सांस्कृतिक पिछड़ापन और हाशिये से उभरती कविता

रविता कुमारी
हिंदी विभाग, गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय हरिद्वार, उत्तराखण्ड ईमेल: ravita_kumari@yahoo.in

भारत सम्मान का वह शब्द है जिसके आगे विश्व नतमस्तक होता है। इसकी कला, संस्कृति, दर्शन, योग और विज्ञान की चर्चा विदेशियों तक ने की है। भारत का वह समाज जो सामाजिक न्याय और आपसी सहयोग में विश्वास करता है और अपने नागरिकों को संवैधानिक रूप से मिलजुल कर रहने का सन्देश भी देता है। सामाजिक समरसता सबको न्याय और स्वतंत्रता देने की बात करती है। कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत विविध भाषाओँ, विभिन्न बोलियों, विभिन्न संस्कृतियों, अस्मिताओं और परम्पराओं का देश है।  सामान नागरिक संहिता यहाँ की विशेषता है। लेकिन जब हम समाज के आंतरिक ढाँचे को ठीक से देखते हैं तब हमें बहुत रूखेपन का एहसास होता है। हमें अपनी शिक्षा पर कोफ़्त होती है कि आखिर हम किस समाज में जी रहे हैं। मनुष्य ही मनुष्य का दुश्मन क्यों होता जा रहा है। वह जाति, वर्ण, वर्ग, अर्थ, कला, इतिहास, संस्कृति, भाषा, समुदायमें बंटकर एक दूसरे की हत्या पर क्यों उतारू है।फिर हम उन तटों तक जाते हैं जहाँ से नदियों को गंद्लाने की प्रक्रिया शुरू होती है। हम संस्कृति के उस स्वरूप तक पहुँचते हैं जिसमें निर्माण और ध्वंश दोनों के तत्व समान रूप से मौजूद हैं।

सभ्य समाज को जहां जीवन जीने के तमाम अधिकार प्राप्त थे तो वही असभ्य समाज को उसके प्रत्येक अधिकारों से वंचित रखकर उसका कई प्रकार से शोषण आरम्भ हो गया। जिससे वे सामाजिक और आर्थिक स्तर के साथ-साथ जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में पिछड़ते चले गये और समाज में उनकी स्थिति दयनीय हो गयी।भारतीय समाज वर्ग-भेद के आधार पर समाज का विभाजन करता है। जिसके संचालन में सबसे अहम भूमिका वेद, उपनिषदों और पुराणों ने निभाई है। जिन्होंने समाज को चलाने के कुछ नियमों और मापदण्ड़ों का निर्माण किया। जिसने समाज के सबसे निचले तबके  हाशियेसमाज से उसके तमाम अधिकार छीनते हुए, उसे पशु की श्रेणी में रख शारीरिक श्रम करने का अधिकारी घोषित कर उसका हजारों वर्षों तक शोषण किया। हाशिये की वैचारिकी के सशक्त हस्ताक्षर कर्मानंद आर्य की कविता ‘संस्कृति का इतिहास भूगोल’ का एक अंश यहाँ देना चाहूंगी।  कविता सम्पूर्ण अपवंचित समाज को कैसे मुखर शब्द नवाजती है:
दम घुटता है
किस संस्कृति की बात करते हो आप
वह संस्कृति जिसने हमें छोड़ दिया पशुवत
चाण्डाल कहके निकाल दिया बस्तियों से
चमार का कहके मजाक उड़ाया
नीचों का नाच कहा / कलाओं का किया अपहरण
हमारी प्रतिभा को नोचकर
दुष्ट बिचौलिए को / सौंप दिया अकादमी
किसी ऐरे गैरे को बना दिया गन्धर्व
सत्ता के भांडों को बना दिया लोक कवि
जिसको तू हमारी संस्कृति कहता है
और लूटता है कला के नाम पर
बता उसमें मैं कहाँ हूँ / उसमें मेरी संस्कृति कहाँ है
(अयोध्या और मगहर के बीच)

