भारतीय नवजागरण के स्त्री सरोकार की वैचारिकी

अभिषेक भारद्वाज  
 शोधार्थी गुजरात विश्वविद्यालय, संपर्क :abhidwaj86@gmail.com,7818067905
नवजागरण समूह विशेष में अपने सामूहिक रूप से अवनति के चिंतन से उपजता है. इस अर्थ में जो हार गए अथवा पीछे छूट गए हैं, और वह वापस पुनर्स्थापित होना चाहते हैं, उनका नवजागरण है. यह उस समूह विशेष की भूमिका, हिस्सेदारी और उनके अधिकार को सुनिश्चित करना है . यहाँ एक सवाल पैदा होता है कि यदि समाज के पीछे छूट गए अंश के हिस्सेदारों को हम पुनः स्थापित नहीं करते हैं तो क्यायह नवजागरण है? अपितु यह केवल वर्चस्वशील वर्ग का ही सतत विकास है. 19वीं सदी के नवजागरण पर बहुधा उसके अभिजात्य स्वरूप को लेकर सवाल उठने लगा है. इस अर्थ में यह एक उचित प्रश्न है. इस अर्थ के साथ हम धर्म के आधार पर (मुस्लिम नवजागरण), वर्ग के आधार पर (बौद्ध काल में पुरोहितवर्ग के विरुद्ध धार्मिक सुधार एवं जागरण), राष्ट्र के आधार पर (भारतीय राष्ट्रीय नवजागरण, इटली और फ़्रांस आदि विभिन्न देशों के नवजागरण) भाषा के आधार पर हिन्दी नवजागरण, बंगाली नवजागरण, आदि(यह विभाजन केवल भाषा का न होकरजातियता का भी है) इसी भांति लिंग, जाति (भारतीय वर्ण व्यवस्था) के बरक्स भी हम अध्ययन कर सकते हैं. बहुतेरे लिंग के आधार पर अध्ययन करते भी हैं.

मानव सभ्यता के प्रारंभ में जब सभी मनुष्य समान थे तो इसका अर्थ हुआ स्त्री भी पुरुष के बराबर रही होंगी. सभ्यता के विकास के साथ वह पीछे छूटते चली गई. कई विद्वानों ने यथा मॉर्गन, एंगेल्स, बोट्मोर आदि ने इस पर पर्याप्त तथ्यों को उद्घाटित किया है. संभवतः इस प्रकार देंखे तो जागृति की सर्वाधिक आवश्यकता उन्हीं में है. क्योंकि उनकी शोषण से मुक्ति तो दूर की बात है पहले इसका सम्पूर्ण बोध तो हो. इस प्रकार नवजागरण के काल में स्त्री के सरोकार के मायने बढ़ जाते हैं, क्योंकि यह स्त्री के अन्दर बोध निर्मित करने का दौर था. इसके साथ ही अगले स्तर के रूप में नवजागरण उनकी सामाजिक भूमिकाओं की पहचान सुनिश्चित करने का युग था . इसके उदाहरण के स्वरूप पंडिता रमाबाई को देखा जा सकता है, वैसे वे हिंदी क्षेत्र से बाहर की परिधि से हैं. लेकिन उनका प्रभाव निश्चित रूप से हिंदी पट्टी में रहा है इसे नाकारा नहीं जा सकता.

