दलित पत्रकारिता का जूनून: कठिन डगर की राह पर डॉली कुमार

स्त्री नेतृत्व की खोज’ श्रृंखला के तहत हमने नेतृत्व के कई नामों के बारे में या तो स्वयं उनसे  स्वयं या किसी लेखक द्वारा प्रस्तुत आलेख पढ़े. बहुत कम समय में वैकल्पिक मीडिया में अपनी शानदार उपस्थिति बनाने में कामयाब हुई नेशनल दस्तक की मुखिया डॉली कुमार के बारे में जानते हैं उनकी ही ज़ुबानी- प्रेम से लेकर कारोबार तक की पहलकदमी को: 

मैं मध्यवर्गीय परिवार में अपने मां-पिता की पांचवीं संतान हूँ. पिता, विजेंद्र पाल, पोस्टल विभाग में कर्मचारी थे, अब रिटायर्ड हैं, मां, भारती, गृहिणी रही हैं. दादा जिले सिंह किसान थे. मेरी प्राथमिक पढाई अपने आस-पास में जो स्कूल था उसमे हुई है. हिंदी मीडियम स्कूल था यूपी बोर्ड का उसमे हुई. मैं पढ़ाई में अच्छी थी. पापा चाहते थे कि बेटियां पढ़ें-लिखें तो सभी को पढ़ाया. मेरा कुछ ज्यादा इंटरेस्ट था पढ़ने-लिखने में तो फिर पापा ने मुझे यहां, दिल्ली में सीबीएसई स्कूल में दाखिला दिलवाया. अर्वाची भारतीय स्कूल में मैंने एडमिशन लिया, इंग्लिश मीडियम स्कूल था सीबीएसई बोर्ड. फिर मेरी सारी दिल्ली में ही होती रही. ग्रेजुएशन भी फिर दिल्ली विश्वविद्यालय  से हुआ, उसके बाद मास्टर्स मैंने इग्नू से किया और उसके बाद पीएचडी.

घर चूकी मध्यवर्गीय था, इसलिए सामान्य सोच थी कि लड़कियां हैं, इनकी पढ़ाई-लिखाई करानी है और शादी तय करानी है. लेकिन पापा को बहुत उम्मीदें थी कि मेरी बेटियाँ जितनी भी हैं पढ़ लिख कर किसी अच्छी जगह पर जायें. सब के लिए उन्होंने कोशिश की. हालांकि कुछ-कुछ असर होता है लड़कियों पर भी, जब वे अपने आस-पास का समाज देखती हैं. वे देखती हैं कि लड़कियां शादी करके घर छोड़कर जा रही हैं, तो मेरी बहनों का भी इसी तरीके से एक अप्रोच बन गया कि उनको ज्यादा कुछ नहीं करना है. मैं कुछ अलग सोचती थी. पापा ने प्रोत्साहित भी किया पढ़ने के लिए, उन्होंने कभी मेरे ऊपर दवाब नहीं बनाया कि तुम्हें शादी करनी है या यह कि तुम पढ़ो. वे चाहते थे कि मैं जितना पढ़ना चाहती हूं पढूं. मुझे आगे जो करना है करूं.

बुलंद इरादे और युवा सोच के साथ 

हां, पापा के ऊपर दादा जी की तरफ से भी दवाब रहता था कि बेटियों की जल्दी-जल्दी शादी करो. हालांकि मेंरे दादा जी ने भी मुझे नहीं कहा कभी. जब तक वे ज़िंदा रहे मेरा हर स्तर पर समर्थन करते रहे. जो मेरी बड़ी बहनें थीं उनकी शादी जल्दी कि गई. मैं आखिरी बेटी थी तो सबको ये था कि नहीं ठीक है, चार की शादी हो चुकी है, एक बची है तो उसको अवसर दिया जा सकता है.

जाट परिवार से हूँ. सारे समाजों की तरह यह भी एक पितृसत्तात्मक समाज है. जितना मैनें देखा है, औरतें घर में काम करती हैं. मतलब कि आप वही चीजें आप कर रही हैं, जो चीजें आपके लिए तय हैं, वह तय समाज कर रहा है. बचपन से अपने घर चूल्हा-चुका, शादी के बाद में दूसरे का घर जा कर संभालना है.

