युवाओं कों स्त्री-सच से रूबरू करता अनोखा पाठ्यक्रम

हेमलता यादव
युवा कवयित्री इंदिरा गांधी ओपन विश्वविद्यालय में शोध छात्रा हैं.   संपर्क :hemlatayadav2005@gmail.com

भारत ही नहीं संपूर्ण विश्व के इतिहास में महिलाऐं कभी शोषण के विरुद्ध तो कभी सामाजिक, राजनीतिक व आर्थिक स्वतंत्रता और सहभागिता के लिए अनवरत, संधर्ष करती आई है। यह संघर्ष आज भी जारी है क्योंकि आधुनिकता, भूमंडलीकरण और विज्ञान एवं प्रोधोगिकी के विकास ने महिलाओं के विरुद्ध शोषण कम नहीं किया अपितु शोषण के तरीको में परिवर्तन अवश्य किये हैं । पितृसत्ता की नीव पर लिंग विभेदीकरण, राजनितिक सहभागिता पर प्रश्नचिन्ह, घरेलू हिसां, यौन हिंसा, देह व्यापार  सभ्य समाज के गलीचे तले अपना जाल फैला रहे है। जहां कुछ समय पूर्व तक कन्या को जन्म लेने के पश्चात मारा जाता था वही अब उसे अल्ट्रा साउड जैसी आधुनिक तकनीक से भ्रूण  अवस्था में ही मार दिया जाता है आधुनीकरण ने तथाकथित सभ्य लोगो के अति अमानवीय चेहरे को नकाब पहना दिए।

कानूनों के निर्माण से भी धटनाओं की तीव्रता में कोई कमी नही आई है इन समस्याओं अथवा संघर्षो के हृदय विदारक वर्णन के गवाह पिछले दशकों के आंदोलन एंव समाचार पत्र हैं। सामाजिक परिवर्तन समाज के अस्तित्व में आने के साथ ही प्रारम्भ हो गया था पंरतु स्त्रियों की स्थिति में परिवर्तन की गति तीव्र नहीं रही; स्त्रियों के लिए आज भी समाज वही संकीर्ण विचारधारा रखता है | समाज में परिवर्तन शिक्षा में परिवर्तन का कारण बनता है उसी प्रकार शिक्षा में परिवर्तन सामाजिक परिवर्तनों का आधार बनता है; एक समय था जब औपनिवेशिक भारत में प्रथम महिला डाक्टर कादम्बिनी गांगुली को उस समय की रुढ़िवादी पत्रिका ने वेश्या करार दिया था; जिन्होने 1886 में फिलाडेल्फिया के वूमेंस मेंडिकल कालेज में स्नातक की उपाधि ग्रहण की थी । धीरे-धीरे शिक्षा ने ही स्त्री की सामाजिक स्थिति में परिवर्तन लाना आरंभ कर दिया पंरतु कन्या भूर्ण हत्या, शील भंग, धरेलू हिंसा, यौन शोषण के आंकडे प्रत्यक्षदर्शी है कि अपनी बहुआयामी भूमिका, श्रम बल, राजनीतिक, सामाजिक एंव आर्थिक सहभागिता के बावजूद भारतीय महिला एक असुरक्षित एंव शोषित वर्ग का प्रतिनिधित्व करती है । ऐसे में शिक्षा व्यवस्था का कार्यभार दोहरा हो जाता है । लैंगिक समानता, स्त्री प्रखर विद्रोह, नारीवादी आंदोलनों, स्त्री उन्मुख साहित्य को शिक्षा प्रणाली में उपर्युक्त स्थान प्रदान कर युवा वर्ग के मानसिक पटल पर स्त्रियों के लिए सम्मान एंव समानता अंकित करने का साधन शिक्षा बन सकती है । इस संबध में सराहनीय कदम दिल्ली विश्वविधालय में प्रथम वर्षिय स्नातक शिक्षा के अंग्रेजी सहित्य के संकलन में दृष्टीगोचर होता है ।
   
