मेरा कमरा/अपने कमरे की बात

सुशीला टाकभौरे  
चर्चित लेखिका. दो उपन्यास. तीन कहानी संग्रह , तीन कविता संग्रह सहित व्यंग्य,नाटक, आलोचना की किताबें प्रकाशित. संपर्क :9422548822

वर्जीनिया वूल्फ की किताब  ‘ A Room of One's Own’ का प्रकाशन 1929 में हुआ था, उसका केन्द्रीय स्वर है कि एक स्त्री का अपने लेखन के लिए अपना कमरा होना चाहिए, अपने निजी को सुरक्षित रखने के लिए भी अपना कमरा, इसके लिए उसकी आर्थिक स्वतंत्रता जरूरी है.

वर्जीनिया वूल्फ की पुस्तक ‘^A Room of one’s own*में शिद्दत के साथ यह बताया गया है कि एक स्त्री का अपने लेखन के लिए अपना कमरा होना चाहिए। अपने लेखन, अध्ययन जैसे कार्य कलापों के लिए अपना एक कमरा होना ही चाहिए, यह प्रत्येक प्रबुद्ध साहित्यकार स्त्री चाहती है, मगर इसके साथ यह प्रश्न भी है - क्या स्त्री की अपनी इतनी आर्थिक स्थिति सामर्थ्य या स्वतंत्रता है कि वह अपना एक अलग कमरा अपने लिए सुरक्षित रख सके ? अथवा घर में या परिवार में उसकी वह जगह है कि वह घर के एक कोने पर या एक कमरे पर अपना अधिकार या स्वामित्व जता सके ?

वर्जीनिया वूल्फ ने पश्चिमी देशों की सभ्यता और संस्कृति के आधार पर, पश्चिमी घर - परिवार में उन स्त्रियों की जगह को ध्यान में रखकर यह लिखा है। मगर हमारे देश की संस्कृति और सामाजिक रीति परम्पराओं को देखते हुए, क्या लेखिका की यह बात भारतीय स्त्रियों के लिए है ? सामन्ती और धनाढ्य परिवारों की बात अलग है। सम्पन्न प्रगतिशील शिक्षित और पश्चिमी सभ्यता के अनुयायी परिवारों की बात भी अलग है, यहाँ परिवार के छोटे बच्चे के लिए भी उनके अलग कमरे होते हैं। मगर इन परिवारों की संख्या कितने प्रतिशत है ? बहुत कम है। मैं उन 80 प्रतिशत परिवारों की बात जानती हूँ, जहां घर भले ही बड़े हों, मगर स्त्रियों के लिए अलग से उनका कमरा होने की बात आश्चर्यपूर्ण मानी जाती है।

एक पत्नी का कमरा पत्नी का नहीं पति का कमरा होता है। माँ का कमरा बेटा बेटी नाती पोतों के साथ होता है। बेटी का कमरा भी अलग न होकर, बहनों या नानी दादी के साथ होता है। तब वे अपने निजत्व को सुरक्षित कैसे रखें ? यदि घर पुरानी पद्धति के हो। और संयुक्त परिवार हो, तब तो स्त्री को अपना कोई अलग कमरा नहीं मिल सकता। बड़ा किचन, बड़ा बरामदा, बड़े कमरे का बेडरूम - वहाँ स्त्री हर जगह होती है मगर अकेली नहीं होतीं। वह सबके लिए होती है और सबके साथ होती है। ये बातें भी बड़े घरों के सम्पन्न सवर्णों, बड़े लोगों की हैं। मैं अपने लिए क्या कहूं ?

कहने के लिए बहुत कुछ है। अनुभवों अनुभूतियों, ख्वाहिशों और हताश उदास टूटे सपनों का अम्बार हमारे दिलों में भी है। ये कब शुरू हुए और कब मैंने इन पर विचार करना शुरू किया, इसका अपना एक इतिहास है। यह बात सच है, जब तक हम किसी बात पर गंभीरता के साथ विचार नहीं करते, तब तक वह हमारे लिए कोई महत्व नहीं रखती है। हम उन स्थितियों में बरसों से रह रहे थे। वह हमारी आदत में इस तरह शामिल थे कि कभी उससे अलग विचार भी मन में नहीं आया। यह बात शुरू में मेरे साथ भी रही है।

