छन्ने की लौंडिया गुनगुनाती है

राकेश तिवारी
'चर्चित कथाकार. उसने भी देखा' और 'मुकुटधारी चूहा' कहानी संग्रह.  एक उपन्यास 'फसक'. पत्रकारिता पर एक पुस्तक 'पत्रकारिता की खुरदरी ज़मीन'. संपर्क: 9811807279  
छन्ने की लड़की के कल्ले फूटते ही गली बड़ी बेसब्र हो गई।
 कुछ-कुछ बेसुरी।
बिना तिराहे-चौराहे वाली इस गली में, जहां वह रहती है, लोग आजकल भटक जाते हैं।  वह सड़क पर आहिस्ता और घर में खुल कर गाती है।
छन्ने की लड़की इन दिनों कतार में खड़ी गुनगुनाती है।
उसी कतार में लगे एक उजले, मुलायम और लचकदार युवक ने उसे ‘अमृता शेरगिल की पेंटिंग से निकल भागी लड़की’ का ख़िताब दिया है।
 मुहल्ले की बेडौल और झाईंदार स्त्रियां उसे ईश्वर की बेहतरीन कलाकृति मानती हैं।  
 लाइन मारने की उम्र पार कर गए अधेड़ उसे चोर निगाहों से देखते हैं।
 गली के लड़कों को यह सोच कर घबराहट होती है कि किसी दिन लड़की के घर के नीचे भी कतार न लग जाए।
 अठारह की उम्र में उसके छत्तीस दीवाने हैं और बहत्तर फ़साने।
  वह ऐसी ही है।
 पर कहते हैं, ‘वैसी’ नहीं है।
पता नहीं।

स्कूटर-बाइक के मैकेनिक आस-पास की गलियों से निकल कर ब्रेक जांचने इसी तरफ़ आते हैं। कालिख लगे कपड़ों में दुपहियों की कान फोड़ हूं-हूं के साथ गली में फर्रांटे भरते हैं और बीच-बीच में ब्रेक की चिंघाड़ गुंजाते हैं। कॉलेज के लड़के आते-जाते इसी गली से होकर गुज़रते हैं। नए-नए मूंछें निकाल रहे स्कूली बच्चे झुंड बना कर एकाध चक्कर गली का लगा जाते हैं। इन दिनों पुलिस भी गुंडे-मवालियों की धर-पकड़ के लिए इसी गली में दबिश दे रही है। कुछ पुलिसिये यूं ही सूंघते-मंडराते हैं। किसी ठेले के हत्थे पर डंडा बजा दिया। किसी की दुआ-सलाम क़बूल की और किसी को बेवजह डपट दिया। नज़र उनकी दुमंज़िले पर रहती है। मंडराने वालों में शादीशुदा फ़रेबी भी हैं। लकदक वर्ग के इज़्ज़दार लोग भी आजकल यहां पाए जा रहे हैं, जो आम तौर पर ऐसी गलियों में नहीं घुसते। जिनके टहलने और पाये जाने के इलाक़े अलग होते हैं। जहां चौड़ी-चिकनी सड़कों के किनारे म्यूनिसिपल्टी के माली फूल-पौधे लगाते हैं।

 गली कौड़ियों वाली एक संकरी गली है। जिसमें दोनों तरफ़ मकान हैं। कुछ मकान बिना पलस्तर के हैं। कुछ जर्जर हैं। कुछ पैंतीस फुट के प्लाट में कुतुबमीनार की तरह खड़े हैं। दुमंज़िले, तिमंज़िले मकानों के नीचे दुकानें हैं। कहीं हुक में बकरे लटके हैं, कहीं पंक्चर लग रहे हैं। कहीं से मूंगफली भुनने की गंध आती है, तो कहीं से तंदूरी रोटी की। यहां सब्जी, फल, छोले-कुलछे और चने-मुरमुरे से लेकर ब्रा तक ठेलों में बिकती हैं। ठेले वाले दुकानों के आगे खड़े रहते हैं और गली को ज़्यादा संकरी बना देते हैं। कई घरों की खटिया और लद्दड़-गूदड़ भी सड़क पर फैला रहता है। औरतें सर्दियों की दुपहरी में धूप की ओर पीठ किये बैठी रहती हैं और बच्चों को कूटती-गरियाती हैं। गर्मियों की रातों में वे आंचल गिराये हाथ-पंखा झलती हैं। हवाओं को लगातार एक ही सूचना देती हैं कि बड़ी उमस है। बच्चे सुबह-शाम नालियों में शौच करते मिल जाते हैं। कभी-कभी उनके शौच में केंचुए (राउंड वर्म) निकलते हैं.  छन्ने कबाड़ी की लड़की इसी गली में रहती है। इन दिनों इसे ‘छन्ने कबाड़ी की लौंडिया वाली गली’ कहा जाने लगा है।