19वीं सदी में स्त्री 

कोई भी नवजागरण बहुस्तरीय होता है . कई बार यह एक-दूसरे के विरोधी भी प्रतीत होते हैं, किन्तु वे वास्तव में  विरोधी होते नहीं बल्कि विभिन्न समूहों, जिनमें नवजागरण घटित हो रहा है उनके सकारात्मक मूल्यों की वृद्धि में सहायक होते हैं. क्योंकि नवजागरण अपने मूल में सार्वभौमिक मानवतावाद से अनुप्रेरित है. इस तरह स्त्रियाँ  भी , जो जन्म के समय एवं आदिम समाज में जब सभ्यताओं का आरंभ हुआ होगा तब पुरुषों के  समान ही रही होगी. किन्तु, जीवन और समाज के विकास के साथ-साथ प्राकृतिक रूप से मिले अधिकार को खो कर, वह पुरुषों के अधीनस्थ हो जाती हैं. यदि अपने समलिंगी के साथ समान चेतना बोध को ग्रहण कर प्रतिक्रिया करती हैं और अपने उत्थान के लिए सक्रिय होती है तो यह स्त्री नवजागरण है. अभी इस प्रकार के पदबंध का उपयोग नहीं होते हैं, किन्तु यदि हम चाहे तो विभिन्न अन्य समूहवाची पद के समान ही पीछे छूट गए लिंग आधारित वर्ग समूह के रूप में इसकी भूमिका स्वीकार कर सकते हैं. “जब-जब इतिहास में नवजागरण घटित हुए हैं, महिला रचनाकारों का पूरा समूह उभरकर सतह पर आया है.”  नवजागरण में स्त्रियों की भूमिका को स्पष्ट करते हुए सुमन राजे कहती हैं “नवजागरण सांस्कृतिक मंथन ही तो होते हैं, और इस मंथन में वे पैर जमाकर खड़ी हैं, कहीं-कहीं धारा के विपरीत भी, पूरी शक्ति और शब्द संरचना के साथ.”

इस प्रकार हिंदी नवजागरण में स्त्रियों को सशक्त बनाने वाली जो गतिविधियाँ है, वे सभी ‘स्त्री सरोकार’ के अंतर्गत आ सकती हैं. अब यहाँ एक प्रमुख बिंदु उभरता है स्त्रियों के इस उठान में केवल स्त्री ही आ सकती है या पुरुष भी. यदि पुरुष आता है तो उसकी भूमिका क्या होगी और उसकी भूमिका की व्याख्या किस प्रकार करनी होगी? क्योंकि बहुधा स्त्रीवादियों का मानना है कि समाज सुधार के नाम पर स्त्रियों का अनुकूलन (कंडिशनिंग) ही होता रहा है. “एक और ऐसे स्त्रीवादी मिल जायेंगे जो सामाजिक, न्यायिक, व्यवसायगत आर्थिक राजनैतिक और नैतिक समानता की अवधारणा पर खरे उतरते हैं जिनका शत्रु भेदभाव है, प्रतियोगिता और माँग जिनके साधन हैं, दूसरी ओर वे हैं जो बेहतर जीवन के आदर्श संजोएँ हैं, जो तब प्राप्त होगा जब सही राजनैतिक साधनों से सबके लिए एक बेहतर जीवन सुनिश्चित हो जाएगा. उन स्त्रियों को, जो संवैधानिक या सर्वाधिकारवादी या क्रान्तिकारी सभी रुढ़िवादी राजनैतिक उपायों से बददिल हो चुकी हैं, दोनों ही विकल्प नहीं भाते.”  जर्मेन ग्रीअर  जब इस प्रकार स्त्री संबंधी उपादेयता की व्याख्या करती है तो नवजागरण के काल में किए गए स्त्री संबंधी सुधार कार्य कहीं-न-कहीं हमें बेमानी लगने लगते है.
19वीं सदी की मुस्लिम महिलायें 

तब क्या इसकी काल सापेक्ष व्याख्या हो सकती है? मतलब जिस युग में ये नवजागरण के पैरोकार हैं उस समय उनके किए गए सुधार कार्य तत्कालीन युग के अपेक्षा प्रगतिशील है या नहीं. वस्तुतः इसी प्रगतिशील तत्व को पहचानने का यह एक उचित तरीका होगा. इस आधार पर हम हिंदी नवजागरण के अध्ययन करने पर स्त्री-सुधार के दृष्टिकोण से किए गए कार्यों का अवलोकन करते है तो ये तत्कालीन सुधारकों की स्थिति हम एक प्रगतिशील विचारक के रूप में पाते है.लेकिन ऐसा भी नहीं है कि इन सुधारकों में सब कुछ सकारात्मक ही है, कुछ इनकी सीमाएं भी है. जो कुछ हद तक तत्कालीन परिस्थितियों की एवं कुछ इनकी व्यक्तित्व कि सीमा थी. स्त्री की धार्मिक बंधनों से मुक्ति भारत में एक कठिन कार्य है. 19वीं सदी की स्त्रियों की स्थिति में सुधार के दृष्टिकोण से सती प्रथा के समापन से लेकर विधवा विवाह की शुरुआत, बालविवाह और बहुविवाह पर रोक, पर्दा प्रथा की समाप्ति के प्रयास, नाच-विरोधी आन्दोलन, स्त्री-शिक्षा और स्त्री-आत्मसम्मान जैसे मामले तत्कालीन धार्मिक संकीर्ण व्यक्ति को भड़काने वाले थे.  यही गतिविधियाँ वर्तमान में स्त्री-विमर्श के बीज रूप में देखी जा सकती हैं. वस्तुतः औपनिवेशिक दौर, “राष्ट्रीय जागरण के उन्मेष में स्त्री-जागृति की धारा भी शामिल थी और स्त्री-प्रश्न भी नये रूप में एजेण्डे पर उपस्थित था, लेकिन राष्ट्रीय आन्दोलन की विभिन्न संघटक धाराओं की वैचारिक निर्बलताओं-विचलनों से स्त्री-मुक्ति विमर्श भी मुक्त या अप्रभावित नहीं था.”

