अपना कमरा : सार्थकता का एहसास



वर्जीनिया वूल्फ की किताब  ‘ A Room of One's Own’ का प्रकाशन 1929 में हुआ था, उसका केन्द्रीय स्वर है कि एक स्त्री का अपने लेखन के लिए अपना कमरा होना चाहिए, अपने निजी को सुरक्षित रखने के लिए भी अपना कमरा, इसके लिए उसकी आर्थिक स्वतंत्रता जरूरी है. 

अनिता भारती 

मैं और मेरे साथ गली के अन्य बच्चे खिड़की पर टकटकी लगाये अंदर देख रहे थे. मैं लगभग सवा चार साल की थी . अंदर कमरे में मेरा छोटा भाई पैदा हो चुका था . उसे दाई पानी भरे तसले में नहला रही थी . गली-मोहल्ले कि औरतें माँ के पास खड़ी थीं. कमरे के नाम पर सबसे पहले यही याद बाकी है .


किराये के कमरे में रहते हुए मैंने कितनी ही बार माँ को स्वयं के मकान के लिए रोते और पिता से झगड़ते देखा, क्योंकि  किराये के मकान में रहते हुए कोई चीज अपनी नहीं होती. बस एक एहसास होता है कि जैसे कोई यायावर किसी सराय में रुके और सोचे रात भर के लिए यह मेरी जगह है. जब मैं पाँचवीं कक्षा में थी, हमारा अगला पड़ाव था गोविन्दपुरी. पिता ने टिन की  छत डालकर दो कच्चे कमरे बनाये. यहां मानसिक रूप से बीमार माँ का अधिकतर समय अपने आप से बातें करने, रोने, चिल्लाने में ही बीत जाता था, इसलिए उस घर को बेच कर फिर पिताजी के रिश्ते की एक बहन के यहाँ आना पड़ा. बुआ का व्यवहार शुरू में अच्छा था, पर मेरी माँ कि बीमारी से तंग आकर उन्होंने अल्टीमेटम दे दिया जितनी जल्दी हो सके, घर खली कर दो. पिता ने इधर-उधर से उधार लिए पैसों से एक सूखे जोहड़ पर पचपन गज का टुकड़ा लिया . वहां न बिजली थी और न ही सड़क और न पानी की कोई सुविधा. जब घर बनना शुरू हुआ, तभी बारिश से हमरे बनाते घर की पूरी छत बह गयी . दोबारा से छत बनी . माँ और पिता विवशता से कभी छत से टपकते पानी को रोकने के लिए रखी कटोरी, गिलास, परात आदि को देखते तो कभी कोने में सिकुड़ कर बैठे अपने छोटे-छोटे बच्चों को.

अपने लिए एक अदद कमरे की आदत हमें नहीं पड़ सकी, क्योंकि कमरे हमारे लिए नहीं, हम कमरों के लिए बने थे . हमें साहित्य का चस्का लग चुका था. पढ़ने के लिए नितांत अकेलेपन की आवश्यकता होती है पर मुझे शोर-शराबे में पढ़ने कि आदत पड़ चुकी थी.हमारा बिस्तर ही हमारा कमरा था. उसी पर लेटे-लेटे न जाने उपन्यास और कहानियाँ पढ़ डालीं.

