बहुजन चौपाल में हुई चर्चा: भारत का भगवाकरण और सामाजिक न्याय की चुनौतियां

  डिम्पल और अरूण कुमार नारायण 


 बहुजन चौपाल हाशिये के समाज  का वह अम्ब्रेला है जो बहुजन की समस्याओं को उनके नजरिये से देखने व समझने का प्रयास करता है,  जो समाज के दमित ,शोषित तथा उत्पीड़ित लोगों को सामाजिक न्याय के मुद्दे पर एकजुट कर विभिन्न विचाधाराओं का समन्वय  करता है. बहुजनों में विभिन्न विचारधारा होने के बावजूद  न्याय के मुद्दे पर एकजुट होना  बहुजन चौपाल को सार्थकता प्रदान करता है. अत: देश में न्याय व्यवस्था  को लेकर जो भागवावादी माहौल बना हुआ हैं यह उसके विरूद्ध प्रतिरोधात्मक अभिव्यक्ति व बगावत का बिगुल भी है, जो सामाजिक न्याय की कसौटी तार्किकता को  मानता है.  बहुजन चौपाल कार्यक्रम का आयोजन पटना में सामाजिक न्याय को एक वैकल्पिक विकल्प मानकर आयोजित किया गया.





11 जून 2017 को  बहुजन चौपाल में “भारत का भगवाकरण और सामाजिक न्याय की चुनौतियां” पर प्रथम सत्र की अध्यक्षता प्रो . इश्वरी प्रसाद , संचालन संतोष यादव तथा स्वागत डॉ . मुकेश कुमार द्वारा किया गया. इस सत्र  में  आमंत्रित वक्ता के रूप में अलका वर्मा , खालिद   अंसारी ,  अरूण आनन्द , अनिल चमडिया , अशोक दास , सुनील यादव , गुरिंदर सिंह आज़ाद , अरविन्द शेष , मुश्तकीम सिद्दीकी , प्रशांत निहाल आदि थे .

द्वितीय सत्र  की अध्यक्षता प्रो .ओ.पी. जायसवाल, संचालन डॉ.मुकेश कुमार ने किया तथा वक्ता  वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश , डॉ रतन लाल , अशोक भारती , मुलायम सिंह , शरद जायसवाल , गजेन्द्र मांझी , डॉ .पी .एन .पाल , डॉ. के के . मंडल , राजीव यादव , बीरेंद्र कुमार , गौतम कुमार प्रीतम आदि रहे.

इस कार्यक्रम का आयोजन विद्यापति भवन ( पटना म्यूजियम के पीछे ) में हुआ जिसके आयोजन में  बागडोर , न्याय मंच ,सोशलिस्ट पार्टी (इण्डिया), इन्साफ इण्डिया एवं बुद्ध-अम्बेडकर फाउंडेशन की संयुक्त पहल रही. दो सत्रों में यह कार्यक्रम 10  बजे सुबह से शाम 6 बजे तक चला. इस कार्यक्रम में सामाजिक न्याय के विभिन्न पहलुओं पर ध्यान केन्द्रित किया गया.  चिरंतन विद्रोही नक्षत्र मालाकार की स्मृति को समर्पित 'भारत का भगवाकरण और सामाजिक न्याय की चुनौतियां' विषयक इस कर्यक्रम का आयोजन बिहार, यूपी के उन युवा एक्टिविस्टों ने किया था जो लम्बे समय से समाज निर्माण की सक्रियता से जुड़े रहे और जो लगातार लम्बे समय से दक्षिणपंथियों का सामना भी करते रहे.


“यूरोप के विकास के मूल में फ्रांसीसी राज्य क्रांति रही जिसका प्रभाव पूरी दुनिया के शोषितों , उत्पीड़ितों पर पड़ा जिससे यूरोप के समता , बंधुत्व और आजादी के नारे से अन्य देश भी अग्रसर हुए  और  यूरोप का विकास हुआ . धर्म की मौजूदगी के बावजूद पब्लिक स्फीअर में धर्म के हस्तक्षेप को सीमित किया गया और निजी जिंदगी में धर्म के हस्तक्षेप को एक अलग बात मानी लेकिन सामाजिक जीवन में धर्म के हस्तक्षेप को यूरोप ने रोका, लेकिन भारत में समाजवादी सरकारों ने इस हस्तक्षेप को नहीं रोका. यह उद्गार पहले सत्र में बोलते हुए वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश का है. उर्मिलेश  ने कहा कि बुद्धिज्म के पहले और बाद में भी भारत के कुलीनतंत्र ने यहां के कल्चर को नेस्तनाबूद किया और अपने दर्शन को बहुजन समाज पर थोपा. इस तरह का हमला पूरी दुनिया में आपको नहीं दिखेगा. ब्राहणवादी संस्कृति ने पुस्तकालयों और संस्थाओं को नष्ट किया और वे आज भी कर रहे हैं उन्होंने सवाल उठाए कि क्या हम जाति को खत्म कर लेंगे ? आज के हिन्दुत्वा को बनाए रखते हुए जाति को खत्म नहीं किया जा सकता. जिस सोच और  संरचना से जाति पैदा हुई है उस धार्मिक सोच और  संरचना को बरकार रखते हुए इसे खत्म नहीं किया जा सकता. इन कर्मकांडों के खिलाफ सामाजिक न्याय आंदोलन खड़ा हो जाए तो बहुत बड़ा परिवर्तन हो जाए. धर्म आपकी राजनीति और जीवन के सभी स्तरों को प्रभावित करता हैं लेकिन जरूरत इस बात की है कि सभी दलित, सामाजिक आन्दोलन इन कर्मकांडों को त्यागे ताकि हिन्दुत्व की ताकतें सबसे कम पढ़ी-लिखी है. उन्होंने अपनी किताबों को भी नहीं पढ़ा उन्होंने कहा कि आर.एस.एस और भाजपा अज्ञान का अथाह सागर है. आश्चर्य है कि इतने अज्ञानी लोग ज्ञानियों से भरे भारत को डिक्टेट कर रहे हैं . अत: यह भारत में ही संभव है उर्मिलेश ने यह भी कहा कि क्रिशचन , इस्लाम, बौद्ध और हिन्दुत्व जिसे मैं ब्राहण धर्म कहता हूं इन तीनों में कर्मकांड हैं, प्रचंड मूर्खताएं हैं, तीनों में डिस्क्रेमिनेशन है , लेकिन हिन्दू धर्म इनके भी बढ़कर सबसे बड़ा पाखंड हैं जिसमें मंदिरों के निर्माण के लिए मस्जिदों को तोड़ा जाता हैं . अत: हिन्दुत्वादी पंक्तियां पहले कांग्रेस मुक्त भारत, फिर विपक्ष मुक्त भारत और अब मीडिया मुक्त भारत की बात कर रहा हैं आज देश भर में 350 चैनल हैं जिसमें से 20 राष्ट्रीय हैं और ये हमारे ओर आपके घरों में घुसकर बीवी बच्चों का दिमाग बदल रहे हैं. मनुष्य होने तथा उनके ज्ञानी बनने की तमाम संभावनाएं नष्ट कर उन्हें हिंदुत्व का रोबोट बना रहे हैं. वे ऐसी मीडिया चाहते हैं जो भजनमंडली की तरह उनके लिए काम करे. बहुजन जातियों के लोगों को वे अपने एजेंट या गुंडे की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं उनमें से सरफिरों को इकट्ठा करके मुसलमानों के खिलाफ खड़े कर रहे हैं. चूंकि उन्हें मालुम हैं कि अल्पजन उनको छोड़कर कहीं नहीं जाएगा इसलिए वह अपने स्वार्थों उद्देश्यपूर्ती हेतु बहुजन से रिश्ते बनाते है जिसमें उनकी बड़ी सफलता ही छिपी हुई होती हैं अत: इनकी देशभक्ति और राष्ट्रवाद को चैलेंज किया जाना चाहिए क्योंकि यह कई तिकड़म अपना अलग–अलग मुद्दे उठा लोगों को गुमराह कर रहे हैं जैसे रेलवे स्टेशन, हवाई जहाज को बेच रहे हैं तो कभी अस्पताल बेच रहे है. शहर की बगल की जमीनों को कौड़ी के मोल निजी हाथों में सौंप रहे हैं अभी लगभग 23 रेलवे स्टेशन हाल ही में बिक चुके हैं. अस्पताल, विद्यालय, वि.वि. इन सबों का तेजी से निजीकरण किया जा रहा हैं. वे नहीं चाहते कि शिक्षा के क्षेत्र में बहुजन समाज के बच्चे आगे आये या मीडिया में जाएं. अगर यही निजीकरण की रफ्तार रही तो बहुजन के बच्चे पढ़ने लायक नहीं रहेंगे.