 सलमान रुश्दी की कहानी  “हारुन एंड द सी आफ स्टोरीस” में परिवारिक अकेलेपन  और निर्जनता को महसूस करती स्त्री की विडम्बना को दर्शाया है। इस कहानी में सुरैया अपने पति रशीद की व्यस्तता से आहत होती गई। उसने गाना बंद कर दिया, उदास रहने लगी और अंत में मि. सेनगुप्ता  की व्यवहारिक बातों मे उलझकर अपने परिवार को छोड़कर चली गई। अपने पति रशीद के लिये उसके द्वारा छोड़े शब्द थे ” तुम आंनद के पीछे भागते हो, पर एक सही व्यक्ति को पता होता है कि जीवन एक गम्भीर काम है। तुम्हारे दिमाग में झूठी बनावटी बाते भरी है इस कारण उसमें तथ्यों के लिए कोई स्थान नही बचा है। मि. सेनगुप्ता के पास कोई कल्पना नहीं पर वह मेरे लिए हितकर है  हारुन को बता देना कि मुझे उससे प्यार है, पर मैं विवश हूँ, मुझे अब घर छोड़कर चले जाना ही जरुरी है.” सुरैया  का यह कदम सामाजिक रुप से स्वीकार्य न हो पंरतु परिवार में एंकात भोगती उपेक्षित पत्नी द्वारा उठाया गया यह कदम संभतः उसकी मजबूरी का घोतक है ।


 “गर्ल्स” कहानी में लेखिका मृणाल पांडेय न केवल बच्चियों बल्कि महिलाओे द्वारा झेले जाने वाले लिंग अन्याय का वर्णन एक आठ वर्षीय बालिका ‘मिली’ की दृष्ट्रि से करती है। कहानी की पक्तियाँ जैसे “तुम्हारा जन्म लड़की के रुप मे हुआ है तुम्हे सारी जिंदगी ऐसे ही झुककर प्रणाम करना है इसे अच्छे से सीख लो” एवम “कम से कम इस बेचारी को यहाँ तो थोड़ा आराम करने दो” ,”हम स्त्रियों को ऐसे ही पीड़ा सहनी पड़ती है‘‘ बालिका के मन में द्वन्द उत्पन्न करती हैं | ये सब कथन बालिका के मन में प्रश्न उत्पन्न करते है कि “क्या चिडिया माँ भी यही सोचती होगी कि उसकी चिरैया बेटी चिड्डे से कमतर है”। मिली का नरखट, चतुर, उत्सुक एंव विरोधी स्वभाव, उसके द्वारा पूछे गये स्वभाविक पंरतु तीक्ष्ण प्रश्न समाज में लेंगिक असमानता के प्रति रोष उत्पन्न करते है ।

सलीम पेरादीना की कविता “सीस्टर्स” पिता की दृष्टि से दो भिन्न आयु वर्ग की बहनो के बीच संबधो का वर्णन करती है । इस कविता में बड़ी बहन चीख कर अन्याय का प्रतिरोध करते हुए लड़कियों को सिखाये जाने वाली पारम्परिक सीख को नकार देती है कि उसे विनित तथा आत्म त्यागी होना चाहिए । वह पिता को पक्षपाती रुख के लिए दोषी ठहराती है यह कविता पिता की सत्ता, आयु के विरोधाभास और समाज में महिलाओं के स्वर को पक्षपात पूर्ण दबाने के उस गुण को दर्शाती है जो लड़की होने के नाते आदत स्वरुप विरासत में प्राप्त होती हैं। बड़ी बहन का क्रोध मे उबलता मौन पिता को खुशी भी देता है कि अब उसकी बेटी ने अनुचित व्यवहार को चुनौती देने की र्निभिकता हासिल कर ली है ।

