स्त्रीसत्ता, लोकायत दर्शन और क्रान्ति की गति

आशिष साहेबराव पडवळ
स्त्री-वर्ग-जाति के मुद्दों पर काम करनेवाली मानव मुक्ति मिशन नामक संगठन के सोशल मीडिया का महाराष्ट्र प्रभारी. संपर्क: aanvikshiki.edit@gmail.com मो.8888577071
दर्शन काल का इतिहास आदिम समाज से शुरू कर के आगे बढ़ना चाहिए. जब किसी भी संस्था का इतिहास देखना हो तो उसके बेस को भी देखना चाहिए तभी हम उसके आखरी सिरे तक जा सकते हैं. यह समझना होगा कि बुध्द पूर्व भी यहाँ कोई जनजीवन था.

आदिम समाज में परिवार नही था,१ उसमें कुल व्यवस्था थी. परिवार न होने के कारण स्वैरसंभोग था. उस समाज में सिर्फ 'मां' का ही पता होता था, न कि बाप का. खेती तंत्र स्त्री द्वारा ढूंढने की वजह से समाज में स्त्री का वर्चस्व था .

ऋचा 10.71.9  साफ तौर पर यह साबित करती है आर्य पूर्व समाज कृषक था:
इमे ये न अर्वाक् न पर: चरन्ति न ब्राम्हणास: न सुतेकरास :.
ते एते वाचं अभिपद्य पापया सिरी: तन्त्र तन्वते अप्रजज्ञय न : ..२
ये पापी अब्राहमण लोग,जो हवन करते नहीं, जो लोकभाषा बोलते हैं, और खेती  करते है.

आदिम समाज अगर कृषक है तो वह स्त्री सत्ताक और आदिम समाज अगर पशुपालक है तो वो पितृसत्ताक व्यवस्था है.३ इस से साबित भी होता है कि तब स्त्री सत्ताक काल था. स्त्री सत्ताक काल में स्त्री राज करती थी.

समतावादी दर्शन से पहले समता और दर्शन दोनों के कालसापेक्ष क्या मायने थे, वह देखेंगे:

समता : समता अर्थात सभी लोगो को समान अधिकार, समतावादी दार्शनिक अर्थात समता के आग्रही लोग या संस्था. इस समता का शुरुआती दौर हम स्त्रीसत्ताक,मातृवंशक काल में देख सकते हैं, लोकायत का जन्म निम्न शेती विकास अवस्था में हुआ है. निऋति आद्य स्त्री सत्ताक गणों, देवी गणों में भूमि और धन का समान बटवारा करती थी.४ गण व्यवस्था की तेरणा मांजरा खोरे की राणी तुळजाभावनी अपने गणों में धान्य का समन्यायी बटवारा अपने परडी से करती थी.५ चार्वाक अपने ही हिस्से के उत्पादन का भोग लेने का निर्देश करते हैं. उसमें वे उच्च-नीच का भेद नही करते. असुरराज बलिराजा न्याय और समता के लिए सुपरिचित हैं.

दर्शन : दर्शनशास्त्र ज्ञान है जो परम् सत्य और प्रकृति के सिद्धांतों और उनके कारणों की विवेंचना करता है. दर्शन यथार्थ परख के लिए एक दृष्टिकोण है. 'दृश्यतेह्यनेनेति दर्शनम् 'अर्थात् असत् एवं सत् पदार्थों का ज्ञान ही दर्शन है.विविध प्रमाणों के सिद्धांत-समूह को 'दर्शन' कहा गया है .६ दर्शन अर्थात दृष्टि,तो इस 'दर्शन' से ऐसा प्रतीत होता है, उन्हें अंतिम सच के प्रत्यय पर ही विश्वास था . इसीलिये दर्शन (तत्त्वज्ञान) कहा गया ह . भारतीय दर्शनों में अवैदिक और वैदिक दो विभाग बताये जाते हैं. जबकि हम दर्शन को अंतिम सच का प्रत्यय कहते हैं तो , वैदिक आध्यात्मिक ज्ञान(वेद) को दर्शन कैसा कहा जा सकता है ? ये भी सोचने वाली बात है . भारत में हर एक चीज की खोज वेदों में होती है. सच ये है कि अध्यात्म को अंग्रेजी में Metaphysics कहा जाता है , Meta यानी के बाद ( beyond ) और Physics यानी भौतिक जगत. भौतिकजगत के बाद की पढ़ाई (study) करते समय तर्क शास्त्र के साथ मानसशास्त्र (psychology)का आधार लेना पड़ता है . ये भी वेदान्त समर्थकों  को ध्यान देना लेना चाहिए .