 नवजागरण के स्त्री सरोकार की परम्परा एवं जुड़ाव 

कुछ व्याख्याओं के अनुसार  ‘मातृ शिक्षा’ कुशल धाय या कुशल कामगार को निर्मित करने की श्रेणी में आता है . जिसे यह कहकर व्याख्यायित किया  जाता  है कि यह एक प्रकार का अनुकूलन (कंडिशनिंग) है, पितृव्यवस्था के दोषों को दूर करते हुए स्त्री को अपनी  उपयोगिता के अनुसार ढालने की प्रक्रिया . किंतु, दूसरी ओर जब पितृव्यवस्था के स्थान पर ‘मानवता’ को केंद्र के रूप में स्वीकार करते हुए मनुष्यमात्र के लिए उद्धार या करूणा की आवश्यकता की अवधारणा को ग्रहण करते हुए इसका मूल्यांकन करते हैं  तो एक नवीन पक्ष का उदय होता है . यह पक्ष नवजागरण का है . भारतीय एवं यूरोपीय ज्ञान परम्परा के सम्मिलन से जो ‘मानवतावाद’ के बोध की नवीन निर्माण प्रक्रिया शुरू होती है, उसके अनुसार देंखे तो यह कुशल कामगार का निर्माण या कंडिशनिंग नहीं है, बल्कि वंचितों को दिया जानेवाला उनका अधिकार है . भारत में कई नवजागरण आ चुके हैं और उससे निर्मित एक सुदीर्घ ठोस आधार हमारे पास हैं . इसके सन्दर्भ में अमर्त्य सेन कहते हैं, “निस्संदेह, शास्त्रार्थीय महासंग्रामों में तो प्रायः पुरुषों का ही बोलबाला रहा है . फिर भी राजनीतिक नेतृत्व और बौद्धिक अनुष्ठानों में नारी की भागीदारी इतनी नगण्य भी नहीं रही है .”

सुदूर अतीत में महिलाएं मुखर नेतृत्व से अनभिज्ञ भी नहीं थी . यहीं नहीं, ‘अक्सर इन संवादों में अधिकांश तीखे चर्चित प्रश्न भी महिलाओं ने ही उठाए थे .’  गार्गी, मैत्रेयी और भारवि इसके प्रमाण हैं .  “भारत की संवाद-विवाद परम्परा को केवल पुरुष वर्ग का एकाधिकार मान लेना तो कदापि उचित नहीं होगा . ” इसी कड़ी में सुमन राजे के ‘हिंदी साहित्य का आधा इतिहास’ को लिया सकता है . इसमें सुमन राजे भारत में चार नवजागरण की बात करती है- प्रथम नवजागरण: थेरी गाथाएँ, द्वितीय नवजागरण : संस्कृत और प्राकृत की कवयित्रियाँ, तृतीय नवजागरण  : भक्ति आन्दोलन और चौथे नवजागरण के रूप में आधुनिक काल के ‘नवजागरण’ को .  इसमें वह आधुनिक काल के नवजागरण को विश्लेषित करते हुए कहती है- ‘ये सभी मूलतः धार्मिक सांस्कृतिक आन्दोलन थे. राष्ट्रवाद इनकी बुनावट में शामिल था. लगभग एक ही समय में इन महान विचारकों को केंद्र में रखे ये आन्दोलन जन्मे और विभिन्न अंचलों में फ़ैल गए. एक महत्वपूर्ण रेखांकित करने योग्य बात यह है कि इन सभी आन्दोलनों ने ‘स्त्री विमर्श’ को मुख्य मुद्दा बनाया. सती प्रथा निषेध हो, या विधवा विवाह प्रारंभ, सभी ने स्त्री-गरिमा और स्वतंत्रता की बात की. इसका परिणाम यह हुआ कि स्त्री ने स्वयं अपने और अपने परिदृश्य के बारे में सोचना शुरू किया.’  यहाँ पर सुमन राजे स्पष्ट रूप से स्त्री से जुड़े हुए चिंतन पक्ष को नवजागरण के मुख्य सरोकार के रूप में अंकित करती हैं. भारत के सभी हिस्से में यह स्त्री जागृति हमें दिखाई देती है. हिंदी नवजागरण भी इससे कोई अपवाद नहीं है. हाँ, हिंदी नवजागरण के शुरूआती समय में किसी स्त्री विचारक को हम नहीं पाते है, लेकिन 19 वीं सदी के अंत होते-होते इस प्रकार के उदाहरण मिलने शुरू हो जाते है. जो कि भारत के अन्य अंचलों के नवजागरण के समान ही है.



