चलो नागपुर! मनुवाद और हिन्दुत्व के खिलाफ महिलाओं का संर्धषषील कदम

यह रोज-रोज नहीं होता कि दलित, मुसलमान, आदिवासी, बहुजन, अल्पसंख्यक,समलैंगिक महिलायें, किन्नर (ट्रांसजेण्डर), सेक्स वर्कर, खाना बदोस, जनजातियों की महिलायें, छात्र छात्रायें और वह तमाम लोग जिनके साथ जाति वर्ग धर्म समुदाय यौनिकता, जेण्डर,अक्षमता, व्यवसाय या उम्र की वजह से भेद भाव किया जाये वो एक साथ एक जुट होकर उन समप्रदायिक ब्राहम्णवादी, सामन्ती, जातिवादी, पूंजीवादी, पितृसत्तात्मक ताकतों के खिलाफ आवाज उठायें। यह भी रोज-रोज नही होता कि तमाम प्रकार के लोग एक जगह एकत्रित होकर क्रान्तिज्योति सावित्री बाई फुले का  स्मृति दिवस मनायें और इसलिये हम रोज-रोज चलो नागपुर भी नहीं कहते।



10 मार्च 2017 को करीब 5 हजार महिलायें जोकि महाराष्ट्र, राजस्थान, दिल्ली, उ0प्र0, गुजरात, आन्ध्रा, तेलांगाना, छत्तीसगढ़, कर्नाटक, केरल और बिहार से तालुक रखती हैं नागपुर में सावित्री बाई फुले की 120वीं स्मृति दिवस पर एकजुट होकर नफरत, अन्याय और प्रभुत्ववादी ताकतों के खिलाफ एक जोरदार प्रदर्शन करेंगीं। गीत, नृत्य, कला, कविता और रंगमंच जैसे माध्यमों से हम फैली असमानता और असहिसुणता गांव शहरों युनिवरसिटी कैम्पसों में, कार्यस्थलों पर, घरों से सड़कों पर, जहां हमें खामोश कर देने की कोशिशें हैं, ताकतें हैं, उनसे मोर्चा लेंगें। हम उठेंगे अपने आवाज के लिये, अपने हकों के लिये, अपनी सुरक्षा के लिये, जो इस देश का संविधान हमारे लिये निधार्रित करता है। हम मिलकर दोहरायेंगें कि एक धर्म निरपेक्ष व एक प्रजा तांत्रिक देश में किसी को  यह हक नही है कि वहकिसी व्यक्ति समुदाय की बेईज्जती करे, भेदभाव करे, हनन करे या किसी भी प्रकार से उसकी पहचान के आधार पर उस पर जुल्म-ज्यादती करे।




हम आलोचना करते हैं, नकारते हैं, एैसी सभी ताकतों को  चाहे वह प्रभुत्ववादी जातियां हों या स्वयं राज्य जिनकी वजह से सुरेखा भोतमांगे खैरलांजी से, राजस्थान से देलटा मेधवाल, केरला से मेधना, जीशा जैसी दलित महिलायें सोनी सोरी जैसी आदिवासी महिलायें, भगाना से नवयुवतियां, बीजापुर की महिलायें, मेवाल और मुज्जफरनगर की मुस्लिम महिलायें व अन्य तमाम एैसी महिलायें इस उतेजित हिन्दुत्व राजनीति की आग में झुलस गयी हैं। हम न्याय और जवावदेही की मांग करते हैं इन महिलालों  के लिये व इनके जैसी हजारो महिलाओं  के लिये जो  हर साल इन जुल्मों का शिकार होती हैं। साथ ही यह मांग भी करते हैं कि तुरंत राज्य इन अपराधी प्रवत्ति के लोगों को, जो  इन अपराधों को बेधडक करते हैं, पर रियायत वढील को खत्म करें। हम चारो ओर फैली असमानताओं हिंसा अत्याचार और क्रूरता को जड़ से  खत्म करने की मांग करते हैं।

महिला आन्दोलन के नेतृत्व में  बतौर कार्यक्रम हमसब अपनी विभिन्न पहचानो के साथ संधर्ष की इस नई राह पर अग्रसर है। हम उस सावित्रीबाई फुले से प्रेरित हैं जो पहली महिला शिक्षक थी, कवित्री थी, लेखिका थी और महिला अधिकारों  पर नेतृत्व की मिशाल थीं जिसने 19वीं शताब्दी में ब्राहम्णवादी, पितृसत्तात्मक ढॉचे को चुनौती दी और साथ ही शूद्रों  और महिलाओ को  जाग्रत कर मनुस्मृति, धार्मिक  लेखों और ब्राहम्णवादी तौर तरीकों को कड़ी चुनौती दी। वह सावित्री बाई फुले ही  थी, जिसने पराम्परागत रूप से चली आ रही महिलाओं पर रोक-टोक व नियंत्रण का बायकाट किया था और हमें आज़ादी की राह लेने का रास्ता दिखाया था।



इसलिये चलो नागपुर, जो सावित्री बाई फुले का सांस्कृतिक और सामाजिक आंदोलन का केन्द्र है। यह वह शहर है जहॉं बाबा साहेब ने आज तक की सबसे बड़ी महिला गोष्ठी शेड्यूल कास्ट फेडरेशन के बैनर तले आयोजित की थी, जिसमें 30 हजार महिलाओं ने एक साथ आकर पितृसत्ता के बत्तर तरीकों को चोट पहुंचायी और हमारी नारी वादी नजरिये औरएक्टीविज़म को प्रेरित किया।

एक एैतिहासिक दिन जब 5000 लोग एक जुट होकर कविताओं, नृत्य, गानों और परफामेन्स के जरिये खुद को अभिव्यक्त करेंगी । चलो नागपुर की कल्पना इसका आयोजन जिसका खर्च कई सौ महिलाओं द्वारा व्यक्तिगत रूप से किया गया है।
चलो कि मनुवाद और  हिन्दुत्व के खिलाफ -
चलो कि ब्राहम्ण बाद और  पितृसत्ता के खिलाफ
चलो कि मिल कर चलें।
हजारो  सलाम; जय सावित्री, जय फातिमा, जय भीम, जय वीरसा


स्थान - इन्दौरा मैदान, इन्दौरा
चौक,  कामटी रोड, नागपुर
समय - 10.00 सुबह से 4.00 बजे शाम

आयोजकों की तरफ से

अभिन्यां कांवले, अजिता राय, अनिता घई, बिटटू कोर्तिक कोनडिटा, छाया खोब्रागडे, दुर्गा झा, एलिना हारो, हसिना खान, जया शर्मा, किरन देशमुख, लता प्रतिभा, मुधुकर, माधवी कुकरेजा, मनिशा बंगाड, मंनजुला प्रदीप, मारिया सेशू, मोनिशा बहल, निषा शिडें, निवेदितामेनन, प्रदन्य बागडे, रजनी तिलक, रिनुपरना, संगीता मनोजी, संदयाली अरूना

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