इस भारतीय समाज में "भारतीय दर्शनों को मोटे तौर से दो कोटियों में वर्गीकृत किया जा सकता है-आस्तिक और नास्तिक में. सामान्य शब्दावली में प्रथम से तात्पर्य है ईश्वरवादी और दूसरे से निरीश्वरवादी.७ इसमें से जोनिरीश्वरवादी असुर , अब्राम्हण, लोकायत, अवैदिक है . जिन्हें वेदों के निंदक, नास्तिक कहा गया ह . नास्तिक जिन्हें कहा गया है मनुस्मृति के अनुसार
वो लोग मूलतः आर्येत्तर थ असुर थे.
स साधू भिर्वहिष्कार्यो नास्तिको वेदनिन्दक: ..११.. ८
जो नास्तिक दर्शन है उनके विचार परलोक नही मानते, भारतीय दर्शन का इतिहास भौतिकवादी बनाम कल्पनावाद का देख सकते है. Materialistic को जड़तावाद कहा गया है, लेकिन जो चीज मूलतः जड़ नही है, उसे जड़तावादी कैसे कह सकते है? विचार जो जड़ नहीं, तो उन्हें जड़तावाद में कैसे तोल सकते है? इसलिए materialistic को भौतिकवादी ही कहना ठीक होगा.


लोकायत चार्वाक का कोई भी एक ग्रंथ आज उपलब्ध नहीं या लिपिबद्ध भी नहीं है , इसलिए हमें लोकायत संस्था विरोधियों की टिका-टिपण्णी पर निर्भर रहना पड़ता है. लोकायत का लोगो में विस्तुतः होता गया शास्त्र (लोक +आयत ) ऐसा भी उल्लेख पाया जाता है. भारतीय दर्शन का इतिहास हम पूर्वपक्ष पर कड़ी कर के अपना उत्तर पक्ष खड़ा कर सकते है. दर्शन- दिग्दर्शन में राहुल सांकृत्यायन कहते हैं कि ,सिंधु सभ्यता असुर सभ्यता की भगिनी कही जा सकती है .९ इससे हम दावे के साथ कह सकते हैं, वेदों के पहले भी यहाँ एक संस्कृति वास करती थी. भारतीय दर्शन के इतिहास को मान्य करना होगा कि भारतीय आस्तिक दर्शनों का उदय नास्तिक दर्शनों के बाद हुआ है,१०मतलब उन्हें परास्त करने के उद्देश्य से यहा अपनी बस्तियां बसाने वालो वैदिकों ने अपने वेदों को जन्म दिया.

मातृवंशक काल में तंत्र का विकास हुआ तभी लोकायत का उगम देखा जाता है. लोकायत, किसी व्यक्ति का नाम था या लोगों के समूह का यह बता पाना मुश्किल है. लोकयत  नाम चार्वाक से प्राचीन है, लोकायत का उल्लेख पाणिनी ने (अष्ठयाध्यायी ४.२.६०) में किया है. तो कौटिल्य उसे 'शास्त्र' कहते है .
स्थापना क्षेप सिद्धान्त परमार्थज्ञना गतै: .
लोकायतिकमुख्यैश्च सामन्तादनुनादिनम् .. आदिपर्व (६४.३७)