 गली में हर वक़्त किसी न किसी घर से लड़ने-झगड़ने की आवाज़ें आती रहती हैं। अन्यथा ठोक-पीट का शोर और बरतनों की खटर-पटर लगातार चलती है। सुबह से शुरू हुई ये आवाज़ें रात को दस-ग्यारह बजे के बाद थकने लगती हैं। लेकिन सुबह चार बजे से आवाज़ों का जागरण फिर शुरू हो जाता है। इन आवाज़ों को आराम नहीं है।

इसी गली में एक दुकान छन्ने कबाड़ी की है। जिसके सामने सलीम भाई मुर्ग़े वाला क़ाबिज़ है। जहां बीमार लगने वाले पंख नुचे मुर्ग़े और मुर्ग़ियां छोटे-छोटे खानों वाली जालियों में बंद रहते हैं। उसके दाईं तरफ़ तीन दुकान छोड़ कर मितरां दा ढाबा है। यहां से, साठ डिग्री के कोण से, छन्ने का दुमंज़िला साफ़ दिखाई देता है। कुछ हरामी लौंडों का अड्डा यहां भी है। असल में, सलीम भाई की दुकान से आंखों की ‘ कसरत ’ में गर्दन को तकलीफ़ उठानी पड़ती है। उस पर सामने बैठा छन्ने और अंदर बैठे सलीम भाई, दोनों ताड़ लेते हैं। इसीलिए सलीम भाई के ‘कसरती’ लौंडे दिन में दो-चार बार मितरां दा ढाबा की ओर चले आते हैं।



छन्ने की दुकान घर के नीचे है। या यूं कहिए कि दुकान के ऊपर छन्ने का घर है। कभी छन्ने का बाप इस जगह झुग्गी डाल कर रहता था। वह फेरी लगा कर रद्दी ख़रीदा करता था। छन्ने की दुकान के सामने एक बड़ा-सा तराजू लटका रहता है और तराजू के एक पलड़े में हमेशा बड़े-बड़े बाट रखे होते हैं। छन्ने पुराने अख़बार, शराब की खाली बोतलें, प्लास्टिक, लोहा, पीतल  और अल्यूमीनियम ख़रीदता है। पर आपको कोई भी पुरानी चीज़ बेचनी हो और उसके पास जाएं तो वह दाम ज़रूर लगाता है। जैसे कुछ साल पहले एक महिला अपने लकवा पड़े ससुर का हारमोनियम बेचने आ गई थी। हारमोनियम में न लोहा, न पीतल। छन्ने ने दो सौ से बोली लगाई। उस औरत ने तीन सौ पर छोड़ दी। सोचा— चल छोड़ परे, बेकार में जगह घेर रही है। पर छन्ने हारमोनियम का क्या करता ?  घरवाली के आगे पटक कर बोला, “ये ले, इसे बजाया कर।  दिल बहलेगा।”
 
क़सम खुदा की, इन दिनों गली कौड़ियों वाली में रौनक-मेला लगा है। जिसे देखो वही गली का रुख़   किए हुए है। कुछ लोग जिज्ञासावश आते हैं। एक बार आते हैं तो दुबारा आते हैं। तिबारा आते हैं। कुछ बार-बार आते हैं। गली के लोग सब समझते हैं।  उन्हें पता है कि इतनी तरह के नमूने आख़िर क्यों दिखाई दे रहे हैं।

पर, माफ़ी चाहते हुए, पहले मैं छन्ने की लुगाई का ज़िक्र करना चाहूंगा। एक ज़माने में उसकी खूबसूरती के बड़े चर्चे थे। इसके बावजूद कि लोगों ने उसे उतनी ही बार देखा था जितनी बार गिनती करने में भ्रम नहीं होता। एक बार जब छन्ने सरेआम उसका हाथ दबोचे फिल्म दिखाने ले गया था। उन दिनों गली में दुकानें कम थीं और ऐसी खुल्मखुल्ला दीवानगी भी कोई नहीं दिखाता था। कुछ लोग गश खा गए थे। तीन-चार बार उसे तब देखा गया जब वह पेट से थी और छन्ने उसे अस्पताल ले गया था। पहली ज़चगी तो घर पर ही कर ली थी। एक बार लोगों ने उसे तब देखा था जब वह छन्ने से लड़ कर गली में दौड़ती हुई सरपट निकल गई थी और उसके गालों पर डेढ़ आंसू थे। रोती हुई औरत गली के लोगों को बेहद खूबसूरत लगी थी। जब गली के लोगों को पता चला कि वह छन्ने से अनबन के बाद भागी है तो उनकी निगाह में वह और खूबसरत हो गई थी। कइयों ने उसे पलकों पर बिठा कर रोज़ सुबह रबड़ी-जलेबी और शाम को लाल-हरी चटनी के साथ समोसे खिलाने की कल्पना कर ली थी।
   छन्ने की घरवाली जैसे सरपट गई, घंटे भर में वैसे ही सरपट लौट आई। लोगों के दिल में फिर छुरी चली। हाये ! ये क्या हो गया। इतनी जल्दी सुलह-सफाई  ?   कुछ दिन तो सब्र करती। पर खड़ूस तो असल में मायके वाले निकले। बैरंग लौटा दिया— अरे, मार-कूट लिया तो क्या हो गया ?  सब मारते हैं। सबर से काम लो। थोड़ा बर्दाश्त करना सीखो। आहिस्ता-आहिस्ता मुट्ठी में करो और पुचकार कर गले में पट्टा डाल दो।

