हिन्दी नवजागरण और स्त्री

अंजली पटेल
,गुजरात केंद्रीय विश्वविद्यालय में शोधरत
है. Email : anjalipatelbindki@gmail.com


नवजागरणएक कालवाची शब्द है, जहाँ इसकी पृष्ठभूमि विभिन्न आन्दोलनों से जुड़ती है तो वहीं स्त्री उत्थान की दृष्टि से भी यह कालखण्ड अपना विशेष महत्त्व रखता है।नवजागरण शब्द के अर्थ पर यदि विचार किया जाये तो हमें ‘नवीन चेतना’ का बोध होता है।यह चेतना किस प्रकार उस समय और समाज को प्रभावित कर रही थी? इस चेतना को विकसित रूप प्रदान करने में किन-किन साहित्यकारों एवं समाजसुधारकों का योगदान रहा है?उस समय ही इस चेतना के जागृत या विकसित होने की आवश्यकता क्यों हुई?क्या नवजागरण को स्त्री उत्थान के प्रस्थान बिन्दु के रूप में देखा जा सकता है?यहाँ नवजागरण को लेकर इन सब पक्षों पर विचार करना आवश्यक हो जाता है। उस समय समाज में साहित्य, संस्कृति और कला के क्षेत्र में स्त्रियों का भी योगदान कम महत्वपूर्ण न था। स्त्रियों ने उस समय हो रहे आन्दोलनों में बढ़चढ़ कर भाग लिया।यह वह दौर था जब स्त्रियोंपर वर्षों से हो रहे अत्याचार पर समाज सुधारकों का ध्यान गया और उन्होंने उनके अधिकारों को महत्त्व दिया। इसके लिए उन्होंने कई आन्दोलन किए, जिसमें न सिर्फ पुरुष, बल्कि खुद स्त्रियाँ भी खुलकर सामने आईं। इन स्त्री समाज सुधारकों के रूप में पण्डिता रमाबाई, ताराबाई शिंदे एवं रख्माबाईअग्रणीय हैं।

नवजागरण का आरम्भ 1857 ई. के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से माना जाता है। इस समय ही स्त्रियों द्वारा अपने अधिकार के लिए पूरे विश्व में एकजुट होकर आन्दोलन किया गया था। यही कारण है कि स्त्रियों द्वारा अपने हक़ के लिए सामूहिक रूप से किए गये इस प्रथम प्रयास को ‘अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस’ के रूप मं  मनाया जाने लगा।भारत में नवजागरण का उदय सबसे पहले बंगाल और महाराष्ट्र राज्य में हुआ। बंगाल और महाराष्ट्र के समाज सुधारकों ने ही सबसे पहले समाज में फैली बुराइयों पर आव़ाज उठाना शुरू किया। इन समाज सुधारकों में राजाराममोहन राय, महादेव गोविन्द रानाडे, ईश्वरचन्द्र विद्यासागर, स्वामी दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानंद और केशवचन्द्र सेन आदि को देखा जा सकता है।नवजागरण शब्द का हिन्दी में पहली बार प्रयोग करने का श्रेय मार्क्सवादी आलोचक ‘रामविलास शर्मा’ को जाता है, जिन्होंने 1977 ई. में प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘महावीर प्रसाद द्विवेदी और नवजागरण’ में नवजागरण शब्द की संकल्पना प्रस्तुत की है, यह शब्द उन्होंने अंग्रेजी शब्द ‘रेनेसां’ के पर्याय में प्रयुक्त किया है।भारत में नवजागरण का जनक ‘राजाराम मोहन राय’ को माना जाता है,जिन्होंने सती प्रथा,बाल विवाह,पर्दा प्रथा आदि घातक और अनिष्टकारी कुरीतियों का विरोध किया। हिन्दी नवजागरण काल से स्वामी दयानन्द सरस्वती जी का संबंधभी महत्वपूर्ण है। हिन्दी के विकास में उनका योगदान बहुत अधिक है एवं अन्धविश्वासों और रूढ़ियोंसम्बन्धी मतों का उन्होंने विरोध किया है। इस प्रकार हिन्दी नवजागरणमें स्वदेशीयता की भावना को उजागर करना,धार्मिक अन्धविश्वासों का विरोध करनाएवंसमाज सुधारआदि सभी बातें दिखाई पड़ती हैं।