हरिशंकर परसाई द्वारा लिखित “अ टेन डे फास्ट” लोकतंत्र एंव विरोध करने के लोकतांत्रिक उपायो पर एक व्यंग्य रचना है जहाँ कुछ लोग लोकतंत्र, जनमत के जाति, धर्म  बाहुबल दुरुपयोग के लिए विभिन्न स्ट्रेटीज अपनाते हैं,  साथ ही यह लेख महिलाओं की स्थिति एंव उनकी इच्छा के महत्व पर व्यंग भी है । इस कहानी का नायक बन्नू, रांधिका बाबू की पत्नी सावित्री पर 16 वर्षो से आसक्त है और किसी भी हाल में उसे पाना चाहता है । वह उसे बलात भगा ले जाने का भी प्रयास करता है पंरतु सावित्री उसके प्रयासों को विफल कर देती है। ऐसे में उसकी मुलाकात बाबा सनकीदास जैसे तिकड़मबाज राजनीतिज्ञ से होती है जो गाँधी जी के अहिसंक उपाय अमरण अनशन का उपयोग बन्नू की नाजायज मांग को पूरा करने के लिए करते है। कहानी के एक प्रसंग में सावित्री जब आग बबूला होकर बन्नू के तम्बू में जाती है और पूछती है कि इस प्रकार की अनुचित माँग करने से पहले उसकी सम्मति क्यो नहीं ली तब बाबा सनकीदास कहते है कि सावित्री तो मात्र विषय है । कोई भी व्यक्ति विषय से अनुमति नहीं लेता उदाहरण देते हुए वे कहते है कि “गौ-रक्षा अभियान से जुडे किसी भी साधु या नेता ने अपना अभियान आंरभ करने से पूर्व गाय से अनुमति नहीं ली थी” । यहाँ हम देखते हैं कि समाज में महिला को मात्र विषय अथवा निरिह पशु के समकक्ष रखा जाता है । बन्नू को प्रोत्साहित करते हुए बाबा सनकीदास कहते है कि इस उपवास में तुम्हारी सफलता अन्य अनेक व्यक्यिों के लिए सहायक होगी जो दूसरों की पत्नियों को हथियाना चाहते है । सावित्री को सामाजिक अपमान सहना पड़ता है वह बन्नू को राखी बांधने का प्रयास करती है तो कभी आत्महत्या की चेष्टा करती है पंरतु बाबा सनकीदास की रणनीति, अनुत्तरदायी मीडिया ( जिसे केवल सनसनीखेज मुददों की तलाश रहती है तथा अज्ञानी जनसाधारण विफल कर देते है) । सावित्री के घर पर पत्थर बरसाये जाते है और उसके पति को मारने की धमकी दी जाती है । परसाई जी ने दिखाया है कि किस प्रकार बन्नु की वासना से लिप्त अनुचित मांग लोकतंत्र के अनुचित उपयोग से सिद्धांत का रुप ले लेती है और एक कायर, गुण्डे लालसी व्यक्ति को जनता नायक बनाकर पूजती है । लोकतंत्र का किस प्रकार अनुचित  उपयोग किया जाता है इस कहानी में हास्य द्वारा परसाई जी विश्लेषित करते हैं.


सुब्रतो बागची की आत्मकथा से लिया गया अंश “गो किस द वलर्ड” में लेखक माँ के प्रेम, त्याग एंव शिक्षा को परिभाषित करता है | कहानी में बागची की माता उसे सौन्दर्य का निर्माण करना सिखाती है । वे स्वंय मेहनत से अपने सरकारी आवास का सौन्दर्य निर्माण करती है यह जानते हुए भी कि उस सौन्दर्य को देखने से पहले ही उनके स्थानान्तरण के आदेश आ जायेंगे । उनका कहना था कि “मुझे तो मरुस्थल में फूल खिलाना है और जब भी मुझे नया घर मिलेगा मे उसे पहले की अपेक्षा अधिक सुन्दर बना कर छोडूंगी”। अपने लिए सौन्दर्य का निर्माण सब करते है पंरतु बागची की माता जी ने सिखाया किस प्रकार दूसरो के लिए सौन्दर्य एंव खुशी छोड़ी जा सकती है । मोतियाबिंद के कारण नेत्रों की रोशनी गंवा देने के बावजूद उन्होने लेखक को बंद आखों से प्रकाश देखना सिखाया किस प्रकार एक छोटे से गाँव में रहते हुऐ उन्हें पूरी दुनिया की चिंता रहती थी । 80 वर्ष की आयु तक वे अपने सारे कार्य स्वंय करती थी। उन्होने लेखक को स्वावलम्बन की नई परिभाषा और अंधरे में प्रकाश को प्रज्जवलित करने की कला सीखाई । 82 वर्ष की आयु में जब माता को पक्षाधात हुआ तब भी उन्होने लेखक को काम पर वापिस जाने की सलाह दी लकवाग्रस्त स्थिति में अपने अस्पष्ट स्वर में उन्होने कहा “तुम मुझे क्यो चूम रहे हो, जाओं समस्त संसार को चूमो”। लेखक की माताजी ने उन्हे सिखाया कि किस प्रकार तात्कालिक कष्ट से ऊपर उठकर कल्पनाओं को उड़ान देना, प्रत्येक तबके के लोगो के प्रति आदर भाव, विशाल संसार के साथ संबंध और जीवन में लेने की अपेक्षा देने की भावना साधारण लोगो को आसाधरण सफलता दे सकती है ।