लकड़बग्घे पट्टा नहीं पहनते। छन्ने ने भी नहीं पहना। उल्टा घरवाली नज़रबंद हो गई। हर दो-ढाई साल में एक बच्चा जनती और महीने-डेढ़ महीने आराम के बाद फिर वही चूल्हा, वही चौका। सुंदरता के पुरस्कार में उसे दीवारें मिली थीं। जिनसे छन कर कभी-कभार सिसकियां और कराहें बाहर जा आतीं। मानो, दीवार सिसकती हो। पड़ोसी अनुमान लगाते कि कबाड़ी अपनी उजली और मूक दीवार पर लात-घूंसे बरसाता होगा । आश्चर्य, खासकर, उन्हें होता जिन्हें अपनी दीवारें कुछ कम उजली या बदरंग लगती थीं। या जिनकी दीवारों के आंख, कान, नाक और मुंह निकले हुए थे।

  खैर, यहां बात कबाड़ी की औरत की नहीं हो रही। वैसे भी, वह अब धुआंई-पीली दीवार बन चुकी थी।
   घिसी हुई पीली दीवार।
   पिटी हुई पीली दीवार।
बात कबाड़ी की लड़की की हो रही है, जो हर सुबह सूरज की तरह गली में उगती है। धूप से  वायटामिन-डी लेती है और हवा से खनिज पदार्थ। इसीलिए इतनी सुर्ख़ है। इतनी कि अगर अगले साल उसका सपना सच हो गया तो खाते-पीते घर की लड़कियों पर कहर बरपेगा। वह बारहवीं का इम्तिहान देने वाली है। उसने तय कर रखा है कि बारहवीं करते ही कॉलेज जाएगी। कॉलेज जाएगी तो तय था कि वहां औसत रूप-रंग की नख़रीली, ग़ुस्सैल और घमंडी लड़कियों की छुट्टी हो जानी है।

छुट्टी इसलिए हो जानी है, क्योंकि छन्ने की लड़की खूबसूरत है। हरदम मुस्कराती है। बात-बेबात गुनगुनाती है।
   लड़की हर सुबह ज़्यादा खिली और स्वस्थ लगती है। उसका निखार दिन पर दिन बढ़ता जाता है। बढ़ते निखार के साथ उसके दीवानों की संख्या बढ़ रही है। इससे छन्ने की दिक़्क़तें बढ़ रही हैं। वह डरा हुआ रहता है। अपनी पत्नी से कहता है, “लौंडिया सयानी हो गई।”
   “अभी अठारा की भी ना हुई।”
   छन्ने चुप। कुछ सोच कर फिर कहता है, “लौंडिया के पर लिकड़ रहे हैं।”
   औरत भुनभुनाती है, “थोड़ा तो उड़ लेन दो। फिर तो...।”
   कबाड़ी के दांत बजते हैं। आंखें बाहर निकल आती हैं। भुजाएं फड़कने लगती हैं।
 
आजकल कई जगह लंबी कतारें लगती हैं। लगती क्या हैं, लोग कतार लगाने को बावले हुए पड़े हैं। एक कतार गली के बाहर, आधा किलोमीटर की दूरी पर लगी है। छन्ने की लड़की रोज़ इस कतार में खड़ी होती है। कतार में खड़ी बुदबुदाती है। शायद प्रार्थना करती है। वह कसमसाती है। कसमसाहट काम नहीं आती। वह गुनगुनाती है। गुनगुनाहट बेअसर हो गई है। वह थोड़ी-थोड़ी देर में पीछे मुड़ कर देखती है। कतार लगातार लंबी होती जाती है। वह पंजों के बल उचक कर आगे देखती है। लोग बातें करते हैं। खूब बातें करते हैं। ज़्यादातर अच्छी-अच्छी और भविष्य को लेकर आश्वस्त करने वाली बातें। कुछ लोग उनसे असहमत होते हैं। पर उनके तेवर देख कर निराश हो जाते हैं। बाकी लोग सहम जाते हैं और छन्ने की लड़की को देखने लगते हैं। कुछेक की निगाहें हटती नहीं। मानो, सुंदरता देश-दुनिया और रोटी-पानी से बड़ी चीज़ हो। छन्ने की लड़की तड़प कर गेट के अंदर देखती है। कुछ नहीं दिखाई देता। वह बेबसी के कतार को देखती है। लेकिन आगे से कतार छोटी होने का नाम नहीं लेती, जबकि पीछे से लंबी होती चली जाती है। लोग खिसक क्यों नहीं रहे ? आगे क्या हो रहा है?  वह सोचती है।
 
