शंखमुखी शिखरों का कवि : लीलाधर जगूड़ी

रविता कुमारी
हिंदी विभाग, गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय हरिद्वार, उत्तराखण्ड ईमेल: ravita_kumari@yahoo.in

साहित्य में विचारधारा को उत्तराधुनिकता के नाम से जाना जा रहा है. आजकल इसकी चर्चा जोरों पर है. केन्द्रीय वर्चस्व को अंगूठा दिखाकर यह स्थानीयता और उसकी विभिन्नताओं पर यह बल देती है. उत्तर आधुनिकतावाद अब बहुसंस्कृतिवाद या बहुलतावाद पर आधारित नया विमर्श है.आज के लिखे को समझने के लिए एक पूरी व्यवस्था पर नजर डालनी होगी. यह एक ऐसी अलग वैश्विक व्यवस्था है जिसमें छोटे से छाटे शहर की सीमाओं को अपने  पाश में जकड लिया है. इसमें चीजे बहुत सरल नहीं है, इसे कुछ ऐसे समझा जा सकता है कि आधुनिकता में उच्च तथा सुसंस्कृत वर्ग राजनीतिक जीवन पद्धति और कला संस्कृति का नियामक था. उत्तराधुनिकता ने इस को भी समाप्त कर दिया. यह केंद्र के लोगों को परिधि पर ले आया और परिधि के लोगों को केंद्र में लाकर समय के पहिये को पलट दिया. जहाँ उपेक्षितों, शोषितों, दलितों, स्त्रियों, समलैंगिकों को प्रमुखता दी जाने लगी. उत्तराधुनिकता ने लेखक कि महत्ता को नकार दिया. यहाँ पाठक का महत्व बढ़ गया. इसने यह भी मानने से इनकार कर दिया कि विज्ञान के पास सब समस्याओं का हल मौजूद है.

यह वही समय है जब बहुजन और समाजवादी राजनीति का चरम, शिक्षा मध्यम जातियों की ओर आती है. यह वही दशक है जब इस दसक में विद्रोही स्वर कवितायेँ लिखी गईं. यह वही समय है जब कविता में सबाल्टर्न स्टडीज, आइडेंटिटी पॉलिटिक्स, उत्तर आधुनिकतावाद, उत्तरमार्क्सवाद,  उत्तर उपनिवेशवाद आदि से कवि गहरे प्रभावित होते हैं और यही समय है जब मध्यवर्गीय अवसरवादी (कथित वामपंथी) की मौका परस्ती और दोमुहँपन कविता में खुलता है. यदि इसे जनभाषा में कहा जाय तो यह वही समय है जब ‘साहित्य के पटवारी’ अपनी चकबंदी करते हैं और विचारधारा से आक्रांत सगा-सौतेला, चचाजात, भाई-विरादर है या नहीं कि ठीक ठीक पहचान भी. १९९० के बाद साम्प्रदायिक फासीवाद और पूंजीवाद भारत में उभरा है जिसमें छोटे बडा़ नौकरशाह, लुटेर डॉक्टर, ठग वकील, पूंजी के दलाल, मीडिया, एनजीओ और मिल बांट खाने और चुप रहने वाली संस्कृति के रहनुमा एक अलग अर्थ में विस्तार पाते हैं.
पद्मश्री, साहित्य अकादमी पुरस्कार, रघुवीर सहाय सम्मान आदि से सम्मानित तथा ‘शंखमुखी शिखरों पर’, ‘नाटक जारी है’, ‘इस यात्रा में’, ‘रात अब भी मौजूद है’, ‘बची हुई पृथ्वी’, ‘घबराए हुए शब्द’, ‘भय भी शक्ति देता है’, ‘अनुभव के आकाश में चाँद’, ‘महाकाव्य के बिना’, ‘ईश्वर की अध्यक्षता में’, ‘खबर का मुँह विज्ञापन से ढँका है’ आदि ग्यारह से अधिक कविता संग्रहों के वरिष्ठ कवि लीलाधर जगूड़ी आज 75वें वर्ष में प्रवेश कर गए. लीलाधर जगूड़ी उसी समय और सन्दर्भ के ऐसे सशक्त रचनाकार हैं जो भाषा और अनुभव के बीच एक ऐसा वितान रचते हैं जो अन्य कवियों में दुर्लभ है. भाषा में उन्होंने एक नया सौन्दर्यशास्त्र गढ़ा है. उनकी कविता का विराट जीवन और प्रतिबद्ध रचनात्मकता उनकी कविता में एक साथ देखी जा सकती है जो उन्हीं के समय के कवियों में विरल है. लीलाधर लिखते हैं :
पुलिस लाइन में आज क्या हो गया
पुलिस लाइन में पुलिस पर पुलिस हँस रही है.

