हम तुम्हारा बलात्कार कर देंगे: भारत माता की जय!

 संजीव चंदन 

ऐसा नहीं है कि उन्होंने पहली बार गुरमेहर कौर को और उसके दोस्तों को ही बलात्कार की धमकी दी है- ऐसा वे पहले भी करते आये हैं, क्या फर्क पड़ता है वे किस छात्र संगठन में हैं या किस समूह में- वे राष्ट्रवादी हैं, उनके राष्ट्रवाद का मतलब है 'हाई कास्ट हिन्दू मेल', यानी 'सवर्ण हिन्दू पुरुष'. उनका राष्ट्रवाद लिंग केन्द्रित है- फैलससेंट्रिक.

वे स्वयंभू राष्ट्रवादी किसी अल्पसंख्यक की आवाज को पाकिस्तान भेज देना चाहते हैं, किसी दलित की आवाज पर आवाज पर उसे पीटना चाहते हैं, उसे मरने को मजबूर करते हैं, किसी स्त्री की आवाज को बलात्कार से दबा देना चाहते हैं- ऐसा करते हुए उन्हें कथित भारत माता की जय कहने में उन्माद और अतिरेक का आनंद आता है, भारत माता की जय, वन्दे मातरम या जय श्रीराम - वे ऐसा कुछ भी चीख सकते हैं, जब वे राष्ट्रवादी उन्माद में होते हैं.



वे सत्ता के संरक्षण में इतने निर्भीक होते हैं कि घटना-दर-घटना अंजाम देते जाते हैं और सत्ता का शीर्ष उनके बेशर्म बचाव में खड़ा हो जाता है, वह भी राष्टवाद की ढाल के साथ. अभी ज्यादा दिन नहीं हुए, कुछ ऐसे ही सिरफिरों ने एक लेखिका नीलिमा चौहान  के खिलाफ भाषिक बलात्कार को अंजाम दिया तो उसके भी पहले कविता कृष्णन जैसी सक्रिय एक्टिविस्ट के खिलाफ भी या दिल्ली विश्वविद्यालय की एक प्रोफ़ेसर के खिलाफ भी. सोशल मीडिया में ऐसे कई उदाहरण हैं 10वीं की छात्रा कनुप्रिया इन राष्ट्रवादियों के भाषिक हमले का शिकार हुई.  वे ऐसा हर रोज करते हैं. गुरमेहर कई और भी हैं- वे सब, जो उनके सवर्ण-पुरुष केन्द्रित, लिंग केन्द्रित राष्ट्रवाद से अलग भी किसी राष्ट्र को जानते समझते हैं.

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संकट कई और भी हैं- उनकी आक्रामकता इतनी प्रबल है कि हम सब राष्ट्रवाद-राष्ट्रवाद के शोर में शामिल हो गये हैं, जिसे 20वीं सदी में ही रवींद्रनाथ टैगोर जैसे लोगों ने नकार दिया था. ऐसा भी नहीं है कि सत्ता संरक्षित यह बलात्कारी राष्ट्रवाद एकतरफा विजयोन्माद में हो, उसे गुरमेहर जैसे कई लडकियां चुनौती दे रही हैं, कई लड़के चुनौती दे रहे हैं- उसके खिलाफ संवेदनशील लोगों की एक पूरी जमात है. दिल्ली विश्वविद्यालय में सामूहिक प्रतिरोध के लिए जुटे लोग ऐसा ही तो सन्देश दे रहे हैं. ये वे लोग हैं, जो पुणे से लेकर, हैदराबाद तक, जेनएनयू ,दिल्ली विश्वविद्यालय से लेकर जाधवपुर तक लगातार प्रतिरोध कर रहे हैं- सत्ता की निरंकुशता को इन लोगों से डरना चाहिए.