बिहार के संबंध में चर्चा करते हुए उर्मिलेश ने कहा कि लालू और नीतीश सत्ता में बैठे सामाजिक न्याय के आखिरी शहंशाह हैं क्योंकि अगर यह  नहीं जागे तो आप 2020 में कर्पूरी, मंडल सभी परंपरा नष्ट हो जाएगी. भगावा राज्य में स्कूल, कॉलेज और वि.वि. को गरीबों से छीन लेगा और इसी बात को ध्यान में रखकर फीसें बढाई जा रही हैं. इसको चैलेंज करने की जरूरत है, उन्होंने कहा कि नए ढंग के नए प्रतिरोध आंदोलन निजीकरण के खिलाफ खड़े करने होंगे. ब्राहणवादी कर्मकांडों के खिलाफ अभियान चलाने होंगे, रिजर्वेशन की लड़ाई को पुन: जारी रखने की जरूरत हैं और निजीकरण के खिलाफ लड़ाई को मजबूत करें और प्राइवेट क्षेत्र में आरक्षण की लड़ाई को मजबूत करना होगा 7-8 सालों में सरकार ने रेलवे, अस्पताल आदि कई क्षेत्रों का तेजी से निजीकरण किया, लेकिन पटना में उसके खिलाफ कोई आंदोलन नहीं हुआ. जबकि अर्जेटीना में इसके खिलाफ बड़े आंदोलन हुए.उनका मानना माना हैं कि आज कश्मीर के खिलाफ पूरे देश को खड़ा किया जा रहा है. ये इतने मूर्ख,काहिल लोग हैं कि अपना इतिहास भी नहीं देखते. शेख अब्दुला नहीं होते तो कश्मीर भारत का अंग नहीं होता .


कार्यक्रम का संचालन कर रहे बागडोर के संयोजक संतोष यादव ने कहा कि आर.एस.एस वर्णाश्रम धर्म की कोख से निकला है. भाजपा भारत की 70 सालों की उपब्धियों को पलटना चाहती है. वह भारत के डेमोक्रेटिक रिपब्लिक को हिंदू रिपब्लिक बनाना चाहती है. जाति जनगणना की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि जाति का सवाल चेतना का सवाल है यह जनगणना हर हाल में होनी चाहिए. उन्होंने इस देश के एक हजार कोर्पोरेटस के निदेशक मंडलों के हुए सामाजिक सर्वे का उल्लेख किया. जिसमें 46 % बनिया, 44 % ब्राहण और 3 % ओबीसी पाए गए इसमें दलित, आदिवासी का प्रतिशत शून्य पाया गया. उन्होंने लोहिया की उस उक्ति को कोड किया जिसमें उन्होंने कहा था कि इस देश के दिमाग पर ब्राहण का राज्य है और जेब पर बनिया का . संतोष ने कहा कि नए समाज को बनाने के लिए इस पारंपरिक वर्चस्व को खत्म करना होगा और सामाजिक न्याय की लड़ाई को ज्ञान और धन के न्यायपूर्ण बंटवारे की ओर केंद्रित करना पड़ेगा. उन्होंने नक्षत्र मालाकार की चर्चा करते हुए कहा कि उन्होंने ही यह आह्वान किया था कि ‘जेल, फांसी, नरक सब कबूल है लेकिन गैर बराबरी नहीं , उन्होंने जेपी के समर कैंप शिविर में दो तरह के भोजन की व्यवस्था पर सवाल किया था कि यह दुहरापन नहीं चलेगा . अगर आप मुक्ति चाहते हैं तो उस नारे को अपने जीवन का हिस्सा बनाना पड़ेगा. संतोष ने कहा कि संकीर्ण शुद्ध जातिवाद से सबसे खतरनाक है उससे मुक्ति के बगैर इस समाज का विकास संभव नहीं है.