हिंदी नवजागरण की जब स्त्री भूमिकाओं का विश्लेषण करते हैं तो रामविलास शर्मा हिंदी नवजागरण की निर्मित वैचारिकी में 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम का व्यापक प्रभाव मानते हैं. रामविलास शर्मा के साथ सुमन राजे भी इस आन्दोलन में स्त्री की महती भूमिका को स्त्री के सकारात्मक पक्ष के रूप में निबंधित करती हैं. ‘1857 के विद्रोह ने राष्ट्रीय नवजागरण को नया आयाम दिया . इस क्रांति में महिलाओं की प्रमुख हिस्सेदारी थी जैसे- बेगम हजरत महल, झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई, मध्यप्रदेश में रामगढ़ की रानी, बदुरी की ठकुरानी और रानी दिगंबर कौर आदि.’  भारतीय इतिहास में इन वीरांगनाओं के बारे में विस्तृत जानकारी उपलब्ध है.नवजागरण के अग्रगण्य जिस आधुनिक वैचारिकी और सांस्कृतिक तत्वों के विकास हेतु प्रयत्नशील थे उसकी विभिन्न सीमाओं एवं अवरोधकों से अवगत थे . भारतेंदु युग के सभी लेखक इससे पार जाने का प्रयास करते रहे . कर्मेंदु शिशिर इस संबंध में कहते हैं- “सामंती उत्पीड़न में जातिगत रूढ़ी, संकीर्णता और नारी - शोषण पर वे चोट करते रहे . बालविवाह की भर्त्सना की . विधवा-विवाह का आन्दोलन किया . भारतेंदु- युग के लेखकों की देशभक्ति, दूरदर्शिता और तत्कालीन आधुनिकता का मैं लोहा मानता हूँ . वे विचारों के स्तर पर ही नहीं, कर्म के स्तर पर भी सकर्मक रहे . भारतेंदु युग के तमाम लेखकों ने अपने सांस्कृतिक संगठन बनाए . बिना संगठन का कोई रचनाकार न था .”  इस प्रकार इस युग के लेखक दोहरी भूमिका का निर्वाह करते है. एक स्तर पर वह साहित्यकार है तो दूसरी ओर वो समाज सुधारक की भूमिका को भी अदा कर रहे है.

