क्या ‘महिलायें’ सिर्फ़ ‘पुरुषों’ की जरुरत की वस्तु हैं ??

हिमांशु यादव
जर्मन अध्ययन केंद्र ,गुजरात केंद्रीय विश्वविद्यालय में शोधरत है. संपर्क :9998780243, 9104676458 Email : yadavhimanshu2642@gmail.com


यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः। हमारे देश में यह प्रसिद्ध श्लोक बड़े ही गर्व के साथ हमें सुनाया जाता है . हमें सिखाया जाता है कि महिलाओं की इज्जत करनी चाहिए. बचपन से ही 'रानी लक्ष्मी बाई' जैसी वीरांगनाओं की वीरता के किस्से भी सुनाये जाते हैं . भारतीय समाज में तो स्त्री को देवी तक का रूप दे दिया गया है . धन की देवी, विद्या की देवी, शक्ति की देवी और भी तमाम तरह की देवियाँ हमारे यहाँ मौजूद हैं .

बहुत ही सराहनीय भी है कि हमारे ही समाज की, हमारे ही देश की कुछ महिलाओं ने सफलता के उस शिखर को भी छुआ है जहाँ तक पहुँच पाना अत्यंत ही मुश्किल है . उन महिलाओं के जज्बे को भी सलाम है जिन्होंने अपनी कामयाबी के बलबूते पर हमारे देश के परचम को सम्पूर्ण विश्व में लहराया है . भूतकाल से लेकर वर्तमान तक अनेक महिलाओं ने किसी न किसी क्षेत्र में यह कर दिखाया है कि वे पुरुषों से किसी भी मायने में कम नहीं हैं .

हम इन्हीं सभी बातों, नामों तथा कहानियों में उलझकर रह जाते हैं . हम केवल इतना ही सोच पाते हैं कि महिलाओं को भी बराबरी का अधिकार दिया गया है . हम आंकड़ों में यह देखकर गौरवान्वित महसूस करते हैं कि महिलाओं की साक्षरता दर बढ़ रही है . कुछ कामयाब महिलाओं का उदाहरण देकर, हम यह कह भी देते हैं कि महिलाएं किसी से कम नहीं हैं . परन्तु सच इसके ठीक विपरीत है . सच इतना डरावना है कि हम सच के पास जाने से भी डरते हैं .

हमारे ही समाज में हमें दोयम दर्जे का आचरण देखने को मिलता है . हमारे ही समाज में जहाँ महिलाओं को देवी का दर्जा दिया जाता है, वहीँ उसी समाज में, महिलाओं को डायन भी कहा जाता है .

हमारे ही समाज में,एक तरफ महिलाओं की आज़ादी की भी बातें की जाती हैं तथा वहीँ दूसरी तरफ,उन्हें पर्दे में रहने को मजबूर किया जाता है . हमारे ही समाज में महिलाओं को पूजा जाता है तथा हमारे ही समाज में महिला को दहेज़ के लिए जला दिया जाता है .

मैं स्त्रीवादी नहीं हूँ, तथा ना ही स्त्रीवादियों के विपक्ष में हूँ . परन्तु कुछ सवाल हमेशामेरे दिमाग में कौंध जाते हैं:

1. आखिर हमारे समाज में लड़कियों को युवा अवस्था में आ जाने के बाद घर से बाहर निकलने के लिए अपने चेहरे पर नकाब बांधकर क्यों चलना पड़ता है ?

2.आखिर हमारे समाज में महिलाएं अपने पिता, पति या भाई के नाम से ही क्यों जानी जाती हैं ?

3.आखिर मेरी  पत्नी को मिसेज हिमांशु यादव के नाम से क्यों जाना जाये ? अगर मुझे Mr.ABC(जो भी मेरी पत्नी       का नाम हो) के नाम से जाना जाता है तो क्या बुराई है?

4.आखिर बार-बार हम पिताजी से ही क्यों पूछते रहते हैं कि आप सेवानिवृत कब होंगे ? क्या हमारे घर में हम           कभी अपनी माताजी से पूछते हैं कि वो सेवानिवृतकब होंगी ?