जहां घर होगा, वहीं तो कमरे की बात सोची जाएगी। इसके लिए मैं अपने उन सभी घरों के विषय में जरूर बताना चाहूंगी जहां जहां मैं रही हूँ। गरीबी और अभाव हमारे जीवन के विशेष अंग रहे हैं। बचपन से ही मैंने देखा, हम 7 बहन भाई, माँ पिताजी और नानी के साथ एक घर में रहते थे। घर क्या था एक कमरा और छोटा सा बरामदा। कमरे में ही रसोई के चूल्हा चक्की थे। वहीं बर्तन, वहीं बिस्तर की मचान। पिताजी और बड़े दो भाई बरामदे में सोते थे। माँ नानी हम तीन बहने और छोटे दो भाई कमरे के अन्दर जमीन पर बिस्तर बिछाकर एक लाईन से सोते थे। यह घर भी हमारा नहीं नानी का घर था। एकांत न मिल पाने के कारण कभी पिताजी माँ और नानी से झगड़ते, कभी नानी माँ और पिताजी को आश्रय देने का एहसान जताते हुए झगड़ा करती। तब किसी तरह जोड़ जुगाड़ करके पिताजी और माँ ने नानी के घर की बगल में अपना अलग छोटासा घर बना लिया। तब भी हम बहन भाई नानी के साथ ही रहते थे। वहीं रहना, वहीं खाना। बानापुरा गांव में, गांव से दूर हमारे दो घर थे, जहां न बिजली की सुविधा थी न ही पानी की। बानापुरा में गांव का विस्तार होने और स्कूल के पास अनाज गोदाम के ऑफिस का विस्तार होने पर हमारे घर वहां से हटाए गए। हमें डॉक बंगले के पीछे जंगल के पास की जगह में, नगर पालिका ने मकान बनाकर दिए। यह बात सन 1965 की है। यहां भी नानी और हमारे दो ही घर थे। एक कमरा किचन और बरामदा, बस। मैं कक्षा 6-7 तक नानी के साथ ही सोती थी। रात में कुत्तों के भौंकने पर डर कर  नानी से लिपटकर सोती थी।


तो यह था हमारा घर और घर की सुविधा व्यवस्था। ऐसी स्थिति में अपने लिए अलग कमरे की कल्पना तो क्या, सपना भी नहीं देख सकते थे। ऐसे माहौल में मेरे बड़े भाई कल्लू भैया, शंकर भैया और मेरी पढ़ाई कैसे हो सकी ? बडे़ भाई पढ़ाई करने के लिए अधिकतर अपने दोस्तों के घर चले जाते थे अथवा घर के पास की अमराई में किसी झाड़ के नीचे या निचली डाल पर बैठकर पढ़ाई करते। कभी वे रेल्वे लाईन के उस पार नदी के किनारे जाकर पढ़ते थे। मैं कहां जाती ? या कहां जा सकती थी ? स्कूल से लौटने के बाद पढ़ाई की चिन्ता से बेचैन रहती। इन दिनों मैं छोटी छोटी कविताएं भी लिखने लगी थी। घर के काम भी करती रहती, शाम के खाना बनाने में सहयोग करती, साथ ही अपनी पुस्तक के पन्ने भी पलटती रहती। ऐसे समय मन में कभी कोई कविता ही मचलने लगती, तब दाल बघारते समय, या रोटी बनाते समय मैं उठकर अपनी कॉपी पेन निकालकर वे लाईने लिख लेती थी।
सबका खाना हो जाने के बाद बिस्तर लगाया जाता। सबके सोने के बाद मैं लालटेन की धीमी रोशनी में देर रात तक पढ़ाई करती रहती। तब मैं कविता की तुकबन्दी भी करती थी। दरी पर बैठकर पढ़ाई करते हुए कभी झपकी लग जाती। माँ देखती तब डांटकर कहती - बेटी बहुत रात हो गई, अब बिस्तर पर सो जा। कल पढ़ लेना।’’ पिताजी की नींद खुलने पर वे डांटते थे - ‘‘लड़की, सोई नहीं अब तक ?’’ मां बप्पा के डर से मैं थोड़ी देर के लिए लालटेन धीमी करके बिस्तर पर लेट जाती। उनके सोने पर फिर से पढ़ने लगती। अपनी रचनाएं भी लिखती। परिक्षा के दिनों में अक्सर भय लगता, पिताजी शाम को घर आकर लड़ाई झगड़ा न करें। ऐसे में पढ़ाई करना मुश्किल हो जाता था। मैट्रिक की पढ़ाई, बी. ए. की पढ़ाई मैंने इसी तरह की थी। परिक्षा के दिनों में ऐसे समय रात में माँ मुझे चाय बनाकर देती और अच्छी पढ़ाई करने का हौसला जगाती थी।