एक लोकायत शास्त्र के आश्रम का उल्लेख महाभारत के आदि पर्व में है और उसमे यह दिखता है कि - खंडन, सिद्धान्त, आदि में जो श्रेष्ठ है, जो जाननेवाले लोकयत शास्रो के प्रमुखों की वजह से वो आश्रम परिचित हो गया है. इसी से मालूम होता है कि लोकयत एक शास्त्र है जो उच्चतम शास्त्र समझा जाता था. लोकायत चार्वाक राजा-महाराजा के दरबार में भी पाये जाते हैं . राजा जनक के दरबार का याज्ञवल्क्य एवं दुर्योधन का चार्वाक दोस्त. द्रौपदी भी लोकायत शास्त्र की जानकार थी. बृहस्पति लोकयत शास्त्र के आद्य प्रवर्तक, अर्थात प्रथम पुरुष थे. बृहस्पति आर्यो के रचित वेदों में वैदिक देवता, अर्थात सुरों के भी गुरु पाये जाते हैं. अगर बृहस्पति गुरु हैं तो वह निःसंकोच नीतिवान ही रहे होंगे, इसलिये वे सुरों का पक्ष छोड़कर असुरों के पक्ष में गए होंगे. इंद्र, ब्रह्मा, विष्णु की भोगलीला तो पुराणों में यत्र-तत्र दिखाई देती है. इसलिये बृहस्पति का लोकायत शास्त्र का विद्यार्थी प्रहलाद पाया जाता है. इससे लोकायत चार्वाकों का असुर होने का पुख्ता सबूत है. क्योंकि प्रहलाद असुरों के राजा थे. प्रल्हाद के आगे की पीढ़ी के सभी 'असुरराज'- विरोचन, बलिराजा, बाणासुर को इतिहास ने नीतिमान और समताप्रिय कहकर उनका गौरव किया है. तो दूसरी ओर बृहस्पति के बारे में यह भी सोच है कि जैसे प्रजापति और गणपति अनेक हुए हैं, उसी तरह से बृहस्पति भी हो सकते हैं. सभी असुरों- अवैदिकों ने वैदिक यज्ञयाग को नकारा थाबिनाडरे ने उसका विनाश भी किया था. इसकी एक लोकप्रिय कहानी भी है – दक्ष ने अपने यज्ञ में रूद्र को न्योता नही दिया तो रूद्र के गणों ने यज्ञ का नाश किया. मतलब अवैदिकों के मन में यज्ञ प्रति कोई आदर भाव नही था. 'बृहस्पतिमतानुसार नास्तिकशिरोमणिना चार्वाकेण'११ बृहस्पति मत के अनुसार चलने वाला नास्तिक शिरोमणि चार्वाक हैं. उन्होंने वेद पुराण अर्थात 'शब्द' प्रमाण को नाकारा है. जिसने- जिसने वेदों को नकारा, समता का पक्ष लिया, वेदों ने उन्हें नास्तिक कहा. उनको नास्तिक कहना सिर्फ वेदों का विरोध नही था, तो उनकी समानता का राज्य उनका नीतिवान रहना भी कारण रहा है. तो इससे यह भी प्रतीत होता है कि मातृवंशक समाज के राजा ने लोकायत शास्त्र को ऊँचाईयो पे लाकर रखा था. तो दूसरी ओर वैदिक आर्य, आर्य का दासप्रथा- समाज में मतलब स्वामी था. क्योंकि आर्यो ने यहा कि उन्होंने असुर राज्यो की जीतकर अपना राज्य प्रस्थापित किया. पशुपालक आर्यों ने यहाँ आकर खेती का नया तंत्र विकसित किया. उसका बेस उनको यहा के अनार्यो से ही लेना पड़ा. जबकि आर्य के पितृवंशक होने की वजह से उन्हें 'क्षत्र' और 'ब्रम्हन्' आदि मालूम नही था, इसी के वजह से उनके ही गण बांधव से नया वर्ण का उदय हुआ, जो कि  'वैश्य' नाम से परिचित है. उन्होंने दूसरे गणों को जीतकर यहाँ 'शूद्र' वर्ण प्रस्थापित किया  इस प्रकार आर्यो ने चातुर्वर्ण की नींव रखी. यहाँ के प्रजा को लुभाने के लिये और लोकायत तंत्र को पराजित करने के लिए वेदों की रचना की. वेदों में विश्व की निर्मिति भगवान की शक्तियों से हुई, ऐसा दिखाया गया. आत्मा का देह के बाद भी प्रवास रहता है. परलोक की कल्पना ,पुनर्जन्म की कल्पना, ऐसा ही बहुत सारा कूड़ा वेदों में भर दिया. सुप्रसिद्ध वेद निरुक्तकार यास्क, जिनका जन्म ईसापूर्व 500 का है, के निरुक्त में वेद एक तो अर्थशून्य है या आत्मव्याघातपूर्ण है, ऐसा बोलने वाला कौत्स का उल्लेख है, वेदविरोधी उसके मतों का सविस्तर खंडन किया है .१२ वेद मानना यानी शब्द को प्रमाण मानकर चलना, वहाँ अपनी स्वतंत्रता को बेचने समान ही है. और जो ऐसा शब्द प्रमाण मानकर चलते हैं उन्हें वेद आस्तिक कहते हैं. नास्तिक असुरो की वेदों ने निंदा की है.