स्त्री पहलु से जुड़ा अगला अध्याय “हिटिंग डाउरी फोर ए सीक्स” कल्पना शर्मा द्वारा लिखित यह लेख 1 जून 2003 को प्रतिष्ठित अखबार ”द हिन्दू“ में छपा था । इस लेख में सत्यारानी चड्डा एंव निशा शर्मा के दहेज विरोधी अभियान के कुछ महत्वपूर्ण मसलों का वर्णन किया  गया है । सत्यारानी चड्डा ने 1970 के अतिंम दशक में दहेज के विरुद्व तब आवाज उठाई जब उनकी पुत्री को दहेज के कारण तमाम् यातनाएं देकर मार डाला गया । नोएडा की निशा शर्मा ने उस समय शादी से इन्कार कर दिया जब दहेज की मांग एक सीमा से ऊपर हो गई । लेखिका यहाँ यह प्रश्न उठाती है कि दहेज की न्यायोचित मांग की सीमा क्या है । निशा शर्मा ने विरोध उस समय जताया जब दहेज की मांग  उनके सामर्थ्य से बाहर हो गई | दहेज की कुरीति महिलाओं के शोषण के कई मुददों की जड़ है । दहेज के नासूर के खिलाफ लड़कियों को दो शस्त्र सशक्त करते है -शिक्षा और माता-पिता का समर्थन ।

हालांकि केरल जैसे शिक्षा से परिपूर्ण राज्य मे भी दहेज जैसी कुप्रथा अपने पैर पसारे हुए है। लेखिका कहती है कि हमारी संस्कृति में जहाँ पुत्र को अधिक महत्व दिया जाता है, समाज में पुरुष वर्चस्व है दहेज प्रथा का उन्मूलन अभी दूर है और यह तब-तक नही हो सकता जब तब लड़कियां स्वयं दहेज को “ना” कहना नहीं  सीख जाएं और लड़के यह विश्वास एंव गर्व करे कि लड़कियों की कम होती जनसंख्या में यदि पत्नी मिल रही है तो यह एक विशेषाधिकार है। यह लेख इस बात पर भी रोशनी डालता है कि महिला को बोझ समझना समाज की संकीर्ण मनोस्थिति की परिचायक है । शिक्षित युवक भी यह कहने में गर्व महसूस करते हैं  कि उनकी व्यवसायिक शिक्षित कार्यरत भावी पत्नी विवाह के बाद नौकरी से त्याग पत्र दे देगी | स्त्री के भाग्य को घर की उन जिम्मेदारियों तक सीमित रखा जाता है जहाँ वे आर्थिक रुप से सबल नही बन पाती । लड़की पति के परिवार पर बोझ नही बल्कि सम्पत्ति है वह घर के कार्यो में मदद करती है, परिवार के सदस्यों की सेवा करती है, अतः यह आवश्यक नही कि अपने साथ दहेज लेकर आए । दहेज की अवधारणा हमारी संस्कृति की नाकारात्मक प्रवृति एंव समाज की रुग्ण मनोवृति का परिणाम है इसके हल स्वयं लड़कियो के सशाक्तिकरण पर निर्भर है यदि लड़किया नौकरी के क्षेत्र में एंव शिक्षा के क्षेत्र में लड़को को पछाड़ सकती है तो दहेज को भी हिट करके सिक्स मार सकती है .


मंजू कपूर का ”चाकलेट“ तारा के वैवाहिक जीवन के उतार-चढाव की कहानी है । यह कहानी विवाह की गग्भीर परिस्थितियों में स्त्री के आस्तित्व की कहानी है, हांलाकि तारा द्वारा अपने वैवाहिक जीवन को सुदृढ रखने के लिए किए गये उपाय कहानी को व्यंग्यात्मक  बनाते हैं, पर शादी के रिश्ते को बचाने के लिए शायद उसके पास कोई अन्य रास्ता नही बचता इसलिए वह पहले स्वंय अपने मोटापे को दूर करती है फिर अभय को स्वादिस्ट खाना खिला-खिला कर मोटा कर देती है, जिसके कारण अभय को अपनी प्रेमिका से हाथ धोना पड़ता है। तारा का पहला बदला पूरा होता है क्योकि अभय उसे स्वादिष्ट चाकलेट खिलाता था फिर मोटापे के कारण अभय तारा में रुचि खो बैठा और उसके जीवन में दूसरी महिला आ गई। दूसरी समस्या उसके संतान रहित होने की थी.