घर के पीछे ईंधन जलावन लकड़ी कंडे रखने की छोटी टापरी, घर के पीछे की दीवार से लगी हुई थी। दिन के समय कभी कभी मैं वहां एकान्त में बैठकर भी पढ़ती थी। कभी कोर्स की किताबे पढ़ती थी, कभी कहानी उपन्यास पढ़ती, कभी कविताएं लिखती। मैं अधिकतर अपने विचारों में खोई रहती। कभी कागज के फूल बनाती कभी पेन से कॉपी में ड्राईंग करती रहती। इन दिनों सिर्फ चार हफ्ते तक मैंने पेंटिंग और चित्रकला भी सीखी थी। एक बार बरसात के समय, लकड़ियों के बीच से निकलकर एक सांप मेरे बहुत नजदीक से निकला। अपने विचारों में तल्लीन मैं उसे चुपचाप देखती रही। देखते देखते सांप टापरी से बाहर निकल गया। बाद में मुझे समझ में आया कि वह जहरीला संाप था, काट भी सकता था। यह सोचकर मैं वहां बैठने से डरने लगी थी। माँ ने भी मुझे वहां बैठने से शख्त मना कर दिया था। तब मैं दिन में दोपहर या शाम के समय नानी के घर के बरामदे में एक खाट खड़ी रखकर, उसपर एक चादर डालकर अपने लिए ओट बनाकर कृत्रिम कमरा बना लेती थी। दीवार से लगी खाट से बना वी  आकार का मेरा छोटा सा कमरा मुझे एकान्त का एहसास देता और मैं ध्यान लगाकर पढ़ाई करती रहती। कभी काम करने के लिए पुकार होती - ‘‘शीला मसाले पीस दे, रोटी बना ले, खाना परोस दे।’’ तब मैं अपने ये काम तुरन्त पूरे करके, पुनः अपने कमरे में बैठ जाती। ऐसे समय मैं भाई द्वारा लाई गई ‘फिल्मी दुनिया’ ‘सत्य कथाएं’ पत्रिका या गुलशन नन्दा के उपन्यास और जासूसी उपन्यास भी पढ़ती थी। घर के लोग खाट के ऊपर से अक्सर झांकते कि मैं क्या पढ़ रही हूँ। तब मैं तुरन्त उन किताबों को छिपाकर, अपने स्कूल कॉलेज की किताब खोलकर पढ़ने लगती थी। इस चोरी में भी बड़ा अच्छा लगता था। बड़ी बहन गुस्सा करते हुए माँ, नानी से कहती कि मैं कामचोरी करती हूँ। काम के डर से किताब पकड़कर बैठी रहती हूँ, कोर्स की किताबें नहीं पढ़ती हूँ। बड़ी बहन की पढ़ाई चैथी पांचवीं कक्षा से ही छूट गई थी। घर के काम और छोटे बहन भाईयों को संभालने के कारण वह पढ़ नहीं सकी थी।

1965 में बड़े भाई की शादी होने पर जबलपुर वाली भाभी भी हमारे घर में आ गई। 1969 में शंकर भैया की शादी होने पर जलगांव वाली भाभी भी आ गई थी, उस समय मैं कक्षा नौवीं में पढ़ रही थी। इतने लोग उस छोटे से घर में रहते थे। बड़े भैया भाभी कमरे में सोते, दूसरे भैया भाभी किचन में सोते। बाकी हम सब बरामदे में एक लाईन से नीचे सोते। तब पिताजी ने छोटे बरामदे के सामने छप्पर बढ़ाकर दूसरा लम्बा बरामदा और बना लिया था। इससे बरसात के दिनों में भी हमें सूखी सुरक्षित जगह मिल जाती थी। गरमी के दिनों में उसी नए बरामदे के एक कोने में चूल्हा जलाकर खाना बनाया जाता। वहीं सामने पानी के घड़े गुण्डी रखने की मचान थी। घर आए मेहमान बरामदे में ही बैठते, बरामदे में ही सोते। शंकर भैया होशंगाबाद में नौकरी करने लगे। वे पेपर मिल के क्वार्ट़र में रहने लगे तब भाभी को भी अपने साथ ले गए थे। बाकी हम सब एक साथ रहते रहे। दो बड़ी बहनों की शादी हो गई थी। बड़ी भाभी को संजय अजय बेटे हो गए, तब मां पिताजी ने घर के पास की नजूल की जमीन को खरीद कर, एक अलग घर और बनाया। वहां बड़ी भाभी और भैया रहने लगे थे।