5.क्यों हमारे घर में हमारे माता-पिता हमारी बहनों को ही यह कहते हैं कि आप जीन्स-टीशर्ट पहनकर बाहर मत     जाया करो . क्या कभी हमारे पिताजी या किसी और ने हमें या हमारे भाई को यह कहा है कि जीन्स मत पहना     करो .


यह सब बातें बेशक हमें बहुत ही मामूली प्रतीत होती हैं परन्तु यही सच है . हम कभी भी यह उदाहरण देने से नहीं चूकते हैं कि लड़कियां हमारे रीति-रिवाजों को तोड़कर समाज का नाम बदनाम कर रही हैं . आपके नज़रिये से यह ठीक हो सकता है, पर हम यह क्यों भूल जाते हैं कि ऐसा करने के लिए भी हमने ही उन्हें मजबूर किया हैं . बचपन से ही हम उन्हें एक निश्चित दायरे में बांधना शुरु कर देते हैं . हमारे ही घरों में उन्हें यह सिखाया जाता है कि यह करना है, वह करना है . यह नहीं करना है, वह नहीं करना है . झाड़ू-पोंछा और रसोई से आगे वो सोच ही नहीं पाती हैं .

आप किसी भी एक साधारण सी गाली का उदाहरण ही ले लीजिये . बहन.... से लेकर तमाम तरह की गालियाँ भी महिलाओं को संबोधित कर के ही बनायीं गयी हैं . हमारे ही समाज में संतान उत्पति नहीं होने पर महिला को बांझ कहकर गाली दी जाती है तथा उसी समाज में मासिक धर्म (जो की संतान उतप्ति के लिए जरूरी है) के समय में महिला को अपवित्र समझा जाता है उसके साथ अपने ही घर में अपने ही लोगों द्वारा दोहरा बर्ताव किया जाता है .

‘आदमी की निगाह में औरत’ पुस्तक में लेखक राजेंद्र यादव लिखते हैं कि औरत को हमने केवल सम्भोग करने तथा स्वयं की शारीरिक जरूरत की वस्तु ही समझा है .


मेरा व्यक्तिगत अनुभव भी रहा है, जो मैं आप लोगों से साझा करना चाहता हूँ . मेरी एक महिला मित्र हैं, या यूँ कह लीजिये कि हुआ करती थी. चूँकि अब वो शादी-शुदा हैं तो संपर्क में नहीं हैं . जब उनकी शादी तय हुयी थी,किसी अनजान लडके के साथ पारिवारिक संबंधों के कारण तो उन्होंने विरोध किया परन्तु असफल रहीं . शादी के बाद तथाकथित सुहागरात की रात को उनके पति महोदय उनके कमरे में आये . पास बैठे, बातें की . धीरे-धीरे उन्होंने अपनी पत्नी के उन अंगों पर छुआ जहाँ पर छूना उनकी पत्नी को नहीं भाया . उन्होंने विरोध किया और कहा कि मैं सहज महसूस नहीं कर रही हूँ, आप मेरे लिए अनजान हैं और मैं किसी अनजान व्यक्ति के साथ शारीरिक संबंध नही बना सकती हूँ . पति महोदय को बुरा लगा और उन्होंने कहा कि “अगर मेरे साथ यह सब नहीं करना चाहती हो तो फिर मुझसे शादी ही क्यों की ? मैं बाहर जा रहा हूँ, बाजार में पैसे के लिए औरतें यह सब करती हैं .”

इस घटनाकर्म ने आज मुझे लिखने पर मजबूर कर दिया . इस छोटी सी दर्द भरी कहानी को सुनने के बाद मैं राजेंद्र यादव जी की लिखी हुयी बातों को को नकारने का साहस नहीं कर सकता हूँ . इस छोटे से घटनाकर्म में हमें दो बातें देखने को मिलती हैं . पहली तो यह जब उनके पति महोदय कहते हैं कि ‘अगर मेरे साथ यह सब नहीं करना चाहती हो तो फिर मुझसे शादी ही क्यों की ?’