आत्मा और परलोक 

वेद और वेदों के समर्थक आत्मा का देह से भी अलग अस्तित्व बताते हैं. उनकी मान्यता से देह का निर्माता और आत्मा का नियंत्रक भगवान है. जो परलोक से सभी को नियंत्रित रखते हैं. इंसान मरने के बाद आत्मा देह छोड़कर परलोक की राह चलता है.वेद आत्मा को नित्य मानते है . इसके उलटा चार्वाक का उपदेश है:
न स्वर्गो , न अपवर्गो वा न एव आत्मा पारलौकिक:.१३ ना तो स्वर्ग है, ना मोक्ष है, न अलग अस्तित्व रखने वाली आत्मा  न ही परलोक है. जब चार्वाकों ने इस कभी न दिखने वाले परलोक पर हल्ला किया तो आगे चलकर वेदों ने पुनर्जन्म को ही जन्म दिया. इस जन्म का पुण्य अगले जन्म में मिलेगा, इस तरह से पुनर्जन्म का ढोंग रचा. इसके उपर हमला करते चार्वाक अगर आत्मा ही नित्य नहीं,  तो वो कैसे जन्म लेगा यह भी पूछते हैं. और किसने भी अपने पुनर्जन्म का दावा नही किया. ‘देहस्य नाशो मुक्तिस्तु न ज्ञानान्मुक्तिरिष्यते’१४ शरीर का मृत्यु के बाद होई प्रवास नही है ; वेदों को ज्ञान कहा गया है. तो बृहस्पति कहते है - ज्ञान(वेदों) से कोई मोक्ष मिलने वाला नहीं , न तो आशा रखनी चाहिए. मनु - नास्तिक्यं वेदनिन्दा च देवतानांच कुत्सनम् .द्वेष दंभ्भ च मान च क्रोधं तैक्ष्, यंच वर्जयेतु ..१५ वेद, स्वर्ग  ईश्वर आदि को न मानने वालो को द्वेष छोड़ने को कहकर वेदों को प्रमाण मानने का सलाह वेद समर्थक देते हैं . चार्वाकों ने वेदों के भीतर लिखी सारी चीजें नकारी और वेदों से कुछ भी ज्ञान नही मिलेगा, ऐसी उसकी निंदा की है . 'भूतान निधनं निष्ठा स्रोतसामिव सागर' :.१६ मृत्यु ही देह का अंत है . यही देहात्मवाद असुर राज विरोचन के भीतर भी देखा सकते है .

महाभूत 

जो वेदों के निन्दक है वह आकाश की नित्यता सिद्ध करने का प्रयास करते दिखाई देते हैं. इसीलिये उन्हें नास्तिक कहा गया है. वेद एकमात्र ईश्वर को अनित्य बताते हैं. आकाश को जो नित्य मानता है, उसे वदो की भाषा में नास्तिक खा गया है. इससे यह प्रतीत होता है कि वेदों के सिद्धांत दृढ़ करने के लिये अनुमान आदि की सहायता को भी मना किया है. वेद विरोधी जो सिद्धांत है वह वेदों की दृष्टि में नास्तिक दर्शन है  विश्व की सभी चीजों को अनित्य मानना और एकमात्र आत्मा को ही नित्य मानना ये वेदों के प्रताप है. लेकिन आत्मा अनित्य है यह दर्शन का निर्देष चार्वाक करते हैं. इसीलिये आत्मा का शरीर से अलग भी अस्तित्व नकारने वालो को वेदों ने नास्तिक कहा. लोकायत चार्वाक चार महाभूत स्वीकार करते हैं, उन्हें ही सर्वस्व मानते है. ‘तत्र पृथ्विव्यादीनि भूतानि चत्वारि तत्वानि’ .१७ इन्हीं चारो भूतों के मिलन से शरीर बनता है. वह स्वयं प्रेरित है न कि उसका कोई उपरवाला नियंत्रक है. जिन्हें वेद परमेश्वर कहते हैं. लोकायत-मतानुसार मोक्ष को पाना है तो इसी जन्म में. मतलब मोक्ष यानी दुःख का निवारण और वो भी इसी जन्म में, क्योंकि दूसरा जन्म दूसरा नहीं है.मरने  के बाद इन्ही चार महाभूतों से बनी आत्मा देह बिना कुछ भी नहीं है. 'ननु पारलौकिकसुखभावे'१८ उसका प्रवास समाप्त हो जाता है, आत्मा का आगे का होई परलोक का प्रवास नही होता है. परलोक, स्वर्ग ,नरक ये सभी वेदों के शब्द-छल हैं,  जिनकी बुनियाद महात्मा फुले कहते है कि ब्राम्हण वर्चस्व लिए खड़ी की गयी है .
अत्र चत्वारि भूतानि भूमिवार्यनलोअनिलाः .
चतुर्भ्यः खलु भूतेभ्यः चैतन्यमुपजायते ॥१९
१.भूमि - शब्द, स्पर्श, रस, रुप, गंध
महाभारत वनपर्व में दिखता है कि 'भूमि:पन्न्चगुणा'
२.जल - शब्द , स्पर्श , रूप , रस
वनपर्व 'ब्रम्हन्नु दकन्न्च चतुगृणम्' २१०. ४-८
३.तेज - शब्द, स्पर्श, रूप
४.वायु – शब्द , स्पर्श
आदि पर्व में एक जगह वायु के गुणों का उल्लेख पाया जाता है .
'शब्दलक्षणमाकाश वायुस्त स्पर्शलक्षण'
आकाश- का एकमात्र गुण शब्द है, इसलिये उसको चार्वाक परंपरा ने नाकारा है कि वो प्रत्यक्ष प्रमाण की कसोटी पर खरा नही उतरता ना ही लोकप्रिय अनुमान कसोटी पर. लोकप्रिय अनुमान यानी लोगो के प्रत्यक्ष मतो पर विचार विमर्श करना.