 :दलित महिला उद्यमिता को संगठित कर रही हैं सागरिका

मां तो दसवीं पास थीं. लेकिन मेरे नजरिये से उन्होंने बहुत दवाब का जीवन जिया. वही दवाब जो मध्यवर्गीय पितृसत्तात्मक समाज में गृहस्थ स्त्रियों पर होता है. मैंने उन्हें वही देखा है. हर वक्त काम करते हुए ,चाहे घर का हो चाहे घेर का हो. हमारे यहां घेर मतलब है, जहाँ भैंस वगैरह होती हैं. ज्यादातर बैठकें होती हैं वहाँ. आदमी लोग वहीँ पर बैठते हैं. घेर में यदि औरतें बैठती हैं तो अलग बैठती हैं-एक डिविजन होता था कि जब आदमी बैठ के बात कर रहे हैं बैठक में, तो औरतें वहां पर नहीं होती हैं.

मेरे पापा प्रेमचन्द आदि के साहित्य पढ़ते थे. हालांकि तब प्रेमचंद से या किसी भी साहित्य से मेरा बिलकुल भी जुड़ाव नहीं था. साहित्य मैंने पढ़ा ही नहीं था. बचपन में मैंने प्रेमचंद का उपन्यास निर्मला पढ़ा, लेकिन उस वक्त मंँ बिलकुल भी नहीं समझ पाई कि निर्मला क्या है, क्यों लिखी गई है. मैंने एक कहानी के तौर पे उसे पढ़ लिया. भीमराव अम्बेडकर कॉलेज, दिल्ली यूनिवर्सिटी से मैंने बीए किया. ज्योग्रफी, हिस्ट्री मेरा विषय था.

पूर्ण शराबबंदी के लिए प्रतिबद्ध वड़ार समाज की बेटी संगीता पवार

वहीं कॉलेज में मेरी मुलाक़ात सुमित (अब पति) से हुई. हम क्लासमेट थे. फिर दोस्ती हो गई. एक दूसरे को जानना शुरू किया, उस वक्त तक भी ऐसी कोई चेतना नहीं थी. बस ठीक है चल रहा था. पढ़ रहे थे. ये था कि नौकरी करनी है, आगे कुछ कमाना है. जब हम मिले थे तो सुमित की जाति हमें मालूम नहीं थी और तब मेरे लिए उनकी जाति इशू भी नहीं थी. अब मैं यह नहीं बता सकती कि प्रेम कब शुरू हुआ, क्यूंकि आपको नहीं पता होता है कि आप कब आकर्षित होते हैं, एक-दूसरे की तरफ लेकिन जब हम दोनो ने एक दूसरे को कहा कि हां हम आगे बढ़ना चाहते हैं, जीवन साथी बनना चाहते हैं, जब मैंने कहा कि ‘मैं तुमसे प्यार करती हूं’ उससे पहले मुझे पता था कि सुमित किस जाति से आते हैं, और मुझे यह भी पता था कि मुझे आगे किन चीजों का सामना करना है- सुमित जाटव थे और मैं जाट.

जाति, एक सामाजिक सच्चाई के रूप में बचपन से ही पता हो गई थी, तब जब मुझे बताया जाता था कि मैं जाट जाति से हूं, मुझे बताया जाता था कि ये पंडित हैं, मुझे ये बताया जाता था कि ये पंडित घर आते हैं तो उनको खाना खिलाया जाता है, उनको सम्मान दिया जाता है, मुझे बताया जाता था कि वे चमार हैं, उनके साथ में बैठा उठा नहीं जाता है, उनके साथ खाना नहीं खाया जाता है. मैं तब अम्बेडकर को भी जानती थी, लेकिन सिर्फ नील कोट वाले आदमी के रूप में. अम्बेडकर का नाम जरुर पढ़ा था कि वे संविधान निर्माता हैं, बस इतना ही पढ़ा था किताबों में. कौन हैं, क्या हैं, बहुत नहीं पता था. जिस तरीके से हम कुछ और क्रांतिकारियों का नाम पढ़ लेते हैं, जब हम स्वतंत्रता संग्राम के बारे में पढ़ रहे होते हैं. मेरी कुछ सहेलियां थीं, जो चमार जाति से थीं. मैं उनके घर जाती थी तो वहां वह तस्वीर देखती थी, उनके घर में लगी हुई होती थी. लेकिन कभी उससे आगे जानने की कोशिश नहीं की, गंभीर नहीं हुई. बहुत सारे लोग, जो जाति से चमार थे, हमारे खेत-वगैरह में काम करते थे, उनके घर में शादियाँ वगैराह होती थी तो ठीक है कि मद्द कर दी, कपड़े वगैरह दे दिये, खासकर उनकी बेटी की शादी है तो सब चीजें दे दी.  लेकिन जब उनके घर से जब कोई सामान आता था मिठाई वगैर ,तो मुझे याद है हमें वो चीजें खाने के लिए मम्मी या फिर घर की अन्य औरतें मना करती थीं कि ‘नहीं चमार के घर से आया है मत खाओ’, नहीं खाना चाहिए. एक बार के रसगुल्ले मुझे याद हैं. एक बार रसगुल्ले आये थे, तो हमें खाने के लिए मना किया गया था. हालांकि ज्यादातर ऐसी मनाही मैंने मेरी मम्मी से या बाकी लोगों से सुनी थी. पापा ने हमें ऐसा कभी नहीं कहा.