‘मास मीडिया’ और ‘जन मीडिया’ के संपादक अनिल चमड़िया ने भाजपा की सोच में निहित सांप्रदायिकता को टारगेट करते हुए कहा कि आजादी के दौर में एक ऐसी धारा भी थी जो अंग्रेजों को नहीं भगाना चाहती थी . गोलवलकर आह्वान कर रहे थे कि ब्रिटिश के खिलाफ लड़ने में हिन्दुओं को अपनी शक्ति जाया नहीं करनी चाहिए क्योंकि आपके अंदर ही दुश्मन बैठा हैं. दुश्मन की शिनाख्त वे मुसमलान, क्रिश्चन और कम्युनिस्ट के रूप रहे थे .एक देश के भीतर हिंदू राष्ट्र बनाने की बात वे कर रहे थे. श्री चमड़िया ने कहा कि सत्य आपकी चेतना को एक खास दिशा देता हैं .वायरस जिस तरह कम्यूटर को नष्ट कर देता है  उसकी तरह खंडित विचार व्यक्ति की चेतना को नष्ट कर देते हैं. सावरकर राजनीति का हिन्दूकरण और हिन्दुओं का का सैन्यीकरण करना चाहते थे. अनिल चमड़िया  ने कहा कि धर्म के रूप में कई तरह के शेड़स हैं जिसका भाजपा अलग-अलग स्तरों पर प्रयोग कर रहा हैं. यह अकारण नहीं कि सहारनपुर की घटना एक इवेंट बनकर रह जा रही है, वह आंदोलन की एक धारा नहीं बन पा रही है. उन्होंने माना कि आज कई तरह से अंगूठों को काटने की विधियां दफ्तरों, कार्यालयों में ईजाद हो गई हैं. उन्होंने गुजरात की चर्चा करते हुए कहा कि आरक्षण का संबंध सांप्रदायिक दंगों से क्यों जोड़ा जाता है? सांप्रदायिक दंगे यह एहसास कराने की कोशिश करते हैं कि हम सारे के सारे हिंदू हैं.
मुस्लिम समाज में अशराफों के खिलाफ कलम चलाने वाले चर्चित लेखक खालिद अंसारी   ने कहा कि आजादी के पहले कई तरह की ताकतें संघर्ष कर रही थीं. मुसमानों के अंदर दो धाराएं थीं-मुस्लिम लीग और मोमिन कान्फ्रेंस . मुस्लिम लीग अशराफ मुसलमानों का संगठन था जो दो राष्ट्र का समर्थन कर रहा था और मोमिन कान्फ्रेंस दो राष्ट्र के सिद्धांत का विरोध कर रहा था. उन्होंने कहा कि आजादी के बाद पुराने मुस्लिम लीगी मुसलमान कांग्रेस के साथ जुड़ गए. पसमांदा , दलित और आदिवासी मुसलमानों ने पाकिस्तान बनने का विरोध किया, तब से भारत की राजनीति में उनका पूरी तरह से वर्चस्व है और वह आज तक जारी है. जमाते इस्लामी, ऑल इंडिया पर्सनल लॉ बोर्ड- इन सभी संस्थाओं पर इन्हीं 12 % सवर्ण मुसलमानों का कब्जा हैं. पीपुल्स आफ इंडिया के अनुसार भारत में मुसलमानों की 705 जातियां हैं जिसमें से 15-20 % ऐसी जातियां हैं जिन्होंने सारे इंस्टीट्यूशन पर कब्जा जमा रखा है, उन्होंने कहा कि जाति दक्षिण एशिया के सभी धर्मों और क्षेत्रों की समस्या है. दंगे होते हैं साल तीन साल पर कश्मीर में हिंसा फौरी जिंदगी बन गई है. इस पर सेकूलर खेमा कोई चर्चा नहीं करता. आज देख लीजिए मुजफ्फरनगर गुजरात में जहां भी दंगे होते हैं वहां पसमांदा ही क्यों मारे जाते हैं? उन्होंने कहा कि दंगे की भी भारत में जाति होती ह . हिन्दुत्व बढ़ता है तो उसकी एक बड़ी वजह मुस्लिम सांप्रदायिकता है.

उन्होंने कहा कि 70 के बाद सेकुलरिजम आज का सवर्ण सेकुलरिजम है. डॉ साहब अम्बेडकर की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि कास्ट को अम्बेडकर नेशन कहते हैं , गैंग्स कहते हैं वे जातियों को सामाजिक न्याय की
राजनीति को मुसलमानो के अंदर के ये ही गैंग्स प्रभावित कर रहे थे  अपने अंदर के जातिवाद को भी चुनौती देने की बात उन्होंने कही . राजीतिक सत्ता मिल गई तो उसको ये गैंग्स की तरह इस्तेमाल करते रहे . लोहियावादी 10 वर्ष तक शासन में रहे लेकिन उन्होंने लोहिया की रचनावली नहीं छापी, आंबेडकर की रचनावली नहीं छपी ,उन्होंने कहा कि विचारों का प्रसार होगा तो अंगुलियां अपने उपर भी उठेंगी.


बनारस से आए मशहूर छात्र नेता सुनील यादव ने कहा कि आज ट्रम्प से लेकर सेकुलर राष्ट्र फ्रांस, टर्की आदि दुनिया के पैमाने पर दक्षिणपंथी ताकतों का उभार हुआ है. यह दमन चक्र कहीं धर्म के आधार पर तो कहीं जाति के आधार सभी जगह चल रहा है. भारत में विजेता की स्थिति में हैं ये शक्तियां. सहारनपुर में आर.एस.एस भाजपा हिन्दू मुस्लिम पोलराइजेशन के लिए दंगे करवाती है. यूपी में योगी की सरकार बनने के बाद मुसलमानों और दलितों के उपर हमले बढ़े हैं. वोट लेते समय ये जातियां उनके लिए हिंदू हैं और बाद के दिनों में महज जातियां, इन्होंने संस्थाओं पर कब्जे की भी अजीब मुहिम चला रखी है. उन्होंने सवाल उठाए कि क्या हम केवल हिन्दुत्व की बात करके, डेमोक्रेटिक स्टेट की बात करके उनका मुकाबला कर लेंगे, हमें इस पर भी गौर करना चाहिए. आर.एस.एस भाजपा सुसंगत तरीके से बढ़ रही है. सत्ता के विस्तार के लिए जो भी बिम्ब संभव हो सकते हैं वह उसका इस्तेमाल कर रही है. आज तिरंगे को लेकर माहौल बना दिया गया है . तिरंगे के प्रति आर.एस.एस का नजरिया क्या था. गाय के सवाल पर गौ गुंडे उन्माद फैला रहे हैं. अखलाक की हत्या कर रहे हैं.