नवजागरण में समाज में स्वतंत्र अस्तित्व की धारणा परिलक्षित होती है, जिसमें व्यक्ति विकास की ओर उन्मुख होता है।इस समय न केवल पुरुष, बल्कि स्त्रियों में भीअपने अधिकारों के प्रति जागृत भाव पैदा होता है। यही भावना विकसित होकर एक चेतना का रूप ले लेती है, जो नवजागरण में स्त्री उत्थान का प्रमुख कारण बनती है।चाहे वह 1829 ई. में सती प्रथा पर प्रतिबंध लगना हो या 1856 ई. का विधवा पुनर्विवाह कानून का पारित होना हो या फिर चाहे 1857 ई. की क्रान्ति, सब इसी चेतना का परिणाम हैं। नवजागरण में उपजी यह नई चेतना समाज में हर स्तर पर धीरे-धीरे अपना प्रसार कर रही थी। सामाजिक राजनीतिक, सांस्कृतिक व आर्थिक पहलू इससे प्रभावित हो रहे थे।पश्चिमी ज्ञान-विज्ञान से प्रभावित एक नया बुद्धिजीवी वर्ग तैयार हो रहा था। इस बुद्धिजीवी वर्ग की आकांक्षाएँ पहले से काफ़ी भिन्न थी, जो कि ख़ुद हर तरफ़ बदलाव चाह रहा था। इस नये वर्ग को स्त्रियों की स्थिति में भी कुछ बदलाव की ज़रूरत महसूस हुई। इस नये वर्ग की आकांक्षाओं के अनुरूप स्त्रियों को ढ़ालने के लिए उनकी स्थिति में परिवर्तन करना आवश्यक था।यह परिवर्तन कुछ विशिष्ट गुणों, स्वभाव और विशेषताओं से युक्त स्त्री के रूप में परिलक्षित हो रहा था।लेकिन यहाँ पर ध्यान देने योग्य बात यह है कि उन्हें उस समय ही स्त्रियों की स्थिति में सुधार लाने की आवश्यकता क्यों महसूस हुई?इससे पहले ऐसा प्रयास क्यों नहीं किया गया?इसको जानने के लिए राधा कुमार का यह कथन देख सकते हैं- “स्त्रियों की शिक्षा के आन्दोलनों का उल्लेख आम तौर से उभरते मध्यवर्ग द्वारा अपनी स्त्रियों को पाश्चात्य तौर-तरीकों में ढ़ालने की आवश्कता के रूप में किया जाता है।ब्रिटिश शिक्षा के प्रसार और पुरुषों को रोजगार के नए अवसरों के मद्देनज़र सार्वजनिक तथा निजी का विचार पैदा हुआ तथा दोनों के समन्वय स्थापित करने के बजाय, घर और संसार के बीच विरोध के स्वर उभरे। स्पष्ट शब्दों में कहा जाये तो घर एक पुण्य स्थान होने के बजाय परम्पराओं का मुर्दा बोझ ढ़ोता नज़र आया, जिसे फूहड़ और आदिम कहकर धिक्कारा गया।अतः इसे सुधारकर बाहरी दुनिया के साथ सौहार्द स्थापित करने की आवश्यकता दिखाई पड़ी।”1 इससे एक बात तो स्पष्ट हो जाती है कि पुरुष अपने स्वार्थसिद्ध हेतु स्त्रियों की स्थिति में सुधार व शिक्षापर बल देते हैं।इससे पहले समाज में फैली कुरीतियों को ख़त्म करने की ज़रूरत महसूस नहीं होती है।पुरुष वर्ग अपने हित के लिए ही इन स्थितियों में सुधार करने की कोशिश करता है।बहरहाल जो भी हो नवजागरण में स्त्रियों की स्थिति में परिवर्तन हेतु बात तो उठती है। वह किसी भी रूप में क्यों न हो।परिवर्तन की इस दिशा में स्त्री और उसका जीवन बहस का केन्द्रीय मुद्दा बनकर सामने आया। इस सन्दर्भ में राधा कुमार कहती हैं- “उन्नीसवीं सदी को स्त्रियों की शताब्दी कहना बेहतर होगा क्योंकि इस सदी में सारी दुनिया में उनकी अच्छाई, बुराई,प्रकृति, क्षमताएँ एवं उर्वरा गर्मा-गर्म बहस का विषय थे।”2 इस प्रकार नवजागरण को स्त्री आत्मचेतना का प्रारम्भिक चरण कहा जा सकता है।

नवजागरण काल स्त्री हित के दृष्टिकोण से इसलिए भी महत्वपूर्ण है,क्योंकि वर्षों से लगभग अभिशाप सी बनी ‘सती प्रथा’ को समाप्त करने की पहल ‘राजा राममोहन राय’द्वारा इसी समय की गई।वह पहले भारतीय थे जिन्होंने सती प्रथा के विरुद्ध आन्दोलन चलाया।1818 ई. में बंगाल के गवर्नर ‘विलियम बैंटिक’ ने प्रान्त में ‘सती प्रथा’ पर रोक लगाई थी और 1829 ई. में इस पर कानून बना दिया गया।बावजूद इसके हिन्दी नवजागरण में‘भारतेन्दु’ विधवा स्त्री के सती होने को प्रोत्साहित करते नज़र आते हैं।स्त्री के लिए भारतेन्दु का आदर्श क्या है, यह उनके ‘नील देवी’ नाटक के अंतिम वाक्य से समझा जा सकता है-“अब मैं सुखपूर्वक सती हुंगी।”3 यह है उनका आदर्श जहाँ स्त्री अपने पति के मृत्यु के बाद उसके हत्यारे से बदला लेकर सती हो जाती है, इससे अधिक भारतेन्दु की नज़रों में स्त्रियों केजीने की कोई उपयोगिता नहीं है। स्पष्ट है कि ‘सती प्रथा’ पर प्रतिबंध लग जाने पर भी उस समय के हिन्दी साहित्यकारों में स्त्री के प्रति सिर्फ सहानुभूति ही थी, उनके अधिकारों और मुक्ति की बात वह स्वीकार नहीं पाए थे।