आन्वीक्षिकी और प्रत्यक्ष प्रमाण

लोकायत चार्वाक के शास्त्र को आन्वीक्षिकी कहा गया है. आन्वीक्षिकी या तर्कशास्त्र (logic) का उल्लेख बहुत जगह पाया जाता है. शास्त्र मीमांसा में आन्वीक्षिकी विद्या का उपयोग किया जाता था. आन्वीक्षिकी अर्थात प्रत्यक्ष देखने के बाद अनुमान करना. लोकयत सिर्फ प्रत्यक्ष प्रमाण मानते हैं. जो ज्ञान तर्कशास्त्र और लोकप्रिय अनुमान की कसौटी पर खरा नही उतरता वह ज्ञान उन्होंने साफ नकारा है .
महत्तम अर्थशास्त्रकार कौटिल्य बताते है कि चार विद्या है-
आन्वीक्षिकी, त्रयी , वार्ता , दंडनीतिश् च इति विद्या :..
आन्वीक्षिकी अर्थात सांख्य , योग और लोकयत दर्शन , त्रयी याने वर्णजातिधर्म , वार्ता मतलब अर्थशास्त्र, और दंडनीति का मतलब राजकारण .२०
अहमासं पंडित को हेतुको वेदनिन्दक:.
आन्वीक्षिकी तर्कविद्यामनुरक्तो निरर्थिकाम् .. (शांतिपर्व १८०.४७-४९)


वेदों को नकार देने वाले शास्त्रो की निंदा की गई है. इंद्र -काश्यप संवाद में भी एक जगह आन्वीक्षिकी को निरर्थक कहा है. अर्थात अन्वीक्षा करके लोकायत चार्वाकों ने वेदों को नकारा था . महाभारत के शांति पर्व में राजा जनक ओर याज्ञवल्क्य का संवाद ऐसा पाया जाता है:  हे राजन यह आन्वीक्षिकी विद्या मोक्ष पाने के लिये, त्रयी वार्ता व दण्डनीति से भी बहुत उपयोगी है .
चतुर्थी राजशार्दूल विद्यैषा साम्परायिकी .
उदीरिता मयातुभ्यं पंचविंशादधिप्ठिता .. शांतिपर्व ३१८.३४
आयोध्याकांड में राम ने कहा है कि बहुत से अभिमानी पंडित मुख्य धर्म छोड़कर आन्वीक्षिकी ज्ञान के बल पर निरर्थक वाद-विवाद करते रहते हैं. यहां आन्वीक्षिकी शब्द का अर्थ 'नास्तिक लोकायत' विद्या है .