हाशिये की कविता मानव को सम्मानपूर्वक जीवन जीने और उसके अधिकारों के पक्ष को प्रस्तुत कर उसे उसके प्रति सजग करती है। हाशियेकवि की कविता अपनी आत्मसन्तुष्टी व सुख के लिए नही अपितु समाज में अपने खोए हुए अस्तित्व और स्वाधीनता की खोज व पहचान का मार्ग है। कविता उसकी मर्मान्तिक पीड़ा, दर्द उसके भोगे-जिये हुए जीवन की गाथा है जो उसे मुक्ति के लिए लगातार प्रेरित करती है। डॉ एन सिंह अपनी अभिव्यक्ति को स्वर देते हुए लिखते है-

झुर्रियों में अंकित है अतीत का इतिहास,/
जिसके पीछे छुपा हुआ, एक दर्द का हास।/
छाया है दूर-दूर सन्नाटा और सूनापन,/
शोषण से कातर है, ये आँखें उदास।
(सतह से उठते हुए)

आदिकाल से ही हाशिये के लोगों की अस्मिता, अस्तित्व और स्वाधीनता को सदैव नकारा गया है। जो किसी न किसी रूप में वर्तमान समय में भी जारी है। हाशिये की कविता का आर्विभाव ही युगों-युगों से चली आ रही परम्परा,दासता, मूलभूत अधिकारों को दिलाना तथा उनमें अपने अस्तित्व, अस्मिता के प्रति चेतना जगाने के कारण हुआ। हाशिये की कविता हाशिये के समाज की वेदना करूणा की सामाजिक अभिव्यक्ति है। उसका कवि अपने समाज की स्वतंत्रता, न्याय और बन्धुत्व की स्थापना के लिए प्रतिबद्ध है। कवि का अपने समाज के प्रति श्रद्धा भाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। वह उस समाज के प्रति विद्रोह करता है जिसने मनुष्य को मनुष्य मानने से इनकार किया, उसका विद्रोह उस समाज के प्रति है जिसने उसके जीवन को अन्याय, अपमान, अत्याचार, बेबसी, लाचारी, गरीबी और गुलामी का पर्याय बना दिया है।

समाज की तरह ही साहित्य और कला में भी एक बड़ा तबका है जिसे जगह नहीं मिली है। जिसे मुख्यधारा होना चाहिए था वह आज भी हाशिये पर पड़ा हुआ है। नगरों शहरों से बाहर है।  नदियों के तट पर और नालों के संघातों पर वह जीवन की रचना कर रहा है। वह अपनी भाषा, कला, संस्कृति, इतिहास को पुनर्जीवित कर रहा है।  ओम प्रकाश बाल्मीकि के शब्दों में कहूँ तो ‘गूंगा नही है वो’।  वह सब समझता है और अपने हक़ के लिए लड़ने मरने को तैयार है। उसके अन्दर भूख प्रबल हुई है। पर वह अपने विधाताओं से पूछ भी रहा है :
वे जो गिडगिडाते रहे / माई-बाप तुम्हारे चरणों में
जो स्याही की तरह फैल गए / अंगूठे के नीचे
फालों के बीच जोत दिए गए
परती की तरह उघाड़ ली गई जाँघों की मिट्टी
उनके बारे में क्या कहता है तुम्हारा इतिहास
तुम्हारी संस्कृति में कहाँ हैं वे लोग
वे स्त्रियाँ जो जलावन की तरह / देश के नाम पर जल गई
उनको इतिहास / तथाकथित इतिहास में
कितना हिस्सा दोगे तुम
(कैसे बाँटोगे इतिहास, अयोध्या और मगहर के बीच)