दलित महिलाओं के संघर्ष की मशाल: मंजुला प्रदीप 

शादी के वक्त मुझे अहसास था कि मैं जिस कम्युनिटी से आती हूं, वहाँ उनका मानना होता है कि लड़की घर की इज्जत होती है. मैंने ऐसे भी मामले सुने थे, जिसमें जब लड़की ने किसी और जाति में किसी लड़के से शादी करने की हिम्मत दिखाई, या प्यार करने कि हिम्मत दिखाई तो उसको मार दिया गया. मुझे अपने अपने माँ बाप पर ये विश्वास था कि वे ऐसे नहीं हैं, लेकिन आपको अपने रिश्तेदारों पर भरोसा नहीं होता है.

घर को जब हमारे रिश्ते की भनक लगी तो घर से फोन आया कि घर आओ, उस वक्त मुझे सुमित ने तुरत छोड़ा था, मुझे सर्टिफिकेट वगैरह निकलवाना था. फोन के अंदाज से मुझे शक हुआ कि शायद कुछ ठीक नहीं है. फिर घर गई तो घर में पहले से कुछ लोग बैठे हुए थे. दीदी वगैरह, मम्मी, घर के लोग थे. ऐसा नहीं था कि घर के लोगों को हमारी दोस्ती का पता नहीं था. मां की सुमित से बात होती थी, फोन पर. कॉलेज में एक बार पापा मिल चुके थे.

मैं तब आशंकाओं से भरी थी, कैद कर दिये जाने की आशंका, जल्दी से शादी कर देने की आशंका या और भी बहुत कुछ. लेकिन मैंने कुछ नहीं बोला, हां भी नहीं बोला और ना भी नहीं बोला. मैंने रात में सुमित को बताया कि मेरे घर को पता चल चुका है. सुमित ने कहा कि ‘तुम्हें कोई भी प्रॉब्लम हो तो मुझे तुरत बताना. मैं वहीं पर तुम्हारे गाँव के बाहर रहूँगा वहीं पर. पुलिस को भी इन्फॉर्म कर देता हूं.’ मैंने कहा, ‘नहीं ऐसा नहीं ,है लेकिन मुझे डर लग रहा है, मतलब मुझे नहीं पता इनका अगला रिएक्शन क्या होगा!’ पापा ने अगले दिन मुझसे पूछा, ‘मैंने हां नहीं कहा, लेकिन मैं रोने लगी. फिर पापा समझ गये कि इसका मतलब है तुम मना नहीं कर रही हो, तो इसका मतलब तुम चाहती हो. उसके बाद पूरा एक इमोशनल दौर शुरू हुआ. पापा ने ज्यादा नहीं बोला लेकिन चाचा-चाची आदि ने आकर बहुत समझाया. उन्होंने समझाया, ‘कुछ तो हमारी इज्जत का सोचा होता. मतलब चमार तुम ले आयी, चमार जाति का उठा के ले आयी लड़का. इस तरीके से नहीं चलता है समाज और ये सब चीज| शुरुआत में मैं बहुत डरी हुई थी. ये प्रक्रिया पूरे दो महीने तक चलती रही.