धर्मशास्त्रेषु मुख्येषु विद्यामानेषु दुर्बुधा:.
बुद्धिमान्वीक्षिकीं प्राप्य निरर्थ प्रवदन्ति ते .. अयोध्याकांड १०७.८

आन्वीक्षिकी विद्या का जानकार याज्ञवल्क्य वाद-विवाद में सभी को पराजित करके जनक से सोना और गाय इनाम में लेता है. तो यह समझ सकते हैं कि अन्वीक्षा करने का जबरदस्त हथियार चार्वाकों के हाथ में था, जिसकी आखिर तक वेदों की परास्त करने के लिये निंदा करनी पड़ी. वैदिक स्वतंत्र विचार करने के खिलाफ थे, उन्हें शब्द प्रमाण मान्य था तो चार्वाक स्वतंत्र-विचार धारा के लोग थे, जो शब्द प्रमाण बताने वाले वेदों की निंदा करते थे. प्रत्यक्ष अनुमान को महत्व देते थे . इसके द्वारा किसी भी चीज के बारे में निर्णय लेना यह तत्व स्वीकार किया गया है. जहां प्रत्यक्ष द्वारा वस्तु का निर्णय लेना कठिन हो, वहां अनुमान स्वीकार गया है लेकिन वह भी लोकप्रिय अनुमान, यानि जो अनुमान बहुत सारे लोगो ने अनुभव किया है . उसका कोई तो पुख्ता सबूत उनके हाथों में हो ऐसा लोकप्रिय अनुमान उन्हें स्वीकार है .

प्रत्येक्षणानुमानेन तथौपम्यागमैरपि . शांतिपर्व ५६.४

‘मानंत्वक्षजमेव हि’ लोकायत प्रत्यक्ष प्रमाण को ज्यादा महत्व देते थे. तो अनुभव जन्यज्ञान को अविद्या नास्तिकता का लक्षण कहा गया है जो कि शंकराचार्य का वेदांतभाष्य में शामिल है . बाष्काली बाध्व से ब्रह्मस्वरूप के बारे में पूछता है तो बाध्व उसे मौन से जवाब देते हैं . बाष्काली ने बाध्व से प्रार्थना की : 'भगवन मुझे ज्ञान दो. बाध्व शांत रहा. तो बाष्काली ने दूसरी बार फिर से कहा: 'भगवन मुझे ज्ञान दो. बाब्ध शांत रहा. तो बाष्काली ने तीसरी बार फिर से कहा: भगवन मुझे ज्ञान दो. बाब्ध बोला, मैं तो ज्ञान दे रहा हूँ लेकिन तुम ग्रहण करने में असमर्थ हो. आत्मा निःशब्द है. 'उपशान्तोयमात्मा' अनुसार प्रत्यक्ष प्रमाण अविद्या है. प्रत्यक्ष प्रमाण कुछ काम का नहीं है .


वर्णाश्रम की चीरफाड़

न स्वर्गो, नापवर्गो वा नैवात्मा पारलौकिक:.
नैव वर्ण-आश्रम-आदीनां क्रियाश् फलदायिका:..२१ ना स्वर्ग, ना मोक्ष, ना देह से दूसरा अस्तित्व रखने वाला आत्मा है. चार्वाक कहते हैं,, वर्ण आश्रम की सभी क्रिया निष्फल है .

तो वेदों के समर्थक आत्मा वर्णाश्रम इन सभी को उचित मानते है. 'धर्म-अपेतम' अर्थात 'धर्मविहीन'२२ यह उपदेश जाबाली नामक चार्वाक वनवासी राम को देता है, तो वासिष्ठ राम को उसका आचरण धर्म के अनुसार योग्य है, कहते हैं और आगे यह भी कहते है कि जाबाली का कहना कुछ भी वेद और वर्णाश्रम धर्म विरोधी नहीं है. तो इससे यह भी समझ में आता है कि ब्राम्हण लोकायत का भी उगम पाया जाता है.
अग्निहोत्र और पाखंडी वेद ब्राम्हण -
"द्वया वै देवो:. देवा अहैव देवा:. अथ ये ब्राम्हणा:..
श्रुश्रुवांसो नुचा नास्ते मनुष्यदेवा:..शतपत २-२-६..
इन वेदों के निर्माता ब्राम्हणों ने सिर्फ आकाश में ही देव बताये तो वो खुद को इहलोक के अर्थात भूदेव कहते है .
अग्निहोत्र त्रयो वेदास्त्रि दण्डं भस्मगुण्ठ नम्. बुध्दिपौरुषहीनानां जीविकेत बृहस्पति: ..२३

बृहस्पति के यह मतानुसार वेद केवल धूर्त लोगो के प्रताप हैं. अग्निहोत्र क्रिया आदि का उद्देश्य केवल पेट भरना है. अग्निहोत्र, तीनो वे , संन्यासी होना, और पूरे शरीर पर भस्म लगाकर साधु बनना, ये सारी चीजें-  उनके भीतर बुद्धिहीनता का परिचायक है. यह उनके अंदर का पौरुष्य नही है, यह तो केवल उनकी उपजीविका का साधन है.
कृषि,व्यापर,दंडनीति का उपदेश -
मनु कहता है
एकमेव तू शुद्रस्य प्रभु कर्म समादिश् त .
एतेषामेव वर्णानाम् शुश्रूषामनसूयया ..२४