लड़की रोज़ कतार में खड़ी होती है और बुदबुदाती है। मानो, किसी के पसीजने की प्रार्थना करती हो। वह आकाश की ओर देखती है। इधर-उधर देखती है। अपने पैर के नाखूनों को देखती है। चुपचाप। फिर अपनी ही चुप्पी से परेशान हो जाती है और गुनगुनाती है। वह अब भी गुनगुना रही है। पर अचानक कतार में भगदड़-सी मच गई है। मायूस लोग कतार से हटने लगे हैं। आगे से एक कातर-सी आवाज़ आती है। बड़ी ही मायूस और निराशा में डूबी। यह आवाज़ पीछे की तरफ़ आती चली जाती है। कतार की पूंछ तक पहुंच जाती है। सब निराशा में डूब जाते हैं। कुछ लोग भुनभुनाते हुए कतार से हट जाते हैं। कुछ निराशा के बावजूद आवाज़ पर भरोसा नहीं करते और खड़े रहते हैं। क्या पता, सच न हो। ‘विसSSर्जन’ की आवाज़ धोखा हो। वे एक हाथ पेट पर रखते हैं और दूसरे से कंधों को सांत्वना देते हैं। उम्मीद नहीं छोड़नी चाहिए।


कबाड़ी की लड़की कतार में लगने के लिए अगले दिन फिर निकलती है। स्कूटर मिस्त्री नसीर अपना खटारा स्कूटर लेकर उसके पीछे लग गया  है। गली से बाहर निकलते ही वह मुख्य सड़क पर पहुंच जाती है। नसीर बड़ी अदा से उसका रास्ता काट कर दाएं से बाईं तरफ़ निकलता है और कुछ आगे चल कर स्कूटर खड़ा कर देता है। वह बिना हैलमेट के है और स्कूटर पर बैठे-बैठे कंघा निकाल कर बाल संवारता है। उसके क़रीब आने से पहले पान का पीक थूकता है। वह पीछे मुड़ कर नहीं देखता, सिर्फ़ कनखियों से देखता रहता है। अपने सेल फोन के साथ खुचर-पुचर करता है। दुबारा कनखियों से देखता है। वह आ रही है। नसीर इधर-उधर देखता है। कहीं कोई है तो नहीं। कोई नहीं है। सिवाय एक झटियल-से आदमी के, जो कंधे पर कोई थैला-सा लिए दूर से चला आ रहा है। वह गली में जाएगा। नसीर अनुमान लगाता है। लड़की के क़रीब आते ही वह ज़ोर से कहता है, “आई लभ्यू।”
 
तुरंत स्कूटर पर किक मारता है और सर्र-से आगे निकल जाता है। कुछ आगे चल कर पलटता है। लड़की मुस्कराती है। नसीर रुक जाता है। वह क़रीब आती है। नसीर ग़ौर करता है। वह खुश-खुश लगती है। गुनगुनाती हुई उसके बगल से निकल जाती है। वह दाएं हाथ को बाईं तरफ़ लेजा कर सीने पर रखता है और ‘हायेSSS, क्या बात है’ कहता हुआ उसी तरफ़ निकल जाता है जहां, उसे पता है, लौंडिया कतार में लगेगी।
 

अगले दिन राजू ‘सिक्स पैक’ से मुलाक़ात के दौरान नसीर बताता है, “कल मज़ा आ गया उस्ताद, ‘आइ लभ्यू’ बोल दिया।”
 “उसने क्या जवाब दिया ?”
  “मुस्करा दी।”
 “वह तो हमेशा मुस्कराती है।”
 “गुनगुनाने लगी।”
 “उससे क्या होता है ? वह हमेशा गुनगुनाती है।... मैंने तो फिलाइंग किस दी थी।” उसने अपना हाथ चूमते हुए हवा में लहराया, “ऐसे।
 “तो फिर उसने क्या किया ?”— नसीर ने पूछा।
“मुस्करा दी ... और गुनगुनाने लगी।...पर लपेटे में नहीं आती। बड़ी बेरहम लौंडिया है।”
“बेमुरव्वत।” कहते हुए नसीर का उत्साह ठंडा पड़ गया।
    