उनकी कविता सिर्फ स्फीति नहीं है परन्तु विचार्रों का संकुल है. वह शुरू होकर कभी खत्म नहीं हुआ करती. अनुभव के आकाश में उनकी कविता चाँद है. उनकी रचनात्मकता सृजनशीलता के अनुभव से जन्मती है. अपनी भाषा से वे सर्जनात्मकता को नया टूल देते हैं. वे बार-बार दुहराई गई बातों को नए कथ्य और शिल्प के साथ प्रस्तुत कर अचंभित कर देते हैं. वे भोगी हुई तल्लीनता और तार्किकता को अपनी कविताओं का विषय बनाते हैं. सरलता और सहजता के हामी शायद ही कभी जान पायें कि कठिन को सरल रूप में कह पाना कितना कठिन होता है. अनुभव, भाषा और संवेदना के वैविध्य के लिए उन्होंने स्वयं ही कहा है-'भाषाएं भी अलग-अलग रौनकों वाले पेड़ों की तरह हैं. सबका अपना अपना हरापन है, कुछ उन्हें काट कर उनकी छवियों का एक ही जगह बुरादा बना देते हैं.'

चार्वाकी संस्कृति में आज का मनुष्य सुख और चैन से नहीं रह सकता. पहले कर्ज को बुरा माना जाता था परन्तु आज का मनुष्य है जो आधे से अधिक कर्ज में डूबा हुआ है. आज कर्जा उसकी आर्थिक समृद्धि का परिचायक है. ‘अनुभव का सामाजिक अन्वय’ नामक अपने वृहद् आलेख में ओम निश्चल उनकी रचनात्मक प्रतिबद्धता के बारे में लिखते हैं कि :
‘जगूड़ी की कविता न तो पारंपरिक कविता की लीक और लय पर चलती है न आजमाए हुए बिम्ब-प्रतीकों का अवलंब ग्रहण करती है. यह कवित-विवेक के अपने खोजे-रचे प्रतिमानों और सौदर्यधायी मानदंडों फर टिकी है. रीति, रस,छंद और अलंकरण के दिखावटी सौष्ठव से परे यह आधुनिक जन-जीवन में खिलती प्रवॄत्तियों, उदारताओं, मिथ्या मान्यताओं, व्याऔधियों, किंवदन्तियों, क्रूरताओं का  खाका खीचती है. इसमें बरते गए शब्द आधुनिकता के स्वप्न और संघर्ष की पारस्प रिक रगड़ से उपजे हैं. पर्यावरण को ये कविताऍं चिंताओं और सरोकारों के नए धरातल से देखती हैं. इनमें सब कुछ के लुट जाने का और लुटते हुए को बचा लेने का हाहाकारी शोर और रोर नहीं है.

 कितना कुछ बदला है. शक्तिशाली लोग सारे संसाधनों को अपना इलाका मान चुके हैं. वे सब कुछ लूट लेना चाहते हैं. इक्कीसवीं शताब्दी सूअरों की शताब्दी है. डा. कृष्णदत्त पालीवाल अपने एक आलेख में लिखते हैं कि ‘मिलेनियम ईयर’ का भूत मेरे ऊपर सवार है. यह कौन है जो मुझे हर जगह हर अवसर पर अकेला पाकर पकड़ लेता है और फिर कहता है-‘सुनो हजरत! इक्कीसवीं शताब्दी खाते पीते सूअरों की शताब्दी होगी.’ हालाँकि जीवन का संघर्ष चलता रहता है. यह लड़ाई कभी खत्म नहीं होती है. अपनी ‘लड़ाई’ कविता में हम देखते हैं :
दुनिया की सबसे बड़ी लड़ाई आज भी एक बच्चा लड़ता है
पेट के बल, कोहनियों के बल और घुटनों के बल
लेकिन जो लोग उस लड़ाई की मार्फत बड़े हो चुके
मैदान के बीचों-बीच उनसे पूछता हूं
कि घरों को भी खंदकों में क्यों बदल रहे हो?
जानते हो यह उस बच्चे के खेल का मैदान है
जो आज भी दुनिया की सबसे बड़ी लड़ाई लड़ता है
इस शताब्दी में आदमी की ‘आदमियत’ का कोई अर्थ नहीं बचेगा. आदमी का सूअर की जीवन पद्धति से जीना- मुक्त यौनवाद को गह लेगा.
लीलाधर जगूड़ी अपनी ‘अंतर्देशीय’ कविता में समाज के इसी के अंतर्द्वंद्व को व्यक्त करते हैं:
इस पत्र के भीतर कुछ न रखिए / न अपने विचार. न अपनी यादें
इस पत्र के भीतर कुछ न रखिए / न अपने संबंधों की छाप
न दुख, न शिकायतें / न अगली मुलाकात का वादा
न सक्रांमक बीमारियाँ / न पारिवारिक प्रलाप
न अपने हस्ताक्षर / वरना यह पत्र पकड़ा जा सकता है