स्वतन्त्रता मिलने के बाद समाज के शोषित वर्ग में भी अपनी सामाजिक स्थिति को सुधारने व अपने अस्तित्व की लड़ाई के लिए भावना जाग्रत हुई साथ ही उनमें अपनी आत्माभिव्यक्ति के लिए भी चेतना का संचार हुआ। जिसके कुछ रूप हमें हाशिये का साहित्य की विभिन्न विधाओं में देखने को मिलता है। समाज में हो रहे शोषित वर्ग के विरूध भेदभाव, जातिगत तिरस्कार, अपमान, शारीरिक, मानसिक व आर्थिक शोषण, भूख, गरीबी, अस्पृश्यता, बेरोजगारी का चित्रण हाशिये के साहित्यकारों ने अपनी रचना का विषय बनाया है। जिसकी तीव्र अभिव्यक्ति साहित्य की प्रथम विधा कविता में देखने को मिलती है। हाशिये के कवियों ने हिन्दू धर्म, वर्ण व्यवस्था, जाति भेद जैसे तत्वों का अपनी कविता में विरोध किया है।
हाशिये की कविता इस विषमतापूर्ण समाज व्यवस्था, वर्ण व्यवस्था, जाति व्यवस्था के प्र्रति विद्रोह कर अपनी सत्ता और स्वाधीनता के लिए ओर अधिक मुखर हो प्रश्न करती है कि जो वेदना, पीड़ा हमने भोगी है:
क्या उसे महसूस करने की अनुभूति है तुम्हारे पास?-
“तुम क्या जानों/जाति की व्यथा/शोषण की पीड़ा/
अपमानों की यत्रंणा/दासता की वेदना/
क्योंकि तुम्हारे बाप ने नही काढ़ी मरे जानवरों की खाल/
तुम्हारी माँ ने नही ढोया मैला/तुम्हारे बच्चों ने/
घर-घर जुठन की जुहार नही लगाई/
तुम्हें कीड़ों से बजबजाते गंदे नाले के किनारे/
अंधेरे घरों में रहना नही पड़ा/
इसलिए सत्य को देखने की/
अनुभूति और वेदना कहां है तुम्हारे पास।“

हम आज जब अपने इतिहास को उठाकर देखते है तो लगभग सभी धार्मिक ग्रन्थों रामायण, गीता, वेद, उपनिषदों ने सभी सवर्ण कही जाने वाली जातियों के लिए सांस्कृतिक वैधता प्रदान कर उन्हें शिक्षा ग्रहण करने की अनुमति प्रदान की वही दलितों व शोषितों के लिए शिक्षा प्राप्त करने जैसा कोई प्रावधान नही किया है। विभिन्न सांस्कृतिक बदलाओं को अस्मिता का कवि इस रूप में व्यक्त करता है:
अफगानी लाल मिट्टी लगाये
वह अभी अभी लौटा है
बीजापुर, गोलकुंडा, अहमदनगर होते हुए
इसी साल पहुंचा है दिल्ली
अपनी स्थायी राजधानी
यहीं से शासन चलेगा पूरे देश में
विद्रोह बर्दास्त नही किया जायेगा
विधर्मी बक्शे नही जायेंगे
खून बहा दिया जायेगा उन कौमों का
जो उठाएंगी आवाज
(औरंगजेब लौट आया है)

ज्ञान प्राप्ति के अच्छे साधनों के रूप में भी उच्च जातियों द्वारा रचित धर्मग्रन्थों को ही श्रेष्ठ आधार मानकर शोषित जातियों के अनुभव संसार को हमेशा बहिष्कृत कर उन्हें शिक्षा प्राप्त कर शिक्षित होने से सदैव वंचित रखा गया। जो दलितों, शोषितों और पिछड़ों के लिए किसी त्रासदी से कम नही है। स्कूल, कालेजों में दी जाने वाली शिक्षा आज भी जाति आधारित ही है जो समाज में हाशियाविरोधी जाति आधारित संस्कारों, जातिवाद व अस्पृश्यता को ही बढ़वा देकर समाज को विघटन और वर्णवाद की ओर ही ले जा रही है।
समाज की इसी वर्णवादी व्यवस्था ने रोहित वेमुला जैसी अनेकों जिंदगियों को काल के गर्त में समा जाने को मजबूर किया है। एम्स, आई टी, आई आई टी, आई आई एम, जैसे देश के बड़े शिक्षा संस्थान इसके ज्वलंत उदाहरण है। आज का युग विज्ञान का युग है। आजादी के इतने वर्षों के बाद 21वीं सदी में प्रवेश करने पर जहाँ विज्ञान और प्रोद्यौगिकी ने अपने वर्चस्व को चारों ओर कायम किया है। विकास की नित-नई ऊँचाईयों को छूआ जा रहा है। नये-नये प्रयोग व आविष्कार हो रहे है। जीवन जीने की शैली और तौर-तरीके सरल से सरलतम होते जा रहे है। किन्तु विकास और आविष्कार के इस युग में क्या हम सभ्य है?,संस्कृत है? वह जो मजबूर है, लाचार है, गरीबी और भूखमरी से बेहाल है, देश की हाशियेकहे जाने वाली 90 प्रतिशत जनसंख्या आज भी गुलाम है, साधनहीन है।