कोई नहीं जानता कि वह मुस्कराती-गुनगुनाती क्यों है। कोई नहीं जानता कि वह किसी भी फ़ब्ती का जवाब क्यों नहीं देती। कोई कुछ भी बोल दे वह चुपचाप सुनती ही नहीं, बल्कि मुस्करा देती है। उसके मुस्कराने और गुनगुनाने के चर्चे हैं। लोग रीझे हुए हैं। पर सच तो यह है कि वह गली कौड़ियों वाली के लड़कों की परवाह नहीं करती। किसी की नहीं करती। असल में, वह जिन दो सपनों को पोस रही है, उन्हीं में खोई रहती है। एक तो बारहवीं के बाद कॉलेज में एडमिशन लेना है। दूसरा, टीवी पर चलने वाले किसी रियलिटी शो में गाने का एक मौक़ा हासिल करना है।


इसके सिवा, उसे कुछ नहीं दिखाई देता। कुछ सुनाई नहीं देता। सच पूछें तो छन्ने की लड़की को पता ही नहीं कि वह मुस्कराहट बांट रही है। कि लोग उससे उम्मीदें लगा बैठे हैं। अभी तो वह खुद बड़ी उम्मीदों के साथ कतार में खड़ी बुदबुदाती है। पर बुदबुदाहट काम नहीं आती। वह निराश हो जाती है और गुनगुनाती है। गुनगुनाहट में बड़ी ताकत है। यह निराशा से उबारती है। गुनगुनाहट ठंडे आदमी को भी गुनगुना बनाए रखती है।

 वह हरदम संगीत में रमी हुई सुरीली लड़की है। संगीत उसकी मुस्कराहट है और संगीत ही गुनगुनाहट।वह इतनी सुंदर है कि पेंटिंग तो क्या, तस्वीर में मौजूद लड़कियां भी झेंप जाएं। इतना ही सुरीला उसका गला है। वह फ़िल्मी गानों को हू-बहू गा लेती है। उतने ही दर्द के साथ, उतने ही आनंद के साथ। वैसे ही उतार-चढ़ाव के साथ। वैसी ही मुरकियां लेकर। लेकिन उसने संगीत सीखा नहीं है। मां को हारमोनियम बजाने का शौक बचपन से था। कभी वह भी गाती थी। कुछ साल पहले छन्ने ने तीन सौ की हारमोनियम क्या निछावर की, उसे जीने का मक़सद मिल गया। उसने यह मक़सद अपनी लौंडिया को सौंप दिया।
 
तब से दोनों मां-बेटी साथ बैठ कर हारमोनियम पर गाने-बजाने का रियाज़ करने लगीं। अब मां बजाती है, बेटी गाती है। जब वह गाती है, उसकी गोरी गर्दन पर फूली हुई नीली नसें साफ़ दिखाई देती हैं। जब मां बजाती है, बैठे-बैठे उसकी कमर टेढ़ी हो जाती है। उनकी जुगलबंदी देख कर कई बार ऐसा लगता है, जैसे दोनों गाने-बजाने के लिए ही बनी हैं। गाते-गाते बेटी के दिमाग़ में रियलिटी शो में जाने की धुन सवार हो गई— वहां गाना है जहां सितारे गाते हैं। वहां गाना है, जहां सितारे बनते हैं। नीले आकाश में टंगे पीले सितारे।

 नीले आकाश में टंगने के लिए क्या किया जाए ? उसने कई लोगों से सलाह-मशविरा किया। मां ने भी किया। मां उसे आकाश के भी ऊपर टांगना चाहती है। अलग नज़र आने वाला चमकदार सितारा बना कर। मां-बेटी को ज़्यादातर ने यही बताया कि किसी अच्छे गुरु से संगीत की बारीक़ियां सीखनी होंगी। फ़िल्मी गीत गा लेने से काम नहीं चलेगा। तब उन्होंने गुरु की तलाश शुरू की। कई गुरु-मर्द मिले। लेकिन संगीत में अनाड़ी बाप ने भेजने से इनकार कर दिया। ना। क़तई नहीं। गला पकड़ कर कहेगा, गले से आवाज़ निकालो। फिर पेट पकड़ कर कहेगा पेट से निकालो। और अगर छाती से आवाज़ निकालनी हो तो...। ना। ना बाबा, ना।

