सांस्कृतिक राष्ट्रवादियों को बेचैन करने वाले नाटकों का पाठ आयोजित

रंगमंच की लोकप्रिय पत्रिका समकालीन रंगमंच द्वारा 27 जून को आयोजित नाट्य पाठ सह परिचर्चा मुक्तधारा ऑडिटोरियम में विचारोत्तेजक बातचीत के साथ संपन्न हुई। इस अवसर पर संजीव चंदन ने अपने दो नाटकों- 'ओघवती: महाभारत की एक कथा' और 'असुर-प्रिया का संताप' के पाठ किये। ये दोनों नाटक अलग-अलग विषयवस्तु, प्रयोजन और कलेवर के थे।


'ओघवती...' जहां महाभारत के अनुशासन पर्व में वर्णित एक प्रसंग पर आधारित है, जिसमें अतिथि के समक्ष अपनी पत्नी को प्रस्तुत करने को मृत्यु पर विजय प्राप्त करने का माध्यम बताया गया है, वहीं 'असुर-प्रिया का संताप' नाटक में स्त्री और असुर गणों की कृषि संस्कृति और समृद्धि को देवों/आर्यों द्वारा नष्ट करने, उन पर साम-दाम-दंड-भेद से सांस्कृतिक वर्चस्व स्थापित करने और यज्ञ संस्कृति, पशु-बलि को आरोपित करने के ऐतिहासिक संदर्भ को प्रचलित ब्राह्मण मिथों के भीतर से ही स्पष्ट करने की कोशिश की गयी है।



कार्यक्रम की शुरुआत नाट्यालोचक, कवि और समकालीन रंगमंच के संपादक राजेश चन्द्र ने उपस्थित रंगकर्मियों, पत्रकारों, साहित्यकारों एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं का स्वागत करते हुए की तथा पत्रिका के प्रकाशन की पृष्ठभूमि और प्रतिबद्धता पर अपनी बात रखी। उसके पश्चात उषा ठाकुर ने जन-गीत और निर्गुण गीतों का प्रभावशाली गायन प्रस्तुत किया, जिसमें उनके साथ तबले पर संगत की सोहन कुमार ने।

साहित्यकारों, स्त्रीवादी कार्यकर्ताओं और रंगमंच से जुड़े लोगों ने संजीव चंदन के इन दोनों नाटकों के पाठ के बाद इस पर परिचर्चा में अपनी बातें कहीं। परिचर्चा में शामिल लोगों ने एक तो नाटकों के कम लिखे जाने को चिह्नित किया और अब तक कहानियां लिखते रहे स्त्रीकाल के संपादक संजीव चंदन की नाट्य-लेखन में शुरुआत को एक अच्छा संकेत बताया। वक्ताओं ने कहा कि ये नाटक सांस्कृतिक राष्ट्रवादियों को बेचैन करेंगे और लेखक तथा मंचनकर्ताओं को उनसे तीखी प्रतिक्रिया के लिये तैयार रहना चाहिये। वक्ताओं ने जहां 'असुर-प्रिया का संताप' को नाट्य-लेखन के स्तर पर भी मजबूत बताया, जिसमें कथानक, दृश्यों और संवाद के साथ ही तत्कालीन समय और वर्तमान के तनाव, द्वंद्व उपस्थित होते हैं, जिससे दर्शक और श्रोता अपना तादात्म्य बना लेता है। उसके ऐतिहासिक बोध और वर्तमान के संघर्षों के प्रति उसके विश्लेषण नये आधार के साथ जुड़ जाते हैं, उसकी सांस्कृतिक तंद्रा टूटती है, उसकी आस्था को झटका लगता है, लेकिन वह इस नये कथानक के साथ जुड़ भी जाता है। वहीं वक्ताओं ने 'ओघवती: महाभारत की एक कथा' को मजबूत नाटक मानते हए भी इसके भीतर नायिका के अंतर्द्वन्द्व को और उभारने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया। समारोह में उपस्थित निर्देशकों और रंगकर्मियों ने इस नाटक के मंचन के प्रस्ताव दिये, वहीं उनके बीच पौराणिक नाटकों और समकालीन संदर्भों पर आधारित नाटकों के दर्शकों पर प्रभाव को लेकर भी अच्छी बातचीत हुई।




कार्यक्रम में शामिल होने वाले साहित्यकारों, रंगकर्मियों, पत्रकारों एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं में रजनीतिलक, सेवाग्राम, महाराष्ट्र से आयीं डॉ. अनुपमा गुप्ता, टेकचंद, कौशल पंवार, मुकेश, सुधांशु  गुप्त, बापी बोस, महेश वशिष्ठ, मंजरी श्रीवास्तव, निवेदिता झा, रचना त्यागी, अपराजिता, विक्रम, राजीव सुमन, धर्मवीर, मनीषा कुमारी, अरुण कुमार, अनिता, अरुण, रीति, स्वीटी, हेमलता यादव, इरेन्द्र बबुअवा, भास्कर झा, गौरव सिंह एवं पाखी ठाकुर आदि के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। 
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