बहुजन आंदोलन की समर्पित शख्सियत: मनीषा बांगर

उस दौरान डायट में ट्रेनिंग ले रही थी. टीचिंग प्रोफेशन के लिए. ट्रेनिंग के लिए मैं हर बार घर से बाहर जाती थी. उसके लिए मुझे बंदिश नहीं थी. धीरे-धीरे जब इतनी सारी चीजें होती गईं थीं. मैंने समझाने की कोशिश भी की. फिर मैं भी खुलने लगी. मैंने सोचा मैं बोलूंगी. हां मैं बोलने लगी. विद्रोही भी कह सकते हैं इन अर्थो में कि मैं उनकी बात पे मानने वाली नहीं थी. मैं डायरी लिखने लगी. अपनी सारी बातें उसमें लिखने लगी, जो मैं उनसे नहीं बोल पाती थी. मैंने बोलना भी शुरू किया कि ‘आप मेरी शादी कहीं और करा देंगे तो मैं उस लड़के को बता दूंगी. मैं आपको ऑप्शन दे रही हूं कि जिंदगी भर शादी नहीं करूंगी. शादी करुँगी, तो उससे करुँगी. आप नहीं करना चाहते उससे शादी, तो आप मुझे शादी के लिए जिंदगी में कभी फोर्स मत कीजिये. यदि आपको जाति के आलावा लड़के में कोई और समस्या दिखती है कि वह कामयाब नहीं है, अच्छा इन्सान नहीं है, एजुकेशन अच्छा नहीं है, फैमिली अच्छी नहीं है तो आप मुझे बताइए. कुछ तो मुझे ऐसा लॉजिक दीजिये, जाति से अलग इस शादी के खिलाफ.’

सुमित ने अपना काम शुरू किया हुआ था, बहुत ज्यादा कामयाब नहीं थे, लेकिन काम शुरू किया था. हमने शुरू में बात की थी कि हम दोनो नौकरी करने लगेंगे तो हम अपने घर में बतायेंगे. अचानक हमारे सामने परिस्थिति भिन्न थी. सुमित भी बहुत परेशान रहते थे. रात में मुझे कॉल करते रहते थे. उनको डर लगता था कि कहीं मुझे कोई कुछ कर ना दे. पापा को सुझाव भी आते थे कि ‘मार दो लड़की है.’ लोगों ने कहा कि अरे ये तो लड़की है नाक कटवा देगी चमार से शादी करके. पापा ने उन सबको चुप करा दिया. एक बार घर पर मेरा फोन छीन लिया गया था, पापा ने फोन कर के कहा था कि उसका फोन उसे वापस करो और उसका फोन उससे कोई नहीं लेगा. क्योंकि सुमित ने पापा को फोन कर दिया था कि मेरी उससे बात नहीं हो पा रही है.उसने कहा था कि उसे बहुत डर लग रहा है, कि उसको किसी ने कुछ किया न हो. पापा से बात कर लेते थे सुमित. फिर पापा ने मुझसे ये कहा कि तुम्हें कुछ होने नहीं दूंगा. मेरे लिए सबसे लड़ना मुश्किल है, क्योंकि किसी को भी समझाना संभव नहीं है.’ हमारी जॉइंट फैमिली थी, बीस-पच्चीस लोग थे. आस-पास का समाज वैसा ही होता है. पापा का जब ये सपोर्ट आया, मेरे लिए इतना काफी था. वे मेरे पक्ष में खुल के नहीं आ पा रहे थे. क्योंकि चार बेटियां और भी थीं, जो शादीशुदा थीं. मेरी चाची ने जब मेरा फोन छीन लिया तो सुमित ने उन्हें धमका दिया था कि ‘अभी उसका फोन वापस करिये नहीं किया तो मैं पुलिस ले के आ रहा हूं.’ इसी वजह से शायद मैं और मजबूत हो पायी.  उधर सुमित के परिवार के तरफ से कोई मुद्दा नहीं था यह. सुमित के पापा ने मेरे पापा से बात की कि ‘बच्चे जब एक दूसरे को पसंद करते हैं तो हमें कोई समस्या नहीं होनी चाहिए. ये दोनों एक साथ पढ़ते हैं, दोनों क्वालीफाईड हैं तो इस तरह की कोई प्रॉब्लम नहीं होनी चाहिए.’ एक दिन सुमित ने पापा से बात की. सुमित ने कहा कि आप उसको छोड़ने के सिवा जो भी कुछ कहेंगे, वो मैं कर लूँगा, लेकिन मैं उसे छोड़ नहीं सकता.’ पापा ने कहा कि थोड़े दिन रुक जाओ. सुमित कहते थे कि हम कोर्ट मैरेज कर लेते हैं. तुम आ जाओ, मैं सारी चीजें तैयार रखूँगा. मैं ऐसे नहीं आना चाहती थी| मैं यह चाहती थी कि मैं परिवार को मना लूं. अंततः पापा ने कोर्ट में शादी कर लेने की अनुमति दी और 23 नवंबर 2007 हम लोगों ने गाजियाबाद कोर्ट में शादी कर ली.