1975 में मेरी शादी हुई। मैं नागपुर अपनी ससुराल आई तब यहां भी एक कमरा और छोटे किचन का छोटा सा घर था। सास, ननद, नन्दोई भी हमारे साथ रहते थे। इस समय की बहुत सी बातें मैंने अपनी आत्मकथा में लिखी हैं। घर के कमरे के सामने खुली जगह थी। छोटे बरामदे जैसी जगह को लकड़ी के पट्टों से घेरकर एक छोटा कमरा बनाया गया, तब जवाई इस बरामदे में सोते थे और अन्दर कमरे में हम पति पत्नी और सास ननद साथ में सोते थे। इस बीच ननद को एक बेटा भी हो गया था, दूसरा बच्चा होने वाला था। हर दिन लडाई झगड़ा होता। ननद घंटों बड़बड़ाती रहती। नन्दोई भी अपने नाज नखरे बताते हुए, शिकायतों के साथ झगड़ा करता। शादी के समय मैंने बी. ए. फायनल की परीक्षा दी थी। नागपुर आने के बाद रिजल्ट आया था। उसी वर्ष बी. एड. में मेरा एडमीशन हो गया था। मैं मेडीकल सर्वेन्ट क्वार्टर से रविनगर वानखेडे़ बी. एड. कॉलेज बस से जाती थी। कॉलेज जाने के पहले और कॉलेज से आने के बाद घर के काम झाडू पोछा, बर्तन कपड़े धोना, खाना बनाना भी करती थी। सुबह से रात हो जाती पढ़ने का समय ही नहीं मिलता था। तब मैं यहां भी सबके सोने के बाद, किचन में चूल्हे के पास अकेली बैठकर बी. एड. की मोटी मोटी पुस्तकों से पढ़ाई करती। कभी अपने जीवन की व्यथा कथा को कविता और कहानी के रूप में लिखती रहती। इन दिनों लिखी ऐसी कई कविता और कहानियों को मैंने बाद में व्यक्तिगत जीवन से ऊपर उठकर, अपने से अलग नाम देकर, समाजगत रूप दिया है।

मैं रात के दो तीन बजे तक लिखती पढ़ती। सुबह 6 बजे के पहले उठकर नहाती, घर आंगन झाड़ती, चाय नास्ता, खाना बनाती फिर कॉलेज जाती। परिक्षा के दिनों में मैं सीताबर्डी की हिन्दी मोरभवन लायब्रेरी के खुले बरामदे में अकेली बैठकर अपनी पढ़ाई करती थी। इस तरह मेरा बी. एड. हुआ। छै माह मातृसेवा संघ में नौकरी की, इसके बाद प्रकाश हायस्कूल में शिक्षिका की नौकरी करने लगी। तब भी मेरी दिनचर्या यही थी। घर में दिन में और रात में रहने सोने की व्यवस्था भी वही थी।

मेडीकल टी. वी. वार्ड का किराये का वह सर्वेन्ट क्वार्टर छोड़कर जब हम अजनी रेल्वे क्वार्टर में किराये से रहने गए, तब वहाँ दो कमरे, अलग किचन और बरामदा था। यहां भी सास और ननद नन्दोई साथ ही रहते थे। तब तक ननद को तीन बेटे हो गए थे। यहां हम पति पत्नी का एक कमरा जरूर था, मगर सिर्फ रात के लिए था। दिन में दरवाजा खुला रहता। सब लोग बैठते, बच्चे खेलते रहते। इन दिनों सितम्बर 1978 में मेरा बेटा भी आ गया था। इसके बाद की घर बदलने की लम्बी यात्रा का चित्रण मैंने आत्मकथा ‘शिकंजे का दर्द’ में किया है। अजनी रेलवे  क्वार्टर से हम शाम टाकीज के पास कामरेड के मकान में किराए से रहे। यहां भी एक कमरा किचन और छोटा बरामदा ही था जो सबके उपयोग के लिए था। यहां आने के बाद ननद नन्दोई अलग किराए का घर लेकर हमसे अलग रहे। यहां सासू माँ बीमार रहने लगी थी। वे कमरे में पलंग पर सोती थीं, हम पति-पत्नी छोटे बच्चे के साथ बरामदे में नीचे फर्श पर बिस्तर बिछाकर सोते थे। फिर हम तुकड़ोजी चौक के पास एलआयजी के एक कमरा एक किचन वाले घरों की तीन मंजिल चाल में रहने आये।

पहली बार इस छोटे से घर को हमने खरीद लिया था। तब हमारे तीन बच्चे भी साथ में थे। 10 बाई 10 का एक कमरा। वही हमारा ड्राईंग हॉल, वही बेडरूम, वही स्टडी, वही मेहमान खाना और वही डाइनिंग रूम था। बडा एक पलंग बिछाने पर आधा कमरा ही रहता था। हम दो और हमारे तीन हम सब एक ही पलंग पर सोते थे। बच्चों की देखभाल के लिए कभी भांजी या भतीजी 12-15 साल की लड़की हमारे साथ रहती। तब वह रात में किचन में सोती। वह रात में कई बार उठती, बाथरूम टायलेट जाने के पहले हमें देखती कि हम कैसे सोये हैं, या क्या कर रहे हैं।