 चिकित्सक ने तारा को सामान्य पाया था पंरतु अभंय ने अपनी रिपोर्ट कभी तारा को नहीं दिखाई बल्कि तारा को अपमानित करता रहा । तारा ने अपना बदला पूरा करने के लिए अभय के मिंत्र से प्रेम -प्रंसग चलाया और गर्भवती हो गई, पंरतु मां बनने के बाद ही उसने अभय के मित्र से किनारा कर लिया अतः अभय को कभी भी उसके प्रेम प्रसंग के बारे में पता नही चल सका। अपनी बेटी को गोद में लेते हुए तारा ने प्रण किया कि वह अपनी बेटी को शिक्षित एंव आर्थिक रुप से स्वतंत्र बनाएगी ताकि वह उस आर्थिक भय से मुक्त रहे, जो उसे अभय द्वारा त्यागे जाने के डर से तारा को हुआ। भारतीय समाज मे बच्चे का जन्म ही विवाह का परिणाम माना जाता है।

संतानोत्पति में अक्षम हाने का श्रेय तारा को जाता है उसे धर्मिक स्थलो पर माथा टेकने, विभिन्न प्रकार के राशि पत्थर पहनने पड़ते हैं, जबकि कमी अभय में है तारा अभय पर निर्भर है इसलिए वह शुरुआत में अपने जिददी, अनुत्तरदायी व निष्ठाहीन पति के अनैतिक जीवन को चुपचाप सहती है फिर सोच समझ कर रणनीति बनाकर उसे दण्ड देती है जब चाकलेट की दीवानी तारा को अभय द्वारा लाई चाकलेट उसके धेाखे के जहर के कारण बेस्वाद बुरादे जैसी लगने लगती है ।

एस. उषा की कविता ‘टू मदर’ भारत के लगभग हर उस घर की लड़की की आवाज है जो अपनी यौवन की आयु आने पर मां की वर्जनाओं, चेतावनियों का सामना करती है ‘ऐसा करो‘, ‘ऐसा मत करो‘ के आदेश कविता में सत्रह वर्षीय पुत्री को विरोधी बना देते है । इस आयु मे पुत्री स्ंवतंत्र होना चाहती है वह नही चाहती कि उस पर पडती धूप को माँ अपने आंचल से रोके और वह सूर्य के प्रकाश और हवा के अभाव में वह माँ की तरह विछिन्न हो जाए। वह नही चाहती कि जिस पंरपरागत धुन पर उसकी, माँ, नानी ने अपने सिर हिलाए वह भी ऐसा ही करे। वह तो अपनी शक्ति अपना विष किसी व्यक्ति पर आजमाना चाहती है, न कि मछली की तरह युगो-युगो से चली आ रही, परपराओं के धुमावदार वकृ में चक्कर काटती रहे । लड़की की इच्छा है कि वह तेज बाढ़ भरी नदी की तरह वर्जनाओं के प्रत्येक बांध को तोड़कर बह निकले और अपना मार्ग स्वंय बनाए। विद्रोही पुत्री, मां के आदर्शो को चुनौती देती हुई स्वतंत्रतापूर्वक जीवन जीने का अनुगृह करती है। किशोर लड़की अपनी माँ को संबोधित करने हुए पितृसतात्मक गुलामी का विरोध करते हुए कहती है कि विनम्र और सुशील बने रहना, लड़कों जैसे उदृड़ता न करना, राहगीरों से प्रणय चेष्टाएँ न करना जैसी माँ की आचरण संहिता उसकी हर आशा, सपने और कामनाओं की हत्या कर देगी ।