नवजागरण काल में ही स्त्रियों को शिक्षित करने की पहल सबसे पहले ‘राजा राममोहन राय’ द्वारा स्थापित ‘आत्मीय सभा’ में की गई,क्योंकि किसी भी समाज का आधार-स्तम्भ वहाँ की स्त्रियाँ होती हैं।यदि समाज में सुधार लाना है तो आवश्यक हो जाता है कि पहले स्त्रियों की स्थिति में सुधार लाया जाये और इसके लिए स्त्री का शिक्षित होना जरूरी है।लेकिन नवजागरण में स्त्रियों कोशिक्षा देने की जो बात उभरकर सामने आती है उसका एक मात्र उद्देश्य था समाज में उदित हुए इस नये बुद्धिजीवी वर्ग के अनुरूप स्त्रियों को ढ़ालना। इन स्त्रियों को शिक्षित करने का उद्देश्य इन्हें अपने पैरों पर खड़ा करना या आत्मनिर्भर बनाना नहीं था, बल्कि उन्हें उनके पतियों की अनुगामिनी बनाना था।इस बात का साफ़-साफ़ उल्लेख हमें नवजागरण के अग्रदूत कहे जाने वाले ‘भारतेन्दु’ के इस कथन से हो जाएगा- “लड़कियों को भी पढ़ाइए किन्तु उस चाल से नहीं जैसे आज-कल पढ़ाई जाती हैं जिससे उपकार के बदले बुराई होती है।ऐसी चाल से उनको शिक्षा दीजिए कि वह अपना देश और कुल धर्म सीखें।पति की भक्ति करें और लड़कों को सहज में शिक्षा दें।”4 भारतेन्दु के इस कथन से हमें उस समय की स्त्री शिक्षा की दशा समझ में आती है।तत्कालीन समाज में ‘स्त्री शिक्षा’को उतना महत्व नहीं मिल पाया था।उस समय लोगों की धारणा थी कि स्त्री को पढ़ाने से वह पथभ्रष्ट हो जायेगी, अतः उसे घर की चार-दीवारी में कैद करके रखा जाता था।उस समय समाज में जो स्त्री शिक्षा दी जा रही थी वह केवल उन्हें एक निपुण गृहिणी बनाने तक सीमित थी।प्रायः उनको रसोई में खाना बनाने व खर्च में मितव्ययता बरतने की शिक्षा दी जाती थी।इस प्रकार शिक्षा के नाम पर स्त्रियों को जो भी सिखाया जाता था वह सिर्फ पति और बच्चों की देखभाल करने और उन्हें खुश रखने तक ही सीमित था।


हिन्दी नवजागरण के आरंभिक दौर के उपन्यासों के केन्द्र में स्त्री शिक्षा ही रही है। जैसे- ‘देवरानी जेठानी की कहानी’, ‘भाग्यवती’, ‘वामा शिक्षक’ एक सीमा तक ‘परीक्षा गुरु’ आदि उपन्यासों में स्त्रियाँ ऐसे चरित्र के रूप में सामने आई हैं, जिनके माध्यम से तत्कालीन समाज व्यवस्था में सुधार की सम्भावना दिखाई पड़ती है।शिक्षा के प्रारूप एवं पाठ्यक्रम को लेकर सबकी एक ही राय थी। आदर्श शिक्षा वही जो लड़की को सुघड़, गृहिणी,समर्पिता पत्नी और कर्तव्य परायण माँ बनाये। उस समय के पाठ्यक्रम में हिन्दी के तत्कालीन दो उपन्यासों (‘देवरानी जेठानी की कहानी’-1870 व ‘भाग्यवती’-1879)को पाठ्यक्रम में शामिल किया गया था। इन दोनों उपन्यासों के केन्द्र में स्त्री शिक्षा है। यह दोनों उपन्यास एक कुशल गृहिणी बनने के सभी गुणों को आधार बना कर लिखे गये हैं।श्रृद्धाराम फुल्लौरी अपने उपन्यास ‘भाग्यवती’ की भूमिका में लिखते हैं- “बहुत दिनों से इच्छा थी कि कोई ऐसी पोथी हिन्दी भाषा में लिखूँ कि जिसके पढ़ने से भारतखंड की स्त्रियों को गृहस्थ धर्म की शिक्षा प्राप्त हो, क्योंकि यद्यपि कई स्त्रियाँ कुछ पढ़ी लिखी तो होती हैं, परन्तु सदा अपने ही घर में बैठे रहने के कारण उनको देश-विदेश की बोल-चाल और अन्य लोगों से बात-व्यवहार की पूरी बुद्धि नहीं होती...और कई विद्या से हीन होने के कारण सारी आयु चक्की और चरखा घुमाने में समाप्त कर लेती हैं।”5 इसके अतिरिक्त ‘देवरानी जेठानी की कहानी’ में एक पढ़ी लिखी स्त्री और एक अनपढ़ स्त्री में क्या अन्तर होता है? इसको ध्यान में रखते हुए पण्डित गौरी दत्त ने इस पुस्तक की रचना की है। इस सन्दर्भ में उपन्यास की भूमिका में वे लिखते हैं- “पढ़ी और बेपढ़ी स्त्रियों में क्या-क्या अन्तर है, बालकों का पालन और पोषण किस प्रकार होता है, और किस प्रकार होना चाहिए, स्त्रियों का समय किस-किस काम में व्यतीत होता है।बेपढ़ी स्त्री जब एक काम को करती है, उसमें क्या-क्या हानि होती है। पढ़ी हुई जब उसी काम को करती है, उससे क्या-क्या लाभ होता है। स्त्रियों की वह बातें जो आज तक नहीं लिखी गई हैं, मैंने खोज कर सब लिख दी हैं।”6 उपर्युक्त कथनों से स्पष्ट होता है कि इन दोनों उपन्यासों में स्त्री को गृहस्थ कामों में दक्ष होने व अपने कुल की मर्यादा की रक्षा करने वाली शिक्षा दी गई।इस बात का समर्थन करते हुए इन दोनों उपन्यासों के संबंध में ‘रोहिणी अग्रवाल’ का कहना है- “दोनों उपन्यासों का सुर सत्यनारायण व्रत-कथा जैसा विशुद्ध उपदेशात्मक-लड़कियों को पढ़ाओगे तो कुल की मर्यादा, प्रतिष्ठा और समृद्धि बढ़ेगी, नहीं पढ़ाओगे तो आपसी कलह, द्वेष और मूर्खता के कारण स्त्री परिवार और संतान, वर्तमान और भविष्य सब को डुबो देगी। नाक कटेगी सो अलग।”7 स्पष्टहै कि हिन्दी नवजागरण में स्त्री शिक्षा को लेकर उस समय साहित्यकारों द्वारा जो लिखा जा रहा था, वह स्त्री उत्थान या उसके स्वतंत्र अस्तित्व के पक्ष में नहीं था।यहाँ यह विचारणीय है कि उस समय स्त्री शिक्षा को महत्व तो मिला, लेकिन वह शिक्षागृहस्थ धर्म, बच्चों का पालन-पोषण एवं कुल की मर्यादातक ही सीमित थी।