 आख़िर लड़की की मुलाक़ात एक गुरुवाइन से हो गई। बिल्लौरी आंखों और कटे बालों वाली गुरुवाइन। जो बिना कत्थे का पान खाती थी। चूना लगा हुआ। गाते हुए उसके मटमैले दांत मुंह से बाहर छलक आते हैं। गदराई औरत और गदराई हुई आवाज़। जब वह गाती है, अपने गदराए हुए पैर हिलाती है। लेकिन बड़ी ही बदमिज़ाज़। अक्खड़ और लठमार भाषा में बात करने वाली। बात-बात में अपमानित करती है। लौंडिया का मन तो नहीं था उससे सीखने का, लेकिन धुन के आगे मन हार गया।
 
पर गुरुवाइन का एक दूसरा चेहरा भी है। उसे लौंडिया की मां ने देखा है। उसने एक दिन लौंडिया की मां को समझाया था कि लड़की होनहार है। सातवें सुर की तरह चढ़ेगी।
 
मां ने पूछा कि आसमान पर टंगेगी ?  गुरुवाइन ने कहा— हां, पर दिमाग़ सातवें आसमान में न चढ़े। उससे मत कहना कि मैं उसके बारे में क्या सोचती हूं। कभी मत कहना। सितारे प्रशंसा से नहीं, अपमान और आलोचना से बनते हैं।



जिस वक़्त छन्ने कबाड़ी के ज़ीने में भगदड़ मची, राजू ‘मितरां दा ढाबा’ में चाय पी रहा था। कौड़ियों वाली गली का यह ढाबा अंधेरी सुरंग जैसा लगता है। दोपहर हो या रात, वहां चौदह वॉट का इकलौता सी.एफ.एल. जलता रहता है, जो धुएं से पीला पड़ गया है और ढाबे के अंधेरेपन में जिसका काफ़ी योगदान लगता है। कुछ लोग भागते हुए ज़ीना चढ़ रहे थे। कुछ उतर रहे थे। बच्चों के रोने की आवाज़ें तेज़ होने लगीं। तभी छन्ने एक रोते हुए बच्चे के पीछे-पीछे गोली की तरह सीढ़ियां फलांग गया। अगले ही पल वह अपनी घरवाली को गोद में उठाए ज़ीने से सड़क पर उतर आया। दुकान के बाहर से, दाईं तरफ़ की, नौ खड़ी सीढ़ियां दुमंजिले में पहुंचाती हैं। दो-तीन लोग उसकी ऐंठती-छटपटाती घरवाली का सिर और पैर पकड़े छन्ने की मदद कर रहे थे। छन्ने की दुकान के ठीक सामने एक ऑटो खड़ा हो गया था। उसने तेज़ी से घरवाली को ऑटो में डाला और पीछे खड़ी एक महिला को उसके अंदर लगभग ठेल दिया। दो-तीन बच्चे चीखते हुए ऑटो की तरफ़ लपके लेकिन छन्ने ने उन्हें बाहों से झिंझोड़ कर वापस ज़ीने की ओर धकेल दिया।

ढाबे वाला ऑटो की रवानगी देख कर बोला, “लो, छन्ने ने एक और मॉडल तैयार कर दिया।”  छन्ने ने दूसरे ऑटो को हाथ दिया और बिना कुछ बोले उसमें घुस गया। ऑटो चल पड़ा। एक लड़का दौड़ता हुआ उस ऑटो के अंदर बैठ गया और उसने रफ़्तार पकड़ ली।

 “नहीं, यह ज़चगी का मामला नहीं है।” बगल वाला अधेड़ पनवाड़ी, जो अपनी छोटी-सी दुकान के अंदर पालथी मार कर बैठता है, मुंह बाहर निकाल कर ढाबे वाले को बताने लगा, “वह परास्त होकर कभी नहीं गई।”
पनवाड़ी के मुंह में कोई आधा कप पीक होगा। उसने पीक थूक कर बताया कि छन्ने की घरवाली ज़चगी के लिए हमेशा मुस्कराती हुई गई है। वह योद्धाओं की तरह जाती है। पहले ज़ीना उतर कर पति की दुकान के सामने खड़ी होती है। फिर छज्जों की तरफ़ देखती है और पेट आगे निकाल कर स्कूटर की ओर ऐसे बढ़ती है जैसे कोई बच्चा या शराबी मूतने जा रहा हो। फिर वह स्कूटर पर बैठते-बैठते बच्चों को हाथ हिलाती है। मानो, जंग जीतने की शुभकामनाएं मांग रही हो।