उस समय में दिन में और रात में पेपर जांचने का काम हमारे पास बहुत रहता। कमरे में एक कोने में नीचे बैठकर मैं रात रात भर पेपर जांचती रहती, अपनी कक्षा के बच्चों के भी और पति की कक्षा के बच्चों के पेपर भी। इन्हीं दिनों याने 1985 - 86 में मैंने ‘हिन्दी साहित्य’ विषय लेकर एम. ए. की पढ़ाई भी की थी। लायब्रेरी से किताबे लेकर पढ़ना, पढ़ने के साथ नोट्स बनाना और किताबे वापस करके दूसरी किताबे लाना, पढ़ना। यह सिलसिला लगातार चलता रहा। 1986 में प्रकाश हायस्कूल की नौकरी छोड़कर सेठ केसरीमल पोरवाल कॉलेज में आ गई, तब भी हम उसी एक कमरे के घर में रहते रहे। इन्हीं दिनों मैंने कई कहानियां लिखी थीं, एकांकी नाटक लिखे थे। जब मन में भावनाओं की तरंगे उठतीं, मेरी लेखनी कविताएं लिखती। उस एक कमरे के घर में मैंने अपने लिए एक कोना चुन लिया था। वहां एकांत मुझे रात के 12.00 बजे के बाद ही मिल पाता था। पड़ोसी का दरवाजा हमारे घर के दरवाजे से लगा हुआ था। उनके घर बातचीत हल्ला कोलाहल चलता रहता। रेडियो ऊंची आवाज में बजता रहता। ऐसे समय बार बार मना करने के बाद भी वे वही करते। तब मैं उस समय का इन्तजार करती, जब सब अपनी मर्जी से सो जाते। तब मेरा दिन शुरू होता, मैं अपने स्वयं के पास होती, अपने आप से बतियाती, अपने मन की सुनती और अपने आप को ही मन ही मन अपनी बातें सुनाती। यह प्रक्रिया प्रतिदिन चलती रहती।  कभी इसमें व्यवधान भी आता। लगातार झगड़े लड़ाई से मन इतना तृस्त हो जाता कि फिर कुछ भी लिखने पढ़ने का मन नहीं होता। तब सामने की गैलरी में घंटों अकेली खड़ी रहती। 1976 में मैंने ‘मृगतृष्णा’ जैसी कविताएं लिखी थीं और 1986 में ‘विद्रोहिणी’ जैसी कविताएं लिखीं। तब तब मेरी जानकारी भी बढ़ी थी, साथ ही हिम्मत और विरोध की क्षमता भी बढ़ी थी। कॉलेज  में अध्यापन की नौकरी करने के साथ, मेरा व्यक्तित्व स्वतंत्र सबल रूप में विकसित होने लगा था।


1986 के पहले से ही मैं सामाजिक कार्यक्रमों में जाने लगी थी, साथ ही महिला जाग्रति के कार्यक्रमों से भी जुड़ गई थी।  अपने दलित शोषित समाज की शोषित पीड़ित स्थिति को देखकर मन दुखी हो जाता। कार्यक्रमों में कई महिलाओं की दुख भरी कथा को सुनकर, अपनी जीवन कथा भी असहनीय लगने लगती। ऐसे समय में रात के एकान्त में, कमरे के उसी कोने में कई कविताएं जन्म लेती रहीं, वैचारिक लेख मानसिक विस्फोट के साथ लावे की तरह कागज की सफेदी पर बिखरते रहे। मेरा लेखन दलित विमर्श और नारी विमर्श पर केन्द्रित रहा। वह इसलिए कि  वे मेरे जीवन से जुड़े रहे, मैं उनके लिए संघर्ष करती रही। कभी हम पति पत्नी कवि सम्मेलनों में जाते थे। कभी ‘कथा कथन’ कार्यक्रम, कभी विचार गोष्ठी में, कभी महिला आन्दोलन, कभी दलित आन्दोलन के कार्यक्रमों में। हर बार विचारों का उद्रेक मेरे मन में उठता और वह लेखन सृजन के रूप में स्थायी बन जाता। कभी ऐसा भी होता कि सृजन की उद्दाम तरंगे अपना सिर पटकती रहतीं और मैं समय या सुविधा के अभाव में कुछ नहीं लिख पाती। तब बहुत कुछ खो जाने का एहसास होता, जैसे विचारों  रूपी बादलों के उमड़ने के बाद भी, कुछ न पाने का एहसास, एक खालीपन की अनुभूति कराता। कभी अपने अहं की रक्षा करने के लिए की गई तकरार से, मेरा वह कीमती समय मैं खो देती। कभी बच्चों की चिन्ता, तबियत या घर में एकांत का अभाव, मन में आक्रोश भर देता था।