हिन्दी नवजागरण में ही ‘भाग्यवती’ उपन्यास में श्रृद्धाराम फुल्लौरी ने भारतीय स्त्रियों की दशा और उसके अधिकारों को लेकर क्रान्तिकारी विचार प्रस्तुत किए हैं।श्रृद्धाराम फुल्लौरी ने भाग्यवती के पिता पण्डित उमादत्त के माध्यम से बाल विवाह का विरोध कराया है।उपन्यास में उमादत्त जी पूरे तर्क के साथ बाल विवाह का विरोध करते हैं। उमादत्त अपने बेटे लालमणि का विवाह 18 वर्ष होने के पश्चात् करने की बात कहते हैंऔर अपनी बेटी भाग्यवती की 11 वर्ष की हो जाने पर, लेकिन उनकी पत्नी राजी नहीं होती है।वह भाग्यवती की शादी 7 वर्ष में ही करा देना चाहती थी। इस पर उमादत्त कहते हैं पहले विवाह बड़ी आयु में ही हुआ करते थे मगर जब से हमारे यहाँ मुस्लिमों का शासन हुआ। मुस्लिम शासक कुँवारी हिन्दू लड़कियों का अपहरण कर लिया करते थे, इस्लाम में विवाहित लड़कियों का अपहरण करना वर्जित था। इसलिए सात-आठ वर्ष में ही लड़कियों का विवाह कर दिया जाता था। पत्नी को समझाते हुए उमादत्त जी कहते हैं-“सो अब तो ईश्वर ने हमको उस महाराज अंग्रेज की प्रजा बनाया है कि जो कभी अन्याय नहीं करना चाहता फिर अब छोटी अवस्था में लड़की-लड़कों के विवाह करने में क्या प्रयोजन है?”8 इसमें लेखक ने उस समय समाज में हो रहे बाल विवाह को स्पष्ट तर्क के माध्यम से खत्म करने की बात की है। उस समय की परिस्थितियों को देखते हुए बाल विवाह किए गए।लेकिन अब परिस्थितियाँ बदल चुकी हैं, तो हमें भी बदलना चाहिए न कि रूढ़िवादिता को अपना लेना चाहिए।इस उपन्यास में चारदीवारी के अन्दर स्त्री के शिक्षित-अशिक्षित होने के प्रभाव का विश्लेषण नहीं किया गया, बल्कि घर से बाहर की स्थितियों को विवेक-बुद्धि के माध्यम से सुलझाते हुए चित्रित किया गया है।यद्यपि भाग्यवती की माँ रूढ़िवादी व संकीर्ण सोच की स्त्री के रूप में चित्रित की गई है, लेकिन वह स्वयं पढ़ी लिखी है।इससे वह भाग्यवती को घर पर ही कई विषयों का अध्ययन कराती है। उमादत्त समय-समय पर भाग्यवती की प्रगति रिपोर्ट की सूचना उसकी माँ से लेते रहते हैं।भाग्यवती की माँ पति उमादत्त को बेटी की शिक्षा की प्रगति-सूचना देते हुए बताती है-“सहस्त्रनाम गीता तो आप उससे सुन ही चुके हैं पर उसे पीछे मैंने उसको भाषा व्याकरण,ऋजुपाठ, हितोपदेश और शिक्षा-मंजरी पढ़ाई और अब वह भूगोल-खगोल नाम का ग्रन्थ पढ़ रही है और फिर मेरी इच्छा है कि थोड़ी गणित विद्या पढ़ा के पीछे से आत्मचिकित्सा आरम्भ करा दूंगी, क्योंकि उसके पढ़ने से प्राणी को लोक-परलोक दोनों भाँति के व्यवहार प्रतीत हो जाते हैं गृहस्थ धर्म और मनुष्य धर्म को सर्व प्रकार से जान लेता है...सच पूछो तो हमारी भाग्यवती के समान सीने-पिरोने में इस गली में की कोई लड़की भी चतुर नहीं।”9 इस प्रकार स्पष्ट है कि उस समय स्त्री को दी जाने वाली शिक्षा उसे एक कुशल गृहिणी बनाने पर बल देती थी।