  “नहीं ज़चगी का मामला नहीं है। बात कुछ और है।”—उसने पूरे विश्वास के साथ कहा और अपने खोखे से उतर कर छन्ने की दुकान की ओर बढ़ गया, जहां कुछ लोग अब भी खड़े थे। कुछ लुगाइयां भी थीं। मर्द और औरतें, सभी फुसफुसा रहे थे। छन्ने ने किसी को कुछ नहीं बताया। पर बच्चे बता रहे थे कि मां को कोई फोन आया था। वह चीखी। बिलबिलाती हुई पूरे घर का चक्कर काटने लगी।  ग़ुसलख़ाने की तरफ़ भी भागी थी। फिर धड़ाम् की आवाज़ आई। बच्चों ने देखा, मां फर्श पर गिरी है। उसे क्या हुआ यह पक्के तौर पर कोई नहीं जानता था। बच्चों ने छन्ने को बुलाया। छन्ने ने अपनी पत्नी के मुंह पर पानी के छींटे मारे। मां ने बाप से आधे-अधूरे-से कुछ वाक्य कहे— मेरी लौंडिया।... मेरी सुरीली लौंडिया का आसमान।...पता नहीं क्या हुआ...कोई देखो।

असल में आज लौंडिया फिर कतार में खड़ी थी। नसीर ने आज उसका पीछा नहीं किया। वह अब भी उदास था। राजू ‘सिक्स पैक’ ने दुबारा फ्लाइंग किस दी। वह उसी तरह मुस्कुराई और कतार में समा गई। बाप नहीं चाहता था कि वह कतार में खड़ी हो। लेकिन मज़बूरी। एक तो वह अंगूठा छाप। दूसरा, दुकान छोड़ नहीं सकता। तीसरा, सारी जिंदगी नक़द का धंधा करता रहा। जेब में लिया और जेब से दिया। पर अचानक ही, जेब धोखा दे गई। जो था, सब मिट्टी हो गया। लौंडिया वही मिट्टी लेकर कतार में लगती है। किसी तरह बदली हो जाए।

 कतार में खड़े होते छठा दिन है। केवल कतार का मुंह गेट में घुस पाता है। न पूंछ, न पेट। वह कभी पूंछ में होती है, कभी पेट में। सारा दिन खड़ी रह जाती है। राजू ‘सिक्स पैक’ जैसे धैर्यवान लड़के तक घंटे- दो घंटे में लौट जाते हैं। आख़िर कितनी देर लड़की को देखता रहेगा। पर लड़की के धैर्य ने अब तक जवाब नहीं दिया है। गुनगुनाहट उसका सबसे बड़ा सहारा है।
 
छन्ने को पता था कि आज लड़की तड़के निकल पड़ी थी। किसी ने लड़की को बताया था कि लोग तो खा-पीकर रात से ही कतार में लग जाते हैं। जिस वक़्त वह पहुंची, कतार उतनी बड़ी तो नहीं थी, लेकिन कई लोग पहले से खड़े थे। उसने अनुमान लगाया और पीछे खड़ी महिला से, जो नाक से बोलती थी, अपनी खुशी साझा की— आज बारी आ सकती है। महिला की नाक ने भी खुशी में मामूली मिनमिन-सी की। मानो, वह पूरी तरह आश्वस्त न हो। गेट खुलने तक कतार इतनी बड़ी हो गई कि घुमा कर लगाई जाने लगी। दोपहर बारह बजे तक कतार धीरे-धीरे खिसकते हुए आगे बढ़ने लगी। वह गेट चढ़ने वाली सीढ़ियों तक पहुंच गई थी। उसे उम्मीद होने लगी कि आज बारी आ जाएगी। उसने पीछे वाली महिला से फिर कहा। महिला की नाक से उम्मीद निकली— हां, लगता तो है।
लौंडिया को बड़ा अच्छा लग रहा था। वह गुनगुनाने लगी। आगे-पीछे खड़े लोग ग़ौर से उसे देख रहे थे। घंटों कतार में खड़ी होने के बावजूद लड़की गुनगुना रही है। ग़ज़ब का धैर्य है। लोगों को आश्चर्य हो रहा था। पीछे खड़ी औरत को नहीं हुआ। वह जानती थी कि यह उम्मीद की गुनगुनाहट है।


 पर उसी वक़्त अचानक भगदड़ मच गई। कुछ लोग घूम कर आ रही कतार की पूंछ से निकल कर मुंह में घुसने लगे। कुछ लोगों ने हल्ला मचा दिया। लड़की भी चिल्लाई। देखते-देखते धक्का-मुक्की होने लगी। लड़की आख़िरी सीढ़ी पर पहुंच चुकी थी। उसे पांच-दस मिनट बाद गेट के अंदर होना था। लेकिन धक्का-मुक्की में वह सीढ़ियों से गिर गई। कहते हैं, ठोढ़ी पर लगने से उसकी जीभ कट गई। कुछ लोगों का कहना था आगे के दो दांत टूटे। लड़की का फोन छिटक कर दूर जा गिरा था। उसके मुंह से एक बार ‘सा-सा, रे-रे, गा-गा’ निकला और फिर खून बहने लगा। लोग घबरा गए। किसी ने लड़की के फोन से की गई आख़िरी कॉल देखी। नंबर मिलाया। उधर से उसकी मां बोल रही थी। फोन करने वाले ने घटना बयान कर दी— लड़की की ठोढ़ी फूट गई। शायद जीभ कट गई हो। या फिर दांत टूट गए। लड़की के मुंह से सरगम के साथ बहुत खून निकल रहा है।