1989 में जब मोहिनी बेटी का जन्म हुआ, तब से हम दूसरा मकान खरीदने का प्रयत्न करने लगे थे। उन्हीं दिनों शकरदरा चैक के पास वैष्णव अपार्टमेन्ट का फ्लैट हमने खरीद लिया था।  यहां दो बेडरूम किचन और ड्राइंग रूम था। दोनों तरफ आगे पीछे गॅलरी थी। पहली बार हम अपने बड़े घर में रहने आए। मगर यहां सीढ़ियों की बड़ी तकलीफ थी। हमारा फ्लैट तीसरी मंजील पर था। यहां फ्लैट में इंजीनीयर डॉक्टर थे मगर उनके घर की महिलाएं जातिवादी थी। वे अपनी उच्चता और सम्पन्नता दिखाने का कोई अवसर नहीं छोड़तीं। उनके व्यवहार से हमें अपमान का एहसास होता रहता था। यहां भी जातिभेद और अकेलेपन से जूझना पड़ा।

अन्त में 1996 में हमने वह फ्लैट बेच दिया और गोपालनगर के एक पुराने मकान को खरीदकर यहां रहने लगे। यहां मकान में दो कमरे किचन हाल था। ऊपर भी दो कमरे एक हाल था। इतना सब रहने के बाद भी कभी वह दिन नहीं आया कि मैं एक कमरे को अपना बनाकर रखती या ‘यह मेरा कमरा है’ - यह कह पाती। कर्ज भरने की चिन्ता से हमने घर के दूसरी मंजिल के कमरों को ट्यूशन क्लास के लिए किराए पर दे दिया था। हम दो और हमारे चार हम छै लोग नीचे के दो कमरे और हाल में ही रहते थे। यहां के रूम भी 8 ग 9 जैसे छोटे छोटे हैं। बाद में यहीं रहने की आदत हो गई। पति पत्नी का अलग कमरा जैसी बात भी न यहां थी, न ही फ्लैट में। बेटा बेटियां बड़े हो रहे थे। हम सब साथ रहते, बच्चों के साथ ही सोते थे।

गोपालनगर के घर में आने के बाद पति ने ऊपर की मंजिल का एक कमरा अपने पढ़ने लिखने के लिए स्वयं ले लिया था, लेकिन मेरे लिए ऐसा कोई कमरा कभी नहीं रहा। यहां आने के बाद भी मैं अपने लिखने पढ़ने का काम रात में करती हूँ। घर में टी. व्ही आने के बाद, रात के 12 बजे तक टी. व्ही ही चलता रहता, तब टी. वी का समय खत्म होने की राह देखते हुए मैं थोड़ा आराम कर लेती। जैसे ही घर में शांति होती, मैं अपनी किताब कॉपी लेकर बैठ जाती। कॉलेज के पठन पाठन की तैयारी भी करती, स्वतंत्र अध्ययन भी करती और अपना लेखनकार्य  भी करती रहती। फ्लैट में रहते समय भी मैं अपने लिए इसी तरह समय निकाल पाती थी।