अर्थात शूद्रों ने भोग करके अपने फल से अलिप्त रहने का बंधन डालना पसंद किया दिखाई देता है. व्यापार, व्याज लेना एकमात्र वैश्य का ही अधिकार माना जाता था जो कि ब्राम्हणों की उपज है. शूद्रों को सिर्फ ब्राम्हण क्षत्रिय और वैश्य इनकी सेवा करने का उपदेश दिया है. तो इस विषमता के बराबर उलटा समतावादी उपदेश चार्वाक देते हैं -
कृषिगोरक्ष्यवाणिज्यदण्ड नित्यादिभिर्बुढ: .
दृष्टैरेव सदुपायैर्भोगाननुभवेद भुवि ..२५

अर्थोत्पादन करने के लिए खेती करो, गोरक्षा करो, व्यापार करो और सामाजिक नीति बरकरार रखने के लिए दण्ड़ नीति का भी प्रयोग करो ऐसा भी सुझाव देते हैं. और आपने ही हिस्से का लाभ उठाओ, यह भीसंदेश भी देते है. इस से यही प्रतीत होता है कि चार्वाक नीतिमान थे. इसलिये तो महाभारत में प्रहलाद को नीतिवान 'तत्वनिष्ठ' कहा है (समसे रतम्) और उनके आगे की पीढ़ियों के बारे में भी इतिहास ने उनकी नीति और तत्वों की प्रशंसा ही की है.
फिर से अब हमे सोचना होगा
यावत् जीवेत् सुखं जीवेद् ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत् .
भस्मिभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः?२६


जब तक जीवन है तबतक सुख से जीओ, कर्जा लेकर घी पीओ. एक बार शरीर खत्म होने के बाद फिर से थोड़ी ही आने वाला है  इसमें लोकायत चार्वाक  खाओ, पीओ और मौज करो ऐसे संदेश देते दिखाई देते हैं. लेकिन एक चीज हमे भी ध्यान देना चाहिए कि जो चार्वाक हमने देखे इतने नीतिवान हैं, बुद्धिवादी हैं, अपने ही हिस्से का भोग लेने का सलाह देते हैं, वह चार्वाक ऐसा ऋण डुबोने वाला उपदेश कैसे कर सकते है? उनके उपदेश भोगवादी कैसे हो सकते है ? यह सोचना होगा. ऋण (कर्जा) डुबोने का धार्मिक आधिकार ब्राह्मण वर्ग को है  तो दूसरी ओर कर्जा डुबोने वाला वैश्य या व्यापारी वर्ग वो भी इसी ब्राह्मण नीति की ही उपज है. तो अब हमें सोचना होगा कि सही क्या गलत क्या?

भारतीय दर्शन का इतिहास स्त्री सत्ताक से आज तक का लंबा सफर है. उसमें हमेशा दो समूह  एक-दूसरे की आलोचना करते दिखाई देते हैं. एक वैदिक, दूसरा अवैदिक.  वैदिक आर्य परम्परा में वेद, ब्राह्मण,वेदान्त ,पुराण से आज के आरएसएस  को देख सकते हैं और अवैदिक परम्परा में  निऋति , तुळजाभवानी ,लोकायति बृहस्पति से प्रल्हाद, विरोचन, बलिराजा, महावीर, बुद्ध ,तुकाराम महाराज, शिवाजी महाराज, फुले, आंबेडकर से आज कॉ. शरद पाटील तक देख सकते हैं . लोग ये भी बोल सकते हैं कि, शरद पाटील दर्शन में कैसे ? जब हम अब्राम्हण-इतिहास के पन्ने देखेंगे तो उसमें कॉ. शरद पाटील एक व्यक्तित्व है, जिन्होंने यहां की प्रस्थापित व्यवस्था के विरोध में अब्राह्मण सौंदर्यशास्र, स्त्री सत्ताक कुल व्यवस्था से आगे बढ़कर सौत्रांन्तिक मार्क्सवाद(सौ.मा ) जैसे मजबूत हथियार यहाँ यहा क्रांति के लिए दिए हैं. इसीलिए जब आगे चलकर भारतीय दर्शन का इतिहास अपडेटे हो जायेगा तब  कॉ. शरद पाटील का नाम भी उस लिस्ट में हम पाएंगे. कॉ.शरद पाटील तक लिस्ट बढाने का यह प्रयोजन है कि घटककुल (clan) व्यवस्था के निम्न विकास अवस्था से शुरू हुई क्रांति प्रतिक्रांति की लड़ाई आज तक चल रही है. आगे भी चलती रहेगी. लेकिन हम उसमें हार नही मानेंगे.
ज्ञान ऐ बाती दिप जलाएंगे.
अंधेरे को चिरते सूरज बन जायेंगे.