यहाँ झील और ज्यादा गहरी और शांत हो गयी

1990 के अंत में अमेरिका ने इराक पर जबरदस्ती हमला कर दिया. अमेरिका की  साम्राज्यवादी नीतियों और युद्ध का विरोध करने के लिए दुनिया के अन्य देशों के साथ-साथ भारत में भी ‘खाड़ी शांति दल’ बनाया गया . इस दल का नायकत्व बेला भाटिया और ज्यांद्रेज कर रहे थे. बेला भाटिया से मेरी मित्रता थी . उन्होंने मुझे ‘खाड़ी शांति दल’ में शामिल होने को कहा . हमारा पहला पड़ाव अम्मान का होटल था . यहाँ मैं पहली बार अकेले एक कमरे में रही और वहाँ मैंने कई कविताएँ लिखीं. इराक में उन दिनों कड़ाके की ठंड पड़ रही थी. पीस कैंप में हम फर्श पर दरियाँ बिछा कर सोते थे. सारे ऊनी कपड़े पहनने और रजाई ओढ़ने के बाद भी ठंड नहीं जाती थी. ऐसे ही पन्द्रह-सोलह दिन बीतने पर आधी रात को अचानक पता चला कि अमेरिका पीस टीम को मिसाइल से उड़ाने वाला है. इस सूचना से आनन-फानन में कैंप पूरा खली हो गया. मैं आराम से अपने बिस्तर पर सो रही थी, मुझे पता नहीं चला. हमारे साथी राजीव सिंह ने अपनी जान जोखिम में डालकर मुझे जगाया, ‘सारे लोग जा चुके हैं .
कैंप किसी भी समय उड़ाया जा सकता है और तुम यहाँ सो रही हो!’ हमें पीस कैंप से निकल कर इराक के फाइव स्टार होटल अलराशिद में ले जाया गया . वहाँ सबने अपने-अपने पार्टनर ढूंड लिए. मैं फिर अकेली खड़ी थी. अब केवल डबल बेडरूम वाले कमरे बचे रह गये थे. संकट यह था कि मैं किसके साथ रहती. तभी मैंने देखा कि जो मुझे जगाकर कैंप से बहार लाये थे, वह भी अकेले खड़े थे. अब हम दोनों ही बचे थे, इसलिए हमें एक ही कमरे में रहना पड़ा. मुझे उस समय नहीं पता था कि होटल का वह कमरा मेरे जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन ले आयेगा.

कोने से कमरे तक: चार पीढ़ियों की अन्तर्यात्रा

अगले दिन हमें पता चला कि हमारा पीस कैंप तबाह किया जा चुका है. उसी रात हमरे होटल को निशाना बनाकर मिसाइल दागी गयी . होटल की दीवारें बड़ी जोर से हिलीं, जैसे कि भूकंप आया हो . मैं लुढ़कती हुई कमरे के दरवाजे से जा टकरायी. समझ में नहीं आया कि अचानक क्या हुआ . हमें तत्काल होटल के बंकर में पहुँचाया गया.

विवाह के बाद मेरे सामने कमरे का झंझट नये रूप में खड़ा था . मुझे और मेरे पति को कमरे के नाम पर स्टोर रूम मिला, जो मुश्किल से दस बाई छह का होग. उसमें एक तरफ कबाड़ भरा हुआ था. मैंने कबाड़ को सलीके से सजाते हुए उस कमरे को शयनकक्ष बनाया. हमारे दो साल इसी कमरे में बीते. कितनी ही रातें मुझे और मेरे पति को एक ही करवट सोकर बितानी पड़ीं  उस छोटे से स्टोर रूम ने मेरे अंदर कि चेतना को न केवल मरने से बचाकर रखा बल्कि उसे और धार दी  ज़िंदगी ने मुझे अपने कमरे के होने कि सार्थकता और निरर्थकता के अंतर को बखूबी समझा दिया.

अनिता भारती साहित्य की विविध विधाओं में जितना लिखती हैं , उतना ही या उससे अधिक सामाजिक मोर्चों पर डंटी रहती हैं  खासकर दलित और स्त्री मुद्दों पर. सम्पर्क : मोबाईल 09899700767.

यह लेख द मार्जिनलाइज्ड प्रकाशन से प्रकाशित मजिद अहमद द्वारा संपादित किताब 'मेरा कमरा' में संकलित है. किताब ऑनलाइन खरीदें. लिंक पर क्लिक करें : 
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जाति के प्रश्न पर कबीर
दलित स्त्रीवाद 

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