दिल्ली से आए युवा पत्रकार अरविंद शेष ने लिखित पर्चे का पाठ किया जिसमें उन्होंने कहा कि चेतना के स्तर पर सशक्तिकरण की प्रक्रिया हमारे समाज में बहुत धीमी रही है, उन्होंने हिन्दू समाज की चेतना को प्रभावित कर रहे कई ढोंगी बाबाओं की पोल खोली और कहा कि ब्राहणवाद से निकलकर ही इंसाफ हासिल किया जा सकता हैं, उन्होंने माना कि विचारधारा आगे तभी बढ़ती है जब वह समाज निर्माण में काम आए.

पंजाब से आए चर्चित युवा कवि गुरिंदर आजाद ने भारतीय राष्ट्रवाद पर ब्राहणवादी ताकतों और अंततः भगवा ताकतों की तेज होती गिरफ्त पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह देश आपका नहीं रहा, वह बहुत बड़ा राज्य का समूह बन गया. उन्होंने माना कि यह राष्ट्रवाद  हमारा नहीं है, भयानक भटकाव है भारत के राज्यों में इस पूरी डायवरर्सिटी को राष्ट्रवाद   के डंडे से हांकने की कोशिशे हो रही हैं. जब स्टेट मजबूत ही नहीं रहेगा तो आप करेंगे क्या?

जे.एन.यू से आए संघर्षशील छात्र नेता प्रशांत निहाल ने वि.वि. स्पेस में सोशल जस्टिस आंदोलन और ब्राहणवादी मानसिकता से जुड़े अनुभव साझा किए, उन्होंने कहा कि एम.फिल, पी.एच.डी में लिखित में 70 और भैवा में 30 अंक दिए जाते हैं. यहां सवर्ण अध्यापकों द्वारा दलित, ओबीसी छात्रों का भयानक भेदभाव होता रहा है. मेरिट के नाम पर उत्पीड़न का पूरा एक पैकेज काम करता रहा है, उन्होंने कहा कि वि.वि. एक प्रोपेगेंडा का स्पेस है जिसे मीडिया के माध्यम किसी खास तरह की विचारधारा को सामने लाने का चलन उसी तरह वि.वि. भी है.


एडवोकेट अलका वर्मा ने कहा कि दक्षिणपंथ का बढ़ता प्रभाव इस देष के लिए खतरा है. उनको रोकने वाली राजनीतिक ताकतें इतनी कमजोर कभी नहीं रहीं.

दलित दस्तक के संपादक अशोक दास  ने कहा कि हम सब भगवाकरण को ढो रहे हैं.उन्होंने सवाल उठाए कि जिस भारत की बहुजन आबादी 80% है क्या उसका भगवाकरण संभव है? हमें खुलकर अपने अंदर झांकने की जरूरत है. आखिर मुट्ठी भर लोग हमारे लिए क्यों चुनौती बने हुए हैं? हमें देखना होगा कि सत्ता वाले कौन लोग हैं?
गजेंद्र मांझी ने माना कि भगवाकरण की ये ताकतें किसानों और दलितों को बहुत चालाकी से अपने में समाहित कर रही हैं उससे निपटने का कार्यभार आज की सबसे बड़ी चुनौती है .

अपने स्वागत भाषण में भागलपुर से आए ‘न्याय मंच’ के डॉ मुकेश कुमार ने कहा कि हम बहुजन चौपाल में शामिल हैं और हमारे सामने मध्य प्रदेश के किसानों की लाशे हैं, दलित छात्र डीका की लाश मौजूद है, गौ आतंकियों द्वारा मारे गए लोगों की लाशे मौजूद हैं, बिहार झारखंड के किसानों की लाशे मौजूद हैं अत: उन्होंने कहा कि सामाजिक न्याय के  पूरे एजेंडे को मुखर करने का एक मौका यह आयोजन हैं जो पूरे देश के स्तर पर इस तरह के कार्यक्रमों की श्रृंखला शुरू करने की बात उन्होंने कही.

मुस्तकीम सिद्दकी ने कहा कि आज बहुजन के दिमाग में आतंक डाल दिया गया है. सांप्रदायिकता प्रशासन तक में चली गई हैं. हाल ही में नवादा में एक खास धर्म के लोगों के उपर हिन्दुत्वादी गुंडों और प्रशासन ने जिस तरह के कहर बरपाए उस घटना में यह प्रवृत्ति खासतौर से दिखी. प्रशासन, मीडिया सब के सब भगवाकरण में रंग गए हैं. राम सेना और हिंदू सेना को ढोनेवाले कौन लोग हैं, उनपर मुख्यधारा का भगवा मीडिया क्यों चुप हैं? भीम सेना बनती है ये ही उसे गुनाहगार साबित करने में लग जाते हैं.

इंजीनियर हरिकेश्वर राम ने सवाल उठाया कि क्या हमारा स्टेट धर्मनिरपेक्ष है? कोर्ट में गीता को माध्यम मानकर शपथ क्यों ली जाती है? ओबीसी के लोग नारियल क्यों फोड़ते हैं? नीतीश मोतिहारी में बहुत बड़ा मंदिर बनवा रहे हैं. मनुवाद को हमलोग आज भी स्वीकार कर रहे हैं. एक बहुत बड़ी आबादी को भेदभाव के आधार पर नीचे रखा गया है. हम इस अन्याय और भेदभाव से मुक्त कैसे हों? सभी क्षेत्रों में निर्णायक जगहों पर संख्यानुपात में उनकी भागीदारी हो. आरक्षण दिए जाने के पीछे यही आधार रहा है . उन्होंने माना कि ये सीधे-सीधे मनुवाद और आंबेडकरवाद की लड़ाई है. इस सत्र के अपने संक्षिप्त अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. ईश्वरी प्रसाद ने सवाल उठाया कि आखिर भाजपा बढ़ इतनी बढ़ क्यों रही हैं ? इस सवाल के शिनाख्त करने की जरूरत है, उन्होंने कहा कि यह एक अजीब विडंबना है कि नीतियों, सिद्धांतों और व्यवहार के स्तर पर आज सभी पार्टियां एक तरह का रोल प्ले कर रही हैं. हमें व्यापक फलक पर इन तमाम सवालों पर सोचना होगा तभी हम सही मायने में भारत के हैं या इस भगवाकरण के इससे निपना होगा.

इस सत्र को डॉ. विनोद पाल, हीरा, नवनीत एवं मनीष ने भी संबोधित किया.


