्य के लम्बे अंतराल को तो चिन्हित करती ही है समय के साथ बदलती सामजिक परिस्थितियों की भी पहचान कराती है. कहानी के प्लाट और विषय की समानता के बावजूद दोनों के ही दलित स्त्री पात्रों में कुछ बड़े अंतर भी हैं. सुजाता से लगभग 23 साल पहले बनी अछूत कन्या की कस्तूरी कई जगहों पर सुजाता से आगे निकल जाती है. एक सबसे जरूरी अंतर तो यह है वह विपरीत परिस्थितियों में भी आत्महत्या का मार्ग नहीं चुनती बल्कि उसका विचार भी दिमाग में नहीं लाती. वह जिजीविषा से भरपूर है. एक जातिवादी-मर्दवादी समाज के आगे वह अपने घुटने नहीं टेकती. वह जब तक जीती है चुनौती बनकर. मरने के बाद भी आने वाली पीढ़ियों के लिए सन्देश बनकर जीवित रहती है. अछूत कन्या की कस्तूरी सुजाता की तुलना में अधिक स्वतंत्र है. लेकिन सुजाता का स्त्री अस्मिता से जुड़ा ‘मैं कौन हूँ’ जैसा गंभीर सवाल उसे उत्तर-आधुनिक विमर्श के बहुत करीब ले आता है. दोनों ही फिल्मों ने कुछ सीमाओं के बाद भी अपने-अपने स्तरों पर अपने समय से कहीं आगे जाकर स्त्री स्वतंत्रता, स्त्री अस्मिता और दलित स्त्री की समस्याओं को मजबूती से चित्रित किया है. हिन्दी सिनेमा जगत में आरम्भ से ही कुछ ऐसे कलाकार रहे हैं जिन्होंने विषयों को चुनने के जोखिम उठाए- “खतरा भी था उन फिल्मों से जिनके जरिये स्त्री की स्वतंत्रता का पक्ष प्रबल हो रहा था. जमींदारी समाज के लिए यह शुभ संकेत नहीं था. एक दौर में प्रेमचंद को भी अपने सामंत विरोधी रुझान के कारण आलोचना झेलनी पड़ी थी. अब विमल राय की सुजाता ब्राह्मण से विवाह करने के ख्वाब देखने लगी थी.”11  इस तरह दोनों ही फिल्में अपने साहसी विषयों और अपने मुख्य स्त्री किरदारों के माध्यम से हिंदी सिनेमा के इतिहास में कुछ सार्थक अध्याय जोड़ने में सफल रहीं.

सन्दर्भ सूची
1.अनभै साँचा, सं-द्वारिका प्रसाद चारुमित्र, अक्टूबर-दिसंबर 2008, पृ. 205
2.सिनेमा और हिंदी सिनेमा, अरुण कुमार, राजस्थान पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण 2007, पृ. 102
3.सदी का विवादास्पद सिनेमा, प्रमोद भारद्वाज, दैनिक जागरण नवरंग, 18 दिसंबर 1999, पृ. 02.
4.आधुनिकता के आईने में दलित, अभय कुमार दुबे, सीएसडीएस, पहला संस्करण 2002, पृ. 233
5.सिनेमा और हिंदी सिनेमा, अरुण कुमार, राजस्थान पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण 2007, पृ. 102
6.सदी का विवादास्पद सिनेमा, प्रमोद भारद्वाज, दैनिक जागरण नवरंग, 18 दिसंबर 1999, पृ. 02
7.समसामयिक सृजन, सं- महेंद्र प्रजापति, अक्टूबर-मार्च 2012-13, पृ. 49
8.आधुनिकता के आईने में दलित, अभय कुमार दुबे, सीएसडीएस, पहला संस्करण 2002, पृ. 230
9.अनभै सांचा, अक्टूबर-दिसंबर, द्वारिका प्रसाद चारुमित्र, 2008, पृ. 199
10.अनभै सांचा, द्वारिका प्रसाद चारुमित्र, अक्टूबर-दिसंबर, 2008, पृ. 199
11.सिनेमा और हिंदी सिनेमा, अरुण कुमार, राजस्थान पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण 2007, पृ.            103

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