स युग के विचारकों की अग्रगामी भूमिका को सुनिश्चित करने में शिक्षा कि महती भूमिका थी, उसमें भी पाश्चात्य शिक्षा पद्धति का विशेषतौर पर . ऐसा नहीं है कि यहाँ अंग्रेजों से पूर्व शिक्षा की परंपरा ही नहीं रही है, जो कि अक्सर कहा जाता है . वास्तव में भारतीय शिक्षा पद्धति की स्थिति इतनी बुरी भी नहीं थी .  कर्मेंदु शिशिर इस संबंध में कहते हैं, “शिक्षा को अंग्रेजों की देन मानने वाले इस तथ्य की अनदेखी करते हैं कि अंग्रेजों के पूर्व भारत में शिक्षा का सुव्यवस्थित, विकसित और सुदृढ़ आधार था. उच्च शिक्षा के जो केंद्र थे उनमें स्त्रियों के शिक्षा ग्रहण करने के दस्तावेज तक इतिहासकार धर्मपाल को मिले थे. अनेक दस्तावेज जला दिए गए और काफी कुछ बटोरकर अंग्रेज लन्दन की इम्पीरियल लाइब्रेरी में ले गए.”  इस सम्बन्ध में के.एन. पनिक्कर ने भी टिप्पणी किया है, जिसमें वह औपनिवेशिक शिक्षा प्रणाली के माध्यम से दिए गए सार्वजानिक शिक्षा पद्धति की सिमित भूमिकाओं को चिन्हित करते हैं. इसके साथ अंग्रेजों से इतर भारतीय शिक्षा के सामाजिक प्रसार को अंग्रेजी शिक्षा से कहीं अधिक बताते हैं.
भारतेंदु द्वारा प्रकाशित महिला-पत्रिका का संपादन 


वर्तमान स्त्रीवादी विमर्श पर पाश्चात्य स्त्री वैचारिकी का अत्यधिक प्रभाव है. इस प्रभाव के फलस्वरूप भारतीय स्त्री विमर्श यूरोपीय स्त्री विमर्श की भारतीय शाखाएँ मात्र प्रतीत होने लगती है. इस प्रकार वर्तमान स्त्री विमर्श भारतीय जमीन पर विदेशी पौधे के समान लगता है, जो कि भारतीय वस्तुगत परिस्थिति की उपज न होकर एक आयातित विचारधारा के समान प्रतीत होता है. क्या वाकई भारतीय स्त्री विमर्श को देखने का यही एकमात्र नजरिया है? क्या भारत में स्त्री वैचारिकी की अपनी स्वाभाविक धारा को ढूँढा जा सकता है? पश्चिम में वोलस्टनक्राफ्ट, जॉन स्टुअर्ट मिल आदि स्त्रीवादी विचारक के रूप में मान्य हैं . जिस प्रकार ये पश्चिम के स्वाभाविक मानवतावादी चिन्तक हैं उसी प्रकार भारत में भी इस परंपरा की खोज किया जा सकता हैं . नवजागरणकाल के कई विचारकों को हम इस प्रकार चिन्हित कर सकते हैं . इसमें पुरुष और महिला समाज सुधारक दोनों को रख सकते हैं .कम से कम स्त्री समाज सुधारक पर एकमत से इसका उत्तर दिया जा सकता हैं . इसमें रमाबाई, आनंदी बाई जोशी या उनके समकालीन अन्य महिला लेखक हैं जिन्होंने स्त्रियों की स्थिति को लेकर चिंतन किया और सामाजिक रूप से भी सक्रिय रहीं .

रमाबाई के व्यक्तित्व विकास में उनके पिता अनंत शास्त्री एवं माता की मुख्य भूमिका थी . राजघराने की एक शिक्षित स्त्री से प्रभावित होकर उनके पिता ने अपनी पत्नी को शिक्षित किया . बाद में उन्होंने अपनी पत्नी के साथ मिलकर अपनी संतानों एवं अन्य बच्चों को शिक्षित बनाने पर जोर दिया . रमाबाई इनकी छोटी बेटी थी . जिसकी शिक्षा में व्यवधान न हो, अतः उन्होंने इनका विवाह 16 वर्ष की उम्र में किया . अब अनंत शास्त्री के इस स्त्री शिक्षा संबंधी जागृति का कारण क्या माना जाए ? रमाबाई का जन्म 1860 ई. में हुआ . इस समय तक भारत में पाश्चात्य प्रभाववश नवजागरण का प्रभाव देखा जा सकता है . किन्तु रमाबाई के पिता इस पाश्चात्य प्रभाव से दूर थे . उनके अन्दर किसी अन्य परिवार की शिक्षित स्त्री को देखकर सहज ही अपने परिवार में भी इस संस्कार के विकास की आकांक्षा उत्पन्न हो गईं . अब इस प्रेरणा एवं उसके प्रभावस्वरूप रमाबाई की शिक्षा क्रम में पाश्चात्य स्त्रीवादी वैचारिकी की कहीं कोई महती भूमिका तो कम से कम नहीं हैं . यही रमाबाई प्रकारांतर में प्रख्यात विदुषी एवं स्त्रीवादी लेखिका हुईं . हाँ, कालांतर में रमाबाई पाश्चात्य ज्ञान परंपरा की ओर जबरदस्त रूप से उन्मुख होती हैं, वह इनसे यहाँ तक अभिप्रेरित होती हैं कि उन्होंने ईसाई धर्म को कबूल कर लिया था. रमाबाई की यह परंपरा ज्योतिबा फुले एवं उनकी पत्नी सावित्रीबाई फुले से जुड़ती है. इस प्रकार भारतीय नवजागरण के प्रभावस्वरूप उभरने वाली स्त्री वैचारिकी के स्वाभाविक धारा का पता चलता है.