उत्तर आधुनिकता को समझे बिना हम अपने समय को नहीं समझ सकते . आधुनिकता ने ईश्वर और प्रकृति के बीच मनुष्य को देखा. हमें यह समझना इसलिए भी जरुरी है क्योंकि बिना इस बोध के हम समकालीन समाज और उसके सरोकारों को ठीक से नहीं समझ पायेंगे . उत्तर आधुनिकता विचारों, प्रवृत्तियों, बौद्धिक रुचियों का समुच्चय है. उत्तर आधुनिकता सुचना युग, बहुराष्ट्रीय पूंजीवाद के वर्तमान पात्र के उस संस्कृति का नाम है जिसमें केन्द्रवाद नहीं है. इसमें वह प्रवृत्तियां घर कर रहीं है जहाँ हासिये के लोग अब केंद्र की तरफ बढ़ पा रहे हैं. इसके अर्थ बहुत व्यापक हैं और इन्हें सीमाओं में बाँधा नहीं जा सकता. सब कुछ माल में परिवर्तित हो गया है.
प्रकृति के अपार संहार से रिश्ते घावों का मवाद बन चुके है. सूचना संक्रांति का ड्रैगन अपना जाल फैला रहा है. नव अर्थशास्त्र की हवा निकल चुकी है. नारीवाद, गे-कल्चर, मुक्त यौनवाद सभी को स्वीकृति कर दुनिया कचरे के ढेर में परिवर्तित होती जा रही है. इसी के साथ जहाँ आधुनिकता का अवसान और उत्तर आधुनिकता का शिगूफा नए अर्थों में जन्मता है. अब यह समय कुंठित राष्ट्रवाद की तरफ लौटने का भी है. भले ही यह माना जाय आधुनिकता के बाद उत्तराधुनिकता पश्चिम के समाज और दर्शन की एक ऐतिहासिक यात्रा है.
साहित्य और समाज में मीडिया और मार्केट की मित्रता और गहरी हुई है. हर अनुभव सूचना बन रहा है और अर्थ की स्थिरता नहीं बची रही. वर्ग जाति में बदल गया है. दलित, स्त्री, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों की अभिव्यक्तियों को और उनकी अस्मिताओं को स्वीकृति मिल रही है. उपभोक्तावाद ने सत्ता के खिलाफ हिंसा बढा दी है. लेकिन ऐसी मीठी सड़ांध कि सब अच्छा लगता है. मंद गति से होने वाले इस सांस्कृतिक संक्रमण से संस्कृतियों की पहचान को भी कोई खास नुकसान नहीं होता. ''मेरी आत्माद लोहार है’ में लीलाधर लिखते हैं कि :
ज़िन्दागी से रोज लोहा लेती है /मेरी आत्माह धोबी है
मन का मैल ऑंसुओं से धोती है/ मेरी आत्मात कुम्हाबर है
सपनों की मिट्टी से आकार बनाती है / मेरी आत्मा  बढ़ई है
रोज़ कोई न कोई विचार खराद देती है.