समारोह के दूसरे सत्र की अध्यक्षता इतिहासकार ओ.पी जायसवाल ने की उन्होंने संक्षिप्त किंतु ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में आर.एस.एस और भाजपा की वैचारिक संकीर्णता पर रोशनी  डाली और कहा कि ये बहुत कम पढे-लिखे लोग हैं. जो झूठ बोलने में माहिर हैं. उन्होंने कहा कि आजादी के बाद जो संस्थाएं खड़ी की गई थीं उसको वे एक-एक कर ध्वस्त कर रहे हैं और वहां आर.एस.एस. की नीतियों को लागू कर रहे हैं . इस सत्र में स्वागत वक्तव्य रिंकु और संचालन मुकेश कुमार ने किया .

इस सत्र को को संबोधित करते हुए प्रो . रतनलाल ने कहा कि जब राज्यसत्ता आततायी हो जाए तो उसे कान पकड़कर सिखाएं कि रास्ता इधर है.उन्होंने कहा कि आज चैथे खंभे में धूल लग गई है. राज्यसत्ता का हर प्रतिरोध पर दमन है, अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला किया जा रहा है प्रजातांत्रिक संस्थाएं नष्ट की जा रही हैं और मीडिया सत्ता की दलाली में बिछी हुई है. बहुजन चैपाल के माध्यम से ही तरह की तानाशाही को खत्म किया जा सकता है. उन्होंने कहा कि उन्हें बीजेपी को हिन्दू राष्ट्र बनाना है तो  वर्णव्यवस्था को बनाये रखना उनकी रणनीति हैं वे 90 वर्ष से गंभीरता से अपने मिशन में लगे हुए हैं उन्हें 90 वर्ष लग गए नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने में लेकिन वे अपने एजेंडे पर डंटे रहे कि हमें हिन्दू राष्ट्र बनाना है, दूसरी ओर एक छद्म, फर्जी सामाजिक न्याय और धर्मनिरपेक्षता का ढोंग करने वाले लोग हैं जिन्होंने सामाजिक न्याय को शंकर की जटा की तरह अपने जटे में ही बांध लिया है और वे नहीं चाहते कि उनके जटे से सामाजिक न्याय की कोई दूसरी धारा फूटे .

भागलपुर से आए प्रो. के.के.मंडल ने कहा कि आज हम सब इतिहास के सबसे कठिन दौर से गुजर रहे हैं. भाजपा की सरकार राष्ट्रवाद को रिफाइंड करने की कोशिश कर रही है. उनकी आइडियोलोजी हैं की यह हिंदू राष्ट्र है . इसकी पुष्टि में वे पौराणिक ग्रंथों का हवाला देते हैं. उनकी भारतवर्ष की अवधारणा बिल्कुल निरर्थक है. ऋग्वेद 1028 मंडल में एक बार भी जनपद का इस्तेमाल नहीं है. वहां 10 बार राष्ट्र का संदर्भ आता है, यह राष्ट्र बीजेपी के राष्ट्र  से अलग है. कुरु, पांचाल, ज्योग्रफी पहचान....यज्ञ संदर्भ है धार्मिक है. बौद्धायन धर्मसूत्र में मध्यदेश की बातें कही गई जिसमें संगम तक भारत की अवधारणा करते हैं. उन्होंने कहा कि पातंजलि और मनुस्मृति-दोनों टेक्स्ट में रिपिटेशन है. मगध क्षेत्र जहां राज्य का निर्माण हुआ, अरबनाइजेशन हुआ, उसी मगध एम्पायर में भारत की संकल्पना पहली बार आती है . मध्य गंगा घाटी में यह प्रयोग हो जाते हैं. यह क्षेत्र ब्राहणीकरण नॉम्स के खिलाफ है इस डिसकोर्स में  ऋग्वेद के 10वां मंडल में किकट शब्द है जो ओबीसी मार्जिनल ग्रुप है, इसमें मार्जिनल ग्रुप को कोई स्पेस नहीं है . मुसलमान, ईसाई, बुद्धिस्ट  उनकी राष्ट्रीय अवधारणा में नहीं हैं, उनकी राष्ट्रीय अवधारणा मिथ है, फेक है उसको रिजेक्ट करना होगा. बुद्ध और अम्बेडकर मध्यम मार्ग की बात करते हैं.

सामाजिक न्याय की की चर्चा करते हुए श्री मंडल ने कहा कि आरक्षण को आज बड़े फलक पर ले जाने की जरूरत है. उन्होंने माना कि 30 साल से बिहार में पिछड़ों की सरकार है .  लेकिन यहां का मार्जिनल ग्रुप कहां है? यहां रेप हो रहा है, बाथे के हत्यारे छूट रहे हैं ऐसे में किससे उम्मीद की जाए किसके खिलाफ लड़ेंगे ,बी.पी.एस.सी के द्वारा सहायक प्रोफेसर की बहाली हो रही है उसमें जेनरल कैटोगरी में एक भी ओबीसी/एस-सी/एसटी के लोगों की नियुक्ति नहीं हो रही. आप सब में टॉप कर रहे हैं और आपकी अपनी ही कोई कैटोगरी नहीं है.