यह सुनते ही मां घर के अंदर भागने लगी। फिर छटपटा कर गिर पड़ी। घर पहुंचा एक पुलिस वाला लगातार एक ही सवाल पूछ रहा था, “बाथरूम की तरफ़ क्यों भागी ?  वहां फिनाइल रखा था ?”
 दूसरे नंबर की लड़की ने कहा, “नहीं।”
“उसके मुंह से फिनाइल की बदबू आ रही थी ?”
“जब फिनाइल था ही नहीं तो बदबू कैसे आएगी ?”
 “जवाब ‘हां’ या ‘ना’ में दे लौंडिया। ज़्यादा होशियार बनने की ज़रूरत नहीं।” पुलिस वाला खिसिया गया था, इसलिए भुनभुनाने लगा, “किसने क्या पिया और क्या खाया, ये तय करना हमारा काम है।”
   
घबराए हुए बच्चे पुलिस वाले का चेहरा देखने लगे। अब इस मुसीबत की घड़ी में यह फिनाइल कहां से आ गया ?
   छन्ने के घर और दुकान पर भीड़ उमड़ पड़ी। सब बुझे हुए थे। लड़कों की आंखें टपकने को थीं। वे एक-एक कर अस्पताल की ओर भाग रहे थे। कौन जाने खून देना पड़ जाए। किसी ने कहा कि खून देने से भाई-बहन का रिश्ता हो जाता है। नसीर तैश में आ गया, “मुझे परवाह नहीं है। लौंडिया की जान बचनी चाहिए।”
 
राजू ‘सिक्स पैक’ लगभग रो पड़ा, “मैं तो खून दिए बिना भी उसे बहिन बना सकता हूं। बस, उस सुरीली आवाज़ को बचना चाहिए।”
दीवानों की पलकें सगे भाइयों की तरह भीग गईं।
 छन्ने जब मौक़े पर पहुंचा तो कतार फिर से लग रही थी। लोग तेज़ या मद्धम स्वर में बातें कर रहे थे। उसने घृणा से कतार की ओर देखा। कतार के बाहर भी चार-चार, छह-छह लोगों के झुंड दिखाई दे रहे थे। रुई के फाहे जैसा उजला और नाज़ुक लड़का भीगी पलकों वाला दीवाना लग रहा था। वह रुआंसे स्वर में कह रहा था— काश ! लड़की पेंटिंग से निकल कर कतार में खड़ी न हुई होती। काश !... किसी ने उसे टोका, “वह पेंटिंग से नहीं, बांसुरी से निकल कर आई होगी। या फिर सितार से या हारमोनियम से।”

 छन्ने ने सुना और तड़प कर रह गया। वह ऑटो घुमा कर अस्पताल की ओर भागा, जहां लौंडिया को ले जाया गया था। जहां अब तक उसकी मां भी भर्ती हो चुकी होगी। जहां, हो सकता है, दोनों को अगल-बगल लिटाया गया हो। जहां, हो सकता है, अब तक दोनों आपस में बातें करने लगी हों। जहां, हो सकता है, दोनों गुनगुनाने लगी हों। जहां, हो सकता है, दोनों रो रही हों। हो सकता है दोनों ही सो रही हों।
 
छन्ने भागा चला जा रहा था। उसके दिमाग़ पर लगातार हथौड़ा बज रहा था। क्या हुआ होगा ? लौंडिया की  जीभ तो नहीं कटी होगी। दांत भी नहीं टूटे होंगे। लेकिन ठोढ़ी कितनी फूटी होगी ? उसका सुर तो निकल रहा होगा ? और  उसकी मां ? वो  पागल हारमोनियम ? उसकी धौंकनी को क्या हुआ ? सोचा भी नहीं कि बिना जुगलबंदी के, बिना सरगम के, घर क्या सचमुच घर रह जाएगा ? क्या अब हम दीवारों के बीच के सन्नाटे को सुनेंगे ? वैसे, अगर सन्नाटे का कोई संगीत होता होगा, तो वह ज़रूर पागल कर देता होगा।
अस्पताल पहुंचने में अभी और कितना समय लगेगा ?
कथादेश से साभार


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