नैन्सी तुम मारी नहीं गई तुम तो यूपीएससी टॉप कर रही हो, सीबीएसई टॉप कर रही हो

संपादकीय

नैन्सी,

मैं कई दिनों से तुम्हारे मारे जाने की खबर पढ़ रहा था, सोशल मीडिया में तुम्हारे मृत शरीर पर की गई हैवानियत की तस्वीरों पर नजर पडीं-वीभत्स! नैन्सी तुम उन कई लड़कियों में से एक हो जो पितृसत्ता से मुठभेड़ करती हुई मारी गईं, तुम उस अनवरत लड़ाई की सिपाही हो, जो जाति और जेंडर के क्रूर तालमेल से से बनी पितृसत्ता के खिलाफ लड रही हैं. हाँ, 12 साल की प्यारी बच्ची तुम पढ़-लिखकर डीएम बनना चाहती थी! देखो साल-दर साल कितनी नैन्सियाँ डीएम बनने की राह पर हैं! अभी पिछले ही साल टीना डाबी ने टॉप किया था यूपीएससी. नैन्सी तुम बड़ी होती तो तुम्हें समझ में आता कि टीना जाति और जेंडर दोनो मोर्चों पर छिड़ी लड़ाई से आगे आई थी, पीढियां लग जाती हैं, इस लड़ाई में छोटी जीत दर्ज करने में भी. और हाँ, इस बार भी नंदिनी केआर के जरिये तुम्हारा सपना पूरा हुआ. वह भी इस बार यूपीएससी टॉप कर गई है. यह कहानी, लड़ाई का यह मोर्चा तबसे ही शुरू हो जाता है, जब तुम जैसी नन्हीं नैन्सियाँ भ्रूण के रूप में आती हैं, और उनमें से कई गर्भ में ही मार दी जाती हैं. लेकिन सफलता की अहर्निश गाथायें भी तुम जैसी नैन्सियाँ ही साल-दर-साल लिख रही हैं. इस वर्ष भी लड़कियों ने लड़कों से बेहतर प्रतिशत में सफलता हासिल की है. हर बार रिजल्ट आता है और लड़कियों के लहराते परचम की खबरें आती हैं. सीबीएसई 12 वीं की टॉपर रक्षा गोपाल की मुस्कानों में भी नैन्सी तुम्हारी ही मुस्कुराहटें हैं.


मैंने तुम्हें पितृसत्ता से लड़ाई के मोर्चे पर शहीद कहा है, यह अकारण नहीं है. बड़ी मुश्किल से आज लड़कियों का साक्षरता दर बढ़ा है, उन घरों से लडकियां शिक्षा के लिए आगे आ रही हैं, जहां शिक्षा के अवसर अभी पहुंचे हैं. लड़कियों का साक्षर होना शिक्षित होना एक युगांतकारी घटना है. स्त्रियों की शिक्षा के खिलाफ ब्राह्मणवादी पितृसत्ता का षड्यंत्र इस कदर रहा है कि प्राचीन कालीन स्त्रियों के विदुषी होने के उदाहरण तो खूब दिये जाते रहे, लेकिन उनकी लिखी रचनाओं के इक्के-दुक्के अंश ही शेष रह पाये. या तो उनकी रचनाएं जला दी गईं या कैननाइजेशन की प्रक्रिया में भुला दी गईं. मनुस्मृति तक आते-आते तो और भी कठोर विधान बना दिये गये. मनु के स्त्रीविरोधी संहिताओं में स्त्री के शैक्षणिक, धार्मिक और दार्शनिक अधिकार छीन लिये जाने के स्पष्ट विधान हैं. तुम्हारी पूर्ण स्वतंत्रता और तुम्हारे अधिकारों के लिए प्रतिबद्ध डा. बाबा साहेब अम्बेडकर ने तुम्हारे विरुद्ध मनु के षड्यंत्रों को अपने लेख ‘हिन्दू नारी का उत्थान और पतन’ में स्पष्ट किया है:


अमन्त्रिका तू कार्येयं स्त्रीणां भावृदशेषत:
संस्कारार्थ शरीरस्य यथाकालं यथा क्रमम्