सन् साठ आजादी के बाद के मोहभंग का एक ऐसा मोड़ है जिसने केवल राजनीति की दिशा ही नहीं बदली, साहिात्यिक विधाओं के कथ्य और फैब्रिक को भी दूर तक प्रभावित किया. कविताओं को देखें तो साठोत्तर पद इसी मोड़ का परिचायक है. अकविता के उन्माद को चीर कर आगे बढ़ना वाकई कठिन था. पर धूमिल और जगूड़ी ने एक रास्ता बनाया. विक्षोभ और मोहभंग को तार्किकता में रूपायित करने की चेष्टा की. समाज के सन्दर्भ को उन्होंने कविता में ढाला. सारा ईंट-गारा अपने समय और सन्दर्भ से लिया. संसद से सड़क तक में यदि धूमिल अपने समय को रूपायित करते हैं तो नाटक जारी है में जगूड़ी अपने समय को. लीलाधर लिखते हैं कि बाद के दिनों में प्रकाशित रात अब भी मौजूद है, बची हुई पृथ्वी, घबराए हुए शब्द, भय भी शक़्ति देता है--उस वक़्त की राजनैतिक, आार्थिक और सामाजिक हलचलों, अन्तर्ध्वृनियों का ही काव्याुत्मक विस्फोट हैं.
भोगवादी संस्कृति ही सब पर हावी है. गत सदी के अंतिम दो दशकों में हुई संचार क्रांति से पहले हालात दूसरी तरह के थे. विकसित संचार माध्यमों के अभाव में पहले सांस्कृतिक संक्रमण से होने वाले प्रतिरोध और आत्मसातीकरण में अक्सर समाज के सभी तबके शामिल नहीं होते थे. अक्सर समाज के कुछ तबकों में परिवर्तन हो जाते,  धीरे-धीरे उन्हें स्वीकृति भी मिल जाती और मामूली प्रतिरोध के बाद उन्हें संस्कृति का हिस्सा भी मान लिया जाता है .

भय भी शक्ति  देता है, अनुभव के आकाश में चाँद और ईश्वर की अध्यक्षता में जैसे बेहतरीन संग्रह जगूड़ी ने दिए.भय भी शक्तिक देता है की दर्जनों कविताऍं आधुनिक अर्थतंत्र, बाजारवाद और भूमंडलीकरण की आगत आहट को लेकर लिखी गयी थीं, जब उदारीकरण और भूमंडलीकरण की चर्चाऍं भी शुरू नहीं हुई थीं और अब उनके नवीनतम संग्रह खबर का मुँह विज्ञापन से ढका है---को देखें तो यह संग्रह न तो पुराने संग्रहों की जूठन से रचा गया है न पुराने अनुभवों का नवीन विस्तार है. यहॉ पुरानी सारी प्रविधियों को अलग रखते हुए सर्वथा नए ढंग से बात कहने की कोशिश है.

लीलाधर जगूड़ी की कविता विपत्ति में भी एक पुल का निर्माण करती है. वे बेहद तात्कालिक सामाजिक विषयों को जीवन-पद्धति से अदृश्य कारणों तक ले जाते हैं जहाँ चीजें भी मनुष्यों के बारे में सोच रही होती हैं. इसीलिए कवि कहता है कि चीजों के बारे में सोचना अब सरल नहीं रह गया है. जगूड़ी की प्रत्येक कविता का कथ्य और विन्यास देख कर लगता है कि अब कविता खुद अपने नए औजार पैदा कर रही है. उन्हें  पुराने औजारों से नहीं जाँचा जा सकता. संसाधन किसी का नहीं होता. कविता की यह सीढ़ी, नामक कविता मेंकवि कहता है कि दुनिया मुझे रोज बनानी पड़ती है. वे अपनी पेड़ कविता में लिखते हैं:
नदियाँ कहीं भी नागरिक नहीं होतीं / और पानी से यादा कठोर और काटनेवाला
कोई दूसरा औजार नहीं होता / फिर भी जो इस भयंकर बाढ़ में अपनी बगलों तक डूब कर खड़ा रहा
वह अतीत के जबड़े से छीन कर अपने टूटे हाथों को फिर से उगा रहा है
इस सपाट जगह के बाद उस कोने पर
जहाँ ढाल करीब-करीब बाईं ओर के अँधेरे में पड़ गया है