यह वाक्य हमें यह सोचने पर मजबूर कर देता है कि “शादी”जो की भारतीय समाज में एक पवित्र बंधन माना जाता है, क्या यह इसलिये ही पवित्र है की शादी के बाद पुरुष किसी अनजान महिला (उसकी पत्नी जिसे वो शादी से पूर्व नहीं जानता है) के साथ संभोग कर सकता है, चाहे उसकी मर्जी हो या ना हो ?


दूसरी बात हमारे सामने यह आती है कि आखिर ऐसी क्या वजह है, जो बहुत सी महिलाएं आज भी, आज़ादी के 70 साल बाद भी, पैसा कमाने के लिए अपना जिस्म बेचने पर मजबूर हैं ?

बचपन से ही हमारी मातायें अपने बच्चों को दो अलग अलग तरह का नजरिया देती हैं . बच्चे को वो ही बताती हैं कि यह खिलौना लड़की का है, यह खिलौना लडके का है . यह कपडा लड़की का है यह कपडा लड़के का है . लड़कियां जब युवावस्था में प्रवेश करती हैं तो शरीर में हो रहे अवांछित बदलावों के बारे में वह सबसे पहले अपनी माता या बड़ी बहन से ही निसंकोच बताती हैं . उस समय उसके दिमाग में इतना कचरा भर दिया जाता है कि यह नहीं करना है, वहां नहीं जाना है . एक युवा अवस्था में प्रवेश कर रही लड़की को दूसरी महिला या लड़की द्वारा ही यह बताया जाता है कि लड़कों से दूर रहना है . किसी हमउम्र लडके से ज्यादा खुलकर कोई बात नहीं करनी है . किसी भी हमउम्र लडके के साथ अकेले में कहीं जाना नही है . रात में किसी लडके के साथ रुकना नही है . और भी तमाम तरह की बातें उनके दिमाग में भर दी जाती हैं . उनके दिमाग में इतनी बातें बहर दी जाती हैं की वो हर एक लडके में एक गन्दा तथा हवस से भरा मर्द देखने लगती हैं .

वह उसी लडके के साथ खुलकर बातें करने में संकोच करने लगती है जिसके साथ उसने अपना पूरा बचपन बिताया है . मैंने मेरे निजी अनुभव में आज तक कभी ऐसा नही देखा है जब किसी युवा लडके ने अपनी हमउम्र लड़की को यह कहा हो कि अब तुम जवान हो गयी हो अब तुम मुझसे बातें करना बंद कर दो . या फिर, अब तुम बड़ी हो गयी हो अब तुम मेरे साथ अपनी भावनाएं नहीं साझा कर सकती हो . या फिर, कभी किसी लडके ने कहा हो कि अब तुम जवान हो गयी हो अब तुम मुझे वेसे नही छू सकती हो जैसे पहले छुआ करती थी . शायद ही किसी लडके ने कहा हो कि अब तुम १६-१७ साल की हो गयी हो अब हम गले नहीं मिल सकते हैं .

अगर हम सही मायनों में बदलाव चाहते हैं तो हमें जरुरत है शुरुआत अपने आप से करने की, अपने ही घर से करने की . हमारे माता-पिता को यह सोचना बंद करना होगा कि यह लड़की है इसलिए जीन्स नहीं पहन सकती है . हमें यह सोचना होगा कि जब हम किसी लड़की को बाइक पर बैठाकर घुमा सकते हैं तो हमारी बहन को भी किसी के साथ बाइक पर बैठकर घुमने का अधिकार है . लड़कियों को भी यह सोचना होगा कि जब कोई लड़का आपको पटाने की या फंसाने की बात कर सकता है तो लड़कियां भी किसी लडके को पटा सकती हैं तथा फंसा सकती हैं .


सवाल बहुत से हैं... और हमारी दिन-प्रति दिन बीतती जिंदगी में भी हर पल हर जगह कुछ सवाल हमारा रास्ता रोकते रहते हैं, परन्तु हम अनदेखा कर आगे बढ़ जाते हैं . हम आगे तो बढ़ जाते हैं परन्तु आगे बढ़कर, मुड़कर देखते हैं तो हम पाते हैं की हम बहुत कुच्छ पीछे छोड़ आये हैं . मैं चाहता हूँ आने वाला वक़्त इन सवालों का जवाब दे .

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