अर्थात :-निर्धारित कालक्रम के अनुसार स्त्रियों के जो संस्कार किये जायें, उनमे वेद-मन्त्रों का पाठ न किया जाये . ब्राह्मण संस्कृति में यज्ञ –कर्म धर्म ही आत्मा माना गया है,परन्तु मनु ने स्त्रियों को इस धर्म-कार्य से भी वंचित रखा है . इस संबन्ध  में उनका आदेश निन्मलिखित है:

न वै कन्या न युवतिर्नाल्प विद्धो बा बालिश:
 होता स्यादग्निहोत्रस्य नर्तोनासंस्कृतस्तथा!
नरके हि पतन्त्येते जुह्वतः  स च यस्य तत
तस्माद्वैता  न कुशलो होता स्याद्वेदपरागः 

अर्थात:- कन्याएँ युवतियां ,थोड़ा पढ़े -लिखे लोग,कुपढ,बीमार अथवा संस्कार-रहित व्यक्ति यज्ञ के होता न बनाये जायें, वरना होता और यजमान दोनों नरकगामी होंगे . धर्म लाभ से स्त्रियों को वंचित रखने के लिए उनको स्वयं तो यज्ञ करने के लिए अयोग्य ठहराया है,मनु ने ब्राह्मणों पर भी बंधन लगा दिया कि वे भी स्त्रियों के लिए यज्ञ न करे. इस प्रकार  न स्वयं  यज्ञ कर सकती है, न ब्राह्मणों के द्वारा करा सकती है.


नैन्सी शिक्षा से वंचन के खिलाफ तुम जैसी हजारो नैन्सियाँ बाधाएं पार कर रही हैं. पीढ़ियों से संघर्ष किया है तुमने. तुम्हारे घर से बाहर निकलने, आत्मनिर्भर होने और आर्थिक-सांस्कृतिक अधिकारों से पीढी-दर-पीढी बड़े-बड़े लोग डरते रहे हैं! स्त्रियों में अपना और अपने परिवार की इज्जत आरोपित करने वाले बड़े-बड़े महानुभाव हंटर कमीशन के सामने स्त्री-शिक्षा के नाम पर सिलाई-बिनाई-कढाई की वकालत करते रहे हैं. लेकिन तब भी तुम जैसी नैन्सियों ने इन षड्यंत्रों से आगे इतिहास में कदम बढ़ाये, तुम्हारे लिए फुले दंपति ने रौशनी के नये मशाल दिखाये. नैन्सी तुम जब बड़ी होती तो सावित्रीबाई फुले, ताराबाई शिंदे, फ़ातिमा शेख या रुकमाबाई के बारे में जानती, तुम्हें अच्छा लगता कि तुम्हारी तरह पितृसत्ता से जंग छेड़ने वाली स्त्रियों को आखिरकार इतिहास ने उन्हें उनका वाजिब स्थान देना शुरू कर दिया है.


सच में तुम जैसी लड़कियों की भ्रूण से लेकर आगे तक की जाने वाली हत्याओं, उनपर हवश के वीभत्स हमलों से हर संवेदनशील नागरिक विचलित होता होगा, होता है. तुम पर या तुम जैसी अन्य लड़कियों पर होने वाले ये हमले तुम्हारे पढ़ने से, तुम्हारे स्कूल-कॉलेज जाने से, तुम्हारे काम करने से, तुम्हारे बड़े पदों पर होने से खौफ खाते वर्चस्ववादियों के आख़िरी और लगातार धारविहीन होते हथियार हैं. हाँ नैन्सी, उम्मीद की किरणें तब-तब दिखाई देती हैं, जब तुम्हारी जैसी ही नैन्सियाँ शिक्षा की हर चुनौती पर खरे उतरती हैं, सीबीएसई, यूपीएससी या ऐसी ही अनेक सफलता की मंजिलों पर अपने परचम लहराती हैं. सच, नैन्सी इन सफलताओं से पितृसत्ता बहुत खौफ खाती है, पुरुष वर्चस्व दरकता है और निरंतर जारी जंग में खूंखार ब्राह्मणवादी पितृसत्ता के पंजे लहू-लूहान होते हैं. नैन्सी तुम मरी नहीं हो, तुम्हारे सपने तुम जैसी ही इन नैन्सियों में अंगडाई लेते रहेंगे, साकार होते रहेंगे !

संजीव चंदन, 2 जून 2017

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