भाग्यवती पढ़ी-लिखी व अपनी समझ-बूझ के कारण अपने ससुराल में बहुत ही सम्मान पाती है।घर का हर सदस्य उससे पूछ कर ही कार्य करता है।घर का कुशल प्रबंधन देख भाग्यवती की सास बहुत खुश होती है और उसे घर की सारी ज़िम्मेदारी सौंप देती है,भाग्यवती उसे बखूबी निभाती भी है।एक बार भाग्यवती के घर भ्रष्ट पुलिस वाले चोरी की तहकीकात के सिलसिले में रिश्वत लेने के उद्देश्य सेउसके घरवालों को धमकाते हैंतो भाग्यवती क़ानूनी भाषा का प्रयोग करते हुए कहती है- “क्यों जमादार जी! आपने हमारे घर की बदनामी या बदमाशी किस मिसल में लिख देखी है या आपको खुद ही हमारे घर पर कुछ शक हुआ है कि जिसके सबब हमारी तलाशी लोगे? अच्छा, हमको सरकारी हुक्म से कुछ उज्र और इनकार नहीं, पर आप हमको इतनी बात एक कागज पर लिख दें कि हम अपने आप इस घर की तलाशी लेते हैं और यह भी बता दें कि यदि हमारे घर से चोरी का कुछ माल बरामद न हुआ तो हम हत्तक की नालिश किस पर करें?”10 स्पष्ट है कि भाग्यवती के पढ़े लिखे होने के कारण ही वह अपने बुद्धि-चातुर्य के बल पर भ्रष्ट पुलिस वालों को अच्छा सबक सिखाकर उनको उन्हीं की भाषा में करारा जवाब देती है। यहाँ भाग्यवती का व्यक्तित्व इस बात को और पुष्ट कर देता है कि उस समय स्त्रियों को इसलिए ही शिक्षित बनाया जा रहा था कि वह अच्छी गृहस्थी चलाएँ और अपनी कुल-मर्यादा को बढ़ाएँ।


नवजागरण काल में सामाजिक स्तर पर स्त्री-मुद्दों को लेकर हो रहे आंदोलनों में स्त्री को एक ‘आदर्श हिन्दू स्त्री’ की रूढ़ि छवि में बांध दिया जाता है।ब्याह के बाद उस शिक्षित, सुयोग्य कुलवधू के लिए पितृ-पक्ष के पास बस एक ही उपदेश होता है, जिसमें उसे सिखाया जाता है कि पति और ससुराल पक्ष की सेवा करना और नितांत अभावों में रहकर भी कुल की मर्यादा को बनाए रखना।हिन्दी नवजागरण में स्त्री को केन्द्र में रखकर लिखे गए प्रमुख उपन्यास ‘देवरानी जेठानी की कहानी’ में भी यही बात सामने आती है।इस उपन्यास में छोटेलाल की पत्नी (जो कि पढ़ी-लिखी थी)के पिता का पत्र आता है उस पत्र में लिखा होता है-“मैं तुमसे उसी दिन प्रसन्न हूँगा जब मैं यह सुनूंगा कि तम्हारी ससुराल वाले तुमसे प्रसन्न हैं। तुम्हारा पढ़ना-लिखना उसी दिन काम आवेगा जब तुम अपनी सास की आज्ञा में रहोगी। अपने धर्म-कर्म पर चलना, ईश्वर को याद रखना। आए-गए का आदर-सम्मान करना, यह अच्छे कुल की बेटियों के धर्म हैं।”11 क्या एक स्त्री को इसलिए ही शिक्षित किया जाता है कि वह अपने ससुराल वालों की सेवा कर सके? पति धर्म व अतिथि धर्म निभा सके।क्या इसके अतिरिक्त उसके जीवन में शिक्षा का कोई महत्व नहीं है? यह सब पक्ष हिन्दी नवजागरण में स्त्री अस्तित्व और अस्मिता पर प्रश्न चिन्ह लगाते हैं, जो यह स्पष्ट करते हैं कि स्त्री सशक्तिकरण की जड़ें बुनियादी तौर पर इतनी खोखली क्यों हैं? समाज में यह रूढ़िवादिता आज इतनी हावी हो चुकी है कि न केवल पुरुष, बल्कि खुद स्त्रियाँ भी पति धर्म और ससुराल पक्ष में कुल की मर्यादा के लिए खुद को मिटा देने में गर्व का अनुभव करती हैं।