पंडिता रमाबाई 

हिंदी नवजागरण भारतीय नवजागरण के इसी विशाल कलेवर का एक प्रमुख हिस्सा है. इस शोध आलेख में हिंदी साहित्य के सन्दर्भ से स्त्री संबंधी तत्कालीन वैचारिकी उसके सरोकारों को समझने का प्रयास किया गया है.


पृष्ठ- नौ,प्रस्थान, हिंदी साहित्य का आधा इतिहास, सुमन राजे, चौथा संस्करण 2011, भारतीय ज्ञानपीठ, नयी दिल्ली
, सम्पादकीय, स्त्री अधिकारों का औचित्य-साधन( मूल पुस्तक A Vindication of the Rights of Women का हिंदी अनुवाद): मेरी वोल्सटनक्राफ्ट, अनुवाद : मीनाक्षी, पहला संस्करण 2003, पहली आवृति 2009, राजकमल प्रकाशन
 पृष्ठ-22, विचार-स्वातंत्र्य और संवाद,भारतीय अर्थतंत्र, इतिहास और संस्कृति (The argumentative indian) : अमर्त्य सेन, अनुवादक : भवानीशंकर बागला, हिंदी संस्करण पृष्ठ- नौ,प्रस्थान,  वही|
 पृष्ठ- 16-17, बधिया स्त्री (The Female Eunch): जर्मेन ग्रीअर, अनुवाद – मधु बी. जोशी, पहला संस्करण 2001, दूसरा संस्करण 2005, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली|
 पृष्ठ-22, सामाजिक क्रांति के दस्तावेज, शम्भुनाथ,प्रथम संस्करण 2004, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली|
 पृष्ठ- vii, सम्पादकीय, स्त्री अधिकारों का औचित्य-साधन( मूल पुस्तक A Vindication of the Rights of Women का हिंदी अनुवाद): मेरी वोल्सटनक्राफ्ट, अनुवाद : मीनाक्षी, पहला संस्करण 2003, पहली आवृति 2009, राजकमल प्रकाशन
 पृष्ठ-22, विचार-स्वातंत्र्य और संवाद,भारतीय अर्थतंत्र, इतिहास और संस्कृति (The argumentative indian) : अमर्त्य सेन, अनुवादक : भवानीशंकर बागला, हिंदी संस्करण 2011, राजपाल एंड संज, नई दिल्ली
 पृष्ठ-22, वही|
 पृष्ठ-22-25, वही|
 पृष्ठ-25, वही|
 हिंदी साहित्य का आधा इतिहास, सुमन राजे, चौथा संस्करण 2011, भारतीय ज्ञानपीठ, नयी दिल्ली|
 पृष्ठ- 227, हिंदी साहित्य का आधा इतिहास, सुमन राजे, चौथा संस्करण 2011, भारतीय ज्ञानपीठ, नयी दिल्ली
 पृष्ठ- 227, वही |
 पृष्ठ-24, नवजागरण और संस्कृति, कर्मेंदु शिशिर, प्रथम संस्करण 2000, आधार प्रकाशन, पंचकूला, हरियाणा|
 पृष्ठ-24, वही|
  पृष्ठ-67, औपनिवेशिक भारत में सांस्कृतिक और विचारधारात्मक संघर्ष, के.एन. पणिक्कर, अनुवाद: आदित्य नारायण सिंह|
 के.एन. पणिक्कर, अनुवाद: आदित्य नारायण सिंह : औपनिवेशिक भारत में सांस्कृतिक और विचारधारात्मक संघर्ष

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