मुझे कुर्सी से उठ कर उससे मिलना चाहिए आलोचक या समीक्षक ही अपनी पुरानी नसैनी से यहाँ कैसे चढ़ सकता है—पहाड़ों पर खाइयों में नदियों में रास्ते-सी सीढि़याँ गिरी पड़ी दिखती हैं/ फिर भी जिस-जिस रास्ते से जाना होता है/उसे वह सीढ़ी खुद बनानी होती है/ एक एक कदम कविता में जैसे छोटे-छोटे वाक़्य/ हर नए कदम फर नए डंडे बिठाने पड़ते हैं--हवा में/....तब कहीं एक कविता उतर पाती है पृथ्वी पर...और चढ़ पाती है बिना शीर्षक के शीर्ष पर भी.---यही सीढ़ी उस रास्ते तक पहुँचाती है जो एक मजदूर दम्पीति के जीवन में जाता है लेकिन जिस रास्ते से वे बिल्कुल किनारा किए रहते हैं. उसी तकलीफ को समझने से पत्रकारिता की भाषा में वह कविता लिखी जा सकी जो एक रिपोर्ट जैसी है और जिसका उद्देश्य न प्रथमतः, न अंततः कविता होना नहीं था. भाषा, हालत का साथ नहीं दे रही है. जैसे रखे-रखे उड़ गया हो पानी का बोझ और गुस्सा.
लीलाधर अपने एक निबंध में लिखते हैं कि ‘जब भी मैं कविता के बारे में सोचता हूँ, मैं उन छूटी हुई घटनाओं की ओर चला जाता हूँ जो अतीत होकर भी व्ययतीत नहीं हो पाती हैं. वे हर नये मौसम के बादलों की तरह आपस में मिल जाती हैं और छा जाती हैं. भाषा वही होते हुए भी, वह हर अनुभव की अभिव्य क्ति में कोई न कोई सहज बदलाव प्राप्तह कर लेती है. 'जाने-बूझे' में भी एक अनजानापन पैदा हो जाता है. क्या  है जो कहा नहीं गया है फिर भी कविता कुछ नया ले आती है. यह संवेदना और भाषा का नया रिश्ताे भले ही कठिन और अटपटा लगता हो, लेकिन उसकी मनसा अपने समय में सरल और बोधगम्य  होने की ही रहती है.
बी.ए.पास रिक्शावाले की कविता
उस जगह को याद रखे हुए जिसे छोड़ आया हूँ / पहाड़ की चोटी पर
श्रम और पूँजी और विनिमय के बीच में
गमछे भर आधी करवट लेटने की जगह ढूँढ़ता हूँ मैं
शहर के कूड़े से बने रपटे में / सैकड़ों दिन की कड़ी मेहनत कठिन बचत से
उलझे हुए अपार जगत व्यापार में क्या-क्या पा सकता हूँ मैं
एक तो तिरछा ढाल जिस पर से मेढ़क भी गिर पड़े
चिड़िया भी रपट जाए

हर बार कलफदार भाषा कविता की पहचान नहीं होती है. आज का कवि केवल कल्पना का कवि नहीं रहा है. वह जीवन के कटु यथार्थ को बड़ी संजीदगी से साध रहा है. वह तुकें और अन्त्यानुप्रास भिड़ाने वाला प्राणी नहीं है. सूखे समाज में लहरें पैदा करने वाली विज्ञापन टीम फर उसकी पैनी नज़र है. आज की कविता केवल वही कविता नहीं है जिसमें वैश्विक परिदृश्य हों बल्कि आज की कविता वह कविता है जो ग्लोबल होने से पहले है. भारतीय समाज के यथार्थ से हटकर हम आज की कविता को नहीं देख सकते. अस्सी के बाद कविता की भाषा और संवेदना में जिस तरह का बदलाव आया है उसी का एक नमूना मात्र हैं जगूड़ी की कवितायें. वे बदलाव, विकास, आधुनिकता, तकनीकि संचार और नवाचारों का विरोध नहीं करते बल्कि उसे नोटिस में लेकर उससे लगातार जूझते हैं. उनकी कविता सम्पूर्ण मानवता की कविता हो जाती है. वे जंगल, पहाड़, नदी, नाले और अभिवंचित वर्ग की पीड़ा को अपनी कविता में उड़ेल देते हैं.

 1. https://samalochan.blogspot.com/2015/07/blog-post.html
 2.  खाते पीते सूअर की शताब्दी, उत्तर-आधुनिकता और दलित साहित्य, कृष्णदत्त पालीवाल, पेज-277
 3.http://www.hindisamay.com/writer/leeladhar
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