संदर्भ सूचि :

१. भारतीय विवाह संस्थेचा इतिहास- वि.का.राजवाड़े पृ.२
२. मार्क्सवाद फुले-आंबेडकरवाद- कॉ.शरद पाटील पृ.२३३
३. जातिव्यवस्थाक सामंती सेवकत्व- कॉ.शरद पाटील पृ.१७०
४. जातिव्यवस्थाक सामंती सेवकत्व- कॉ. शरद पाटील पृ.१७२
५. तुळजापूरवासी भारतीबूवा के मठ की चौपट देखो
६. Outlines of indian philosophy by Prof.Hiriyanna मराठी अनुवाद भारतीय तत्वज्ञानाची रूपरेषा-                  भा.ग.केतकर पृ.१८३
७.   प्राचीन भारतमें भौतिकवाद ,पृ.१३१-१३२
८.  मनुस्मृति हिंदी अनुवाद-पंडित गिरिराज प्रसाद द्विवेदी प्रथम आवृत्ती अध्याय २ श्लो ११ पृ.२५
९.  दर्शन दिग्दर्शन –राहुल सांकृत्यायन पृ.३७६
१०..चार्वाक इतिहास आणि तत्वज्ञान-प्रा.सदाशिव आठवले लक्ष्मणशास्त्री जोशी प्रस्तावना पृ.3
११. सर्वदर्शनसंग्रह माधवाचार्यकृत मराठी अनुवाद- र.पं.कंगले पृ.५४
१२. Outlines of indian philosophy by prof.Hiriyanna मराठी अनुवाद भारतीय तत्वज्ञानाची रूपरेषा -                भा.ग.केतकर पृ.९४
१३. सर्वदर्शनसंग्रह माधवाचार्यकृत मराठी अनुवाद- र.पं.कंगले पृ.६३
१४ .सर्वदर्शनसंग्रह माधवाचार्यकृत मराठी अनुवाद- र.पं.कंगले पृ.५७
१५. मनुस्मृति हिंदी अनुवाद-पंडित गिरिराज प्रसाद द्विवेदी प्रथम आवृत्ती अध्याय ३ श्लो.१६३ पृ.१४२
१६. Outlines of indian philosophy by prof.Hiriyanna मराठी अनुवाद भारतीय तत्वज्ञानाची रूपरेषा                     अनुवादक-भा.ग.केतकर पृ.९८
१७. सर्वदर्शनसंग्रह माधवाचार्यकृत मराठी अनुवाद- र.पं.कंगले पृ.५४
१८. सर्वदर्शनसंग्रह माधवाचार्यकृत मराठी अनुवाद- र.पं.कंगले पृ.५६
१९. सर्वदर्शनसंग्रह माधवाचार्यकृत मराठी अनुवाद- र.पं.कंगले पृ.५७
२०. मार्क्सवाद फुले-आंबेडकरवाद - कॉ.शरद पाटील पृ.३३
२१. सर्वदर्शनसंग्रह माधवाचार्यकृत मराठी अनुवाद- र.पं.कंगले पृ.६३
२२. जातिव्यवस्थाक सामंती सेवकत्व .कॉ.शरद पाटील पृ.१२२
२३. सर्वदर्शनसंग्रह माधवाचार्यकृत मराठी अनुवाद- र.पं.कंगले पृ.५६
२४. मनुस्मृति हिंदी अनुवाद-पंडित गिरिराज प्रसाद द्विवेदी प्रथम आवृत्ती अध्याय १ श्लो ६१ पृ.१७
२५. सर्वदर्शनसंग्रह माधवाचार्यकृत मराठी अनुवाद- र.पं.कंगले पृ.६३
२६. .सर्वदर्शनसंग्रह माधवाचार्यकृत मराठी अनुवाद- र.पं.कंगले पृ.६३      

दलित स्त्रीवाद मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

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