हिन्दी नवजागरण में ही स्त्री हित की बात करने वालों में ‘पण्डिता रमाबाई’ का नाम आता है। उनके लिए स्त्री-शिक्षा केवल कुशल गृहिणी बनने तक सीमित नहीं थी और न ही अक्षर-ज्ञान व हिसाब-किताब तक। वह ऐसी शिक्षा चाहती थीं, जो स्त्रियों को आत्मनिर्भर बनाए और सामाजिक कुरीतियों से लड़ने का बल प्रदान करे। इसी प्रकार ‘ताराबाई शिंदे’ और ‘रख्माबाई’ ने भी अपने-अपने विचारों से ‘बाल विधवा’ व ‘अनमेल विवाह’ को लेकर आन्दोलन किया।उनके इस तरह के उठाये गये कदमों का भारतीय नवजागरण के नेताओं ने साथ नहीं दिया और उसे एक तरह का अपवाद मानकर चुप रहे। साथ ही साथ हिन्दी पट्टी के समाज सुधारक व राजनेता उनकी विद्रोही प्रवृति को कुचलकर एक आदर्श हिन्दू पत्नी बनाने को दृढ़ रहे। इस सन्दर्भ में ‘दयानंद सरस्वती’ की इस टिप्पणी को देख सकते हैं- “लड़कियों की शिक्षा का चरित्र लड़कों की शिक्षा से भिन्न होना चाहिए...हिन्दू लड़की को हिन्दू लड़कों से भिन्न प्रकृति के कार्य करने होते हैं अतः मैं उस व्यवस्था को प्रोत्साहित नहीं करूँगा जो उन्हें उनके राष्ट्रीय चारित्रिक गुणों से वंचित कर दे। हम अपनी लड़कियों को ऐसी शिक्षा नहीं देंगे जो उनकी सोच को बदल दे।”12 विचारणीय है कि यहाँ भी बेटा-बेटी में भेद-भाव देखने को मिलता है जो आज तक नहीं बदल पाया है।महान समाज सुधारक ‘दयानंद सरस्वती’ का स्त्री-शिक्षा के प्रति यह दृष्टिकोण स्त्री हित के लिए कहीं से भी न्यायोचित नहीं जान पड़ता है।उस समय स्त्री-उत्थान के लिए सबसे जरूरी था स्त्री की सोच में बदलाव लाना और यह बदलाव स्त्री को शिक्षित करके ही लाया जा सकता था। परिणाम स्वरूप पुरुष वर्चस्व के चलते इन महिला समाजसुधारकों का विरोध किया गया और स्त्री-शिक्षा और उस समय के हिन्दी साहित्य में ऐसी विषयवस्तु को केन्द्र में रखा गया, जिससे स्त्रियाँ अपनी सोच को बदल न पाएँ और पति की दासता और गृहस्थ धर्म को ही सर्वोपरि मानती रहें।

यह विडम्बना ही है कि हिन्दी में नवजागरण युग की लेखिकाएँ एक ‘अज्ञात हिन्दू महिला’ (जिनकी 1882 में रचित पुस्तक ‘सीमंतनी उपदेश’ को डॉ धर्मवीर ने 1984 में खोज निकला) और ‘दुखिनीबाला’ (जिनकी 1915 से 1916 तक ‘स्त्री दर्पण’ में धारावाहिक के रूप में प्रकाशित पुस्तक ‘सरला:एक विधवा की आत्मजीवनी’ को प्रज्ञा पाठक ने 2005 में ‘कथादेश’ में प्रकाशित कराया)को साहित्यक परिदृश्य से गायब कर दिया जाता है। उनके लेखन को पुरुष के समकक्ष नहीं माना जाता है।स्त्रियों द्वारा अपने अधिकारों की मांग किए जाने पर उसे कठोरता से उपेछित कर दिया जाता था।उनका मानना था कि स्त्रियों को स्वतंत्र होकर निर्णय लेने का अधिकार नहीं मिलना चाहिए। परिवार के दायरे के भीतर रहते हुए पुरुषों के हाथों से ही उद्धार होना चाहिए।‘सीमंतनी उपदेश’ की लेखिका पतिव्रता धर्म की आलोचना करते हुए कहती हैं-“ऐ नेक गरीब भोली हिन्दनियों, इस खुदमतलबियों के कहने को हरगिज न मानो। तुमको पतिव्रता महात्म्य सनाते हैं और तुम्हारे खाविंदों को कोकशास्त्र और नायिकाभेद और बहार ऐश और लज्ज्तुल निसा की पोथियाँ सुनाकर कहते हैं- इस दुनिया में जिसने दो चार दस बीस कन्याओं का संग नहीं उसका पैदा होना ही निष्फल है।”13 इससे स्पष्ट है कि हिन्दी नवजागरण में स्त्रियों को पतिव्रता रहने का पाठ पढ़ाया जाता था और पुरुष को एक नहीं कई स्त्रियों के साथ संबंध बनाने की बात कही जाती रही है।इस प्रकार उस समय स्त्रियों को घर के अन्दर व शिक्षा में पुरुष के समकक्ष रहनेके अधिकार नहीं थे।समाज में यही मानसिकता आज भी कार्य कर रही हैऔर यही मानसिकता स्त्री हित के लिए सबसे बड़ी मुसीबत है, जिसे दूर किए जाने की जरूरत है।

हिन्दी नवजागरण में स्त्री हित के लिए लड़ने वाली ‘अज्ञात हिन्दू महिला’ ने तमाम विरोधों के बावजूद हार नहीं मानी। वह समाज में पुरुषों का हित साधने के लिए महिलाओं को शिक्षा दिये जाने के तर्क को स्वीकार नहीं करती हैं। उन्हें स्त्री के लिए ऐसी शिक्षा चाहिए थी, जिससे वह अपना जीवन खुद सवाँर सके।स्त्री का किसी और पर आश्रित होना उन्हें स्वीकार्य नहीं था। यद्यपि वह पुरुषों की प्रगति का विरोध नहीं करती हैं। वह तो बस स्त्री-प्रगति के लिए चिंतित हैं।इस सन्दर्भ में अपने एक कथन में वह कहती हैं-“अगर कहो कि हिन्दुस्तानियों ने विद्या में बहुत तरक्की की है और इल्म हासिल किया है, बेशक माना। फिर हमें क्या, एक के खाना खाने से दूसरे का पेट नहीं भरता है।”14यहाँ लेखिका ने सिर्फ पुरुषों को ही बढ़ावा दिए जाने को गलत बताया है।उनकी नज़र में स्त्री को भी पुरुषों के समान प्रगति के सारे अवसर मिलने चाहिए।स्त्रियों के प्रति यही उपेक्षित भाव उसके पिछड़ेपन का प्रमुख कारण रहा है।