गुरमेहर कौर 

संकट यह है कि एक तार्किक बात को वे अतार्किक सेलिब्रेटी चकाचौंध से दबा देना चाहते हैं. पहले उनके पास एक अनुपम खेर होते थे, इस बार तो वीरेन्द्र सहवाग, गीता फोगट से लेकर योगेश्वर दत्त तक की फ़ौज खड़ी है. राष्ट्रवादियों की ही ‘कारगिल भावुकता’ से ‘खेल राष्ट्रवाद’ की भावुकता लड़ने को तैयार है. इस सब के बीच वह लडकी, 20 साल की लडकी गुरमेहर जो कहना चाहती थी, वह तो कहीं पीछे ही छूट गया. दरअसल बलात्कारी राष्ट्वादियों की जमात अपने बनाये दायरे से बाहर कुछ समझना नहीं चाहती, समझना उनके वश की बात नहीं है, क्योंकि उनकी समझ पर नागपुर (संघ मुख्यालय) का ब्रेनवाश हावी है.

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संकट यह भी है कि गुरमेहर कौर से मुकाबले के लिए इन बलात्कारी राष्ट्रवादियों के पक्ष में कुछ स्त्री चेहरे भी सामने आ जाते हैं- जो छात्र संगठनों से लेकर दुर्गावाहिनी तक सक्रिय रहते हुए यह सोच भी नहीं पाते कि बलात्कार की यह भाषा कैसे उनके खिलाफ भी एक स्टेटमेंट है, उनकी सक्रियता के खिलाफ भी एक चेतावनी. वे फैलससेंट्रिक राष्ट्रवाद के पक्ष में खडी एक टूल भर ही तो होती हैं अन्यथा एक स्त्री का भाषिक बलात्कार या उसे मिलने वाली बलात्कार की धमकी उनके लिए सुकून और राष्ट्रवादी स्वर्ग का विषय कैसे हो सकती है. यह समझ से परे है कि किसी की चेतना इतनी कुंद कैसे की जा सकती है कि वह अपने ही वर्ग के खिलाफ एक हथियार की तरह इस्तेमाल होने लगे. गुरमेहर के खिलाफ किसी गीता फोगट या किसी जोशी, झा को देखकर आश्चर्य और दुःख होता है.

गुरमेहर कौर का शान्ति सन्देश, जिसके सन्देश समझने की बजाय तथाकथित राष्ट्रवादी उन्हें ट्रोल करने लगे...




दुखद यह भी है कि आज जब विश्वविद्यालयों सहित पब्लिक स्पेस पर पीछे छूट गये समूहों की भागीदारी बढ़ी है, बल्कि यह सिलसिला शुरू ही हुआ है, तभी सवर्ण-पुरुष केन्द्रित विमर्श, भाव और भाषा का माहौल बन रहा है. बलात्कार की ये धमकियां इस स्पेस को पुनः छीन लेने की कवायद ही तो हैं.

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सुखद यह है कि बलात्कारी राष्ट्रवाद के खिलाफ दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रदर्शनों में लड़कियों की बहुतायत देखने को मिल रही है. ऐसा देश भर में हो रहा है. हम सब उम्मीद ही कर सकते हैं और इस उम्मीद को सफल बनाने में शामिल हो सकते हैं कि समय को पीछे की ओर ले जाने की जिद्द पर अड़े बलात्कारी राष्ट्रवादियों को एक दिन हार माननी ही पड़ेगी!

बहनों, हम तुम्हारे संघर्ष में तुम्हारे साथ हैं, लेकिन इस लड़ाई की अगुआई तुम्हें ही करनी चाहिए. और हां, थकना नहीं या पीछे नहीं हटना, इतिहास से सबक सीखो, क्योंकि लड़ाई के मोर्चे और भी हैं, जहां तुम्हें होना चाहिए ! यह लड़ाई सामूहिकता और निरंतरता की लडाई है, क्योंकि बलात्कारी राष्ट्रवादी तुम्हें शुंग काल में खीच ले जाना चाहते हैं, मनुस्मृतीय विधानों में जकड़ देना चाहते हैं.

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