लेखन कार्य तो स्कूल में पढ़ने के समय से ही चल रहा था। उन अधकचरी रचनाओं में कभी सुधार करती, कभी एक ही रचना या कविता को बार बार लिखकर सुधारती रहती। इसी तरह लेख और कहानियों को भी बार बार पढ़कर ठीक करती। मैं अपने इन कार्यो में इस तरह मगन रहती कि घंटों बीत जाते और समय बीतने का एहसास ही नहीं होता। रात के 12.00 बजे से सुबह के पांच बजे जाते। चिड़ियां चहचहाने लगतीं, आकाश में उनीदां धुंधला उजाला फैलने लगता। तब लगता कि रात बीत गई है और दिन आ गया है। तब एक या आधा घंटा लेटकर आराम करने के बाद, मैं घर के सुबह के काम में लग जाती। रातभर जागने के बाद भी, कॉलेज जाने के लिए नागपुर से कामठी आने जाने की यात्रा करती। कक्षा में 100-120 छात्रों के शोर के बीच मैं उन्हें पढ़ाती और शाम को घर आकर पुनः घर में भोजन पकाने खिलाने का काम करती। कभी कभी इस तरह 2-3 दिन बीत जाते तब थोड़े चक्कर आने जैसा लगता, मतली जैसा लगता। फिर भी दिनचर्या इसी तरह चलती। तकलीफ होती मगर मन में खुशी रहती कि मैंने अपनी रचनाओं को सही रूप दे दिया है या नई रचनाओं का सृजन किया है। 1986 तक ‘अनुभूति के घेरे’ कहानी संग्रह की कहानियां पूरी तरह छपने के लिए तैयार थी, ‘स्वाति बूंद और खारे मोती’ काव्य संग्रह के लिए मेरे सभी कविताएं बार बार सुधारित होकर परिमार्जित रूप पा चुकी थीं। मैं चाहती थी कि मेरा कविता संग्रह और कहानी संग्रह छपे, प्रकाशित हो। मगर उस समय मैं उन्हें प्रकाशित करने के प्रयास में सफल नहीं हो पाई। कारण यही था - न प्रकाशकों की जानकारी थी, न ही प्रकाशन के लिए खर्च करने के अतिरिक्त रुपए।  पूछने पर सब यही कहते थे कि नागपुर में हिन्दी के कोई प्रकाशक ही नहीं। तब मैं मन मार कर चुप रह जाती थी।

1986 में एम. ए. के डेजरटेशन के लिए नागपुर यूनीवर्सिटी के डॉ. रामेश्वर शर्मा जी से कई मुलाकाते हुईं। इसी तरह नागपुर विश्वविद्यालय के डॉ. हरभजन सिंह हंसपाल जी से भी मिलते रहे। इसके बाद पी.एच. डी. के शोधकार्य के लिए एल. ए. डी कॉलेज की डॉ. योगेश्वरी शास्त्री मैडम से और उनके पति डॉ. अजय मित्र शास्त्री जी से लगातार मिलने रहे। 1990 तक यही चलता रहा। इस बीच इन्हीं लोगों से नागपुर के हिन्दी प्रकाशकों  की जानकारी मिली, तब 1993 में ऋचा प्रकाशन नागपुर से मेरा पहला काव्य संग्रह छपा। इस तरह नागपुर में स्वयं लागत खर्च उठाकर, मैं चार कविता संग्रह, तीन कहानी संग्रह, एक लेख संग्रह, दो नाटक की पुस्तकें और महिला सम्बन्धी दो विवरणात्मक पुस्तकें प्रकाशित कर सकी। इसके लिए मुझे अपने घर में ही और बाहर भी किस तरह संघर्षो का सामना करना पड़ा, यह अलग बात है।

इसके साथ मैं एक बात जरूर कहना चाहूंगी, घर में मुझे लिखने पढ़ने से प्रत्यक्ष रूप में कोई भी मना नहीं करता था, मगर यह सत्य था कि मेरे लगातार लेखन और प्रकाशन से, पति की थोड़ी खुशी के बाद लगातार नाराजी ही दिखाई देती। घर में हम दोनों और बच्चों के अलावा कोई नहीं रहते थे। बच्चों को मेरे लेखन से कोई विरोध नहीं था, फिर कौन मेरे लेखन में अवरोध खड़ा करता था ? मुझे मेरी रखी हुई किताबे पांडुलिपी मिलती नहीं थीं। मैं घंटों और कभी कभी महिनों उन्हें ढूंढ़ती रहती। फिर वे ऐसी जगह रखी मिलतीं, जहां कभी मैंने रखा ही नहीं था। छुट्टी के दिनों में मेरे लिखने के समय ही, घर में कुछ अलग या अच्छीं विशेष चीजे बनाने की फरमाईश होती। मुझे लिखना छोड़कर उठना पड़ता। कभी मुझे लिखने में व्यस्त देखकर ही घर में कचरा गंदगी नजर आने लगता। तब वे सारा सामान उथल पुथल कर, घर में साफ सफाई करने की बात कहते। मैं समझ जाती कि यह मेरे लेखन में जानबूझ कर व्यवधान खड़ा किया जा रहा है। अगर मैं मना करती तब तो दिन भर के लिए लड़ाई का मोर्चा बांध लिया जाता। इस स्थिति से बचने के लिए मैं अपना लेखन कार्य छोड़कर, घर के काम में अपना वह कीमती समय लगा देती। दो दो बातें भी हो जातीं, मगर मैं उस समय अपने विशेष लेखन से वंचित रह जाती। यह दुख मुझे कई दिनों तक सालता रहता। अक्सर यह भी होता रहा, मुझे लेखन में तल्लीन देख उसी समय बेमलब की हुज्जत शुरू की जाती। अकारण ही नाराजी बताकर मेरा ध्यान भंग किया जाता। और फिर यह सिलसिला इस तरह आगे बढ़ता कि कई दिनों तक चलता ही रहता। सुविधा के नाम पर कभी कुछ दिया नहीं, मगर मुझसे मेरा कीमती समय किस तरह छीना जाता रहा, वह भी तानाशाही अधिकारों के साथ ! अब इसके लिए क्या कहू ? यदि उन दिनों मेरे साथ ये जुल्म न किए जाते, तो शायद मेरे लेखन का भंडार कितना बड़ा और महत्वपूर्ण होता। यह मैं अच्छी तरह जानती हूँ, मगर दुखी होने के सिवा कुछ नहीं कर सकी, यह भी मैं जानती हूँ।
अपने लेखन को बचाने के लिए मेरे मन में हमेशा भय रहता था। मैं छिप छिप कर लिखती। मेरे लिखते समय पति आ जाते, या आकर सामने खड़े हो जाते, तब मैं स्वयं अपनी कापी किताब रखकर दूसरे काम में लग जाती। मुझे यह भय रहता कि कहीं मेरी रचनाएं कोई नष्ट न कर दे। तब मैं उन्हें हमेशा संभालकर छिपाकर रखती थी। मेरे लिखे हुए पन्ने सुरक्षित रहें, मेरे लिखे को भी मैं छिपाकर पढ़ती थी। शारीरिक, मानसिक मेरे कष्ट का सिलसिला शुरू न हो जाए, हमेशा सतर्क रहती थी। लायब्रेरी से लाई हुई किताबे भी संभालकर छिपाकर रखती थी कि कहीं वे अचानक नदारद न हो जाएं।