नवजागरण काल में स्त्रियों को एक वस्तु के रूप में देखा जाता रहा है, जिसे पुरुष जिस रूप में चाहे उसमें ढ़ाल सकता है। स्त्रियों की अपनी कोई इच्छा-आकांक्षा नहीं होती है, उनसे एक आदर्श पत्नी की तरह व्यवहार करने की कामना की जाती है।स्त्रियाँ ऐसा करती भी हैं, जिसे नवजागरण के समय के प्रमुख हिन्दी उपन्यास ‘परीक्षा गुरु’ में मदनमोहन की पत्नी में शत प्रतिशत घटित होते दिखाया गया है।वह अपने पति की सच्ची शुभचिंतक, सुख-दुःख की सच्ची संगिनी व हमेशा आज्ञा का पालन करने वाली पत्नी के रूप में दिखायी गई है।उसका अपना कोई नाम नहीं होता है वह ‘मदनमोहन की पत्नी’ के नाम से ही जानी जाती है। शुभचिंतक स्त्री जब अपने पति को कोई नेक सलाह देना चाहती है, तो उसे बड़ों की तरह दबाकर नहीं, बराबर वालों की तरह झगड़ कर नहीं, अपितु किस तरह विचार कर देती है, इसे इस कथन में देख सकते हैं- “छोटों की तरह अपने पति की पदवी का बिचार करके उनके चित दुःखित होनें का बिचार करके, अपनी अज्ञानता प्रकट करके, स्त्रियों को ओछी समझ जता कर धीरज से अपना भाव प्रकट करती है, परन्तु कभी लौटकर जवाब नहीं देती, बिबाद नहीं करती।”15 इसमें एक आदर्श स्त्री की छवि गढ़ने की कोशिश की गई है, जिससे वह कभी समानता व मुक्ति की बात न सोच सके।

स्त्री को हमेशा ही ऐसी शिक्षा दी जाती रही है कि पुरुष उससे श्रेष्ठ है।समाज में स्त्री की अपेक्षा पुरुष को ही अधिक सम्मान मिलता है। इसका कारण यह है कि समाज में पुरुष का ही वर्चस्व है, वह धन का उपार्जन करता है और उसकी एक छवि हम सब के मन में अंकित हो गई है।हिन्दी नवजागरण में भी यही भाव देखने को मिलता है। लाला श्री निवास दास कृत 1882 ई. में प्रकाशित उपन्यास ‘परीक्षा गुरु’में भी पतिव्रता धर्म चित्रित हुआ है।इस सन्दर्भ में उपन्यास की प्रमुख स्त्री पात्र मदनमोहन की पत्नी के कथन को देखा जा सकता है- “प्यारे प्राणनाथ! मैं आपकी हूँ और अपनी चीज पर उसके स्वामी को सब तरह का अधिकार होता है।”16 इससे यह स्पष्ट होता है कि वह अपने को चीज ( दासी ) समझने का अधिकार खुद पुरुष को दे रही है। पुरुष वर्ग तो ऐसा चाहता ही है।यहाँ विचारणीय बात यह है कि समाज में पुरुषों को सबसे ज्यादा सम्मान खुद स्त्रियों द्वारा ही दिया जाता है।तमाम व्रत-उपवास और जी हुजूरी स्त्रियाँ ही वर्षों से पुरुषों के लिए करती आई हैं। अतः जब तक स्त्रियाँ खुद पुरुषों की जी हुजूरी का विरोध नहीं करेंगी तब तक स्त्री-मुक्ति का सपना साकार नहीं हो सकता है।

नवजागरण काल में विधवा पुनर्विवाह के मुद्दे को उठाया जाता है, इससे पहले ऐसा कोई प्रयास नहीं किया गया था।लेकिन प्राचीन काल में विधवाओं के विवाह की प्रथा थी मगर वह विवाह मृत पति के छोटे भाई देवर से ही हो सकती थी।नवजागरण के समय में कई पुरुष सुधारकों ने विधवाओं के प्रति उदारता और करुणा का भाव दिखाया और विधवा पुनर्विवाह को उचित ठहराया है। सर्वप्रथम ईश्वरचन्द्र विद्यासागर ने 1856 ई. में विधवा पुनर्विवाह पर लगे प्रतिबंध को हटाने का अभियान चलाया, जिसमें वे काफ़ी हद तक सफल भी होते हैं। लेकिन समाज इसको पूरी तरह से स्वीकार नहीं कर पा रहा था।इस सन्दर्भ में भारतेन्दु के इस कथन को देख सकते हैं- “जो विधवा विवाह नहीं करती है, उसको पाप तो नहीं होता, पर जो नहीं करती, उसको पुण्य अवश्यक होता हैं।”17 स्पष्ट है कि समाज में यह धारणा थी कि जब एक विधवा स्त्री दूसरा विवाह करती है तो वह पाप की भागीदार बनती है।यहाँ विचारणीय यह है कि ऐसी मान्यताओं के चलते यदि कोई विधवा स्त्री अपना पुनर्विवाह कर भी ले तो क्या वह शोषित होने से बच जाएगी? उसके सामने वही परिस्थिति पुनः भी आ सकती है। इस सन्दर्भ में अज्ञात हिन्दू महिला का कहना है कि- “पुनर्विवाह करने की इच्छा करने वालियों को याद रखना चाहिए कि हमें भी शादी करने के पीछे इन्हीं के मानिंद रोना पड़ेगा। जहाँ हजार-लाख-करोड़ को ठोकर खाते देखा, हमको चाहिए कि हम भी अंधों के माफिक अपने तई गिरवें नहीं बल्कि देख के कदम रख उसको जीत लेवें।...हे प्यारी बहनों, वही काम करों जिससे तुम्हें इस दुनिया में सुख मिले। बड़े भारी दुखों की जड़ काम है। पहले काम को रोको। इसको रोकने की यह तजवीह है की जब इसका ख्याल पैदा हो तक इसके दुखों का ख्याल करो।”18 लेखिका के इस कथन पर यदि विचार करें तोस्पष्ट हो जाता है कि एक विधवा स्त्री को पुनर्विवाह करने से पहले अपने वैवाहिक-जीवन की समस्याओं पर विचार कर लेना चाहिए।


निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि हिन्दी नवजागरण में स्त्री-उत्थान के लिए अनेक प्रयास किए गए। उस समय वर्षों से रूढ़ि बनी कुरीतियों को समाप्त करने के लिए अनेक आन्दोलन चलाये गये जो स्त्री हित की दृष्टि से कारगर साबित हुए।साथ ही स्त्रियों की सोच में बदलाव व उन्हें जागरूक करने के लिए स्त्री शिक्षा को महत्व दिया गया। वर्षों से चली आ रही सती प्रथा, बाल विवाह, परदा प्रथा आदि कुरीतियों को बंद कराया गया।इस प्रकार हिन्दी नवजागरण को स्त्री-उत्थान के प्रस्थान बिंदु के रूप में देखा जा सकता है।नवजागरण में एक तरफ जहाँ स्त्रियाँ अपने शोषण के प्रति आवाज उठा रही थीं, तो दूसरी ओर उस समय के पुरुष समाज सुधारक एवंसाहित्यकार स्त्री की ऐसी छवि गढ़ रहे थे जिसके सूत्र उनके शोषण से जुड़ रहे थे।उस समय के हिन्दी साहित्य में स्त्री को आदर्श पत्नी व कुलीन बहू जैसे चरित्रों से जोड़कर प्रस्तुत किया जा रहा था।इसका प्रभाव यह हुआ कि स्त्री के खुद के मन में भी उसकी यह छवि अंकित हो गई।परिणामस्वरूप स्त्री ने खुद ही आदर्श पत्नी व कुलीन बहू के संस्कारों को अपना लिया।आज स्त्री अगर शोषित या उत्पीड़ित है तो उसका एक कारण यह है कि स्त्री खुद अपने ऊपर हो रहे अत्याचारों को चुपचाप सहन कर लेती है।जब तक स्त्री खुद अपने उत्पीड़न का प्रबल विरोध नहीं करेगी तब तक स्त्री, आदर्श पत्नी व कुलीन बहू जैसे तमगों के कारण उत्पीड़ित होती रहेगी।हिन्दी नवजागरण में रख्माबाई, पण्डिता रमाबाई एवं ताराबाई शिंदे जैसी स्त्री समाज सुधारकों ने ही स्त्री हक़ के लिए सर्वप्रथम प्रयास किए थे।जिसके परिणामस्वरूप उस समय स्त्री अपने अधिकारों के प्रति जागरुक हुई।जबकि उस समय के पुरुष समाज सुधारकों द्वारा स्त्री हित के लिए जो भी प्रयास किए गए वह कहीं न कहीं उनके खुद के स्वार्थ हेतु थे।

सन्दर्भ-सूची

1. कुमार,राधा, स्त्री संघर्ष का इतिहास, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, संस्करण-2011, पृष्ठ संख्या- 39
2. वही, पृष्ठ संख्या-23
3. http://hindisamay.com/title= नील देवी/भारतेन्दु हरिश्चंद्र
4. सं.-ओमप्रकाश सिंह, भारतेन्दु हरिश्चंद्र ग्रंथावली- 6, प्रकाशन संस्थान, दिल्ली, संस्करण- 2010, पृष्ठ                     संख्या-70
5. सं.- मधुरेश,  भाग्यवती, यश पब्लिकेशन्स, दिल्ली, संस्करण- 2012, पृष्ठ संख्या- भूमिका
6. http://hindisamay.com/title= देवरानी जेठानी की कहानी/पण्डित गौरी दत्त
7. अग्रवाल,रोहिणी, स्त्री लेखन:स्वप्न और संकल्प,राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण- 2012,            पृष्ठ सं-43
8. सं.- मधुरेश,  भाग्यवती, यश पब्लिकेशन्स, दिल्ली, संस्करण- 2012, पृष्ठ संख्या- 25
9. वही, पृष्ठ संख्या-  28-29
10. वही, पृष्ठ संख्या-101
11. http://hindisamay.com/title= देवरानी जेठानी की कहानी/पण्डित गौरी दत्त
12. कुमार, राधा, स्त्री संघर्ष का इतिहास, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, संस्करण-2011, पृष्ठ संख्या- 72
13. सं.- डॉ. धर्मवीर, सीमन्तनी उपदेश, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, संस्करण- 2006, पृष्ठ संख्या-112
14. वही, पृष्ठ संख्या- 44
15. दास, श्रीनिवास, परीक्षा-गुरु, नेशनल बुक ट्रस्ट, नई दिल्ली, संस्करण- 2012, पृष्ठ संख्या- 89
16. वही, पृष्ठ संख्या- 163
17. http://hindisamay.com/title= वैदिक हिंसा हिंसा न भवति/भारतेन्दु हरिश्चंद्र
18. सं.- डॉ. धर्मवीर, सीमन्तनी उपदेश, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, संस्करण- 2006, पृष्ठ संख्या-88


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