देश के सरकारी एवं गैरसरकारी क्षेत्रों के संस्थानों में भी अपने सहकर्मियों से अमानवीय-व्यवहार, छींटाकशी, जातिसूचक शब्दों के प्रयोग व कई प्रकार के शोषणों की घटनाएं भी आएं दिन देखने को मिलती है। शिक्षा क्षेत्र में केन्द्र व राज्य सरकारों के अधीनस्थ विश्वविद्यालयों में आरक्षण को सही ढंग से लागू न करने के कारण भी अभी तक गिने-चुने हाशियेशिक्षकों को ही स्थान मिल पाया है। तथा वहाँ के खाली पड़े पदों पर अनावश्यक नियमों को लागू कर दलितो, आदिवासीयों तथा अल्पसंख्यकों को दूर रखने का षड़यन्त्र रचा जा रहा है। जिससे वे अपने समाज, समुदाय, के उत्थान में सहयोग न कर सके जो कि सवर्णों की मनुवादी मानसिकता और सोच को ही प्रदर्शित करता है। हाशियेकविता ऐसे ही व्यक्ति के मन की बेचैनी, कुलबुलाहट व गुस्से को व्यक्त करने की कविता है जो अपनी एक अलग सत्ता और स्वाधीनता के लिए मानसिक प्रताड़ना से सदैव के लिए मुक्त होना चाहती है-
“आदमी की जाति। । । । । । । । । । /
मगरमच्छ सी सभी स्थलों पर खड़ी है/
सिर्फ अछूत को निगलने किसी ओर को नही............... /
यही तो उत्तर आधुनिकता का /
जातिबोध है मानव बोध नही।“

हमेशा ही यह देखा गया है कि दलितों ने जब कही भी नाममात्र की जमीन, नौकरियां प्राप्त की है वहां पर आर्थिक रूप से सम्पन्न समाज द्वारा उनका आर्थिक, सामाजिक व शारीरिक शोषण होने लगता है। उन्हें आगे बढ़ने से रोकने व अपने जीवन स्तर को ऊँचा उठाने से रोकने के लिए हिंसा का सहारा लिया जाता है। जिसके परिणाम स्वरूप गोहाना, खैरलांजी, मिर्चपुर, भगाना, बथानी टोला, जैसी घटनाएं सामने आती है।परन्तु केवल निराशा ही नहीं है. कुछक्षेत्रों में मनुष्यों ने अभूतपूर्व उन्नति की है. वह विकास के पथ पर अग्रसर हुआ है:
तुम्हारी परम्परा से लड़ते हुए हमने जाना है
तुम्हारी परम्परा रूढ़ और काली है
सघन और बदबूदार काइयां, भीतर पड़े हुए जाले बताते है
तुममें वर्षों से हलचल नही हुई
मैंने ट्रेन की टिकटें खरीद ली है
उस ट्रेन की टिकटें जिसका वास्ता विकास से है।

  विकास के मार्ग को खोजने व नव-निर्माण का यह उद्घोष कवि उस समुदाय, उस वर्ग विशेष के लिए कर रहा है। जो अभी तक समाज में अपने लिए कोई सम्मानीय दृष्टि पाने और अपनी स्थिति को बेहतर बनाने में समर्थ नही हो सका है। सभ्यता के विकास के साथ ही प्रारम्भ हो गया था मनुष्य के निरन्तर चिरकालिक सभ्य होने का मार्ग। मनुष्य सामाजिक  प्राणी होने के कारण आरम्भ से ही समूह में रहता आया है। समूह में रहकर ही उसने अपने जीवन का विकास किया। विकास के इसी क्रम में धीरे-धीरे सम्पत्ति के प्रति उसका मोह उत्पन्न होने के साथ ही शरू हुई अपने को अधिक श्रेष्ठ और सभ्य दिखाने की प्रक्रिया। जिसने समाज में वर्ण व्यवस्था को जन्म दिया। समाज की इसी वर्णव्यवस्था ने मनुष्य को मनुष्य में भेद कराने के साथ दासता व गुलामी को जन्म देकर समाज को दो भागों में विभक्त कर दिया। जहां समाज का एक वर्ग सभ्य श्रेणी का माना गया। वही दूसरी ओर समाज में एक ऐसा वर्ग भी तैयार हुआ जिसे असभ्य समाज अर्थात हाशियेसमाज के नाम से जाना गया।

