उन दिनों मम्मी की जगह बुआ या चाची खाना देती थी

नीतीश के एस
  लेखक सामाजिक कार्यकर्ता हैं. संपर्क:9650280564
स्त्रियों के लिए माहवारी को टैबू बनाया जाना सामाजिक-सांस्कृतिक प्रक्रिया है. इसे गोपनीय,  टैबू और लज्जा का विषय बनाने में यह प्रक्रिया न सिर्फ स्त्रियों के मानस को नियंत्रित और संचालित करती है, बल्कि पुरुषों का भी ख़ास मानसिक अनुकूलन करती है. माहवारी को लेकर पुरुषों के बीच की धारणा को समझने के लिए यह एक सीरीज है, जिसमें पुरुष अपने अनुभव इस विषय पर लिख सकते हैं.

अनुभव और जीवन एक दूसरे के पर्यायवाची होते, अगर अनुभवों को इस्तेमाल करने की समझ सब में एक सी होती। किसी स्त्री के लिए माहवारी के अनुभव अलग होते हैं और पुरुष के लिए नितांत विपरीत। माहवारी से मेरा परिचय बहुत छुटपन में हो गया था। बस ये पता देर से लगा कि ये माहवारी है, न कि कोई गंभीर बीमारी।

यूं शुरू हुई हैप्पी टू ब्लीड मुहीम 

घर में अक्सर ये माहौल बन जाता था कि आज अमुक औरत रसोई में नहीं जाएगी। ये सिर्फ आज का नाम अगले तीन चार दिन चलता। पहले पहल तो नोटिस ही नहीं किया। बच्चे ऑब्जर्व करते हैं, अडॉप्ट करते हैं, नोटिस नहीं करते। मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ। लेकिन जब हर दूसरे महीने मम्मी की जगह बुआ या चाची खाना देती, मम्मी पूजा भी नहीं करतीं, ये सब देख कर एक अजीब सा भेदभाव समझ आने लगा था।

थोड़ा बड़ा हुआ तो रुतबा और औकात घर की अलमारियों तक पहुँच गयी। बच्चों के साथ खेलते हुए कुछ छिपा देना, किसी का कहना कि अलमारी से कुछ निकाल लाओ वग़ैरह -वग़ैरह। वहां कभी- कभी कपड़ों और सामान के बीच एक काली पन्नी दिखती। वही काली पन्नी जिसे पापा चुपचाप ला कर मम्मी को देते, चाचू चाची को देते। मौका और समझ मिलने के साथ इन काली पन्नियों के बारे में भी पता चला। ये सब उस उम्र के खुराफ़ाती दिमाग की दास्तान है जब बच्चे होमवर्क के लिए मार खाते हैं।

जजिया कर से बड़ी तानाशाही लहू पर लगान 

स्कूल में एक बार एक फीमेल क्लासमेट को कुछ दिक्कत हुईं। चार- पांच लड़कियां उसे घेर कर घर तक छोड़ कर आई। ये माहवारी से पहली प्रत्यक्ष मुठभेड़ थी। उसकी स्कर्ट के धब्बों ने काफी कुछ समझा दिया था। लेकिन अभी भी जानकारी के नाम पर सब कुछ खुद के बनाई हुई धारणाएं थी। वो सही थी या ग़लत ये जानने के लिए आठ साल इंतज़ार करना पड़ा।



उम्र में बीस का पड़ाव पार करने के तीन साल बाद एक लड़की से दोस्ती हुई। हालांकि फीमेल फ्रेंड्स तो पहले भी थीं। लेकिन कभी किसी से इंटिमेसी नहीं बनी। साथ काम करने वाली इस लड़की से हुई दोस्ती जल्दी ही घनिष्ठ हो गयी और मामला कुछ प्यार जैसा लगने लगा था। यह बात अलग है कि ये रिलेशन बहुत लंबा नहीं चल पाया लेकिन इसने मुझे बहुत कुछ सिखाया। पीरियड्स और उनसे जुड़ी कुछ बारीकियां, उनमे दी जाने वाली दवाइयां, उनके घरेलू नुस्खे, पीरियड्स की जटिलताओं में से कुछ के बारे में जानने का मौका मिला। ये वक़्त मेरे लिए जागरूकता के मामले में सबसे शानदार था। कुछ काम्प्लेक्स इश्यूज पर जानकारी का अच्छा आधार मिला इस वक़्त में जिसने बाद में मुझे खुल कर बात करने का कॉन्फिडेंस दिया।

माहवारी पर बात की झिझक हुई खत्म 

समय गुज़रा और औरतों की उन समस्याओं पर जानकारी बढ़ती गयी जिनको ले कर हम टैबू शब्द का इस्तेमाल करते हैं। उत्तराखंड के गाँवों में सैनिटरी नैपकिन बाँटने के दौरान काफी अनोखे अनुभव मिले। अनपढ़ से गाँव में कहीं दुत्कारा गया, कहीं हाथों हाथ लिया गया। लेकिन एक सबसे ज़रुरी बात जो पता चली वो ये थी कि किसी को तो बात करनी होगी। साल 2015 में माहवारी पर किये वर्कशॉप में जब स्त्री रोग विशेषज्ञों ने मेंस्ट्रुअल कप के बारे में अनभिज्ञता जताई तब इस बात पर यकीन पुख़्ता हो गया।

जब मैंने स्त्रियों की माहवारी को पहली बार जाना

आज फिर से यहाँ लिखने का मकसद यही है। कुछ विषयों पर बात करना बहुत ज़रूरी है। बात करने से ही बात बनती है। जानकारी देने से ज़्यादा ज़रूरी है उस मुद्दे पर बात करने की झिझक ख़त्म की जाये। जानकारी से ज़्यादा ज़रूरी जानकारी से जुड़ा विश्वास है।

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