अशोक भारती ने  कहा कि जर्मन में जिसे फांसीवाद कहते थे इटली में में उसे ही नाजीवाद कहा गया और भारत में वही भगवाकरण है, उन्होंने माना कि भगवा सरकार तथाकथित राष्ट्रवादी सरकार है. दलितों, आदिवासी नेताओं को खरीद कर अपने में शामिल करना उनकी मोड्स अपरेंडी है. रामविलास पासवान से लेकर रामदास अठावले तक उनके साथ हैं, जो न्याय की बाते करते थे उनको भी खरीद लिया . अति पिछड़ी जातियों के नेताओं को खरीदने की उनकी नीति है, वे इस देश के अल्पसंख्यक समुदाय को हर स्तर पर अपमानित करते हैं, उनके विरूद्ध झूठा और बुनियाद प्रचार करते रहे हैं ताकि उन्हें देश  का दुश्मन साबित किया जा सके, अलग-अलग राज्यों में ताकतवर अगड़ी जातियां है. पश्चिमी उतर प्रदेश में जाट,रेड्डी, कम्मा, मराठा, पटेल, गुज्जर हैं अत: वे इनके खिलाफ  पिछड़ी अति पिछड़ी जातियों को गोलबंद करना चाहते हैं. मराठा में पटेलों के खिलाफ किया अब बाकी को करने वाले हैं. वे सत्ता हाशिए की जातियों के माध्यम से प्राप्त करना चाहते हैं और उसकी कमान भूरा बाल वाली जातियों को सौंपते रहे हैं. उतर प्रदेश में क्या हुआ? पिछड़ा उप मुख्यमंत्री स्टूल पर बैठा है, वहां सत्ता अति पिछड़ों के नाम पर आयी और नेतृत्व भूरा बाल को दे दिया. ये जो कर रहे हैं वह दरअसल गाय, गोबर और गोमूत्र का दर्शन है , इसको अगर हमने समझ लिया तो अपना काम कर लिया. हमारा संकट यह है कि पिछड़े आपस में एक नहीं हो सकते यह लड़ाइयां कई स्तरों पर लड़े जाने की जरूरत है. वे क्या कर रहे हैं, हमारी लड़ाई कैसे मजबूत होगी, इस पर हमें विचार करना होगा.  संगठन और बिजनेस का ढांचा कैसे बनेगा हमें इस पर भी विचार करना चाहिए, उन्होंने कहा कि बाजार पर कब्जा भूरा बाल वाली जातियों का है. जिस दिन आप इस बाजार से भूरा बाल को खदेड़ देंगे, उस दिन आपने एक बड़ी जंग जीत लेंगे जब तक आप उनकी बाजार खड़ी करते रहेंगे, मजबूत नहीं होंगे हमारा संकट यह है कि आज तक इनके कामों को प्रोत्साहित नहीं किया गया . कई बार प्रताड़ित होने वाले लोग भी प्रताड़ित करनेवाले के दृष्टिकोण से सोचते हैं, हमारा हर काम पहचान और सम्मान के निमित्त बनना चाहिए.



जे.एन.यू से आए छात्र नेता मुलायम सिंह ने कहा कि आप सब गाय, गोरू और गंगा में मत फंसिए प्रोग्राम क्या है इसे कैसे इनीसिएट करना है इसे जनता के बीच आयोजित करें. नीतियां क्या होंगी आर्थिक, सामाजिक इस पर मंथन कीजिए . सामाजिक न्याय की सरकारों के पास आज कोई बड़ा विस्तृत प्रोग्राम नहीं है. हमें अगले 50 साल तक के एजेंडे पर सोचना पड़ेगा. आपकी शिक्षा नीति कहां है? बहुजनों के अंदर चेतना का विस्तार, बच्चों को बेहतर शिक्षा मिल पाई कि नहीं. अभी तक एम्स जैसा कोई ओर एम्स क्यों नहीं बन पाया. हेल्थ पॉलिसी, छोटी बीमारी तमाम लोग दवाओं के अभाव में मर रहे हैं. कांग्रेस, भाजपा, पड़ोसी देशो से संबंधों को लेकर आपकी पॉलिसी नेशनल और और इंटरनेशनल ऐजेंडे शामिल हो सकते हैं. हम कैसा समाज और दुनिया बनाना चाहते हैंइस पर ध्यान देने की जरूरत हैं क्या जैसा फूल, आंबेडकर सोचते हैं वैसा देश होगा. उन सपनों के देश में जाने के लिए ये बातें कितनी दूर तक सहायक होंगी. जिंदगी जीने से मरने तक बहुत सारी समस्याएं हैं . पार्टी प्रोग्राम विकसित करने पड़ेंगे . प्रोपेगैंडा कैसे करेंगे मीडिया, अल्टरनेटिव, सोशल, प्रिट जर्नल्स, मीडिया हमलोग भी तो हैं . आदमी का जब से कंठ खुला तब से मीडिया आई. लोगों तक अपना विजन कैसे ले जाया जाए , लोकेशन फिट करना पड़ेगा.  
       
रोडमैप पर आनेवाला वह स्थान कहां होगा. इसके लिए मेरी नजर में 7 फार्मू ले है जैसे  साहित्य जनेउधारियों का , कस्ट से पाएं मुक्ति, उन्नति के साथ मंत्र, क्यों नहीं होती देवताओं की मुछे, मिथक, अवतारवाद पुरातनपंथी गार्वेट के खिलाफ आपका मंथन से बुकलेट, 1 महीने 7 सेमिनार, कष्टों पर होगी चर्चा, कैसे होंगे बहुजन खुशहाल, सोशल एजेंडा, अपने इतिहास को जानें रेशनल इतिहास, आर्यों का इतिहास कहा जाता है या हमारे यहां उन्नत सभ्यताएं थीं लेकिन इस पर किसी इतिहासकार ने कुछ नहीं लिखा इसी कारण हमारा सबाल्टन इतिहास पिछड़ गया.

लखनऊ से आए रिहाई मंच के राजीव यादव ने कहा कि भगवा ताकतों से निबटने के लिए हमें हर स्तर पर तकनीक विकसित करनी होगी. भाजपा के समानांतर हमें देश प्रेम की नई परिभाषा गढ़नी पड़ेगी. उतर प्रदेश में भगवा शक्तियों को बड़ी जीत हासिल हुई, उन्होंने भागीदारी आंदोलन की चर्चा की और कहा कि जब तक राजनीतिक ढांचे को आंदोलन नहीं समझेगा तो दलितों के हिन्दूकरण को नहीं रोका जाएगा. गोरखनाथ पीठ की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि कबीर और गोरखनाथ में एक समानता मिलती है .

शब्बीरपुर की घटना की चर्चा करते हुए राजीव ने कहा कि यहां भाजपा अम्बेडकर को लेकर दलित मुसलमानों में विभाजन करने में कामयाब हुआ उन्होंने आतंकवाद के नाम पर मुस्लिम समाज के बेगुनाह लोगों को मीडिया, प्रशासन और भगवा गुंडे द्वारा फसाए जाने से संदर्भित कई घटनाक्रमों की चर्चा की, हाल ही बिहार के नवादा और यास्मीन नामक महिला से जुड़े संदर्भ भी उद्घाटित किए और कहा कि दरअसल हमें आज गिरिराज सिंह पर चिंतित होना चाहिए. जो बिहार को गुजरात बनाना चाहते थे  मेरी मान्यता है कि इसी तरह के और सारे युवा चैपाल लगाई जाए.  