ये बातें कहने में अच्छी नहीं लगती, मगर मेरे साथ अधिकतर यही होता था। जानबूझकर ऐसा किया जाता और अपनी गलती कभी स्वीकार भी नहीं की जाती, जैसे यह खुला आतंकवाद था, जिससे मैं मन ही मन भयभीत रहती थी।  अपनी लिखी रचना इन्हें दिखाकर प्रसंशा पाने के बदले, मैं कई दिनों की आफत को अपने लिए आमंत्रित करती थी। वे मुझे कई तरह से जलील कर करके, यह साबित करते थे कि मुझे कुछ लिखना नहीं आता, वे इससे कई गुना अच्छा लिख सकते हैं। ऐसे समय हमारे बीच लड़ाई झगड़ा होता, मेरे साथ मारपीट भी होती। फिर वह साहित्य सृजन की लगन ऐसे रूठती कि कई दिनों – महीनों तक मेरा साथ ही नहीं देती। तब मैं निष्क्रिय सी अपने जीवन के रेगिस्थान में अकेली भटकती रहती। मेरा लेखन ही मेरे जीवन का उद्यान रहा है। मेरे लेखन के लिए मेरे घर में एक कमरा तो क्या, एक कोना भी सुरक्षित नहीं रहा।


फिर भी मैं लिखती रही, छपती रही। यह मेरी जिद भी, दृढ़ निश्चय था, यह मेरी आशा थी,अरमान था क्योंकि मेरा लेखन सिर्फ मेरे लिए नहीं बल्कि पूरे समाज के लिए है, दलित पीड़ित शोषित जनों की जागृति और उत्थान के लिए हैं। इसके लिए मैंने कभी ‘अपने कमरे’ की कमी को महसूस नहीं किया। जीवन जिया संग्राम की तरह, और मेरा लेखन चलता रहा संघर्ष के साथ।जब लोग किसी के प्यार में डूबकर अपना घर अपनी हथेली पर बसा लेने की बात करते हैं,तब अपने लोगों के लिए क्या अपना कमरा या कोना न मिल पाना कोई बहाना बन सकेगा ?

मैं जानती हूँ गैरदलित स्थापित सवर्ण साहित्यकार अपने लेखन के लिए विदेश जाते हैं। कई लेखक पहाड़ों पर जाते रहे हैं, प्रकृति की गोद में बैठकर लिखते रहे हैं। वे और उनके समर्थक कभी यह भी देखें कि इसके बिना भी लिखा जा सकता हैं, वह भी तेज धारदार असरदार। फिर भी यदि हमें अपना कमरा मिल पाता, तो यह लेखन कितना महत्वपूर्ण और अधिक होता। झील और पहाड़ों के सपने नहीं चाहिए, मगर जीवन जीने की सुविधा चाहिए, अपनी अभिव्यक्ति का अधिकार चाहिए। यह एक कमरे से अधिक महत्वपूर्ण बात है।  

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दलित स्त्रीवाद मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

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