और मैं फूलनदेवी से जुड़ गई

श्वेता यादव
सामाजिक कार्यकर्ता, समसामयिक विषयों पर लिखती हैं. संपर्क :yasweta@gmail.com
2002- 04 के आसपास की बात है| यह समय मेरा हाईस्कूल-इंटर का है| शुरू से ही स्वभाव मेरा काफी अक्खड़ है| किसी भी गलत बात पर चुप नहीं रहना, किसी से भी भीड जाना चाहे वह बात मेरी हो या किसी और की ये मेरा स्वभाव था, जो आज भी बदस्तूर जारी है| मेरे स्कूल में सवर्ण लड़के (जी हाँ पूरी जिम्मेदारी से कह रही हूँ, सवर्ण लड़के, जिसमें ज्यादातर ठाकुर थे|) मुझे फूलन देवी बुलाते थे| सोशल मीडिया में उस समय की एक ही दोस्त दिखती है, प्रिया जयसवाल, शायद उसे याद हो!

 तब मैं भी छोटी थी और फूलन को ज्यादा नहीं जानती थी लिहाजा बुरा लगना लाज़मी था| क्योंकि फूलन देवी को लेकर जिस तरह की छवि बना दी गई है उससे जानने वालों को भले ही फूलन देवी संबोधन अच्छा लगे लेकिन ना समझने वालों को और गलत तरीके से जानने वालों को तो अच्छा नहीं ही लगेगा| एक बार कि बात है इन लड़कों से कुछ बहस हो गई बहस क्या हम दो लड़कियों ने मिलकर बड़ा काण्ड कर दिया| हुआ यूँ कि ये बदतमीज  लड़के क्लास में भी बहुत हुल्लड़ करते थे और किसी भी टीचर को पढ़ाने नहीं देते थे| चूँकि वह दौर था कि अगर टीचर ने कुछ भी बोल दिया या क्लास के बाहर कर दिया तो, स्कूल के बाहर तेचार का पीटना तय| इस डर के चलते कोई भी टीचर इन बच्चों से पंगा नहीं लेता था| हमारे फिजिक्स के सर दुर्गा प्रसाद मिश्र जो की बहुत ही सीधे थे लेकिन पढ़ाते बहुत अच्छा थे, उन्हें ये लड़के क्लास ही नहीं लेने देते थे| हम दो लड़कियों ने इन्हें सबक सिखाने की सोची और केवाछ खरीद कर लाये (केवाछ एक ऐसी दवा जो अगर शरीर को कहीं छू जाए तो बहुत भयानक खुजली होती है, कहते हैं केवाछ से उत्पन्न खुजली सिर्फ एक ही चीज से रूकती है वह है गोबर)| जब सब प्रार्थना सभा में इकट्ठे हो कर प्रार्थना कर रहे थे तब मैं और ज्योति इनके बैग, सीट हर जगह पर केवाच छिडक रहे थे| थोड़ी देर बाद ही क्लास शुरू हुई अमूमन यह आदत होती है कि सीट पर बैठते वक्त हम सब आगे की तरफ झुकते हैं और बैग पर हाथ रख कर बैठ जाते हैं, यही हुआ उस दिन भी, उसके थोड़ी देर बाद जो हुआ वो मंज़र आज भी आँखों के सामने आता है तो हंसी छूट जाती है| लड़कों का पूरा शरीर खुजला खुजला कर बुरा हाल| इधर हम दो लड़कियां भी इसी हालत में थी .. चूँकि तमाम सुरक्षा लेने के बाद भी केवाच हमें भी छु गई थी तो बुरा हाल होना लाज़मी था| अच्छा भी हुआ इससे मैनेजमेंट की नज़र में लड़कियां भी बरी हो गई कि लड़कियां तो खुद खुजली से परेशान से परेशान हैं इसलिए यह ये शैतानी नहीं कर सकती| स्कूल शुरू होते ही हम लोग अपना अपना बैग लेक्कर घर वापस|




खैर लड़के घर गए और उस दिन और उसके बाद लगभग हमेशा के लिए क्लास शांत हो गई| मुझे आज भी याद है दुर्गा सर समझ गए थे क्योंकि उनकी आँखों में झलक रहा संतोष का भाव बहुत कुछ समझा गया था| मुझे नहीं पता कि लड़कों को यह बात कैसे पता चली कि यह काण्ड मैंने किया था| जिस दिन वे लौट कर स्कूल आये उस पूरे दिन मुझे बहुत परेशान किया स्कूल से बस स्टॉप जाते वक्त पूरे रास्ते उन्होंने मेरा पीछा किया और रास्ते भर जोर-जोर से आवाज़ लगाते रहे फूलन देवी- फूलन देवी| उस दिन मैं वापस घर लौट कर बहुत ही दुखी होकर बैठी थी तो पापा ने वजह पूछी मैंने सब बताया और कहा " सब ठीक है लेकिन जब कोई मुझे फूलन देवी बुलाता है तो मुझे अच्छा नहीं लगता"...
'पापा ने पूछा क्यों?' क्यों अच्छा नहीं लगता?
मेरा जवाब था- 'क्योंकि वह अच्छी नहीं थी' तभी तो लड़के मुझे फूलन बुलाते हैं!
पापा ने कहा- तुम्हें पता है फूलन कौन थीं? और उनकी हत्या क्यों हुई?

अत्याचार का अस्वीकार है फूलन की क्रांति गाथा 

मैंने कहा- मुझे नहीं पता बस मैं इतना जानती हूँ वह अच्छी नहीं थी, इसलिए मुझे फूलन बुलाया जाना पसंद नहीं!
पूरी बात सुनकर पापा हँसे और काफी समझाया लेकिन मैं जस की तस स्कूल तक जाने तक को तैयार नहीं| पता नहीं पापा को क्या सूझा और कहा 'अच्छा रुको तुम्हें कुछ सुनाता हूँ|' और पापा एक कैसेट खरीद कर ले आए. जहाँ तक मुझे याद है आवाज 'बेचन राम राजभर' (जो बिरहा सम्राट के नाम से भी जाने जाते हैं) की  ही थी| बिरहा एक बहुत ही फेमस विधा जिसमें विस्तृत रूप में किसी घटना का जिक्र गीत के माध्यम से करते हैं| बिरहा विधा में ज्यादातर वीर रस का प्रयोग होता है| बेचन अपने बिरहा में फूलनदेवी के बचपन से लेकर संसद तक की कहानी गाते थे. बाद  के दिनों में मैंने इसे विजय लाल यादव की आवाज़ में भी सुना जो मुझे ज्यादा अच्छा लगा|
                                     
  बेचैन जी का बिरहा:



                             
खैर पापा बेचन की आवाज़ वाली कैसेट ही लाये थे और कैसेट लगाते हुए कहा आओ सुनते हैं| कुछ कहने से पहले पूरा सुनना जरूर फिर बात करेंगे| उसके बाद मेरे घर में डीवीडी आई फूलन पर बनी फिल्म बैंडिट क्वीन जो तब के दौर में एक बड़ी घटना कह सकते हैं आप कि इस फिल्म को पहली बार मैंने अपने घर में देखा| उसको देखा मैंने कहीं न कहीं मन की धुंध साफ़ हुई पूरी तरह से तो नहीं पर हाँ इतना जरूर हो गया कि अब कोई फूलन कह कर आवाज लगता तो पलट कर देखती जरूर और मुस्कुरा कर कहती हाँ बोलो... आज जब फूलन को अच्छे से जान गई हूँ तब ख़ुशी होती है कि लोग किसी ज़माने में मुझे फूलन बुलाते थे| फूलन आपको नमन!
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