जे.एन.यू. से आए बीरेंद्र कुमार ने बहुत सारगर्भित अंदाज में अपनी बातें रखीं और कहा कि जे.एन.यू में पढ़ता हूं पुलिस की नजर में मैं माओवादी हूं , अगर मुसलमान होता तो आतंकवादी भी हो जाता, उन्होंने इतिहास लेखन को लक्षित करते हुए कहा कि प्रगतिशील इतिहासकारों ने भी आदिवासियों के संघर्ष और विद्रोह को गायब करके देखा. पिछड़ों, दलितों का सवाल एक तरह का नहीं है. 2017 में हमें नए कंटेंट एवं नए कांटेस्ट में इनकी बात करनी होगी . बिहार, यूपी में फांसीवाद का चरित्र सिर्फ कम्यूनल ही नहीं जातिवादी भी है . सामाजिक न्याय के पुरानी खिलाड़ी बिक गए, खप गए उनको त्याजिए. इसका रास्ता संघर्ष के मैदानों से ही निकलेगा. विपक्ष सड़कों, खेतों और खलिहानों में है, यही फासीवाद को नेस्तनाबूद करेगा. यह जो संकट गहराया है उसकी जड़ में निजीकरण , कॉर्पोरेशन, रामरथ, कमंडल, रणवीर सेना, आतंक आदि मुख्य रहे हैं.

पटना के सामाजिक राजनीतिक विमर्शों की एक अपूर्व कड़ी रहे डॉ.पी.एन.पी पाल ने कहा कि आर.एस.एस और भाजपा कई स्तरों पर बहुजन समाज को अपने अंदर समाहित करने की कोशिश में लगी है , उन्होंने कहा कि संघ के लोग संगठित हैं अत: इनका नेटवर्क हर क्षेत्रों में है . अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद,सरस्वती विद्यामंदिर, स्वयंसेवक, सदस्य, बजरंग दल के पूर्णकालिक सदस्य, प्रकाशन सदस्य, मजदूर संघ इनके कामों को आगे बढ़ा रहे हैं, इसके अलावा आशा राम बापू, मोरारी बापू, रामदेव आदि लाखों साधू संत के रूप में ठग उनके विचार को मजबूत करने में लगे हैं और हमारा बहुजन समाज आज भी हिंदू धर्म के सारे कर्मकांडों का वाहक बना हुआ है. वामपंथ की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि वे हाशिए पर क्यों चले गए? इसलिए कि जाति और वर्ग के सवाल को उन्होंने ठीक से समझा नहीं, उसका हल नहीं निकाला. लोहिया समाजवादी एक विकल्प दिया लेकिन वे इसमें कामयाब नहीं हुए. मध्य जातियों से आए तमात नेताओं का पतन परिवार में हो गया उन्होंने कहा कि व्यापक सृजन के जो हाथ हैं वही जातियां वर्तमान फांसीवाद का विकल्प खड़ा कर सकती हैं.
कोचस, रोहतास से आए डॉ. विजय प्रकाश सिंह ने कहा कि आज गांवों और कस्बों के 15 से 30 साल के बहुजन समाज के बच्चों का हिंदू सेवा समिति द्वारा ब्रेनवाश किया जा रहा है इस चुनौती से आपको निपटना होगा और जिला, प्रखंड पंचायत तक जाना होगा इसके लिए मैन पावर, पैसा, बुद्धिजीवी और समय सब चीजों की जरूरत पड़ेगी. सामाजिक न्याय की धज्जियां इस देश की संस्थाओं कम पिछे नहीं रही . 2007 में सुखदेव थोराट एवं पाल एटवेल के एक सर्वे की चर्चा करते हुए डॉ विजय ने कहा कि नामी प्राइवेट उद्योग कंपनियों में जातिवाद किस कदर हावी है की शोध इसको सामने लाता है. सवर्ण, ओबीसी, दलित सब के मार्क्स के  नाम पता अलग-अलग था . कंपनियों में उंची जाति वालों को इंटरव्यू के लिए बुलाया गया, ओबीसी एसटी पर कंपनियों ने कोई संज्ञान नहीं लिया , उन्होंने कहा कि उनके यहां 500 एम. आर आते हैं उनमें एक भी ओबीसी एमआर नहीं आए. उन्होंने माना कि किसी भी देश में हाशिए पर खड़े वर्ग को सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक मूलभूत समस्याओं से पार पाने के लिए समान अवसर उपलब्ध कराना ही सामाजिक न्याय हैं. 70 वर्षों की आजादी में बाधा पैदा किया गया है. नाम के लिए अनुसूचित जातियों को आरक्षण मिल रहा है लेकिन क्लास वन नौकरियों में वे 12 % ही सीट ओबीसी/एस-सी/एसटी के हैं. ओबीसी की 5 % सीटें तक नहीं भरी गईं और फिर भी उनकी छाती फट रही है कि हमारी मेरिट मारी जा रही है, कहां गई तुम्हारी मेरिट जहां सैकड़ों मामले न्यायालयों में लंबित हैं.

अजीत आर्यन ने बढ़ते भगवा हमले पर चिंता जताई कहा कि परिवर्तन आना चाहिए यह काम अलग-अलग तरीके और माध्यमों से लोग कर रहे हैं लेकिन कोई दिशा निकालनी चाहिए जो नई राजनीति से सामने आ सकती हैं. अत: जैसे लोहिया ने छोटी राजनीति की बात कही थी, जो जनता को रोज-ब-रोज शासन-प्रशासन के साथ झेलने पड़ते हैं उसी को उन्होंने बड़ी राजनीति कहा. आज की  चुनौती है कि हम आप अपनी विश्वसनीयता जमीनी स्तर के लोगों के बीच बनाए.

स्कोलर एवं डॉ शरद जायसवाल  ने भारत और खासकर उतर प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में हुए दंगों के कारणों की बारीक तफ्तीश की ओर कहा कि आज पश्चमी उतर प्रदेश का हर तीसरा गांव दंगे की चपेट में है वहां आर.एस.एस अपना घृणा प्रयोग कर रहा है. मुसलमानों को नमाज नहीं पढ़ने दिया जाता और उनकी पुरानी मस्जिदों को किसी पौराणिक हिन्दू मंदिर साबित करके पुलिस प्रशासन की मदद से उस पर प्रतिबंध लगावा रही है इसमें पूरी तरह मीडिया और प्रशासन उनकी सहयोगी की भूमिका में है. वे अब कोई शारीरिक हमला नहीं करते बल्कि उनका पूरा मकसद साइक्लोजिकल अटैक का है वे मानते हैं कि डेमाग्राफी को बदला जाए यह प्रयोग गुजरात, कानपुर,बिहार आदि देश के दूसरे शहरों में तीव्रता से किए जा रहे हैं.