वही हाशिये कीस्त्रियों व बच्चों की स्थिति में भी कोइ विशेष सुधार नही आया है। उनकी स्थिति आज भी दयनीय बनी हुई है। उनकी स्थिति को सुधारने के लिए उन्हें विकास की मुख्यधारा में जोड़ने के लिए केन्द्र व राज्य सरकारों को शिक्षा, स्वास्थ्य, नौकरी, आर्थिक विकास में विशेष कानूनों के प्रावधान रखने और प्रतिनिधित्व को बढ़ाने की बेहद आवश्यकता है। दलितों के प्रति सवर्णों की अनुदार नीतियों व स्थितियों के चलते एन आर सागर आजादी के इतने वर्षों बाद भी दलितों के प्रति गैर दलितों के व्यवहार में कोई सुधार न होने पर कहते हैं-
“देश हुआ आजाद बताओं/
तुमको क्या अधिकार मिला?/
भाई चारे के बदले में नफरत का संसार मिला/
बराबरी की मांग उठाई मार पड़ी, घर-द्वार जला/
आजादी की बात कही सामांतवाद ने सिर कुचला/
खोज करो अपनी आजादी खोई किस जंगल में/
उठो कसम लो!! बदला लोगे उससे तुम हर हाल में।“

निसन्देह हाशिये कीकविता एक ऐसे समाज का स्वर है जिसने सत्ता और स्वाधीनता के लिए एक लम्बी लड़ाई लड़ी है जो वर्तमान में भी जारी है। हजारों वर्षों से जाति प्रथा, वर्ण व्यवस्था का दंश झेलने वाले समुदाय से प्रतिरोध के स्वर धीरे-धीरे उभर रहे है। जो अपने साथ चेतना, जागरूकता, विकास और नव-निर्माण का उद्धोष लिये हुए है। दलित कवि असंग घोष लिखते हैं कि :
कहते हैं दीमकें चाट जाती हैं किताबें
पोथी पतरा और ग्रन्थ
फिर वे क्यों नहीं चट कर पायीं
वेद, पुराण, उपनिषद और मनुस्मृति ?
बताओ तो!
(हम ही हटायेंगे कोहरा)

हम और हमारा समाज भले ही तीसरी सदी में जी रहा हो, पर हम उत्तरआधुनिक होने को लालायित है. कला संस्कृति, इतिहास, साहित्य में ऐसे बनावटी लोगों भरमार है जहाँ हाशिये की आवाज दबी हुई है.मनुष्य ने मनुष्य को बहुत सताया है। स्त्री के रूप में आधी मानवता और दलितों के रूप में एक बडा वर्ग जीता जागता उदाहरण है हमारे सामने। मुख्य धारा को  एक भी आदिवासी लेखक की याद नहीं आती है, जो हमारी हिन्दी के पाठ्यक्रमों में हो। क्या कारण हैं कि आदिवासी रचनाकार साहित्यिक विधाओं में उच्चतर स्थिति में नहीं हैं? क्या लेखन नहीं हैं? क्या प्रकाशन की स्थितियां नहीं हैं या सही समय पर समुचित प्रोत्साहन का अभाव है? यह सब कुछ अंतत: उसी चालाक भद्रलोक के हित में होता है जिसने अधिसंख्यक जन को हाशिये पर धकेलने की साजिशें कींI और यही वर्तमान पूंजी-केंद्रित इस देश का- धन, धर्म और सत्ता का- यथार्थ है, जहां राष्ट्र-समाज ‘इंडिया बनाम भारत’ में विभाजित नजर आता है!

 1. अयोध्या और मगहर के बीच, पृष्ठ79
 2. डॉ एन आर सिंह-सतह से उठते हुए, पृ.-52
 3. अयोध्या और मगहर के बीच, पृष्ठ 99
 4. कंवल भारती-तब तुम्हारी निष्ठा क्या होगी, पृ.-51
5.  अयोध्या और मगहर के बीच, पृष्ठ88
 6. डॉ प्रेम शंकर-अपनी सदी के उपेक्षित, पृ.-32
7.  डॉ कर्मानन्द आर्य-रचनाकार ब्लॉग, 4/2013
8.  एन आर सागर-आजाद है हम, पृ.-52
9. असंग घोष,हम ही हटायेंगे कोहरा, पृष्ठ ८३

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