“सोपनट लीवस” एक आठ वर्षीय दलित लड़की गाविरी के विद्रोह की धटना है । दो दिन की भूखी गाविरी चने के खेत मे धुसने ही हिम्मत इसीलिए नही जुटा पाती क्योकि वह गरीब मजदूर की बेटी है । हाथ में झाडू और टोकरी लिए जलावन की लकडिया एकत्र करती है। वर्ण अंतर, आर्थिक असमानता से उत्पन्न मजबूरीयां, बालिकाओं पर परिवारिक जिम्मेदारियों का बोझ डाल देती हैं। भूखी गाविरी की विवशता के दृश्य इस अध्याय में  खुबसूरती से उकेरे है । अध्याय का सबसे झंझावत पहल गाविरी द्वारा अपनी सच्चाई और आत्मसम्मान के लिए उठाई गई आवाज है जब उच्च धनी वर्ग का प्रतिनिधि क्रूर जमींदार निर्दोषिता सिद्ध करने के उपरांत भी उस पर प्रहार करता रहता है तो वह रोना छोड़कर सारे गांव पर एकछत्र रौब जमाने वाले जमींदार पर गालियों की बौछार कर देती है । हालांकि इसका परिणाम जमीदार खड़ाऊँ से उसकी टांग पर चोट करके करता है पर छोटी बच्ची का अदम्य साहस विशेषाधिकार प्राप्त लोगो के विरुद्व नए प्रभात की रणभेरी का आगाज है।

 “लेम्बो टू द स्लोटर” रोल्ड दाही द्वारा लिखी गई एक जासूसी व्यंग्य रचना है कहानी की नायिका मेरी मेलोनी पूर्णतः अपने पति पैट्रिक मेलोनी के प्रति समर्पित थी । अपने पति से निकटता उसके लिए आंनद का सबसे बड़ा स्रोत्र थी । प्रैटिक द्वारा अपने जीवन में किसी दूसरी स्त्री के होने की संभावना दर्शाना और मेरी को तलाक देने का निर्णय सुनाने का आधात उसके मानसिक संतुलन को स्तब्ध कर देता हैं और इस सदमे के आवेश में उसके द्वारा पति की हत्या हो जाती है। सदमें से उबरने पर अपने अजन्मे बच्चे के भविष्य के बारे मे सोचती है और चालाकी एंव सूझबूझ से स्वंय को पुलिस से बचाती है । यह एक साधारण पत्नी द्वारा जासूस पति को धोखे का बदला एंव पुलिस से स्वयं एंव अपने अजन्में बच्चे को बचाने वाली छोटी किंतु प्रवाहपूर्ण कथा है ।

रीटा-एन-हिंगिस की कविता “सम पीपुल” एक गरीब स्त्री की उत्कंठा, विवशता और पीड़ा की दांस्तान है। एक प्रताड़ित माँ अपने बच्चों के सामनें गंदी गाली सहती है, कर्जदारों के आगे झुठ बुलवाती है, गरीब, अपमानित, सरकारी भत्तों पर अश्रित महिला सरकार द्वारा जारी कल्याणकारी योजनाओं के असफल क्रियान्वन की शिकार है। एक माँ द्वारा बच्चों के सामने शर्मीदगी, अपमान, लाचारी का सामना किया जाना समाज, सरकार और उच्च एंव धनाहय वर्ण की संवेदन हीनता का परिणाम है ।


इस पुस्तक के अतिम अध्याय “रुट एंड एस्केप रुट” की नारी पात्र हेमा एक उच्चजाति की महिला है, जो समाज के विरोध के बावजूद एक दलित प्रोफेसर सतीश गोडधाटे से विवाह करने का साहस करती है । वह जातीगत राजनीति का भी विरोध करती है एक सशक्त चरित्र के साथ वह गलत का समर्थन देने से इन्कार करती है; चाहे इसके लिए उसे अपने परिवार के बुजुर्ग काका से विरोध का सामना करना पड़ता है वह अपना मत अवश्य प्रकट करती है।

दिल्ली विश्वविधालय बी. ए. प्रथम वर्ष के अंग्रेजी पाठृक्रम का लगभग प्रत्येक अध्याय युवाओं के समक्ष स्त्री व्यवहार, समस्याओं, विद्रोह, दृढता, प्रेम, विवशता, सृजन आदि के विभिन्न सोपानो को गढ़ता है। पाठ्यक्रम में इस प्रकार का स्त्री उन्मुख साहित्य समाज में स्त्री के स्थान को युवाओं के समक्ष सुदृढ़ करने में सहायक है अन्य विश्वविधालयी पाठ्क्रमों में भी इस प्रकार की पहल की आवश्यकता है क्योंकि उच्च शिक्षा गृहण करने के साथ युवा वर्ग समाज में अपनी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों का वहन करने के लिहाज से भी परिपक्व होते हैं ।

संदर्भ

फ्लुएंसी इन इगंलिश, बी.ए. प्रोग्राम 1 ( दिल्ली युनिवर्सटी )

दलित स्त्रीवाद मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

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