बाहर और घर, दोनो मोर्चों पर जिसने स्त्रीवादी संघर्ष किया

सुमित की वजह से मेरी सामाजिक गतिविधियों में मेरी रुचि बढ़ी. उन्हें लगता था कि हमें कुछ करना चाहिए. उनके जरिये ही मैंने चीजों को जानना समझना शुरू किया. जब उनका झुकाव मैंने देखा तो मैं भी फिर जानने लगी. मैं भी बातें करने लगी, समझने लगी चीजों को. यहां इस परिवार का माहौल भी ऐसा था कि मैंने यहां अंबेडकर को जाना. इन लोगों ने जब चौदह अप्रैल को एक कार्यक्रम कराया. वहाँ बाबा साहेब के ऊपर बनी फिल्म दिखाई गई. मैंने उस सिनेमा को देखकर बाबा साहेब डा. अंबेडकर को जानना शुरू किया. एक बार  सुमित के साथ मैं उनके गाँव  गई . हमारे घर की और औरतें भी गई थीं. वह मेरे लाइफ का टर्निंग पॉइंट था. वह साल था 2012 का| मैं उस वक्त दूसरे गाँवों  में भी गई, लोगों से मिली. वहां मैंने कुछ चीजें देखीं, जो मेरे लिए बहुत अलग थीं. मैंने मम्मी (सुमित की मां) से तब पूछा कि यहां इतने छोटे -छोटे गाँव हैं, इतनी जल्दी हम  घूम ले रहे हैं. मम्मी ने मुझे बताया कि ये गाँव नहीं है, पूरा गाँव वह है, जो तुम्हें उधर दिखाई दे रहा है- उनका इशारा सामने था. उन्होंने कहा कि ये तो दलितों कि बस्ती है, जहाँ तुम घूम रहे हो. मुझे आश्चर्य हुआ. जिस गाँव से मैं थी, वहां ऐसा नहीं था- दलितों के अलग मोहल्ले थे, लेकिन बस्ती अलग नहीं थी. दलितों की बस्ती यहाँ तो टापू कि तरह लग रही थी. मैंने ये चीजें नहीं देखी थी. जाति भेद-भाव देखा था मैंने. लेकिन ये मेरे लिए सीमा के परे चीज थी कि आपने आशियाना पूरा अलग बसाया हुआ है. यहाँ से मेरी समझ बढ़ी, झुकाव बदला. मैंने देखा कि इन बस्तियों, इनलोगों की खबरें अखबार में पढ़ने के लिए नहीं मिलती थीं. किसी टीवी चैनल पर देखने के लिए नहीं मिलती थीं. उसी समय दलित दस्तक पत्रिका के अशोक दास से भी संपर्क हुआ. तब ये लगा कि इन बस्तियों की खबरें, यहाँ के उत्पीडन की खबरें आयें, बेहतर तरीके से आये तो नेशनल दस्तक का उस समय प्लान दिमाग में आया.

सतपुड़ा की वादियों में सक्रिय आदिवासियों की ताई: प्रतिभाताई शिंदे

नेशनल दस्तक की शुरुआत दिसंबर 2015 में हुई. हालांकि इसकी प्लानिंग और इसे लांच करने में मैं शामिल थी, लेकिन मई 2016 से मैंने  इसका काम पूरी तरह अपने हाथ में लिया.  मुझे लगता है कि जिन बस्तियों, जिन लोगों की मैं बात कर रही हूँ उनके लिए ही जरुरी है ‘दलित-पत्रकारिता.’ नेशनल दस्तक का लोगों ने स्वागत किया है और हम भी लोगों की उम्मीदों पर खरे उतरने के लिए प्रतिबद्ध हैं.  नेशनल दस्तक से  लोगों की उम्मीद आज मेरी जिम्मेवारी है.

स्त्रीकाल का संचालन 'द मार्जिनलाइज्ड' , ऐन इंस्टिट्यूट  फॉर  अल्टरनेटिव  रिसर्च  एंड  मीडिया  स्टडीज  के द्वारा होता  है .  इसके प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें : 

दलित स्त्रीवाद मेरा कमराजाति के प्रश्न पर कबीर

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