आर.एस.एस. ने एक लिस्ट जारी की है जो सुदर्शन टी.वी ने आधे घंटे का एक एपिसोड बना दिया जिससे मस्जिद विवाद हो गया जो शेरपुर हुई घटना हैं वहां मुसलमानों से जमकर लूट-पाट की गई उसमें पुलिस भी शरीक रही. इस घटना पर विपक्ष की ओर से कोई आवाज नहीं उठी सपा, बसपा, कांग्रेस किसी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी जबकि वहां से 35 कि.मी. दूर देबवंद है. बिहार के नवादा में हाल के दिनों में जो घटनाएं मुसलमानों के साथ घटीं, उसमें सत्ताधारी पार्टी के एक एम.एल.सी के घर को भी नहीं बक्शा गया, वहां डेढ़ सौ से उपर घरों पर हमला किया गया , कई दुकानें जला दी गईं. पीरो में हमला हुआ लालू जी ने कोई बयान नहीं दिया बिहार में हाईकोर्ट का निर्णय है कि किसी भी धार्मिक कार्य में कोई  डी जे नहीं बजेगा . इसी डीजे की वजह से ज्यादातर जगहों पर दंगे हो रहे हैं हाईकोर्ट का निर्देश है बावजूद इसके बिहार में इन मौकों पर डीजे बज रहे हैं उन्होंने कहा कि शासक वर्ग बदलाव से बहुत डरता है इसीलिए इस तरह की घटनाओं पर वह चुपी साध लेता हैं,  उनका मानना हैं कि हाशिए के लोगों की दमन की प्रक्रिया में वि.वि. सिस्टम भी शामिल रहा जैसे  जे.एन.यू से लेकर हैदराबाद तक की घटनाओं में इसे देखा जा सकता हैं.


मौटे तौर पर कह सकते हैं कि बहुजन चौपाल सामाजिक न्याय को केंद्र में रख कर एक व्यापक वैचारिकी को जन्म देने का प्रयास हैं, जो न्यायपूर्ण हो तथा जिसका उद्देश्य  समाज में अवरोध उत्पन्न करने वाले कारकों व लोगों की पहचान करना ताकि सामाजिक न्याय की अवधारणा पर बढ़ते हमलों को रोका जा सके और नए दौर में नए परिप्रेक्ष्य से राजनीति के नवीनीकरण को विकसित किया जा सके, हो.  यह राजनीति में सक्रिय भागीदारी के बिना संभव नहीं अत: भगवाकरण सरकार के समक्ष ऐसे चुनौतीपूर्ण संगठनों या विचारधारा के लोगों को न्याय के सवालों पर बहुजन चौपाल एकत्र होने के साथ एक नयी दिशा देने का प्रयास भी हैं. वर्तमान राजनीति का भगवाकरण इस कदर हो चूका हैं कि एक आम व्यक्ति को न्याय मिलने में इतनी देरी हो जाती कि उसका विश्वास इस संवैधानिक न्याय व्यवस्था से उठने लगता हैं जिसका एक जीता जागता उदाहरण नजीब का लापता होना जिसके लिए भाग्वावादी सरकार जिम्मेदार हैं क्योंकि उनके सत्ता में आते ही मानों बाबरी मस्जिद या कश्मीर , गौ माता , भारत माता जैसे मुद्दे को उठाना तथा धर्म व जाति जैसे के मुद्दे को उठाकर लोगों को गुमराह करना होता  हैं.

बहुजन चौपाल बहुजन की एकता को मजबूत करने की मुहीम भी हैं जो सामाजिक न्याय को आधार बना कर एक ब्लू प्रिंट तैयार किया जो सांकृतिक न्याय प्रकाश डालता हैं.  
   
नयी पीढी की उभरती नयी उर्जा को सही दिशा में लगाने के लिए बहुजन चौपाल एक वैचारिकी मंच प्रदान करता हैं जिससे दमनित शोषित व उत्पीड़ित बहुजन की समस्याओं व मुद्दों को उनके तरीके से देखा व समझा जा सके जोकि यह राजनीति तौर पर सामाजिक तथा बौद्धिक क्षेत्र में हस्तक्षेप द्वारा संभव हो सकेगा. बहुजनों के आत्मसम्मान व सत्ता के साधनों व संसाधनों का समान आबंटन हो सके वह किसी वर्ग वर्चस्व की धरोहर न हो सके. बहुजन चौपाल में बहुजनों के अंतहीन  अन्याय के खिलाफ मोर्चा खोलने की तैयारी की जिसका आधार न्याय रखा गया.    

बहुजन चौपाल जैसे कार्यक्रमों का आयोजन बदलते परिवेश में बदली परिस्थियों के अनुसार  परिवर्तन पर भी बल देता है, जिसमें  सामाजिक न्याय, लैंगिक न्याय, रिजर्वेशन के मुद्दे, जमीनी स्तर से जुड़े किसानों की समस्याओं पर भी ध्यान केन्द्रित किया. मजदूरों की समस्या पर अभिषेक जी जो समान शिक्षा, रोजगार तथा स्वस्थ्य अभियान से जुड़े हैं जिन्होंने मजदूरों की मुलभुत जरूरतों की ओर ध्यान आकर्षित करने का प्रयास किया आदि.  
पटना की स्थिति से अन्य स्थानों पर महिलाओं की स्थिति क्या होगी इसका अंदाज़ा हॉल  में विद्यमान महिलाओं की संख्या से लगाया गया जिसमें केवल लगभग 10 से अधिक महिलाएं  नहीं थी उसमें भी पुरूष वक्ता की अपेक्षा केवल तीन महिलायें ही शामिल रही. लेकिन 12 जून को हुई मीटिंग में दो महिलाओं डिम्पल और गुंजन ने इस बात को सामने रखा कि महिलाओं की संख्या कम रही जिस पर विचार किया जाना चाहिए, चूंकि महिलाओं के बिना सामाजिक न्याय की बात करना एकतरफा व एकांगी होगा. उन्होंने पटना में ही सक्रिय महिलाओं को शामिल किये जाने की बात रखी ताकि महिलाओं को विश्वास में लेकर गांव से शहर की ओर सांस्कृतिक पलायन को रोका जा सके. महिलाओं के सशक्तिकरण के मुद्दे पर चूंकि महिलाओं के कास्ट, क्लास, वर्ग, क्षेत्र तथा भाषा के आधार पर अनुभव अलग – अलग होते हैं इसलिए उनके संवेदनशील मुद्दों पर उनकी दृष्टि से विचार किया जाना चाहिए साथ ही महिला आरक्षण बिल पर भी चर्चा की गयी.  


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